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Sunday, May 27, 2012

कोलकाता में बिहार शताब्दी समारोह

कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में बिहार शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में 27 मई 2012 को आयोजित कार्यक्रम में भोजपुरी अभिनेता व गायक मनोज तिवारी तथा अभिनेत्री व गायिका प्रतिभा सिंह।





















Tuesday, May 22, 2012

'कलकतिया भउजी' में गायिका की भूमिका में प्रतिभा सिंह


भोजपुरी गायिका प्रतिभा सिंह फिल्म कलकतिया भउजी में गायिका की भूमिका अदा कर रही हैं। फिल्म की शूटिंग शुरू हो चुकी है। फिलहाल उन्होंने छपरा के समीप तरइयां रामबाग गांव में अपनी दो दिन की शूटिंग आज रविवार 27 मई 2012 को पूरी की। शेष शूटिंग जल्द ही कोलकाता में होगी। इस फिल्म के निर्देशक हैं अशोक जायसवाल, जिन्होंने प्रतिभा सिंह के म्यूज़िक एलबम 'मेहरारू ना पइब' का निर्देशन किया है। प्रतिभा सिंह ने इसके पहले भी कई फिल्मों में अभिनय किया है जिनमें प्रमुख हैं भाई हो त भरत नियन, बहिना तोहरे खातिर। इस फिल्म में अनुराग नायक एवं मीरा नायिका की भूमिका में हैं। इंद्राणी सिंह एवं डाली आदि ने भी इसमें अभिनय किया है।

Sunday, April 22, 2012

ज़ीरो फिगरवालियों का स्टंट

किसी पुरानी फिल्म का क्लाइमेक्स याद कीजिए — खूबसूरत और फूलसी कोमल नायिका को खलनायक ने रस्सी से बांध रखा है। वो सुपर हीरो का इंतजार कर रही है, जो उसे छुड़ाकर ले जाएगा। हीरो आता है और खलनायक की पिटाई करता है। इसके बाद नायक-नायिका की शादी होती और फिल्म का होता — हैप्पी द एंड। गुजरे जमाने में ऐसी फिल्मों से बाजार गर्म रहता था, लेकिन ऐसा कब तक होता? 20वीं सदी में फिल्मों में नए-नए बदलाव हुए। महिलाओं की छवि सशक्त तरीके से प्रस्तुत करने के प्रयोग किए गए। नायिका को खूबसूरत अंदाज में पेश करने के साथ शक्तिशाली और मानसिक तौर पर असाधारण शक्ति से सराबोर भी दिखाया जाने लगा। हैल वॉय फिल्म में शैरमेन और स्टार वार्स में प्रिंसेस लिया जैसा मजबूत किरदार पेश किया गया। चार्ली एंजेल की तीन तितलियां (नायिकाएं) जासूसी कंपनी चलाते हुए बड़े से बड़ा स्टंट करने से भी नहीं डरतीं। शुरुआती सफलताओं के बाद अभिनेत्रियों में स्टंट करने की इच्छा जोर पकड़ने लगी। करीब-करीब सभी फिल्मों में नायिकाओं पर कम से कम एक स्टंट दृश्य फिल्माया जाने लगा। जेम्स बॉन्ड की फिल्म — डाई ऐनदर डे में हैलीबेरी और मिशेल येहो, द वर्ल्ड इज नॉट एनफ में डेनिस रिचर्डस, लिव एंड लेट डाई में जेन सिमोर को साहसी दिखाया गया। शुरुआती कोशिशों के बाद स्टंट दृश्य ट्रेंड ही बन गए। एक इंटरव्यू से खुलासा हुआ कि बहुत सी फिल्मों में एक्शन दृश्य करने वाली एंजेलिना जोली को नए-नए स्टंट करने की प्रेरणा अपने बच्चों से मिलती है, क्योंकि उनको स्टंट दृश्य देखना अच्छा लगता है। बात हॉलीवुड की या फिल्मों की ही नहीं, अभिनेत्रियों के स्टंट का जादू छोटे परदे पर भी चलने लगा है। टेलीविजन पर साहस की थीम के इर्द-गिर्द कई धारावाहिक बनाए गए हैं, जिनमें हिस्सा लेने वाली युवतियों का उत्साह युवकों से किसी मायने में कमतर नहीं है। आधुनिकीकरण के इस प्रभाव से भारतीय सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। 1935 में वाडिया बंधु की हंटरवाली की नायिका का सुनहरे परदे पर खूबसूरती का दम साहस देखकर लोगों ने दांतों तले अंगुलियां दबा लीं। ऊंची-ऊंची इमारतों पर एक से दूसरी जगह कूदती, घोड़े को बिजली की गति दौड़ाती, जोखिम भरे स्टंट करने वाली अभिनेत्री नाडिया के एक-एक दृश्य पर लोग तालियां बजाए बगैर रह नहीं पाते। यह वह दौर था, जब घरेलू महिलाएं परदे की ओट में रहती थीं। 

ऐसे समय में सुनहरी जुल्फों वाली विदेशी महिला नाडिया के साहस को लोगों ने खूब सराहा। दस-दस गुंडों पर घूंसे और चाबुक बरसाती नाडिया उस दौर में नारी शक्ति का प्रतीक बन गई। इन्हीं बेखौफ अदाओं के चलते उसका नाम ही पड़ गया फीयरलेस नाडिया। इस फिल्म से वह सिल्वर स्क्रीन की स्टंट क्वीन बन गई। भारतीय सिनेमा में हम महिलाओं की अनेक छवियां देखते हैं। ये छवियां समय-समय पर बदली हैं। समाज में स्त्री की स्थिति में जिस गति से बदलाव आ रहा है, उसी तेजी से सिनेमा के परदे पर भी उसकी भूमिकाएं बदल रही हैं। हिंदी सिनेमा में महिलाओं की भूमिका को मजबूत बनाने का श्रेय देविका रानी को भी जाता है। जिस समय में फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था, उस दौर में देविका रानी ने महिलाओं को फिल्मों में प्रमुख स्थान दिलाया। जिस तरह नाडिया ने अपने स्टंट से लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया था, ठीक उसी तरह हेमामालिनी ने सीता और गीता में खलनायक को मारकर दर्शकों की तालियां बटोरीं। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। खून भरी मांग की ज्योति तो कभी फूल बने अंगारे की नम्रता बनकर एक्ट्रेस रेखा तलवार की नोक पर खलनायक को परास्त कर वाह-वाही लूटती रहीं। फिल्म चालबाज में चुलबुली श्रीदेवी ने भी इस तरह के कारनामों की फेहरिस्त में अपना नाम दर्ज कराया। दक्षिण भारतीय अभिनेत्री विजया शांति तेजस्विनी में मजबूत इरादों वाली पुलिस अफसर की भूमिका निभाकर चर्चित हुईं। फिल्म दस में शिल्पा शेट्टी ने पुलिस अफसर की भूमिका निभाई। 

पुरानी फिल्म डॉन में जीनत अमान के स्टंट से प्रेरित होकर प्रियंका चोपड़ा ने नई फिल्म डॉन में भी स्टंट के नए प्रयोग किए। इन प्रयोगों के जरिए प्रियंका के मन में स्टंट के प्रति रुझान पैदा हुआ और उन्होंने खतरों के खिलाड़ी रिएलिटी शो में खतरनाक स्टंट करने से गुरेज नहीं किया। करीना कपूर ने भी फिल्म गोलमाल 3 में अनूठा स्टंट किया। कार के बोनट पर खड़े होकर उन्होंने संतुलन बनाए रखा। धूम में ईशा देओल, धूम २ में ऐश्वर्या राय और चांदनी चौक टू चाइना में दीपिका पादुकोण ने ऐसी ही भूमिका निभाई है। चर्चा है कि शांत और घरेलू छवि से बाहर आने के लिए आतुर दीया मिर्जा ने आने वाली फिल्म एसिड फैक्टरी में खतरों से खेलने का जोखिम उठाया है। स्टंट करने वाली अभिनेत्रियों की फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ता है पूर्व मिस यूनिवर्स लारा दत्ता का। उन्होंने फिल्म ब्लू में समुद्र के अंदर बहुत से स्टंट खुद ही किए हैं। सच तो ये है कि सुंदर नायिकाएं ‘साहस’ को मसाले की तरह इस्तेमाल करती हैं और सफलता के लिए सीढ़ी बनाने से भी बाज नहीं आतीं। ग्लैमर और साहस का घालमेल ऐसा ही है! सुंदर नायिकाएं ‘साहस’ को मसाले की तरह इस्तेमाल करती हैं और सफलता के लिए सीढ़ी बनाने से भी बाज नहीं आतीं। ग्लैमर और साहस का घालमेल ऐसा ही है! (कोषा गुरुंग,अहा! ज़िंदगी,2.2.12)

Thursday, April 19, 2012

सिनेमा को नए रंग दे रही स्त्रियां

‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं। 

लाइट, कैमरा, एक्शन.. 
फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई की फिल्में आम जीवन को गहरे छूती हैं। इन फिल्मों में कहीं नहीं लगता कि हम वास्तविक जीवन से इतर कुछ देख सुन रहे हैं। सिनेमा में योगदान के लिए सई परांजप को 1996 में पद्मभूषण से नवाजा जा चुका है। अगला नाम अपर्णा सेन का है। अपर्णा बंगाली सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री रही हैं। एक अभिनेत्री केवल अभिनय के लायक होती है.., इस मिथक की धज्जियां अपर्णा ने निर्देशन की कमान संभालकर उड़ाईं। उन्होंने अपनी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन से यह भी साबित कर दिया कि निर्देशन के मामले में महिलाएं कहीं कमतर नहीं। अपर्णा की परोमा, मिस्टर एंड मिसेज अय्यर, 15 पार्क एवेन्यू, द जैपनीज वाइफ और इति मृणालिनी जैसी नायाब फिल्में सिनेमा प्रेमियों के सर चढ़कर बोली हैं। अपर्णा की हर आने वाली फिल्म का शिद्दत से इंतजार रहता है उनके प्रशंसकों को। 

अब उस महिला की बात, जो न सिर्फ फिल्में बनाती है, बल्कि फिल्मी कलाकारों को अपने इशारों पर भी नचाती है। वे सरोज खान के बाद इंडस्ट्री की लोकप्रिय कोरियोग्राफर हैं। यहां बात फराह खान की हो रही है, जो एक अच्छी फिल्म निर्देशक भी हैं। फराह अपने खास अंदाज और बेबाक शैली के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने मैं हूं ना और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है। उनकी फिल्में व्यावसायिक स्तर पर भी अच्छी साबित हुई हैं। 

जोया अख्तर असीम संभावनाओं से भरी हैं। रचनात्मकता भले उन्हें विरासत में मिली हो, लेकिन केवल दो फिल्मों से वे खुद को काबिल फिल्मकार के रूप में स्थापित कर चुकी हैं। लक बाय चांस और ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ऐसी फिल्में हैं, जो शायद जोया जैसी युवा महिला निर्देशक ही सोच बुन सकती हैं। जोया ने फिल्मों को एक नए विस्तार के साथ सामने रखा है, खासकर रिश्तों के यथार्थ को। इस मामले में जोया का कोई सानी नहीं। हाल में हुए फिल्मफेयर अवॉर्डस में उनकी फिल्म ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ने सर्वश्रेठ निर्देशन समेत सात पुरस्कार हासिल किए हैं। मुंबई के सोफिया कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएट रीमा कागती ने पहली फिल्म हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड से लोगों का दिल जीत लिया था। शुरुआत में वो इतने सारे फिल्मी सितारों के साथ काम करने, उन्हें निर्देशित करने की कल्पना मात्र से आशंकित हो गई थीं। पहले दिन बोमन ईरानी और शबाना के साथ शूटिंग थी। वे घबराई हुई थीं, लेकिन जल्द ही सबकुछ ठीक हो गया। बतौर निर्देशक उनकी दूसरी फिल्म तलाश है। इसमें आमिर खान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में हैं(माधवी शर्मा गुलेरी,अहा ज़िंदगी,5.4.12)।

Tuesday, March 6, 2012

फिल्म इंडस्ट्री में कामकाजी जोड़े

घर की दहलीज से बाहर आकर अपने पति या पत्नी के साथ काम करना दुधारी तलवार साबित हो सकता है। एक ओर आपसी रिश्ते में तनाव तो दूसरी ओर प्रोफेशनल तरीके से काम न हो पाने का खतरा बना रहता है। इसके बावजूद बॉलीवुड के जोड़े व्यावसायिक साझेदार बनने में हिचकते नहीं हैं। सुपर स्टार आमिर खान और उनकी डायरेक्टर पत्नी किरण राव इस बात का आदर्श उदाहरण हैं कि घर और काम को कैसे बैलेंस किया जा सकता है। समीक्षकों द्वारा प्रशंसित, किरण की ‘धोबीघाट’ एक-दूसरे के सहयोग के कारण निर्बाध पूरी हो गई। हालांकि परफेक्शनिस्ट आमिर खान इस फिल्म के प्रोड्यूसर और एक्टर के साथ-साथ किरण के पति भी हैं, परंतु उन्हें किरण के भरोसे और नजरिए पर विश्वास था। इसीलिए वह फिल्म की परिकल्पना से लेकर प्रोडक्शन तक, किरण के कंधे से कंधा मिलाकर चले और किरण ने अंतत: उन्हें ड्रीम प्रोड्यूसर का खिताब दिया। उनके रिश्ते में एक बात साफ नजर आती है कि वे पर्सनल और प्रोफेशनल, दोनों ही स्तरों पर एक-दूसरे को समान मानते हैं। 

अपनी पत्नी कल्की को ‘देव डी’ और ‘दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ में डायरेक्ट कर चुके राइटर-डायरेक्टर अनुराग कश्यप का मानना है कि उनकी वर्किंग रिलेशनशिप का आधार आपसी भरोसा, सम्मान और सहमति है। दूसरी ओर कल्कि स्वीकार करती हैं कि कई मौकों पर गहरे मतभेद भी उभरते हैं, पर वह उन्हें गंभीरता से नहीं लेतीं। वह मानती हैं कि लव और केयर की तरह तकरार भी मॉडर्न रिश्तों का जरूरी हिस्सा है। डायरेक्टर अब्बास टायरवाला ने भी अपनी पत्नी पाखी द्वारा लिखित स्क्रिप्ट पर अपनी पिछली फिल्म ‘झूठा ही सही’ बनाई थी, जिसमें हीरोइन भी पाखी थीं। अब्बास कहते हैं, पत्नी को कभी हल्का मत समझिए, कभी नहीं। 

ऐसे जोड़े आज इंडस्ट्री में बढ़ते वर्किंग कपल्स की संख्या पर आश्चर्य नहीं करते और अब हर काम की बागडोर पुरुषों के हाथों में ही नहीं है। डायरेक्शन, प्रोडक्शन, एडीटिंग आदि जो काम पुरुषों के माने जाते रहे हैं, उन्हें अब स्त्रियां भी करने लगी हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की सारी फिल्में उनकी पत्नी पीएस भारती एडिट करती हैं। इसके विपरीत फराह खान की सभी फिल्में उनके एडीटर पति शिरीष कुंदेर एडिट किया करते हैं। कभी इनकी ही तरह विधु विनोद चोपड़ा और रेणु सलूजा मिलकर काम किया करते थे। विशाल भारद्वाज भी अपनी गायिका पत्नी रेखा ‘नमक इश्क का’ फेम से कम से कम एक गाना अपनी हर फिल्म में जरूर गवाते हैं। आशुतोष गोवारीकर को मदद करने के लिए उनकी पत्नी सुनीता भी हमेशा उनके साथ सेट पर मौजूद रहती हैं।  

देखा जाए तो वर्किंग कपल्स का टे्रंड इंडस्ट्री में नया नहीं है। पहले भी देविका रानी-हिमांशु राय, कमाल अमरोही-मीना कुमारी, गुरुदत्त-गीता दत्त/ वहीदा रहमान, अमोल पालेकर-संध्या गोखले जैसे कपल्स ने कामकाज में साझेदारी को सफलतापूर्वक निभाया है। यह टे्रंड पूरी तरह भारतीय टे्रंड भी नहीं है। चार्ली चैप्लिन, सेसिल बी डेमिले, जीन रेनोइर, डीडब्ल्यू ग्रीफिथ, इडो ल्यूपिनो आदि बहुत-सी फिल्मी हस्तियों ने अपने पार्टनर के साथ कई फिल्मों में सफलतापूर्वक काम किया। 

हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कपल्स की प्रोफेशनल साझेदारी का कारण पैसा और किफायत नहीं है। गोवारीकर की पत्नी सुनीता सफलतापूर्वक ‘आशुतोष गोवारीकर प्रोडक्शंस’ संभालती हैं और घर भी। उनकी सलाह है कि निजी हितों के टकराव से बचो। 

प्रोफेशनल साझेदारी का प्रमुख फायदा है कि कपल्स को अधिकांश समय साथ गुजारने का मौका मिलता है, निकटता का आनंद उठा पाते हैं। इससे आपसी बांडिंग और विश्वास भी बढ़ता है। ‘अग्निपथ’ के सिनेमाटोग्राफर किरण देवहंस की आत्मीयता अपनी पारसी डायरेक्टर पत्नी अबान से देखने लायक है। जोड़े वर्क प्लेस की यादें घर लेकर जाते हैं, जिससे उनका रिश्ता बड़ा संवेदनशील हो जाता है। फिल्म ‘अभिमान’ की तरह आपसी ईष्र्या और दुश्मनी का भी जोखिम रहता है। तलाकों की बढ़ती संख्या का एक कारण प्रोफेशनल साझेदारी भी है। एक जैसी रूचि रखना अलग बात है, एक साथ काम करना अलग बात। ज्यादातर पति अपनी पत्नी की सफलता को नहीं पचा सकते और सिनेमा के बिजनेस में कोई भी कुछ बन सकता है। रिश्ते को मजबूत रखने के लिए जरूरी है कि जोड़े भिन्न क्षेत्रों में काम करें(नरेन्द्र देवांगन,दैनिक ट्रिब्यून,26.2.12)।

Tuesday, February 7, 2012

सितारे जमकर दे रहे हैं गालियां

एक ज़माना था, जब धर्मेन्द्र गुस्से में विलेन का खून पीने पर उतारू हो जाते थे, तब भी गाली के नाम पर 'कमीने... कुत्ते' से ज्यादा कुछ नहीं कह पाते थे। हीरो तो हीरो, 'शोले' के आइकॉनिक विलेन गब्बर सिंह यानी अमजद खान भी 'हरामज़ादो...' से बड़ी गाली पूरी फिल्म में नहीं दे पाए थे। तब 'साला' और 'साली' को भी गाली समझा जाता था। कॉमेडी सीक्वेंस में भी गाली वर्जित थी और भले ही एक्टर खुद को साला कह रहा हो, गाली तो गाली थी। इसीलिए जब दिलीप कुमार ने 'सगीना' में 'साला मैं तो साहिब बन गया...' गाया, सेंसर बोर्ड की भौंहें तन गईं और बड़ी मुश्किल से गाना पास कराया जा सका। 

लेकिन अब सिनेमा के साथ गालियों ने भी बड़ी उन्नति कर ली है। विलेन और वैंप तो छोडि़ए, हीरो-हीरोइन पर्दे पर गंदी से गंदी गालियां देते हैं। गालियों के मामले में न सिर्फ सेंसर बोर्ड उदार हो चुका है, बल्कि किरदार और पटकथा की मांग की आड़ में फिल्म मेकर और एक्टर्स भी इसे जायज़ मान चुके हैं। 'इश्किया' में भौंडी गालियां बकने वाले सम्मानित अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक को गालियों पर आपत्ति नहीं है। वे कहते हैं- 'इश्किया' में पृष्ठभूमि और किरदार उत्तर भारत के थे, जहां वैसी ही भाषा बोली जाती है। इस पर इतनी हाय-तौबा मचाने की जरूरत क्या है!' 

गालियों के प्रचलन का आलम यह है कि आज ऐसी फिल्म याद करना ही मुश्किल होगा, जिसमें गालियां न हों। गालियों के इतिहास के बारे में वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र जैन कहते हैं- 'पर्दे पर खुल्लम खुल्ला गालियों की शुरुआत शेखर कपूर ने 'बैंडिट क्वीन' से की, जिसमें हर डाकू खतरनाक गालियां देता है। लेकिन इस शुरुआत को परंपरा में बदलने वाले फिल्मकार प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, सुधीर मिश्रा जैसे लोग हैं। प्रकाश झा की 'गंगाजल' में भरपूर गालियां हैं तो 'राजनीति' और 'आरक्षण' भी गाली से खाली नहीं है। विशाल भारद्वाज की 'ओमकारा' में यू. पी.-बिहार की शुद्ध गालियां हैं। सुधीर मिश्रा ने 'हजारों ख़्वाहिशें ऐसी' में यशपाल शर्मा के मुंह से बहन की गालियां दिलवायी हैं तो पिछले दिनों आई अपनी फिल्म 'ये साली जि़ंदगी' के टाइटल तक में गाली पिरो दी है। 'पीपली लाइव', 'देहली-बेली', 'नो वन किल्ड जेसिका', 'चमेली', 'जब वी मेट', 'तीस मार $खां', 'गोलमाल-३', 'रा-वन' आदि कई फिल्में तो कहानी से ज्यादा गालियों के लिए याद की जाती हैं।' 

मज़े की बात यह है कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों की तरह गाली के क्षेत्र में भी स्त्री अब पुरुष से पीछे नहीं रही। सच तो यह है कि गाली-प्रधान फिल्मों में ज्यादा दमदार गालियां स्त्री किरदारों ने ही दी हैं। नंबर १ हीरोइन करीना कपूर गाली के मामले में भी नं. १ हैं, जिन्होंने 'चमेली' में पहली बार गालियों का अभ्यास किया और आगे चलकर 'जब वी मेट', 'गोलमाल-३', 'रा-वन' जैसी फिल्मों में ज़बान निरंतर सा$फ की। रानी मुखर्जी उनसे थोड़ा ही पीछे हैं, जिन्होंने 'बिच्छू' से लेकर 'नो वन किल्ड जेसिका' तक कई फिल्मों में सामने वाले किरदारों को गालियों से नवाज़ा। 

साड़ी-बिंदी छाप भारतीय नारी की इमेज़ रखने वाली विद्या बालन तक 'इश्किया' और 'द डर्टी पिक्चर' में डर्टी-डर्टी गालियां बक चुकी हैं। हीरोइनें ही नहीं, सपोर्टिंग एक्ट्रेस भी पर्दे पर गालियों की शान बढ़ाती देखी गई हैं। क्या 'दिल्ली-६' में आप दिव्या दत्ता के मुंह से निकली गालियां भुला सकते हैं? बहरहाल, गालियों के बारे में करीना कपूर का कहना है- 'गालियां आज हमारी बोलचाल का हिस्सा हैं। इनका प्रचलन हर जगह हर सभ्यता में है। मुझे पर्दे पर गालियां देने में कोई संकोच नहीं होता। मेरे लिए वह सब $फन है।' 

पर्दे पर तो अमिताभ बच्चन सरीखे चंद अपवादों को छोड़कर सभी गालियां दे रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की पिक्चर ज़रा ज्यादा डर्टी है। कोई बात-बात में गाली देता है तो कोई सिर्फ गुस्से में और कोई सिर्फ प्यार में, लेकिन अधिकतर लोग गालियों का इस्तेमाल करते हैं। धीरेंद्र जैन बताते हैं- 'पुराने लोग गालियां कम देते थे। सिर्फ नरगिस, तनूजा, आर. डी. बर्मन, महमूद, पहलाज निहलानी जैसे चंद लोगों के मुंह से गालियां सुनी जाती थीं। राज कपूर, धर्मेन्द्र, राखी, गुलज़ार, शर्मिला टैगोर, माला सिन्हा, जीतेंद्र आद गुस्से में गालियां बक बैठते थे। 'हम साया' के सेट पर माला सिन्हा और शर्मिला टैगोर तथा 'दाग' के सेट पर शर्मिला टैगोर व राखी के बीच गाली-गलौच एक ऐतिहासिक गाली-गलौच थी। ज्यादातर फिल्मी हस्तियां नज़ाकत और शराफत से पेश आती थीं। लेकिन अब स्थिति उल्टी है।' 

आज निज़ी जीवन के गालीबाज लोगों में संजय दत्त, महेश मांजरेकर, शक्ति कपूर, फरहा, अजय देवगन, रानी मुखर्जी, विधु विनोद चोपड़ा, सलमान ख़ान, महेश भट्ट, शेखर कपूर, डेविड धवन, सचिन, प्रीति जिंटा, जैकी श्रॉफ, राजकुमार संतोषी, विजय राज आदि के नाम अग्रणी हैं। शाहरुख खान, अनिल कपूर, उदित नारायण, गोविंदा, मधुर भंडारकर, सोनू निगम, हिमेश रेशमिया, जीतेंद्र, कुमार शानू, करीना कपूर आदि अगल-बगल देखने के बाद गालियों का उच्चार करते हैं कि कोई अवांछित आदमी तो नहीं सुन रहा। 

इनसे अलग दिलीप कुमार, सायरा बानो, अमिताभ बच्चन, आमिर खान, रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विवेक ओबेरॉय, लारा दत्ता, अमीषा पटेल, करिश्मा कपूर, श्रवण, शिल्पा शेट्टी आदि बहुत-सी फिल्मी हस्तियों को गाली से परहेज है। अमिताभ कहते हैं- 'मेरे पारिवारिक संस्कार मुझे पर्दे तक पर गाली देने की इज़ाजत नहीं देते। इसीलिए मैंने 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' में गाली की जगह बीप की आवाज़ इस्तेमाल की थी।' 

कौन फिल्मी हस्ती कौन-सी गाली देती है, यह तो यहां नहीं लिखा जा सकता, पर गालियों के बारे में एक रोचक तथ्य उभर कर सामने आता है। देखिए न, शुरू में गालियां पशु-पक्षियों पर आधारित थीं- उल्लू, उल्लू का पट्ठा, गधा, बैल, ऊंट, (आस्तीन का) सांप...। फिर गालियों में अंधे, लंगड़े, बहरे, पागल जैसी चारित्रिक विशेषताएं और मां-बहन जैसे रिश्ते आ गए। लेकिन कमाल की बात यह है कि दुनिया की वजनदार गालियां इंसान के गुप्त अंगों पर केंद्रित हैं। एक-एक अंग पर सौ-सौ गालियां रची हुई होंगी। उससे भी कमाल की बात यह है कि ये किसी स्कूल में नहीं सिखाई जातीं, सभ्य समाज में वर्जित हैं, इनकी कोई डिक्शनरी भी नहीं है, फिर भी इनका ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर होता रहता है। बहरहाल, अपने उपयोग के लिए 'मां की आंख' जैसी सॉफ्ट गाली ईजाद कर चुके (या चुरा चुके) निर्देशक सुनील अग्निहोत्री कहते हैं- 'फिल्म इंडस्ट्री में हर भाषा और संस्कृति की गालियों का चलन है। इसका कारण यह है कि यहां देश के कोने-कोने से आए लोग अपनी-अपनी ज़मीन की गालियां साथ लेकर आए हैं।' 

पिछले कुछ सालों में पर्दे पर गालियों का प्रचलन निरंतर बढ़ा है। अब ऐसी फिल्म याद करना मुश्किल है, जिसमें गालियां न हों। विलेन-वैंप ही नहीं, हीरो-हीरोइन भी पर्दे पर गालियां देते नज़र आते हैं। 

पर्दे पर तो गालियां दी ही जा रही हैं, पर्दे के पीछे की तस्वीर और भी डर्टी है। चंद अपवादों को छोड़कर ज्य़ादातर फिल्मी हस्तियां आम बोलचाल में गालियों का प्रयोग करती हैं। इस मामले में हीरोइनें भी पीछे नहीं हैं...(अनिल राही,दैनिक भास्कर,4.2.12)

Sunday, January 1, 2012

बॉलीवुड 2012

हैप्पी न्यू ईयर! नए साल के पहले दिन यह बात सिर्फ हम ही नहीं बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री आपसे कह रही है। इरादा है बड़ी-बड़ी फिल्में लाने का और वादा है आपको भरपूर मनोरंजन देने का। आइए देखें कि 2012 के पिटारे में आपके लिए कितना फिल्मी मसाला है। 

2012 की खास बातें 
साल 2012 में कई सारी फिल्मों के रीमेक और सीक्वल आपको देखने को मिलेंगे। वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई, दंबग-2, क्या सुपरकूल हैं हम, हाउसफुल-2, रेस-2, इनमें से प्रमुख हैं। बात करें रीमेक की तो अग्निपथ, प्लेयर्स सरीखी फिल्में हैं। इसके अलावा साल 2012 की एक खास बात यह भी है कि दक्षिण के कई सितारे और लेखक हिंदी फिल्मों में दिखेंगे। जिनमें विक्रम जिन्होंने रावण में अहम भूमिका निभाई थी प्रमुख हैं। इसके अलावा कोलावरी डी फेम धनुष ने भी ऐलान किया है कि वह भी हिंदी फिल्मों में काम करना चाहते हैं। इस तरह भी कई बड़ी फिल्में बनेंगी और उम्मीद है कि चलेंगी। इस साल कई ऑफबीट फिल्में भी रिलीज होंगी। 

साल का पहला हफ्ता बड़ी फिल्मों के लिए मुफीद नहीं समझा जाता है। लेकिन पिछले साल ‘नो वन किल्ड जेसिका’ के आने और सफल होने के बाद यह मिथ टूटा है और इस साल की शुरुआत भी एक बड़ी फिल्म ‘प्लेयर्स’ से होने जा रही है। 2003 में आई हॉलीवुड की सुपरहिट एक्शन-थ्रिलर ‘द इटैलियन जॉब’ के इस हिन्दी रीमेक में अभिषेक बच्चन, बॉबी देओल, बिपाशा बसु, सोनम कपूर, नील नितिन मुकेश जैसे ढेरों सितारे हैं। थ्रिल के उस्ताद निर्देशकों अब्बास-मस्तान की फिल्म है यह, जिसमें न्यूजीलैंड और गोवा के खूबसूरत नजारे हैं और एक बहुत बड़े सोने के जखीरे को कब्जाने का रोमांच भी। 

साल के पहले महीने का बड़ा आकर्षण होगी ‘अग्निपथ’। अपने पिता यश जौहर की बनाई ‘अग्निपथ’ के रीमेक को निर्माता करण जौहर फिर से नए रंग-रूप में निर्देशक करण मल्होत्र की कमान में लेकर आ रहे हैं। हृतिक रोशन, प्रियंका चोपड़ा, संजय दत्त और ऋषि कपूर के अलावा ‘चिकनी चमेली’ बन कर कैटरीना कैफ भी नजर आएंगी इस फिल्म में। ‘खोसला का घोसला’, ‘ओए लकी लकी ओए’ और ‘लव सेक्स और धोखा’ वाले डायरेक्टर दिवाकर बैनर्जी की पॉलिटिकल-थ्रिलर फिल्म ‘शंघाई’ भी जल्दी ही आएगी जिसमें अभय देओल, कल्कि कोचलिन, इमरान हाशमी आदि होंगे। दिवाकर इसे अब तक सबसे बड़ी ‘हिंसक’ फिल्म बता रहे हैं। 

एक्टिंग में कुछ खास न चल पाए संजय कपूर इस साल बतौर निर्माता अपनी पारी शुरू करने जा रहे हैं। फिल्म का नाम है ‘इट्स माई लाइफ’ और निर्देशक हैं अनीस बज्मी। पर्दे पर अभी तक फिसड्डी रहे हरमन बवेजा के साथ जेनेलिया डिसूजा और नाना पाटेकर इस फिल्म को कितनी दूर तक खींच पाते हैं, यह देखना दिलचस्प रहेगा। पिछले साल ‘यमला पगला दीवाना’ लेकर आए समीर कार्णिक अब तुषार कपूर और कुलराज रंधावा को ‘चार दिन की चांदनी’ में लेकर आ रहे हैं। 

हल्के-फुल्के फ्लेवर वाली इस रोमांटिक फिल्म में तुषार अपने पिता जीतेंद्र के स्टाइल में डांस करते हुए नजर आएंगे। पिछले साल ‘खाप’ दे चुके निर्देशक अजय सिन्हा शरमन जोशी, रिया सेन व रायमा सेन के साथ रोमांटिक कॉमेडी ‘3 बैचलर्स’ लाएंगे। कई हिट फिल्में लिख चुके रूमी जाफरी की बतौर डायरेक्टर ‘गली गली में चोर है’ में अक्षय खन्ना, श्रेया सरन और मुग्धा गोडसे दिखाई देंगे। रामगोपाल वर्मा की पुलिस, राजनीति और अंडरवर्ल्ड के मेल पर बन रही फिल्म ‘डिपार्टमेंट’ भी जल्द रिलीज होगी जिसमें अमिताभ बच्चान, संजय दा, राणा डग्गूबाटी, अंजना सुखानी, नसीरुद्दीन शाह आदि नजर आएंगे। 

बड़ी सीक्वल फिल्मों का रहेगा जलवा 
करण जौहर वेलेंटाइन डे पर भी धमाका करेंगे। यू टी वी के साथ मिल कर वह नए निर्देशक शकुन बत्र की रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म ‘एक मैं और एक तू’ में इमरान खान और करीना कपूर को लेकर आएंगे। फरवरी में ही सैफ अली खान की उस होम प्रोडक्शन फिल्म ‘एजेंट विनोद’ के आने की भी सुगबुगाहट है जो लंबे समय से बन रही है और बताया जाता है कि जिसमें जबर्दस्त एक्शन, सस्पेंस, थ्रिल और स्पेशल इफेक्ट्स हैं। सैफ के साथ करीना कपूर एक बार फिर नजर आएंगी श्रीराम राघवन की इस फिल्म में। वैसे काफी मुमकिन है कि यह फिल्म फरवरी में न आकर फिर टल जाए। 

मगर टिप्स के कुमार तौरानी ने तो मनदीप कुमार वाली अपनी फिल्म ‘तेरे नाल लव हो गया’ के लिए 23 फरवरी की तारीख का ऐलान भी कर दिया है। बहुत जल्द शादी करने जा रहे रितेश देशमुख और जेनेलिया डिसूजा की जोड़ी है इस रोमांटिक फिल्म में। दस साल पहले ‘रहना है तेरे दिल में’ लाए साउथ के नामी निर्देशक गौतम मैनन तमिल और तेलुगू में बनी अपनी फिल्म ‘विनायथांडी वारुवाया’ का हिन्दी रीमेक ‘एक दीवाना था’ की शक्ल में लाएंगे। प्रतीक बब्बर और एमी जैक्सन वाली इस फिल्म में जावेद अख्तर के गीत और ए आर रहमान का संगीत खासा प्रभावी बताया जा रहा है। फरवरी में एक और रोमांटिक फिल्म ‘जोड़ी ब्रेकर्स’ भी आएगी। अश्विनी चौधरी की इस फिल्म में आर माधवन के साथ बिपाशा बसु नजर आएंगी। वैसे मुमकिन है कि माधवन की पिछले साल की हिट फिल्म ‘तनु वैड्स मनु’ का सीक्वल 2012 के जाते-जाते रिलीज हो जाए। विक्रम भट्ट के बैनर से भूषण पटेल ‘1920’ का सीक्वल ‘1920 एविल रिटर्न्स’ लाएंगे जिसमें आफताब शिवदासानी के साथ टिया वाजपेयी होंगी। 

बस इतना सा ख्वाब है’ और ‘द्रोण’ जैसी फिल्में बना चुके भाई-बहन सृष्टि बहल आर्य और गोल्डी बहल (सोनाली बेंद्रे के पति) एक कॉमेडी फिल्म ‘लंदन पेरिस न्यूयॉर्क’ लाएंगे जिसमें ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ वाले पाकिस्तानी हीरो अली जफर के साथ अदिति राव हैदरी होंगी जो 2011 में ‘ये साली जिंदगी’ और ‘रॉकस्टार’ में नजर आई थीं। मार्च के महीने में एक और जबर्दस्त एक्शन फिल्म ‘तेज’ प्रियदर्शन के पिटारे में से निकलेगी। 

काफी समय से कॉमेडी फिल्में बना रहे प्रियदर्शन साल भर पहले ‘आक्रोश’ से पटरी बदलने निकले थे। वीनस की ‘तेज’ का नाम पहले ‘बुलेट ट्रेन’ रखा गया था जिसमें अजय देवगन, अनिल कपूर, कंगना राणावत, समीरा रेड्डी, जाएद खान आदि हैं। इस फिल्म के एक्शन सीक्वेंस हॉलीवुड की ‘द बोर्न सुप्रीमेसी’ और ‘हैरी पॉटर’ जैसी फिल्मों के लिए काम कर चुके एक्शन-कोऑर्डिनेटर पीटर पेड्रेरो ने डायरेक्ट किए हैं। समीरा रेड्डी ने इस फिल्म में बाइक पर स्टंट करने के लिए महीनों तक ट्रेनिंग ली थी। 

निर्माता साजिद नाडियावाला और निर्देशक साजिद खान की जोड़ी कॉमेडी फिल्म ‘हाऊसफुल 2’ में अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, रितेश देशमुख, असिन और जैकलिन फर्नांडीज के साथ मैदान में उतरेंगे। एकता कपूर अपनी डबल मीनिंग कॉमेडी फिल्म ‘क्या कूल हैं हम’ का सीक्वल ‘क्या सुपरकूल हैं हम’ में तुषार कपूर, रितेश देशमुख, बिपाशा बसु और साराह जेन डियाज को डायरेक्टर सचिन यार्डी के साथ लाएंगी। विद्या बालन एक बार फिर एक सशक्त रोल में सुजॉय घोष की ‘कहानी’ में इमरान हाशमी के साथ आएंगी। यह एक ऐसी गर्भवती औरत की कहानी है जो अपने पति और अपने होने वाले बच्चे के पिता की तलाश में कोलकाता से लंदन तक जाती है। फिलहाल इसके आने की तारीख 9 मार्च बताई जा रही है। 

रिलीज डेट में बरतेंगे सावधानी 
अप्रैल-मई में आई़ पी़ एल़ के क्रिकेट मैच होने हैं सो मुमकिन है कि इस दौरान आने की हामी भर रही फिल्में ऐन मौके पर टाल दी जाएं। कुणाल देशमुख भट्ट कैंप के लिए इमरान हाशमी और प्राची देसाई को ‘जन्नत 2’ में लाएंगे। रणदीप हुड्डा और एशा गुप्ता भी होंगे इस फिल्म में। यू टी वी स्पॉटब्वॉय के लिए अनुराग कश्यप की बनाई और समीर शर्मा निर्देशित कॉमेडी फिल्म ‘लव शव ते चिकन खुराना’ भी इसी दौरान आएगी जिसमें कुणाल कपूर के साथ हुमा कुरैशी की जोड़ी होगी। ‘दो दूनी चार’ बना चुके हबीब फैजल यशराज फिल्म्स से बोनी कपूर-मोना कपूर के बेटे अजरुन कपूर और पिछले दिनों ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ में आईं परिणीति चोपड़ा को ‘इश्कजादे’ में लेकर आएंगे। 

क्रिकेट मैच खत्म होते ही आने वाली फिल्म चाहे कैसी ही हो उसका भव्य स्वागत होता है। 2011 में ‘फालतू’ जैसी कमजोर फिल्म के चलने के पीछे एक वजह यह भी थी। 2012 में आई पी़ एल के बाद पहले सलमान खान की ‘एक था टाइगर’ को आना था लेकिन अब इस मौके यानी 1 जून को आमिर खान, करीना कपूर, रानी मुखर्जी वाली ‘तलाश’ आएगी जिसे रीमा कागती ने डायरेक्ट किया है। कहने की जरूरत नहीं कि आमिर जैसे स्टार वाली निर्माता फरहान अख्तर की इस फिल्म से आप सहज ही बड़ी उम्मीदें बांध सकते हैं। जून में विक्रम भट्ट अपनी उस ‘डेंजरस इश्क’ को लेकर आएंगे जिससे करिश्मा कपूर की बड़े पर्दे पर वापसी हो रही है। 
उनके साथ होंगे जिम्मी शेरगिल और रजनीश दुग्गल। यह महीना एक जबर्दस्त एक्शन फिल्म लेकर आएगा जिसका नाम है ‘राऊडी राठौड़’। निर्माता करण जौहर, अक्षय कुमार और यू टी वी की इस फिल्म को हिन्दी में ‘वांटेड’ जैसी शानदार फिल्म दे चुके प्रभुदेवा डायरेक्ट कर रहे हैं। अक्षय कुमार के साथ सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी वाली इस फिल्म का पहला प्रोमो हृतिक रोशन की फिल्म अग्निपथ’ के साथ रिलीज होगा। ‘राऊडी राठौड़’ के 3 डी में आने की भी चर्चा है। एक रोमांटिक फिल्म ‘तेरी मेरी कहानी’ में शाहिद कपूर, प्रियंका चोपड़ा के साथ नेहा शर्मा को कुणाल कोहली इसी महीने लाने वाले हैं। 

ऑफबीट फिल्मों की बहार 
यू टी वी की ‘बरफी’ में रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा को निर्देशक अनुराग बसु लाएंगे। प्रियंका इस फिल्म में मानसिक रूप से कमजोर बनी हैं और रणबीर गूंगे-बहरे लेकिन यह कोई डार्क फिल्म नहीं है बल्कि एक कॉमेडी है। जुलाई के इस महीने में एक और कॉमेडी फिल्म भी आएगी। कॉमेडी फिल्मों के माहिर डायरेक्टर रोहित शेट्टी की इस फिल्म ‘बोल बच्चन’ को यू़ टी़ वी़ के साथ अजय देवगन बना रहे हैं। 2012 में एक बार फिर आप ईद पर सलमान खान को देखेंगे। 17 अगस्त को आने के लिए तय हुई यशराज की कबीर खान निर्देशित इस रोमांटिक-थ्रिलर ‘एक था टाइगर’ में सलमान और कैटरीना कैफ की जोड़ी होगी। इस महीने का अंत अक्षय कुमार, फराह खान और यू टी वी की फराह के पति श्रीश कुंदेर के डायरेक्शन में बन रही फिल्म ‘जोकर’ से होगा। 3 डी में बन रही इस फिल्म में अक्षय, सोनाक्षी सिन्हा, श्रेयस तलपड़े और मिनिषा लांबा नजर आएंगे। भट्ट कैंप की ‘राज 3’ के भी इसी मौके पर आने की संभावना है। इमरान हाशमी और जैकलिन फर्नांडीज की इस सस्पैंस-थ्रिलर फिल्म को ‘राज’ वाले विक्रम भट्ट ही बना रहे हैं। त्योहारों के मौसम में कई बड़ी फिल्में आने का मन बना रही हैं। धर्मेंद्र-हेमा मालिनी की छोटी बेटी आहना देओल की ‘यहां’ बना चुके शुजित सरकार रोमांटिक फिल्म ‘सेकेंड टाइम लकी’ में प्रतीक बब्बर के साथ लेकर आएंगे। वहीं बनने से पहले ही चर्चाओं में आ गई मधुर भंडारकर की करीना कपूर वाली ‘हीरोइन’ भी इन्हीं दिनों में आने की उम्मीद है। 

गायक-संगीतकार हिमेश रेशमिया को लगा एक्टिंग का शौक अभी खत्म नहीं हुआ है। अब वह अक्षय कुमार और ईरोस के साथ मिल कर ‘खिलाड़ी 786’ बना रहे हैं जिसके डायरेक्टर हैं आशीष आऱ मोहन। 2011 की तरह 2012 की दीवाली भी शाहरुख खान के साथ मनेगी। लेकिन इस बार यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म होगी और पूरे चांस हैं कि वह ‘रा वन’ से कहीं बेहतर होगी। 

अब्बास-मस्तान इस साल एक और एक्शन-सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म ‘रेस 2’ लेकर आएंगे। टिप्स की इस फिल्म में सैफ अली खान, जॉन अब्राहम, अनिल कपूर, दीपिका पादुकोण, बिपाशा बसु, जैकलिन फर्नाडीज, अमीषा पटेल, चित्रंगदा सिंह जैसे कई चमकते चेहरे होंगे। अक्षय कुमार के बैनर से अश्विनी धीर के निर्देशन में ‘सन ऑफ सरदार’ आएगी जिसमें अजय देवगन, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त, जूही चावला आदि होंगे। 2012 का अंत क्रिसमस के मौके पर आने वाली अरबाज खान की फिल्म ‘दबंग 2’ से होगा। सलमान खान और सोनाक्षी सिन्हा की जोड़ी वाली इस फिल्म में प्रकाश राज और सोनू सूद भी होंगे। 

बड़े सितारों और बड़ी धमाकेदार फिल्मों के अलावा हर साल की तरह कम बजट वाली और अलहदा मजा देने वाली कुछ फिल्में भी इस साल आएंगी। इनमें हृदय शेट्टी की ‘चालीस चौरासी’ एक ऐसी क्राइम फिल्म है जिसमें कॉमेडी का भी खासा पुट रहेगा। यू टी वी की तिग्मांशु धूलिया निर्देशित ‘पान सिंह तोमर’ इरफान और माही गिल वाली यह फिल्म एक ऐसे एथलीट की सच्ची कहानी पर आधारित है जो बंदूक उठा कर बीहड़ में कूद गया और डाकू बन गया था। महेश भट्ट के लिए निर्देशक विशाल महादकर थ्रिलर फिल्म ‘ब्लड मनी’ में कुणाल खेमू और अमृता पुरी को लेकर आएंगे। 

27 अप्रैल को आने वाली अपनी स्पोर्ट्स फिल्म ‘फरारी की सवारी’ के प्रोमोज विधु विनोद चोपड़ा ने पिछले दिनों ‘डॉन 2’ के साथ रिलीज कर ही दिए हैं। डायरेक्टर राजेश मापुस्कर की इस फिल्म के हीरो शरमन जोशी हैं। इनके अलावा 2012 में ‘दोस्ताना 2’, ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई 2’, राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फरहान अख्तर वाली ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘इंटरनेशनल हेराफेरी’ जैसी कई बड़ी फिल्मों के आने की भी आहट है। साथ ही ‘गुरुदक्षिणा’,‘यह जवानी है दीवानी’, ‘डायल एम फॉर मैरिज’, ‘डम डम डिगा डिगा’, ‘ओसामा’, ‘जिंदगी लाइव’, ‘शादी के लिए लोन’, ‘काश तुमसे मोहब्बत न होती’, ‘चंद्रलेखा’, ‘ग्रेट दादू’, ‘लगी शर्त’ जैसी बहुत सारी फिल्मों की कतार लगी हुई है(दीपक दुआ,हिंदुस्तान,दिल्ली,31.12.11)। 

Sunday, December 18, 2011

गुणी संगीतकार हैं गुमनामी के साये में

इधर एआर रहमान, प्रीतम, विशाल शेखर, सलीम-सुलेमान, हिमेश रेशमिया साजिद-वाजिद, शंकर-एहशान-लॉय आदि के इस दौर में राम लक्ष्मण, आनंद-मिलिंद, रवींद्र जैन, बप्पी लाहिड़ी, उत्तम सिंह, दिलीप सेन समीर सेन, उषा खन्ना, कुलदीप सिंह, इस्माइल दरबार, जतिन-ललित आदि कई संगीतकारों की याद अकसर शिद्दत से आती है क्योंकि इनमें से ज्यादातर संगीतकार एकदम शांत नहीं बैठे हैं। आनंद-मिलिंद से लेकर बुजुर्ग संगीतकार कुलदीप सिंह तक बराबर सक्रिय हैं। इसे जरा भी तुलनात्मक न लें। इधर जिस तरह से चालू संगीत का बोलबाला है, फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर को यदि न भी याद करे तो भी इसके बाद के दौर के इन संगीतकारों को याद करना लाजिमी हैं। इनका नाम कई हिट फिल्मों के संगीत के साथ जुड़ा हुआ है। प्रसिद्ध संगीत समीक्षक हरीश तिवारी कहते हैं, ‘चूंकि इनका संगीत कर्णप्रियता के स्वर्णिम दौर की याद ताजा कर देता है, इसलिए भी संगीत रसिकों की उपेक्षा बहुत परेशान कर देती है। 

मुझ जैसे संगीत-प्रेमी अकसर फिल्म निर्माताओं के सामने सिर्फ एक सवाल रखते है कि सुरीलेपन के इस घोर संकटकाल में क्या इन गुणी संगीतकारों को एक बार भी इन्हें मौका देने का ख्याल नहीं आता है। रवींद्र जैन, उत्तम सिंह, उषा खन्ना जैसे गुणी लोग तो अब भी बहुत कमाल कर सकते हैं। ये लगातार अच्छा काम भी कर रहे हैं पर न के बराबर सामने आ पा रहा है।’ इसे और अच्छी तरह से समझने के लिए हमें ‘97 की ‘दिल तो पागल है’, 2001 की ‘गदर’, 2006 की विवाह के संगीत की थोड़ी चर्चा करनी पड़ेगी। पहली दो फिल्मों के संगीतकार उत्तम सिंह की श्रेष्ठता के बारे में नये सिरे से कोई चर्चा अनर्गल है। दु:ख की बात तो यह है कि यशराज जैसे बड़े बैनर ने भी उन्हें फिर मौका देने की जेहमत नहीं की। विवाह के संगीतकार रवींद्र जैन का दुखी स्वर होता है, ‘किसी तरह का आक्षेप लगाना हम कलाकारों का काम नहीं है। हम तो फिल्म संगीत में सिर्फ बेहतर काम करना चाहते है।’ 

सिर्फ विवाह ही नहीं, ढेरों हिट फिल्मों के संगीत में रवींद्र जैन की कर्णप्रियता ने आज भी श्रोताओं को मुग्ध कर रखा है। साठ के ऊपर के हो चुके रवींद्र जैन को उनके करीबी दद्दो कह कर संबोधित करते हैं। राजकपूर से लेकर ताराचंद बडज़ात्या तक सभी उनके सुरीलेपन के मुरीद थे, मगर आज के फिल्मकारों को उनका ख्याल नहीं काम के लिए वे युवा संगीतकारों की तरह किसी निर्माता की लल्लो-चप्पो करें, यह बहुत अपमानजनक लगता है। कुछ इसी वजह से उषा खन्ना भी वर्षों से कहीं गुम हैं। महान गायक मोहम्मद रफी पर एक किताब लिख चुके धीरेंद जैन बताते हैं, ‘सिर्फ दिल देके देखों, हवस, साजन बिना सुहागन ही नहीं उषा जी ने कई फिल्मों में बेहद धुनें पेश की हैं। मगर इस शोर-शराबे के संगीत के बीच में वह कहीं गुम हो गयीं।’ 

संगीतकार आनंद-मिलिंद इन दिनों भोजपुरी फिल्मों में काम करने के लिए मजबूर हैं। आनंद कहते हैं, ‘हम फिल्मकारों की इस बेरूखी का मतलब जरा भी समझ नहीं पाये हैं। शायद हमारा यह अवगुण हो कि हम किसी गुटबाजी में शामिल नहीं। वरना किसी बड़े बैनर में हमारी भी कद्र्र होती। पर कोई यह समझ नहीं पा रहा है कि इस तरह की बातें हमारे संगीत को कितना नुकसान पहुंचा चुकी हैं।’ एन. चंद्र्रा की एक फिल्म अंकुश के एक प्रार्थना गीत ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर न हो, का उदाहरण देना ही काफी होगा। यह प्रार्थना गीत देश के कई प्रदेशों में जमकर बजता है, फिर भी उनके पास काम का अभाव है। कुलदीप सिंह की बात जाने दें, किसी समय के चर्चित संगीतकार बप्पी लाहिड़ी आज सिर्फ पेज थ्री की पार्टी की शोभा बने रहते हैं। जबकि संगीत प्रेमी कई ऐसी फिल्मों का नाम गिना सकते हैं जिनमें खय्याम कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि हमारे दौर में ऐसी राजनीति नहीं होती थी। आज के संगीतकार अच्छा काम करने की बजाय ज्यादा-से-ज्यादा काम हथियाने की कोशिश करते है। अच्छे सृजन के लिए इनसे बचना बहुत जरूरी है। मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं मेलोडी के जानकार ज्यादा से ज्यादा आयें(गोपा चक्रवर्ती,दैनिक ट्रिब्यून,11.12.11)।’

Friday, December 16, 2011

आमिर-किरण का बच्चा "मां तुझे सलाम" किसे कहेगा?

यह खबर अब जगजाहिर है कि अभिनेता आमिर खान अपनी दूसरी पत्नी किरन राव के साथ एक पुत्र के पिता बन गए हैं। यह शिशु उन्हें अपनी पत्नी के गर्भ और प्रजनन से नहीं, सरोगेट मदर कहलाने वाली औरत के जरिए मिला है। कृत्रिम गर्भाधान का चलन अब प्रचलित है क्योंकि वैज्ञानिक तकनीक ने ऐसी तमाम प्राकृतिक खामियों को फतह कर लिया है, जिनसे धनाढ्य तबका किसी अभाव का शिकार हो जाता हो। इसलिए "किराया भरो और संतान पाओ" का नारा अपने जोर-शोर पर दिखाई और सुनाई देता है। आमिर खान की खुशियां मोहर-अशर्फियों की तरह लुटीं और तब स्वास्थ्य मंत्रालय का ध्यान इस ओर गया कि इस कारोबार को कानूनी जामा पहनाने की जरूरत है। ईमानदारी और पारदर्शिता बनी रहे यह आवश्यकता है। गर्भाशय किराए पर देने वाली महिला को भी राहत मिलेगी। 

स्त्री के लिए यह कैसी राहत और कैसी मोहलत है? यहां दृश्य में दो औरतें आती हैं, एक जो पूंजी से लवरेज आदमी के साथ पत्नी के रूप में है, दूसरी जो रोटी-कपड़े से मोहताज है और बेचने के लिए अपना शरीर ही है, उसका जो भी अंग बिक पाए। ये दोनों औरतें उसी समाज का हिस्सा हैं जो मर्यादा, नैतिकता और स्त्री की पवित्रता के पक्ष में जमकर ढोल-नगाड़े बजाता है, जो पतिव्रत को स्त्री का धर्म बताता है, जो असूर्यपश्या पत्नी की हिमायत करता है, जो लड़कियों के बदन पर छोटे कपड़े देखकर तुनक उठता है, जो औरत के हंसने-बोलने तक पर पहरे लगाने की फिराक में रहता है। 

 "स्त्री का मां बनना जरूरी है, यह किसने कहा? औरत मां बनकर ही पूर्ण होती है, यह सिद्धांत कहां से आया? जो बच्चा पैदा नहीं कर सकती, वह बांझ के नाम से जानी जाती है, यह लांछन किसने लगाया? जो सिर्फ बेटियां पैदा करती है, वह वंश का नाश करती है, यह परिभाषा किसने गढ़ी? गौर कीजिए और देखिए कि ये सारे दोष औरत के सिर हैं। पाइए कि संतान न देने पर स्त्री को कमतर होने का अहसास ज्यादा होता है और सोचिए कि आखिर यह अहसास क्यों होता है? इसलिए कि यह अहसास एक जहरीला इंजेक्शन है, जिसे नजरों और वाक्यों से औरत के रग-रेशों में उतारा जाता है और अनकही शर्त लागू की जाती है कि पत्नी होकर माता न बनना पत्नी पद को खो देने का बड़ा खतरा है या कि बिना मां बने औरत का जीवन असुरक्षा से भरा रहता है। 

यही कारण है कि गरीब औरत अगर बांझ है तो बांझ रहने के लिए अभिशप्त है। मगर जिसके पास या जिसके पुरुष के पास धन है तो वह किसी मजबूर औरत को खरीद सकती है। बिना यह सोचे कि मातृत्व का ऊपरी जामा तैयार करने के लिए यहां दो औरतों का अपमान बराबर-बराबर हो रहा है। बिना यह समझे कि यह सरोगेट मदर का सारा झमेला एक पुरुष के वंशानुक्रम को बढ़ाने के लिए है और जो पत्नी है, पति के सामने अपने आप को मां के रूप में सिद्ध करना चाहती है। कभी यह सोचा है कि जिसने आपको प्रेमिका बनाम पत्नी स्वीकार किया है, वह आपको मां क्यों बनाना चाहता है? या आप भी मां की भूमिका के बिना क्यों जीवन निर्वाह नहीं कर सकतीं? 

हो सकता है, मां की आदरणीय और पूजनीय छवि प्रभावित करती हो। मगर सरोगेट मदर का शिशु किसका है? जो गर्भधारण करते हुए उसे जन्मे देती है, उसका या जो किसी का गर्भाशय खरीद लेती है, उसका? यह बच्चा किसे "मां तुझे सलाम" कहेगा? उसे जिसके नाम पैसों के दम पर बर्खास्तगी लिखी गई या उसे जिसने अपनी दौलत के आधार पर किसी के शरीर को खरीद लिया? 

अगर बच्चे की इतनी चाह थी तो हमारे देश में अनाथालयों की कमी नहीं है और न गोद लेने पर पाबंदी। मगर अमीर लोगों की हठें भी तो अमीर होती हैं, जिनसे वे अपने आपको वीर्यवान बनाए रखने की जिद निभाए जाते हैं। उनको यह सौभाग्य इसलिए हासिल है कि वे फटेहाल नागरिकों के लोकतांत्रिक देश के सर्वोत्तम अमीरों में आते हैं। इसलिए ही वे जन सामान्य के बीच अपनी नेक नाइंसाफियों के साथ देवताओं की तरह पुजते भी हैं। राजनेत्रियों की जमात इस कारोबार पर अपनी राय क्यों नहीं देती? अगर सवाल उठाइए तो तुरंत देवकी और यशोदा जैसी माताओं की मिसालें पेश कर दी जाएंगी कि पैदा किसी ने किए कृष्ण को और पाले किसी ने। मगर यहां संतान की खरीदार माताएं देवकी और यशोदा के वजूदों पर नहीं जातीं बल्कि वे अपने पति को पिता बनने का सर्टीफिकेट थमाकर ही जीवन सफल मानती हैं। 

 "एक गरीब औरत को आर्थिक मदद मिलती है" यह फतवा बड़े दयापूर्ण तरीके से पेश किया जाता है मगर साथ ही यह शंका भी कि किराए की कोख वाली महिला रुपए के लेन-देन में गड़बड़ न करे, विवाद न पैदा कर दे। इन दोनों बातों से जाहिर है कि यहां मदद या हमदर्दी का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यहां तो सिर्फ अपनी पूंजी का दम और मरदाने अहंकार का बोलबाला है। साथ ही जो पत्नी है, औरत के रूप में वह बहुत बड़ी हीनग्रंथि की शिकार है। नहीं तो सुष्मिता सेन विश्वसुंदरी को क्यों किसी सरोगेट मदर की जरूरत नहीं पड़ी? उसने अविवाहित रहकर एक के बाद एक दो बच्चियों को गोद लिया। यों आमिर खान निस्संतान भी नहीं थे, पहले से ही जवान होता बेटा उनके सामने है। बेटी है। मगर इस शिशु के आने से उन्होंने एक नया एलान और कर दिया, जिससे दुनिया जान गई कि अबुल कलाम आजाद उनके चचेरे ग्रेट ग्रैंड फादर थे, जिनके नाम पर उन्होंने अपने शिशु बेटे का नाम आजाद रखा है। यह आजाद किस आजादी का वाइज बना, हमें यह समझना बाकी है। 

समाज का साधारण आदमी उन लोगों का किया-धरा गौर से देखता है जिनके नाम होते हैं। फिल्म तो लोगों को प्रभावित करने का सबसे ज्यादा ताकतवर माध्यम है। माना कि इस माध्यम से जुड़े लोग भी मनुष्य हैं, उनकी हजार कमजोरियां हो सकती हैं। मगर सरोगेट मदर के इस्तेमाल का मामला कमजोरी में नहीं, साजिश में आएगा। अभाव और कंगाली की मारी हुई औरतों के प्रति अमीर लोगों की साजिश। एक पुरुष की दो औरतों के प्रति साजिश। साजिश कने के लिए ज़रूरी होता है कि अच्छे से अच्छे भ्रम पैदा किये जाएं क्योंकि भ्रम ही मजलूम को बाज़ार में खड़ा करता है। अपनी दरिद्रता दूर करने के लिए थोड़ी देर को बाजार सौदेबाजी का मालिक बन जाता है और अपनी कीमत पर चकाचौंध होने लगता है। कोख बेचने वाली औरत समझ नहीं पाती कि अब वह दलालों के बीच है। उधर पैसे से खेलने वाले लोग उसके जाए बच्चे से खेलते हुए अखबारों में अपने मातृत्व और पितृत्व की खबर छपवाएंगे। यह कैसा संदेश है? किसके लिए संदेश है? यही कि मानव अंगो का व्यापार पैसे वालों को जीवनदान दे रहा है। कहते हैं,गरीब से गरीब आदमी भी अपना बच्चा किसी को नहीं देता। मगर गरीब को जब इतना भूखा मारा जाए कि वह अपना ही गोश्त खाने लगे तो फिर खून बिकता है,किडनी बिकती है और अब कोख बिकने लगी। रोटी कपड़े के बदले सब कुछ दांव पर लग जाता है-तथाकथित धनवान सौभाग्यशालियों की कृपा से......(मैत्रेयी पुष्पा,नई दुनिया,16.12.11)

Monday, December 5, 2011

देवानंद की कहानी,नीरज की ज़ुबानी

सुबह सोकर उठा भी नहीं था कि मेरे मित्र मंजीत ने पुणे से फोन पर खबर दी। अवाक रह गया। मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि देव साहब इतनी जल्दी साथ छोड़ देंगे। वह चिर युवा थे। ..जोशीले इंसान। उनका न होना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। अब मुझे फिल्म इंडस्ट्री में याद करने वाला कोई न रहा। उनके निधन से पूरी इंडस्ट्री सूनी हो गई है। छठे दशक की बात है। तब देव साहब मुंबई में रम-जम चुके थे और मैं नया-नवेला कवि। मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई मुंबई (1955-56) में कवि सम्मेलन के दौरान। देव साहब इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। मेरे गीत उन्हें भा गए। जाते हुए मेरे पास रुके और बोले..नीरज, आइ लाइक यू। आइ वांट टू वर्क विद यू। मैं घर लौट आया। मैंने सोचा था कि वे मेरा नाम भी भूल गए होंगे। करीब 10 साल बाद 1965 में मुझे उनका एक खत मिला। फौरन मुंबई बुलाया था। वो फिल्म प्रेम पुजारी बनाने जा रहे थे। एसडी बर्मन भी उनके साथ थे। देव साहब का आदेश मिला..हमें नई फिल्म के लिए गाने चाहिए। छोटे-छोटे वाक्यों में सुख हो। पीड़ा भी झलके। रंगीलापन भी हो..। मैंने वहीं पर गाना लिखा..रंगीला रे..तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन.. ये लाइनें उन्हें बहुत पसंद आई। यहां देव साहब से नाता जुड़ा तो 45 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला। तेरे मेरे सपने, गैंबलर, छुपा रुस्तम जैसी कई फिल्में साथ कीं। देव साहब ने अभी चार्जशीट बनाई तो उसमें भी एक गाना इश्क भी तू..ईमान भी तू.. मुझसे ही लिखवाया। ये मेरी और उनकी आखिरी फिल्म थी। वह वचन के पक्के, सज्जन, स्पष्टवादी और नियम-संयम का पालन करने वाले थे। नए कलाकारों को भरपूर मान-सम्मान देने वाले इंडस्ट्री में अकेले शख्स। लोग एक दिन में रिश्ते भुला देते हैं, वे 10 साल पहले का वादा नहीं भूले। जिस वक्त उनकी फिल्में नहीं चल रही थीं, मैंने उनसे पूछा कि ऐसे में आप फिल्में बनाते ही क्यों हैं? उन्होंने कहा, मैं फिल्में सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं बनाता। फिल्म बनती हैं तो भारत में भले नहीं चलतीं, विदेशों में इतना कारोबार तो हो ही जाता है कि प्रोडक्शन यूनिट का खाना-खर्चा चल जाता है। एक देव साहब ही थे, जो मुझसे गीत लिखवा लेते थे। उनके बहाने इंडस्ट्री के दूसरे कलाकारों से जुड़ाव है। वे नए लोगों के लिए सच्चे मार्गदर्शक थे। शत्रुघ्न सिन्हा, जैकी श्रॉफ, जीनत अमान, टीना मुनीम..तमाम लोगों को मौका देने वाले वही थे। मेरी तो बस यही प्रार्थना है कि देव साहब के साथ ही मेरा अगला जन्म हो। फिर प्रेमभाव से साथ रहें, जिएं। कुछ काम करें(दैनिक जागरण,दिल्ली,5.12.11)।

Friday, December 2, 2011

सिल्क स्मिता, विद्या बालन और मर्लिन मुनरो

आज मिलन लूथरिया की द डर्टी पिक्चर का प्रदर्शन है, जिसमें छोटे बजट की साहसी जंगली जवानी समान फिल्मों की नायिका की व्यथा-कथा है और मुंबई में मधुर भंडारकर की करीना कपूर अभिनीत Rहीरोइनञ्ज की शूटिंग शुरू हो रही है, जिसमें एक भव्य बजट वाली तथाकथित तौर पर शालीन फिल्मों की नायिका की कथा प्रस्तुत की जा रही है। 

डर्टी पिक्चर सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित है तो खबर है कि मधुर की प्रेरणा मर्लिन मुनरो हैं। सिल्क स्मिता और मर्लिन मुनरो दोनों ने ही आत्महत्या की थी और कुछ लोगों को संदेह रहा है कि ये राजनीतिक हत्याएं हैं। कुछ लोग अमेरिका में यह मानते रहे हैं कि मर्लिन मुनरो की अंतरंगता जॉन एफ. कैनेडी और उनके भाई से भी थी। ज्ञातव्य है कि अपनी मृत्यु के पूर्व मर्लिन जॉन कैनेडी के जन्मदिन पर आयोजित समारोह में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आई थीं और इस घटना पर भी हॉलीवुड में फिल्म बन रही है। 

जहां तक महिला सितारों के शरीर प्रदर्शन की बात है तो भव्य बजट की तथाकथित तौर पर शालीन फिल्मों और छोटे बजट की तथाकथित अश्लील फिल्मों में समान रूप से अंग प्रदर्शन होता है, क्योंकि इसमें ब्रांड का मामला फंसा हुआ है। सच तो यह है कि भव्य फिल्मों में नायिकाएं ज्यादा शरीर प्रदर्शन करती हैं। 

आखिर विगत कुछ वर्षो में करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ, बिपाशा बासु, दीपिका पादुकोण इत्यादि को किस तरह प्रस्तुत किया गया है? इन खूब मेहनताना पाने वाली नायिकाओं ने आइटम प्रस्तुत करने वाली तारिकाओं के पेट पर लात मार दी है। करीना के छम्मक छल्लो और मलाइका के ‘मुन्नी बदनाम हुई’ में क्या अंतर है और बिपाशा का बीड़ी जलई ले कैसे भूल सकते हैं? दरअसल चमड़ी दिखाकर सभी दमड़ी कमा रहे हैं और अंतर केवल लेबल का है। सभी फिल्मों में मांसलता की लहर प्रवाहित है। सदियों पूर्व एक सनकी बादशाह ने सोने और तांबे के बदले चमड़े के सिक्के चलाए थे। उसने आज के दौर का पूर्वानुमान कर लिया था। 

फिल्मों में मांसलता के दौर के साथ ही हमें समाज में खुलेपन के दौर को देखना चाहिए। क्या आज के मध्यम वर्ग की महिला दो दशक पूर्व के मध्यम वर्ग की महिला की तरह कपड़े पहनती है? नाभिदर्शना साड़ियां बांधने का तरीका समाज से शुरू होकर फिल्मों में आया है। इसी तरह महिलाओं की शराबनोशी भी शीतल पेय में मिलाकर पीने से खुलेआम पीने तक जा पहुंची है और जो चीज समाज में कभी मात्र पुरुषोचित मानी जाती थी, वह अब समान रूप से जारी है। दरअसल समाज और सिनेमा में परिवर्तन तीव्र गति से हो रहे हैं। गुजरे हुए को हमेशा स्वर्ण युग मानने की फॉमरूलाई सोच से हमें बचना चाहिए। पहले हम जिन चीजों को घर में कालीन के नीचे छिपाकर उनके अस्तित्व को नकारते थे, अब हम उन्हें बुहारकर चौराहे पर ले आते हैं। 

यह समाजशास्त्री बता सकते हैं कि समाज में खुलेपन की लहर का काले धन और भ्रष्टाचार से क्या संबंध है। जो लोग हमारी असमान अन्यायपूर्ण सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों के कारण रातोंरात अमीर हो गए, उन लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को खर्च के लिए अधिक धन दिया। यह धन फैशन पर खर्च हुआ और छद्म आधुनिकता के मोह ने नकली जीवन प्रणाली विकसित की, जबकि असली आधुनिकता सोचने का एक दृष्टिकोण है। इसी धन ने बाजार और विज्ञापन की ताकतों को मजबूत किया। बाजार और विज्ञापन की दुनिया में नारी शरीर एक वस्तु है। 

दकियानूसी सेंसर के प्राणहीन नियमों ने अश्लीलता के लिए संकरी गलियां बनाईं। आदिम असंयमित इच्छाओं की पूर्ति ने उस बाजार को ताकत दी, जो सदियों से जारी रहा है। बदनाम गलियों में बसे मकानों में भी श्रेणी भेद रहा है। ऊंचे कोठे रहे हैं और परचून की दुकान भी रही है, जिसका एक दूसरा स्वरूप हम Rबीञ्ज ग्रेड फिल्मों की नायिकाओं और भव्य बजट की नायिकाओं में देखते हैं। सिल्क स्मिता और मर्लिन मुनरो को उनकी छवियों ने लील लिया। 

मनोरंजन उद्योग में टाइप्ड होने का खतरनाक खेल है। लोकप्रिय किरदार दोहराए जाते हैं और कलाकार का दम घुट जाता है। अफवाहों के लिए उर्वर जमीन बन जाती है। मनोरंजन उद्योग से ज्यादा अफवाहें राजनीतिक गलियारों में फैलती हैं। साहसी यथार्थवादी साहित्य रचने वाली महिला साहित्यकारों को भी बहुत कुछ सुनना व सहना पड़ता है। पुरुष अपनी कमतरी से जन्मी कुंठाओं को अनेक तरह से अभिव्यक्त करता है। अब विद्या बालन के लिए दुर्गम राह है। उन्हें पारंपरिक भूमिकाएं मिलना कठिन हो सकता है और टाइप कास्टिंग उन्हें सिल्क स्मिता की यंत्रणा जीने के लिए बाध्य कर सकती है। कभी-कभी लोकप्रिय भूमिकाएं कलाकार के अंतस में प्रवेश कर जाती हैं। भूमिकाओं का केंचुल उतार फेंकना आसान नहीं होता। जगाते-जगाते इच्छाएं जगाने वाले को भी डस लेती हैं(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,2.12.11)।

Thursday, September 22, 2011

कन्नड़ अभिनेत्री निकिता पर प्रतिबंधःहमेशा महिला ही क्यों होती है दोषी?

कन्नड़ फिल्म जगत कुछ गलत कारणों से विगत कुछ दिनों से सुर्खियों में है, लेकिन अब लग रहा है कि इसका पटाक्षेप हो रहा है। दरअसल, कन्नड़ फिल्मों के निर्माता संघ ने अभिनेत्री निकिता ठुकराल पर जो तीन साल का प्रतिबंध लगाया था, उसे वापस ले लिया गया है। कन्नड़ फिल्म उद्योग की नामी-गिरामी शख्सियतों द्वारा एवं कला-संस्कृति जगत के अन्य लोगों ने भी निर्माता संघ द्वारा पे्रमसंबंधों को लेकर लगाए इस खाप शैली के प्रतिबंध का विरोध किया। अपने बयान में संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि हम लोगों का यह कदम मूर्खतापूर्ण था और हम लोगों ने इस मामले में निर्णय लेने में भी जल्दबाजी की। 

अभिनेत्री निकिता पर यह आरोप लगाया गया था कि अभिनेता टी. दर्शन के साथ प्रेमप्रसंग के चलते उनका अपनी पत्नी विजयलक्ष्मी के साथ वैवाहिक जीवन बरबाद हो गया। इस कारण निर्माता संघ ने पारिवारिक मूल्यों की हिफाजत के लिए यह कदम उठाया था। हालांकि दर्शन और विजयालक्ष्मी के वैवाहिक जीवन में बढ़ते तनाव की खबरें बहुत पहले से चल रही थीं। दर्शन द्वारा विजयालक्ष्मी के साथ की जा रही हिंसा की खबरें भी मिल रही थीं, मगर मामला विस्फोटक स्थिति तक तब पहुंचा, जब अपने पति के हाथों बुरी तरह प्रताडि़त विजयालक्ष्मी ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करा दी। 

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने अभिनेता को गिरफ्तार किया एवं विजयालक्ष्मी को अस्पताल में भर्ती किया गया। कई फिल्म निर्माताओं ने विजयालक्ष्मी पर परिवार को बचाने के लिए दबाव डाला। इसी दबाव में आकर विजयालक्ष्मी ने अपनी शिकायत वापस ले ली थी। विडंबना यही थी कि अपनी पत्नी को जलती सिगरेट से दागने के आरोपी दर्शन का साथ देने में फिल्म निर्माताओं को कोई संकोच नहीं हुआ। यह घटना इस बात को उजागर करती है कि कोई व्यक्ति चाहे जिस तबके का हो घरेलू हिंसा की समाज में आज भी स्वीकार्यता है। भले ही इसे रोकने के लिए तमाम कानून बने हों। 

यह सब सामाजिक जीवन में स्त्री के बुनियादी अधिकार और उसके संदर्भ में समाज के उन धारणाओं को ही बताता है जिसमें परिवार के सम्मान को बचाने को वरीयता दी जाती है। अगर हम कर्नाटक राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन सी. मंजुला की बात पर गौर करें तो वर्ष 2010 में घरेलू हिंसा से रक्षा के लिए बने अधिनियम 2005 के तहत नियुक्त प्रोटेक्शन ऑफिसर्स के पास 2005 मामले दर्ज हुए थे, जिनमें अन्य कानूनों के तहत दर्ज मामलों का उल्लेख नहीं किया गया था। वैसे कन्नड फिल्म निर्माता संघ को इस बार भले ही चार दिनों में ही अपनी मूर्खता का अहसास हुआ हो मगर उस पर हावी पितृसत्तात्मक मूल्यों का यह कोई पहला मसला नहीं है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब कन्नड़ अभिनेत्री रम्या ने निर्माताओं के गठजोड़ के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया, क्योंकि इन्होंने उसे ठीक से पैसे देने से इंकार किया था और यहां तक कि उसे जज्बाती एवं गैर-पेशेवर कहकर संबोधित किया था। रम्या इन धमकियों एवं गलत प्रचारों से डरी नहीं और उसने सोशल मीडिया के सहारे अपनी आवाज बुलंद की। इससे ऐसा वातावरण बना कि निर्माताओं को रम्या को पूरा मेहनताना देना पड़ा। 

अगर हम दर्शन-विजयालक्ष्मी-निकिता प्रसंग पर फिर लौटें तो मामला यह नहीं था कि बेचारी निकिता कितनी निर्दोष है, क्योंकि यदि प्रेमप्रसंग चल रहा होगा तो उसकी भी सहमति रही होगी। उसने भी दर्शन पर दो महिलाओं के साथ समानांतर रिश्ते चलाने के मसले को एजेंडा नहीं बनाया और खुद विजयालक्ष्मी को देखें जो समाज के दबाव में मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान से पलट जाती हैं तथा अपने पति का बचाव करते हुए कहती हैं कि वह बाथरूम में गिरने से घायल हुई हैं। यह कोई नई बात नहीं है कि पत्नियां अक्सर ऐसे समझौते करती हैं, जिसके दूसरे तमाम गलत कारण होते हैं। इसमें अपने परिवार को बचाना भी एक बड़ी वजह होती है। यह उनकी अपनी पितृसत्तात्मक मूल्यों और मान्यताओं व सोच का मामला भी होता है, जिसके तहत सारा ध्यान दूसरी औरत पर टिका रहता है। इसके चंगुल में बेचारा पति फंस गया होता है। 

अक्सर पति निरीह प्राणी बनने का खेल खेलने की कोशिश करते हैं, जो उनके बचाव का एक बड़ा हथियार भी होता है। वह प्रेमिका के सामने ऐसे दुखड़े रोते हैं कि वह पत्नी से बहुत परेशान है। इस कारण वह अपने पत्नी को छोड़कर प्रेमिका के साथ रहने का तर्क गढ़ते हैं और इस बहाने प्रेमिका को राजी करते हैं। प्रेमिकाएं भी ऐसी ही किसी घड़ी का इंतजार करती हैं कि वह पहली वाली को छोड़ कर उसके पास हमेशा के लिए चला आएगा, जो शायद कभी नहीं आता। समाज में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग जगह तय है, जो सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में एकदम भौंडे रूप में उभरकर सामने आता है। हाल में अमरोहा के एक गांव में एक युवती को उसी समुदाय के कुछ युवकों ने अपनी हवस का शिकार बनाया, लेकिन समुदाय की इज्जत के नाम पर मामला थाने में दर्ज नहीं होने दिया गया। न्याय के नाम पर पंचायत बैठाई गई और युवती के साथ होने वाली हिंसा के लिए फैसला सुनाया गया कि आरोपी युवकों को सार्वजनिक तौर पर दो-दो थप्पड़ लगाया जाए। 

इटारसी जिले के केसला थाने के गांव मोरपानी की ग्राम पंचायत की मीटिंग का यह किस्सा भी काबिलेगौर है, जिसका ताल्लुक विजय शुक्ला नामक व्यक्ति के अवैध प्रेमसंबंध से था। पंचायत के सामने विजय शुक्ला की पत्नी ने गुहार लगाई जिस पर पंचों को फैसला करना था। पंचायत बैठी और फैसला भी हुआ। पंच परमेश्वरों के फैसले के तहत पत्नी ने अपने पति की प्रेमिका की सरेआम पिटाई की। फिर इकट्ठी हुई भीड़ ने भी उस महिला की पिटाई की और उसे गांव में घुमाया गया। दरअसल, विजय पहले से शादीशुदा था और वह मोरपानी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए आया था। तभी ग्रामवासियों ने उसकी अच्छी पिटाई कर दी। इसके बाद ही पंचायत बैठी और पत्नी के द्वारा महिला की पिटाई का निर्देश पारित हुआ। 

यहां प्रश्न यह उठता है कि पत्नी के प्रति वफादारी निभाने की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि पत्नी के साथ धोखा उसके पति ने किया है, क्योंकि उसका रिश्ता पहले वाले पति से है तो उसे पहले पिटाई अपने पति की करनी चाहिए थी। हालांकि गांव वालों ने पति की पिटाई की, लेकिन जब पंचायत ने समझ-बूझकर निर्णय दिया तो दोषी पति को नहीं, बल्कि उस महिला को माना गया, जिससे पति ने विवाहेतर रिश्ता बनाया था। आखिरकार दोषी एक महिला ही मानी गई। हालांकि उस पत्नी के वैवाहिक रिश्ते में धोखा हुआ, जिसे विवाहेतर संबंधों के बारे में पता ही नहीं था। इसके अलावा वह दूसरी औरत भी निर्दोष नहीं थी, क्योंकि उसे भी पता था कि वह पुरुष दूसरे रिश्ते में है और वह समानांतर रिश्ता बना रहा है। इस तरह अप्रत्यक्ष तौर पर वह भी उस धोखाघड़ी में शामिल है, लेकिन जहां तक उस पत्नी महिला का सवाल है, उसके पति ने सीधे धोखाधड़ी की(अंजलि सिन्हा,दैनिक जागरण,22.9.11)।

Monday, September 19, 2011

फ़िल्में पैसे से नहीं,जुनून से बनती हैं

१९७६ में मैंने एक फिल्म निर्माता-निर्देशक का इंटरव्यू लिया था जो उन दिनों करीब ४३-४४ बरस के थे । सौभाग्य की बात है कि इन्हीं दिनों मुझे एक बार फिर उसी व्यक्ति से बातचीत का अवसर मिला । उन दिनों इस शख्स ने पहली फिल्म बनाई थी - "घरौंदा", जिसमें प्रमुख भूमिका निभाई थी - जरीना वहाब, अमोल पालेकर तथा डॉ. श्रीराम लागू ने । इस फिल्म ने रातो-रात इस निर्माता-निर्देशक को श्रेष्ठ फिल्म निर्माताओं की पंक्ति में ला खड़ा किया था । फिल्म निर्माता का नाम था - भीमसैन । "घरौंदा" ऐसी फिल्म थी जिसे आम दर्शक ने ही नहीं, बुद्धिजीवियों ने भी सराहा था । मुझे याद है, एक विशेष प्रदर्शन में धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती भी पधारे थे और उन्होंने "ऐसी जीवंत" फिल्म बनाने के लिए मेरे सामने ही भीमसैन की पीठ थपथपाई थी । इस फिल्म की सफलता के दो-तीन कारण मुख्य थे - एक गुलजार के लिखे - "तुम्हें हो न हो, मुझको तो इतना यकीं है, मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है" या "दो दीवाने शहर में, रात में या दोपहर में" या "मैं हस्दयां यार गंवाया, हौक्यां विच लब्दी फिरां," जैसे गाने, दूसरे, भीमसैन का यौवनोचित उत्साह, तीसरे, मुंबई में उन दिनों सिर पर छत के लिए तरसते लोगों और बिल्डरों की नादिरशाही के प्रति जनसाधारण का रोष जो कि इस फिल्म का मुख्य विषय था । भीमसैन ने यूं दो और फिल्में बनाई थीं - "दूरियां", जिसमें उत्तम कुमार और शर्मीला टैगोर जैसे कलाकार थे और तीसरी फिल्म "तुम लौट आओ"। 

"दूरियां" डॉक्टर शंकर शेष के नाटक पर और "तुम लौट आओ" मृदुला गर्ग की कहानी "मेरा" पर आधारित थीं । "दूरियां" कुछ खास सफल नहीं रही और "तुम लौट आओ" में नए कलाकारों - कविता चौधरी और निशांत को लेने के कारण वह लगभग फेल ही हो गई थी । "तुम लौट आओ" की शूटिंग दिल्ली में हुई थी और मैं रात-दिन इस यूनिट के साथ रहा था । कविता चौधरी हमारे गरीबखाने पर ही रहती थी, हालांकि फिल्म निर्माण का मेरा ज्ञान न के बराबर था लेकिन जिस दुलमुल तरीके से निशांत काम करता था, मुझे लगने लगा था कि यह शख्स फिल्म को ले डूबेगा । फिल्म तो डूबी ही, निशांत स्वयं डूब गया - सुना कि किसी मोटर वर्कशॉप में काम करने लंदन चला गया। कविता चौधरी अच्छी अदाकारा थी । 

उसकी एक्टिंग देखकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के तत्कालीन निदेशक बज्जू भाई इतने प्रभावित हुए थे कि कविता के मुख को दोनों हाथों में लेकर उन्होंने कहा था - "हमारी मीना कुमारी !" बहरहाल, "घरौंदा" १९७६ में, "दूरियां" १९७९ में और "तुम लौट आओ" १९८४ में बनी थी । आज इतने बरस बीत गए हैं, भीमसैन ने कोई फिल्म नहीं बनाई । यों कहें कि इस शख्स ने पूरी तरह से फिल्म निर्माण से हाथ खींच लिया । सो, मुझे उत्सुकता थी कि मैं उससे पूछूं कि किस कारण उन्होंने पलायन किया इसलिए पिछले दिनों मैंने उनसे टेलीफोन पर बात की । मैंने छूटते ही पूछा, "भीमसैन जी, यह क्या? इतनी अच्छी फिल्में देकर हाथ खींचकर बैठे हैं। ऐसी क्या बात हो गई ? भीमसैन ने हंसते हुए कहा, (वैसे, आजकल वह बहुत कम हंसते हैं) "ऐसी कोई बात नहीं । असल में, आजकल फिल्म बनाना बहुत ज्यादा मुश्किल हो गया है । "घरौंदा" बनाने के लिए मैं चार लाख लेकर बैठा था । कुल खर्च आया था आठ लाख यानी दुगुना। कोई तकलीफ नहीं हुई । बाकी पैसा मार्केट से मिल गया था । "दूरियां" करीब दस लाख में बनाई थी - अपने पैसे से और मन माफिक । किसी की दखलंदाजी नहीं । मैं दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं कर सकता । (मुझे याद है, "दूरियां" के सेट पर मैंने एक सुझाव दिया था । भीमसैन ने मुझे झिड़ककर बैठा दिया था ।) आजकल आप चार करोड़ या १० करोड़ में भी फिल्म नहीं बना सकते ? 

असल में, उन दिनों फिल्में न्यारी होती थीं, लोग भी न्यारे थे। मैं एक नजर सारे वातावरण पर डालता हूं तो लगने लगता है, कैसे-कैसे लोग चले गए, कैसे-कैसे लोग आ गए हैं! कहां गए वे लोग जिन्होंने "मदर इंडिया" जैसी फिल्म बनाई थी ! उन्हें तो छोड़िए, गुलजार ने जैसी "हूतूतू" बनाई थी, क्या आज के थैलीशाह वैसी फिल्म बनाने की जोखिम ले सकते हैं? मुझे लगता है, गुलजार साहब ने भी फिल्म-निर्माण से संन्यास ले लिया है ।" मैंने कहा, "फिल्मों में लोग पैसा बनाने आते हैं, बहाने नहीं ।" "आप ठीक कहते हैं । पैसा कमाना बुरी बात है यह कौन कहता है लेकिन लालच बढ़ गया है । एक्टर-एक्ट्रेसेज करोड़ों की फरमाइश करते हैं ।" "तभी मांगते हैं, जब जानते हैं कि फिल्म उनके नाम से चलती है ।

" वह बोले, "आज की फिल्मों में आइटम नंबर डालना बहुत जरूरी समझा जाता है । दर्शक लटकों-झटकों वाली भौंडी आइटम खूब पसंद करते हैं । यह देखिए कि ढाई-तीन करोड़ में फकत एक आइटम बनती है । फिर फिल्म को कामयाब बनाने के लिए मसाले डालने पड़ते हैं । मेरे पास इतना पैसा होता तो मैं फिल्म बनाता लेकिन उसमें इस प्रकार के किसी मसाले की छौंक न लगाता ।" "आजकल कोई ऐसी फिल्म नहीं आ रही, जिसे देखने के लिए हम जैसे लोगों में उत्सुकता हो ? क्या कारण है ?" मैंने पूछा । "यहां मैं एक बात कहूं । टीवी ने फिल्म इंडस्ट्री की शक्ल ही बदलकर रख दी है । पहले जो लोग उससे परहेज करते थे, वही लोग उधर भाग रहे हैं । जैसा ग्लैमर टीवी सीरियल्स में है, वैसा पहले नहीं था। अब दर्शक अधिक संख्या में टीवी से ही संतुष्ट हैं । टिकट के लिए भाग-दौड़ नहीं करनी पड़ती । आज आप नई-पुरानी फिल्में घर बैठे देख सकते हैं ।" "फिल्म इंडस्ट्री में डूब जाने वालों की संख्या कम नहीं है । फिर भी धड़ाधड़ फिल्में बन रही हैं !" "सही । उनका पैसा वापस नहीं आता, फिर भी बन रही हैं ।" "यह तो बहुत बड़ा विरोधाभास हुआ !" "लोगों का के्रज है, जुनून है इसलिए फिल्में बनती हैं । फिल्में पैसे से नहीं बनतीं, जुनून से बनती हैं ।" 

 "अब एक-दो निजी सवाल । आप फिल्म नहीं बनाते । आप एनीमेशन कला में ढेरों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। मझे याद है"एक चिड़िया,अनेक चिड़ियां" के बोल बच्चे वैसे ही गुनगुनाते हैं जैसे गुलजार के "चड्ढी पहन के फूल खिला है।" आपने इस क्षेत्र से भी हाथ खींच लिया है। आखिर,खाली तो बैठे नहीं रहते होंगे!"(द्रोणवीर कोहली का यह आलेख संडे नई दुनिया,18 सितम्बर,2011 में प्रकाशित हुआ है)।

Tuesday, September 13, 2011

अभिज्ञात के भोजपुरी गीत पर प्रतिभा सिंह का आइटम सांग

गायिका-प्रतिभा सिंह, भोजपुरी एलबम-मेहरारू ना पइब, गीत-केश बा हमरो, गीतकार-ड़ॉ.अभिज्ञात, कम्पनी-स्काई