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Thursday, April 19, 2012

सिनेमा को नए रंग दे रही स्त्रियां

‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं। 

लाइट, कैमरा, एक्शन.. 
फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई की फिल्में आम जीवन को गहरे छूती हैं। इन फिल्मों में कहीं नहीं लगता कि हम वास्तविक जीवन से इतर कुछ देख सुन रहे हैं। सिनेमा में योगदान के लिए सई परांजप को 1996 में पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है। अगला नाम अपर्णा सेन का है। अपर्णा बंगाली सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री रही हैं। एक अभिनेत्री केवल अभिनय के लायक होती है.., इस मिथक की धज्जियां अपर्णा ने निर्देशन की कमान संभालकर उड़ाईं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन से यह भी साबित कर दिया कि निर्देशन के मामले में महिलाएं कहीं कमतर नहीं। अपर्णा की परोमा, मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, 15 पार्क एवेन्यू, द जैपनीज वाइफ और इति मृणालिनी जैसी नायाब फिल्में सिनेमा प्रेमियों के सर चढ़कर बोली हैं। अपर्णा की हर आने वाली फिल्म का शिद्दत से इंतजार रहता है उनके प्रशंसकों को। 

अब उस महिला की बात, जो न सिर्फ फिल्में बनाती है, बल्कि फिल्मी कलाकारों को अपने इशारों पर भी नचाती है। वे सरोज खान के बाद इंडस्ट्री की लोकप्रिय कोरियोग्राफर हैं। यहां बात फराह खान की हो रही है, जो एक अच्छी फिल्म निर्देशक भी हैं। फराह अपने खास अंदाज और बेबाक शैली के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मैं हूं ना और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। उनकी फिल्में व्यावसायिक स्तर पर भी अच्छी साबित हुई हैं। 

जोया अख्तर असीम संभावनाओं से भरी हैं। रचनात्मकता भले उन्हें विरासत में मिली हो, लेकिन केवल दो फिल्मों से वे खुद को काबिल फिल्मकार के रूप में स्थापित कर चुकी हैं। लक बाय चांस और ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ऐसी फिल्में हैं, जो शायद जोया जैसी युवा महिला निर्देशक ही सोच बुन सकती हैं। जोया ने फिल्मों को एक नए विस्तार के साथ सामने रखा है, खासकर रिश्तों के यथार्थ को। इस मामले में जोया का कोई सानी नहीं। हाल में हुए फिल्मफेयर अवॉर्डस में उनकी फिल्म ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ने सर्वश्रेठ निर्देशन समेत सात पुरस्कार हासिल किए हैं। मुंबई के सोफिया कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट रीमा कागती ने पहली फिल्म हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड से लोगों का दिल जीत लिया था। शुरुआत में वो इतने सारे फिल्मी सितारों के साथ काम करने, उन्हें निर्देशित करने की कल्पना मात्र से आशंकित हो गई थीं। पहले दिन बोमन ईरानी और शबाना के साथ शूटिंग थी। वे घबराई हुई थीं, लेकिन जल्द ही सबकुछ ठीक हो गया। बतौर निर्देशक उनकी दूसरी फिल्म तलाश है। इसमें आमिर खान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में हैं(माधवी शर्मा गुलेरी,अहा ज़िंदगी,5.4.12)।

6 comments:

  1. Nice.

    आधुनिक लगने वाली महिलाओं के जीवन की त्रासदी दर्शाती यह कहानी पढ़ें-
    http://mankiduniya.blogspot.com/

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  2. शुक्रवारीय चर्चा-मंच पर

    आप की उत्कृष्ट प्रस्तुति ।

    charchamanch.blogspot.com

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  3. महिलाएं हर क्षेत्र मेन अपनी उपस्थिती दर्ज करा रही हैं ... इसमें तो बहुत पहले से संलग्न हैं

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