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Wednesday, March 31, 2010

तपन दा की "अंकुश" समेत सात फिल्में अब आप शायद ही कभी देख पाएं

तपन सिन्हा को समांतर सिनेमाई मूल्यों से समझौता न करने वाला फिल्मकार माना जाता है। अंकुश से लेकर अनोखी मोती तक उन्होंने कुल 42 फिल्में बनाई और 19 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। पिछले वर्ष ही उनका निधन हुआ और अब खबर आ रही है कि उनकी सात फिल्मों के प्रिंट स्थायी रूप से नष्ट हो चुके हैं।








(हिंदुस्तान,पटना,30.3.2010)

देवरा बड़ा सतावेला के बंपर ओपनिंग

रंगबाज दरोगा के जोड़ी फिरू  धमाल मचा रहल बा। तीन भाइयन के कहानी पर बनल एह फिलिम के गीत पहिलेही लोकप्रिय हो गईल रहे। बड़हन पैमाना पर बनल एह फिलिम में रानी चटर्जी,  मोनालिसा, प्रदीप पान्डे, नेहा महमूद, बृजेश त्रिपाठी, अवधेश मिश्रा, संजय  पाण्डे, विजय खरे, अनूप अरोड़ा, पुष्पा बर्मा, के के गोस्वामी, आनन्द मोहन, अउर  दिव्या द्विवेदी भी बाड़ें।






































(हिंदुस्तान,पटना,27.3.2010)

शुभम तिवारी के तीन फिलिम एक साथ फ्लोर पर

शुभम तिवारी अइसन पहिल भोजपुरी अभिनेता बन गईल बाड़न जवन के तीनगो फिलिम एक साथे फ्लोर पर जाए के घोषणा कइल गइल ह। हिंदुस्तान,पटना,27 मार्च के रिपोर्ट एहके पुष्टि करsताः

सुन सजना सुन

दहकेला जिया हमार अउर टूअर के निर्माता  के अगिला फिलिम के नाम ह  सुन सजना सुन ,हालांकि उनुकर अंखियां बसल तोहरी सुरतिया के शूटिंग अबहियों जारी बा। देखीं,हिंदुस्तान,पटना,27.3.2010 मे छपल रिपोर्टः

निरहुआ अउर प्रवेश बाडें आज के करण-अर्जुन

सीनियर अउर जूनियर निरहुआ के जोड़ी पहिली बेर,आज के करण अर्जुन मे रउआ के देखे के मिली। अउर ब्यौरा हिंदुस्तान,पटना के 27 मार्च के संस्करण से-

Tuesday, March 30, 2010

दीया मिर्ज़ा के दो शावक-अशोक और नक्षत्र

संकट में केवल बाघ नहीं,तेंदुए भी हैं। एक आंकड़े के मुताबिक उत्तरप्रदेश में महज 200 तेंदुए बचे हैं। मुहिम शुरू हो चुकी है इन्हें बचाने की। इसी सिलसिले में,दीया मिर्जा ने कल लखनऊ अभयारण्य का दौरा कर दो शावकों का नामकरण किया। इससे पहले,रवीना टंडन भी इस अभयारण्य में बरगद का पेड़ लगा चुकी हैं। पढिए,आज के जनसत्ता में छपी यह रिपोर्टः

सत्यजीत रे को आज ही मिला था ऑस्कर

यों तो सत्यजीत रे ने कुल 29 फिल्में और 10 डाक्यूमेंट्री बनाई थीं,कहते हैं कि वे अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के बाद कुछ और न बनाते तो भी विश्व सिनेमा मे अमर हो जाते। उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी के लिए क्रिएटिव विजुअलाइजर,ग्राफिक डिजाइनर आदि के रूप मे 12 वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया था। संभवतः,वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने फिल्म निर्माण की हर विधा में योगदान किया है। इटली की फिल्म द बाइसाइकिल थीफ से बेहद प्रभावित थे और कहते थे कि फिल्मों में उनके होने की वजह यही फिल्म है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्हें ऑस्कर अकादमी ने लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया है। बाद मे भारत सरकार ने भी उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। उनके नाम पर कोलकाता मे सत्यजीत रे फ़िल्म एवं टेलीवीजन संस्थान (एस.आर.एफ़.टी.आई) है। खैर,आज पढिए अमरीकी पत्रिका सिनेएस्ते द्वारा 1982 में लिया गया इंटरव्यू जिसके चुनिंदा अंश को आज दैनिक भास्कर ने प्रकाशित किया है । सत्यजीत रे इस साक्षात्कार में कह रहे हैं कि उन्होंने पश्चिमी दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाईं-

" फिल्म पाथेर पांचाली बनाते समय ही मैंने अपने देश के देहाती समाज से परिचय पाया। मैं शहरों में जन्मा और पला-बढ़ा था। फिल्मांकन के लिए देहाती इलाकों में घूमते और लोगों से बातें करते हुए मैंने इसे समझना शुरू किया। यह सोचना गलत है कि केवल देहातों में जन्मे लोग ही उनके बारे में फिल्में बना सकते हैं। एक बाहरी नजरिया भी काम करता है।

मुझ पर विभूतिभूषण बंदोपाध्याय का गहरा प्रभाव पड़ा। मैंने उनकी अपुत्रयी पर फिल्में बनाई हैं। उनकी पाथेर पांचाली पढ़ते हुए ही मुझे देहाती जीवन के बारे में पता चला। मैंने उनसे और उनके दृष्टिकोण से एक खास किस्म का जुड़ाव महसूस किया। यही वजह थी कि मैं सबसे पहले पाथेर पांचाली ही बनाना चाहता था। इस किताब ने मुझे छू लिया था।

मुझे टैगोर भी काफी पसंद हैं। लेकिन उनका काम देहाती नहीं। हमारा सांस्कृतिक ढांचा पूर्व और पश्चिम के मेलजोल से तैयार होता है। शहर में शिक्षित और अंग्रेजी साहित्य के क्लासिकों से परिचित हर भारतीय पर यह बात लागू होगी। सच्चाई तो यह है कि पश्चिम का हमारा बोध उन लोगों के हमारी संस्कृति के बोध से गहरा है।

एक तकनीकी कला माध्यम के रूप में सिनेमा का विकास पश्चिम में हुआ। दरअसल किसी भी तरह की समय सीमा वाली कला की अवधारणा ही पश्चिमी है। इसलिए यदि हम पश्चिम और उसके कलारूपों से परिचित हैं तो सिनेमा को एक माध्यम के रूप में अच्छी तरह समझ सकते हैं। कोई बंगाली लोक कलाकार शायद इसे न समझ पाए। इसके बावजूद फिल्में बनाते समय मैं पश्चिमी दर्शकों नहीं, अपने बंगाली दर्शकों के बारे में ही सोचता हूं।"

रूह की राह है सूफी संगीतःज़िला खान

संगीत के संस्कार और परंपरा को संजोना आज की जरूरत है। गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए संगीत के जड़ों को सींचने का प्रयास सदियों से कलाकार करते आए हैं। इसी की एक कड़ी को जोड़ने की कोशिश की है, जिला खां ने। पिछले दिनों अपने उस्ताद पिता उस्ताद विलायत खां की याद में "उस्तादगाह" की स्थापना की।
गायिका जिला खां कहती हैं कि हम "उस्तादगाह" के जरिए सीना-बसीना की तालीम शुरू की जाए, ये हमारा मकसद है। हमारे समाज में कुछ लोगों के पास प्रतिभा है, पर पैसे नहीं हैं। जबकि कुछ लोगों को शौक है लेकिन उन्हें भी सीखने का मौका नहीं मिल पाता है। इसलिए दोनों ही हालातों में लोग अपनी प्रतिभा को संवार सकें। उन्हें "उस्तादगाह" में मौका मिले यह हमारी कोशिश है। संगीत की सही तालीम और पढ़ाई के साथ सीखने वाले को परीक्षा को पास करना भी जरूरी होगा। हमारी कोशिश होगी कि पांच साल की पढ़ाई के बाद शिष्य एक जिम्मेदार कलाकार बनकर निकले। उसे गुरु के साथ कुछ समय बीताने को मिले ताकि वह जान सके, जैसा हमें अपने उस्ताद से मिला। शिष्य को गायन, वादन की तालीम की व्यवस्था की गई है। इसमें सीखनेवाले को बस अपनी विशेषज्ञता हासिल न हो बल्कि वह संगीत के अन्य पक्ष से परिचित भी हो। हमारी कोशिश है कि सुदूर प्रदेषों में छिपी प्रतिभा को लोगों के सामने लाया जा सके। दरअसल हम बच्चों को जानकारी और तकनीक दोनों से अवगत कराना चाहते हैं। सूफी संगीत के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, ऐसा गायिका जिला खां मानती हैं। उस्ताद के घरौंदे में तकरीबन ३ हजार शागिर्द हैं। ये बच्चे केरल, पंजाब और दिल्ली में रहकर तालीम ले रहे हैं। यदि इन बच्चों को रास्ते के बारे में पहले से बता दिया जाए, तो मुझे लगता है कि उनका सफर आसान हो जाएगा। उनका जेहन खुलेगा तो मंजर सुहाना हो जाएगा।

सूफी संगीत को और सुरीला बनाने के लिए किस तरह की नई कोशिश की जानी चाहिए? इस सवाल के जवाब में गायिका जिला खां कहती हैं कि सूफीयाना कलाम गाते हुए मेरी कोशिश होती है कि उसमें मैं श्रृंगार और करुण रस होना चाहिए। आजकल बस भक्ति या वीर रस को खास तौर पर पेश किया जाता है। उसमें एक अधूरापन नजर आता है। सूफी संगीत ही क्यों, शास्त्रीय संगीत या गजल में भी हर रस की खुशबू होनी चाहिए। सूफी कलामों में पुकार को खास अहमियत दी जाती है। गाते समय अगर मैं बस वीर और भक्ति रस को उभारती हूं तो वह अधूरा लगता है। हर रस का इस्तेमाल मेरी खासियत है। अपनी बात को जारी रखते हुए, वह कहती हैं कि सूफी संगीत में मालिक को रिझाने की कोशिश का एक अंदाज है। मुझे लगता है कि मालिक का कर्म है कि वह हमें दुनिया में आने से पहले यह बता देता है कि कुछ मीठे से और किसी से नरमी से पेश आना। ये सारी चीजें आपके अंदर होनी चाहिए। इसलिए वो सारी चीजें आपकी गायकी में झलकनी चाहिए। सूफी संगीत साहित्य, भक्ति के साथ तर्क का तरीका है। संगीत जितना सुनिए, उतनी गहराई से अंदर उतरता है। जब मौका मिले तब काम कर डालना चाहिए, समय का इंतजार नहीं करना चाहिए। वरना जिंदगी यूं ही बीत जाएगी।
(शशिप्रभा तिवारी,मेट्रो रंग,नई दुनिया,दिल्ली,29.3.2010)

इंटरनेट और सिनेमा

बहुत कनफ्यूजन है कि इंटरनेट का शुक्रिया अदा करें अथवा उसे बुरा-भला कहें, जिसकी बदौलत अब घर बैठे ही देख सकते हैं ताजातरीन फिल्में।
आप दुनिया के किसी भी हिस्से में जाएं, सिनेमा ऎसा नशा है, जिसका जादू सिर चढकर बोलता है। और इंटरनेट यानी तारों का जाल और इस जाल से मनोरंजन की दुनिया भी बच नहीं पाई है। फिल्म और संगीत के रिलीज से लेकर उसके प्रदर्शन और प्रचार तक के कई पहलुओं को इंटरनेट ने बदलकर रख दिया है। फिल्म रिलीज हुई नहीं कि लोग उसकी पायरेटेड कॉपी तुरंत ही अवैध तरीके से इंटरनेट के जरिए 'यूट्यूब' पर डाल देते हैं और घर बैठे-बैठे ही देख लेते हैं- फर्स्ट डे फर्स्ट शो। पिछले साल जिस दिन फिल्म 'पा' रिलीज हुई, उसी दिन किसी ने इस फिल्म को यूट्यूब पर डाल दिया। इसे लेकर अमिताभ बच्चन कितना परेशान हुए, वह वे खुद बताते हैं, 'हमने यू ट्यूब को कई नोटिस भेजे। वे फिल्म को इंटरनेट से हटा देते थे, लेकिन तुरंत कोई फिल्म दोबारा अपलोड कर देता था। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करना चाहिए।'
हाल ही राजश्री ने अपनी वेबसाइट शुरू की है, जहां हजारों फिल्में और डॉक्यूमेंट्री मौजूद हैं, जिन्हें आप मुफ्त में या मामूली फीस देकर देख सकते हैं। आखिर इतने बडे बैनर ने क्या सोचकर इंटरनेट और ऑनलाइन की दुनिया में कदम रखा राजश्री मीडिया के एमडी और सीईओ रजत बडजात्या खुलासा करते हैं, 'हमने देखा कि राजश्री की कई फिल्में लोग अवैध तरीके से इंटरनेट पर डाल रहे थे। पायरेसी हो रही थी और लोग देख भी रहे थे। तभी हमने सोचा कि क्यों न हम खुद यह काम करें, ताकि लोग वैध तरीके से ये फिल्में देख पाएं, वो भी मुफ्त में। अगर कोई इसे डाउनलोड करना चाहता है, तो वो उसे चंद डॉलर की फीस देकर डाउनलोड भी कर सकता है।'
कुछ साल पहले राजश्री की फिल्म 'विवाह' इंटरनेट पर रिलीज की गई थी, जिसकी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इसके बाद राजश्री ने जी, स्टार, यूट्यूब वगैरह से पार्टरनशिप की, जो धारावाहिक भी उनकी वेबसाइट पर डालते हैं। हाल ही इरोस इंटरनेशनल ने भी ऎसी ही वेबसाइट शुरू की है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि ऎसी वेबसाइटें किसी भी फिल्म प्रेमी के लिए किसी खजाने से कम नहीं। आप सोचेंगे कि फिल्में दिखाने से इन वेबसाइटों को क्या फायदा रजत बडजात्या बताते हैं, 'मुनाफा हमें विज्ञापनों से मिलता है, जो इंटरनेट पर कंपनियां हमारी वेबसाइट पर डालती हैं। फिर फिल्में आदि डाउनलोड करने के लिए लोग फीस भी देते हैं, इससे भी आमदनी होती है।'
दरअसल आज इंटरनेट ने फिल्म को रिलीज करने का तरीका भी बदल दिया है। 'रंग दे बसंती' से मशहूर हुए अभिनेता सिद्धार्थ की हिंदी फिल्म 'स्ट्राइकर' पिछले दिनों थिएटरों के साथ-साथ पूरी दुनिया में एक साथ इंटरनेट पर रिलीज हुई (हिंदुस्तान को छोडकर)। जब हिंदुस्तान में लोग इंटरवल के दौरान पॉपकॉर्न खरीद रहे थे, तो उसी दौरान हीरो साहब ऑनलाइन थे और दुनियाभर के उन प्रशंसकों के साथ चैट कर रहे थे, जो फिल्म को रिलीज के दिन ऑनलाइन देख रहे थे। और यह सब इंटरनेट का ही कमाल था।
इस मायाजाल का एक बडा नुकसान यह जरूर है कि इंटरनेट पर बिना कानूनी अधिकार के लोग अवैध रूप से दूसरों की फिल्में, गाने और दूसरी चीजें डाउनलोड करते हैं। लेकिन हर सिक्के के दो पहलू तो होते ही हैं। जैसा कि रजत बडजात्या कहते हैं, 'जल्द ही तारों का यह जाल इतना फैल जाएगा कि लोग अपने कंप्यूटर पर ही नहीं, अपने मोबाइल, टीवी और यहां तक की घडियों जैसे उपकरणों पर भी इंटरनेट के जरिए फिल्में देख पाएंगे।' यानी मनोरंजन जगत में भविष्य का माध्यम इंटरनेट ही है और इस क्षेत्र में बहुत कुछ नया होना अभी बाकी है। फिल्मी स्टाइल में कहें, तो पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त! (बीबीसी डॉट कॉम)
इंटरनेट ने दुनिया के सामने अपनी सृजनशीलता दिखाने के भी नए दरवाजे खोल दिए हैं। उरूग्वे के एक निर्माता फेडे अल्वारोज ने पिछले साल नवंबर में करीब पांच मिनट की एक लघु फिल्म बनाकर उसे यूट्यूब पर अपलोड कर दिया और चंद दिनों बाद उन्हें हॉलीवुड के लिए फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिल गया।
नई अभिनेत्री और शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा को 'तीन पत्ती' में अपना पहला रोल इंटरनेट के जरिए ही मिला। निर्माता ने उनकी तस्वीरें फेसबुक पर देखीं और बुला लिया ऑडिशन के लिए।
संगीत के क्षेत्र में भी इंटरनेट के कारण नए प्रयोग हो रहे हैं। गायक लकी अली ने अपना नया एलबम सीडी के जरिए नहीं, बल्कि ऑनलाइन बाजार में रिलीज किया है। क्यों खुद लकी बताते हैं, 'दरअसल जब आप सीडी रिलीज करते हैं, तो उसमें रिकॉर्ड कंपनियां शामिल हो जाती हैं, लेकिन गायक को पूरा फायदा नहीं मिलता। वो सोचता रह जाता है कि एलबम की बिक्री तो अच्छी है, फिर मुझे पैसे क्यों नहीं मिल रहे। तब आपको सिस्टम से लडना पडता है, हिसाब मांगना पडता है। हर कलाकार की यह फितरत नहीं है कि वो हिसाब मांगे। मैं नाम नहीं लूंगा, पर मेरा अनुभव कंपनियों के साथ अच्छा नही रहा। इसलिए मैंने इस बार एलबम ऑनलाइन रिलीज किया।'
(राजस्थान पत्रिका,27मार्च,2010)

रीना के भइया के ससुरारी में विजयलाल यादव

मुन्ना बजरंगी के चर्चित निर्मात्री रीना के भइया के ससुरारी में रानी चटर्जी,पूनम सागर अउर सानिया मिश्रा के देखब। कहल जा रहल ह कि एह फिलिम से नदिया के पार वाला ट्रेंड के वापसी होई-



















(हिंदुस्तान,पटना,27.3.2010)

दाग के रिलीज शीघ्र

निरहुआ अउर पाखी अभिनीत दाग जल्दीए रिलीज होई। एह फिलिम मे रउआ बिराज भट्ट अउर स्वीटी के भी देख सकब। बतावत चलीं कि एह फिलिम के निर्माण लागल रहs ए राजा जी के निर्माता रमाकांत प्रसाद कइले बाड़न। एक रिपोर्ट हिंदुस्तान,पटना,27.3.2010 अंक से-

Monday, March 29, 2010

ब्लॉग,ट्विटर और फेसबुक पर फिल्मी सितारे

फिल्मी सितारे अब अपनी बात रखने के लिए प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते। इंटरनेट ने उन्हें नई कलम-स्याही दी है। ब्लॉग,फेसबुक और ट्विटर पर ये सितारे दुनिया भर के मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रख रहे हैं। और यह संवाद एकतरफा नहीं है,उन्हें खूब रेस्पांस भी मिल रहे हैं।

अलका अपने पति नीरज कपूर के साथ

कोलकाता में जनमी और सात बार फिल्मफेअर पुरस्कार जीत चुकी गायिका अलका याज्ञिक ने, शिलंग में रह कर पूर्वोत्तर क्षेत्र मे शराब के कारोबार में शीर्ष पर पहुंचे अपने पति नीरज कपूर के साथ फिर से रहने का फैसला किया है। हिंदुस्तान,पटना,27.3.2010 से यह रिपोर्टः

प्रतिभा सिंह को भिखारी ठाकुर सम्मान मिला

भोजपुरी की विख्यात गायिका और अभिनेत्री प्रतिभा सिंह को भिखारी ठाकुर सम्मान-2010 प्रदान किया गया। 27 मार्च की देश शाम प्रारम्भ हुए इस समारोह में आरा की जदयू सांसद मीना सिंह ने उन्हें यह सम्मान राशि, मानपत्र, स्मृति-फलक एवं शाल प्रदान किया। यह सम्मान सामाजिक शोध संस्थान, भोजपुर, आरा द्वारा एक भव्य लोक-संगीत समारोह में प्रदान किया गया । इस अवसर पर मीना सिंह ने कहा कि प्रतिभा सिंह ने अपने गायन से भोजपुरी के लोकरंग को बचाये रखा है। वे लोकप्रियता पाने के लिए अश्लीलता की बैसाखियों का सहारा नहीं लेतीं। वे हमारी पुरातन लोक धुनों को भी बखूबी गाती हैं और आधुनिक गीतों से भी आज के युवाओं की रुचि को संस्कारित कर रही हैं। लोक और आधुनिकता को संगम उनके यहां मिलेगा। वे फिल्मों में भी काम कर रही हैं और उसमें वे कामयाब हों, हमारी यह शुभकामना है।
उन्होंने कहा कि भोजपुरी लोक-कला और संस्कृति को संरक्षण देने में लगे भिखारी ठाकुर सामाजिक शोध संस्थान का प्रयास सराहनीय है। कलाकारों, पत्रकारों और साहित्यकारों के सहयोग से यह संस्थान बिना किसी सरकारी सहायता के वर्ष 2002 से वर्ष में चार कार्यक्रम करता आ रहा है।
प्रतिभा सिंह पिछले एक दशक से भोजपुरी गायकी में अपने गायन से अपना विशिष्ट स्थान बना पाने में कामयाब रही हैं। उनके एक दर्जन से अधिक कैसेट व सीडी जारी हुए हैं। देश भर में सैकड़ों स्टेज शो करने वाली प्रतिभा को इसके पहले आकांक्षा संस्कृति सम्मान मिला है। पोलिया से बचाव के अभियान के यूनिसेफ और पश्चिम बंगाल सरकार साझा जागरुकता अभियान में उनके गीतों का कैसेट भोजपुरी में जारी हुआ था जो अब भी हिन्दी उर्दू भाषी बहुल क्षेत्रों में पोलियो बूथों पर बजाया जाता है। इधर रेडियो पर मलेरिया से सावधान करने वाले जिंगल में भी उनकी आवाज सुनायी देती है।
इस अवसर पर प्रतिभा सिंह ने कहा कि भोजपुरी संगीत बेजोड़ है। हमारे पास हर संस्कार के गीत हैं जो यह बताता है कि हम कितने संगीतमय हैं। हमें विलुप्त होते अपने संस्कार गीतों को बचाना है और उसके लिए जरूरी है कि लोक कलाकारों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाये कि वे अपने जीवन में संगीत को बचाये रखें। हमें अपने लोकसंगीत की शक्ति को पहचानना होगा वरना वह आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं खो जायेगा या फिर अपनी मौलिकता खो देगा। इस अवसर पर उन्होंने अपने कुछ गीत भी सुनाये। उसके बाद रात भर चले चैता के कार्यक्रम में आसपास के गावों से आये लोक-कलाकारों को सात गोल ने अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किये जिनमें रामाज्ञा राम विशेष तौर पर शामिल थे जो बिहारी ठाकुर की मंडली में थे।
(भोजपुरीमेधा डॉट ब्लॉगस्पॉट से साभार)

मित्तल वर्सेज मित्तलःफिल्म-समीक्षा

बीते शुक्रवार को हम तुम और घोस्ट तथा वेल डन अब्बा के साथ ही एक और फिल्म रिलीज हुई-मित्तल वर्सेज मित्तल। रितुपर्णो सेन गुप्ता,रोहित राय,गुलशन ग्रोवर तथा सुचित्रा कृष्णामूर्ति के स्टारकास्ट वाली इस दो घंटे दस मिनट की फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है। निर्माता हैं राजीवकौल और निर्देशक हैं करण राजदान। गीत शब्बीर अहमद का और संगीत दिया है शमीर टंडन ने। नवभारत टाइम्स में चंद्रमोहन शर्मा जी ने इसे महज दो स्टार दिया हैः
ईशा कोप्पिकर के साथ गर्लफ्रेंड जैसी बोल्ड फिल्म बना चुके डायरेक्टर करण के नाम हर बार पिछली फिल्म से ज्यादा बोल्ड फिल्म बनाने का रेकॉर्ड है। करण ने 70-80 के दशक में बनने वाली फिल्मों की तर्ज पर कहानी लिखी , लेकिन इसमें ज्यादा से ज्यादा हॉट दृश्यों को ठूंसने की चाह में ऐसे भटके कि फिल्म बी और सी सेंटरों और फ्रंट क्लास दर्शकों की बनकर रह गई।

कहानी : मिताली ( रितुपर्णा सेन गुप्ता ) ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि शादी के बाद उसकी जिंदगी इतनी ज्यादा बदल जाएगी। उसकी सास उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती और उसका पति करण मित्तल ( रोहित राय ) अब उसके साथ जानवरों जैसा सलूक करने लगा है। शादी के बाद ससुराल में शारीरिक और मानसिक अत्याचार सहने के बजाय मिताली विरोध करने का फैसला करती है। वह अपना घर छोड़ देती है। साथ ही , करण के खिलाफ मुकदमा भी दायर कर देती है। यह मुकदमा उसकी आजादी के सफर की एक ऐसी शुरुआत साबित होता है , जिसमें मिताली गलत या सही कुछ भी सोचने को तैयार नहीं होती क्योंकि उसे अब किसी भी तरह से अपना मकसद हासिल करना है।

एक्टिंग : सेक्स का तड़का लगाती इस फिल्म में रितुपर्णा सेन ने अपनी पिछली इमेज से हटकर बहुत बोल्ड भूमिका निभाई है। लेकिन रितुपर्णा ने एक्टिंग से ज्यादा ध्यान कैमरे के सामने अपनी बोल्ड ब्यूटी को परोसने में लगाया।

डायरेक्शन : करण ने स्क्रिप्ट को असरदार बनाने की बजाय अपना ध्यान ज्यादा से ज्यादा हॉट दृश्यों को फिट करने में लगाया है।

संगीत : गीत संगीत फिल्म का कमजोर पक्ष है।

क्यों देखे : बस हॉट दृश्य और कुछ नहीं।
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दैनिक हिंदुस्तान की टिप्पणीः


हम तुम और घोस्टःफिल्म-समीक्षा

इस शुक्रवार हम तुम और घोस्ट रिलीज हुई है। अरशद वारसी,दीया मिर्जा,बोमन ईरानी,जेहरा नकवी और टीनू आनंद की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है कबीर कौशिक ने और निर्माता हैं अरशद वारसी। गीत जावेद अख्तर का है और संगीत है शंकर-एहसान लॉय का । फिल्म को यू-ए सर्टिफिकेट दिया गया है अर्थात् बच्चे बड़ों के साथ यह फिल्म देख सकते हैं। नवभारत टाइम्स में चंद्रमोहन शर्मा जी ने इस फिल्म को ढाई स्टार देते हुए लिखा हैः
ऐसा लगता है कि ग्लैमर इंडस्ट्री को इन दिनों भूत - प्रेत से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है। पिछले कुछ अर्से से यह इंडस्ट्री का पसंदीदा सब्जेक्ट बन गया है तभी तो कुछ हफ्तों से ऐसी फिल्मों की लंबी क्यू लग गई है। इसी कड़ी में एक्टर से प्रड्यूसर बने अरशद वारसी की इस फिल्म को भी शामिल किया जा सकता है। लेकिन यह समझ से परे है कि अरशद ने बतौर मेकर अपनी पहली फिल्म में कुछ अलग दिखाने या नया करने के लिए इमेज से हटकर ऐसा सूखा सब्जेक्ट क्यों चुना। माना , अरशद की फिल्म में नजर आने वाले भूत दर्शकों को डराते नहीं बल्कि दर्शकों की सहानुभूति बटोरने में कुछ हद तक कामयाब रहे हैं।

कहानी : फैशन फोटोग्राफर अरमान सूरी ( अरशद वारसी ) और एक मैगजीन की एडीटर गहना ( दीया मिर्जा ) एक दूसरे को चाहते हैं। इस रिश्ते से गहना के पिता ( जावेद शेख ) को भी ऐतराज नहीं। अचानक गहना को लगता है कि अरमान ऐसी बीमारी का शिकार हैं जिसके चलते वह अपनेआप से बातें करता है , मृतकों से अपना रिश्ता जोड़ने लगा है। दरअसल , अरमान में बरसों पहले मर चुके मिस्टर कपूर ( बोमन ईरानी ) का भूत आ जाता है। मिस्टर कपूर की अचानक मौत हुई और उनकी दौलत बेटे ने धोखे से अपने नाम की और पत्नी के इशारों पर मां से किनारा कर लिया। मिस्टर कपूर का भटकता भूत अब धोखे से उनके बेटे द्वारा हथियाई जायदाद को अपनी पत्नी पूजा के नाम कराना चाहता है। अपनी इसी आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए कपूर का भूत अरमान में समाता है। इसके बाद जहां अरमान इस भूत के इशारों पर नाचने को मजबूर है , वहीं गहना उसे दिमागी तौर से बीमार समझने लगती है।

एक्टिंग : फिल्म अरशद ने बनाई है इसलिए ज्यादातर सीन्स में वही दिखाई देते हैं। लगातार कॉमिडी करने के बाद अरशद अब इस अलग रोल में जम नहीं पाते। दीया ने जितनी मेहनत कैमरे के सामने अपनी ब्यूटी दिखाने की , काश मैगजीन एडीटर की अपनी भूमिका में भी उतनी मेहनत करती। बोमन ईरानी खूब जमे हैं।

डायरेक्शन : सहर और चंपू की तर्ज से अलग हटकर इस बार कबीर ने कुछ नया करने की कोशिश तो की है , पर स्क्रिप्ट से लगातार बढ़ती उनकी दूरी फिल्म की कमजोर कड़ी है।

संगीत : शंकर एहसान लॉय के संगीत और जावेद अख्तर के लिखे गानों में ऐसा जादू नहीं कि म्यूजिक लवर्स इन गानों को गुनगुनाएं।

क्यों देखे : इस गोस्ट में इतना दम है कि आपकी हमदर्दी हासिल करने का दम रखता है। वहीं यूके की खूबसूरत लोकेशन और बोमन ईरानी की लाजवाब एक्टिंग के लिए फिल्म देखी जा सकती है।
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नईदुनिया में मृत्युंजय प्रभाकर जी की टिप्पणी भी देखिएः
कबीर कौशिक की फिल्म "हम, तुम और घोस्ट" पूरी तरह अरशद वारसी के ऊपर केंद्रित फिल्म है। अरशद प्रतिभाशाली अभिनेता हैं और उन्होंने इस भूमिका को बेहतर तरीके से निभाया भी है। एक फैशन फोटोग्राफर जिसे भूत की आवाजें सुनाई और दिखाई देती हैं जिसके कारण उसके जीवन में जटिलताएं आती जाती हैं। उनसे मुक्ति के लिए वह भूतों की मदद करता है। भूतों के जो तीन प्रसंग फिल्म में उठाए गए हैं वह भूतों की कम हमारे समाज की समस्याएं ज्यादा हैं और दर्शकों को छूते भी हैं। बोमन ने इस भूमिका में भी अपनी बेहतरीन अदाकारी की है। संध्या मृदुल भी जावेद शेख भी अपनी भूमिकाओं में जंचते हैं पर दिया मिर्जा ग्लैमर डॉल की इमेज से बाहर निकलकर नहीं आ पातीं। फिल्म का संगीत भी याद करने लायक नहीं है।
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हिंदुस्तान में मनीष शुक्ल जी की राय भी देखिए-


वेल डन अब्बाःफिल्म-समीक्षा

कलाकार : बोमन ईरानी, समीर दत्तानी, मिनिषा लांबा, ईला अरुण, सोनाली कुलकर्णी, रजत कपूर, रवि किशन, यशपाल शर्मा
निर्माता: बिग पिक्चर्स
डायरेक्टर: श्याम बेनेगल
म्यूजिक: शांतनु मोइत्रा
गीतः स्वानंद किरकिरे
सेंसर सर्टिफिकेट : यू
अवधि: 134 मिनट
रेटिंगः 3+1/5

लीक से हटकर दमदार फिल्मों के लिए अपनी पहचान बना चुके श्याम बेनेगल की इस फिल्म में भी उन दर्शकों के लिए बहुत कुछ है, जो मनोरंजन के साथ कुछ नया और अलग देखना चाहते हैं। बेनेगल के फिल्मी करियर की यह 26वीं फिल्म है। अपनी पिछली फिल्मों की तरह उन्होंने इस बार भी मनोरंजन के साथ कुछ सटीक मेसेज दिया है। अगर कहा जाए तो सरकार को जो मेसेज देना चाहिए था, उसे बेनेगल ने अपने दम पर ऐसे असरदार ढंग से पेश किया है, जिसकी तारीफ करनी चाहिए।


बेनेगल की पिछली फिल्म 'वेलकम टु सज्जनपुर' को बड़े शहरों और मल्टिप्लेक्सों में ज्यादा कामयाबी भले ही न मिली हो, लेकिन छोटे सेंटरों में फिल्म इस कदर हिट रही कि निर्माता कंपनी ने लागत के बाद मुनाफा भी कमाया। बेनेगल के बारे में कहा जाता है कि वह फिल्म बनाने में प्रॉडक्शन कंपनी की शर्तों को नहीं मानते और न ही किसी तरह का समझौता करते हैं। यही वजह रही कि हैदराबाद के आसपास घूमती इस कहानी को शूट करने के लिए बेनेगल और उनकी यूनिट के लोगों ने साउथ के कई छोटे गांवों में डेरा डाला। फिल्म के टाइटल से आप समझ सकते हैं कि पूरी फिल्म में अब्बा का राज है। 'थ्री इडियट' के बाद बोमन ईरानी ने एक बार फिर साबित किया कि कहानी के किरदार में खुद को कैसे फिट किया जा सकता है। फिल्म में बोमन का डबल रोल दर्शकों को और अधिक चौंकाता है। उन्होंने हैदराबाद की बोली और साउथ के गांव में रहने वाले उन लोगों की बेबसी को सिल्वर स्क्रीन पर ऐसे असरदार ढंग से उतारा है कि हॉल में बैठे दर्शक उनकी वाहवाही किए बिना खुद को नहीं रोक पाते।


कहानी: करीब तीन महीने की छुट्टी के बाद ड्राइवर अरमान अली (बोमन ईरानी) अपने गांव से मुंबई वापस लौटता है, तो उसका मालिक उसे किसी भी सूरत में नौकरी पर वापस रखने को राजी नहीं होता। दरअसल, अरमान अपने मालिक से एक महीने की छुट्टी लेकर गया था और वापस आया तीन महीने में। बस यही वजह है कि इस बार मालिक अरमान का कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं होता। लेकिन अचानक मालिक को जरूरी काम से पुणे जाना पड़ता है, तो वह अरमान को एक बार फिर कार चलाने का मौका देता है। इसी सफर में अरमान उसे अपनी आपबीती सुनाता है। इस आपबीती में अरमान का जुड़वां निठल्ला भाई रहमत अली (बोमन ईरानी) और उसकी बेगम सलमा (ईला अरुण) से लेकर साउथ में अरमान का ऐसा गांव है, जहां इंसानी जिंदगी से पानी ज्यादा महंगा है। गांव में अपने चाचा चाची के साथ रह रही अरमान की बेटी मुस्कान (मिनिषा लांबा) बारहवीं क्लास में पढ़ती है और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का दम रखती है। अरमान अपनी पुश्तैनी जमीन को खेती के लायक बनाने के मकसद से पानी की बावड़ी बनाने के लिए सरकारी अनुदान लेता है। पर इस चक्कर में वह ऐसे चक्रव्यूह में फंसता है, जहां सिर्फ अफसरशाही, भ्रष्टाचार और सरकार द्वारा गरीबों के लिए बनी योजनाओं की रकम डकारते अफसर से लेकर मंत्री तक शामिल हैं।


ऐक्टिंग: पूरी फिल्म बोमन ईरानी पर टिकी है और डबल रोल में बोमन छाए हुए हैं। मिनिषा लांबा ने 'यहां' के बाद एक बार फिर साबित किया कि अगर काबिल डायरेक्टर का साथ मिले, तो उनकी गिनती इंडस्ट्री की टॉप हीरोइनों में हो सकती है। ईला अरुण फिर से अपने पुराने 'वेलकम टु सज्जनपुर' स्टाइल में नजर आईं। वहीं, ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में रजत कपूर और भ्रष्ट और रंगीन मिजाज इंजिनियर की भूमिका में रवि किशन जमे हैं।


डायरेक्शन: बेनेगल की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने ऐसे सब्जेक्ट पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया और बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ मसालों का मोह त्यागकर साफ सुथरी फिल्म बनाई। इंटरवल से पहले फिल्म की रफ्तार कुछ धीमी है, तो वहीं आखिर में फिल्म को आठ दस मिनट बेवजह बढ़ाया गया है।


म्यूजिक: फिल्म का म्यूजिक अच्छा है। पानी को तरसते पानी को झपटते चेहरे, रहिमन इश्क का धागा रे, मेरी बन्नो होशियार... गीत हॉल से बाहर आकर भी याद रहते हैं।


क्यों देखें: अगर आप श्याम बेनेगल की फिल्मों के शौकीन हैं, तो फिल्म आपके लिए है। बोमन ईरानी न भूलने वाले डबल रोल में हैं और भ्रष्ट सरकारी तंत्र का पर्दाफाश फिल्म की खासियत है।

(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स)

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इसी फिल्म की रामकुमार सिंह जी की समीक्षा राजस्थान पत्रिका से-

निर्देशक श्याम बेनेगल एक बार फिर अपने पूरे रंग में हैं। 'वेलकम टु सज्जनपुर' के बाद उनकी अगली फिल्म 'वेल डन अब्बा' सिनेमाघरों में है। गांव की एक कहानी को आधार बनाकर उसे छिछली कॉमेडी से ऊपर उठाते हुए व्यवस्था पर एक तंज करती हुई वेल डन अब्ब्ाा एक तरह से सार्थक सिनेमा की वापसी है। यह लगभग हरिशंकर परसाई और शरद जोशी का एक तरह से सिनेमाई संस्करण है। यह संयोग ही है कि इस फिल्म के कहानी के हिंदी लेखक संजीव की कहानी फुलवा का पुल, उर्दू लेखक जिलानी बानो की नरसियां की बावडी और स्क्रीनप्ले ट्रीटमेंट में जयंत कृपलानी की स्टिल वाटर्स को श्रेय दिया गया है।
फिल्म की कहानी मुंबई में काम करने वाले ड्राइवर अरमान अली की है, जो अपने गांव से लौटकर मुंबई जाता है तो उसका बॉस उसे रखने से मना करता है कि वह एक महीने की छुट्टी लेकर पूरे तीन महीने क्यों गायब रहा। वह अजीब तरीके से किस्सा सुनाता है। सरकार की ओर से कपिलधारा योजना में वह मुफ्त में बावडी की खुदाई करने के लिए सरकारी अनुदान की मांग करता है, लेकिन बावडी नहीं बनी। जबकि सरकार के कागजों में चित्र और वैरिफिकेशन के हस्ताक्षर के साथ मौजूद है। अरमान अली अपनी बेटी मुस्कान अली के साथ पुलिस में इस बात की रिपोर्ट दर्ज कराता है कि उसकी बावडी चोरी हो गई है। पता चला न केवल अरमान अली, बल्कि इलाके के ज्यादातर किसानों की बावडियां चोरी हो गई हैं। अरमान अली यहां एक नेता बनकर उभरते हैं। अरमान अली कहते हैं, मैं बावडी के लिए पैसा लेने गया तो इन लोगों से डरता था, लेकिन अब देख लिया कि ये सब मक्कार लोग हैं। पटकथा की उपकथाओं में मिनिषा लांबा और समीर दत्तानी के रोमांस के ट्रेक हैं और अरमान अली के जुडवां भाई रहमान अली और उनकी पत्नी यानी डबल रोल में बोमन इरानी और इला अरूण भी हैं। इंस्पेक्टर की भूमिका में रजित कपूर, उनके सहयोगी यशपाल और रवि झांकल, इंजीनियर की भूमिका में रवि किशन हैं। सभी ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन सारे नंबर बोमन इरानी को जाते हैं।
श्याम बेनेगल की इस फिल्म की खासियत यह है कि फिल्म विकास में बाधा डालने वाले उस सरकारी तंत्र पर एक तमाचा जडती है। सूचना के अधिकार की ताकत का बेहतरीन इस्तेमाल इस फिल्म में किया गया है। शांतनु मोइत्रा का संगीत अच्छा है। आम आदमी की ताकत की कहानी है वेल डन अब्बा।
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नई दुनिया में मृत्युंजय प्रभाकरः

अच्छे अभिनेताओं की कद्र हमेशा रही है और रहेगी। बोमन ईरानी ने अपनी अभिनय प्रतिभा से अपनी खास पहचान बनाई है और एक अच्छा-खासा दर्शक वर्ग भी। वह जितने सहज तरीके से अपनी भूमिका उत्कृष्टता से निभा ले जाते हैं इस हफ्ते प्रदर्शित दोनों ही फिल्में इस बात की गवाह हैं। दो फिल्में और भूमिकाएं तीन। श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म "वेल डन अब्बा" में बोमन जु़ड़वा भाइयों की दोहरी भूमिका में हैं तो कबीर कौशिक की फिल्म "हम, तुम और घोस्ट" में भूत की भूमिका में। तीनों पात्रों को बोमन ने जितने नेचुरल तरीके से प्ले किया है वह देखने लायक है। बोमन के दर्शकों के लिए यह हफ्ता सच में खास है।

श्याम बेनेगल की फिल्मों में गांव और कस्बायी समाज हमेशा से प्रमुखता से रहा है। उनकी पिछली फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" भी कस्बायी धरातल की फिल्म थी और लोगों को पसंद आई थी। "वेल डन अब्बा" में बेनेगल एक बार फिर गांव की ओर लौटे हैं और सरकारी लोककल्याणकारी योजनाओं की जो हालत है उसका परीक्षण किया है। हाल ही में आई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुस्लिम समाज का जो अक्स दिखाया गया है फिल्म उसकी पुष्टि करती है। बहुत दिनों बाद बॉलीवुड में ऐसी फिल्म आई है जिसका मुख्य पात्र एक मुस्लिम किरदार है। फिल्म हल्के-फुल्के संवादों और दृश्यों के माध्यम से आगे ब़ढ़ती है पर कहीं-कहीं खिंच गई है। इस फिल्म की खोज मिनिषा लांबा हैं जिन्होंने अपने काम से सबको प्रभावित किया है। रवि किशन, राजेंद्र गुप्ता, ईला अरुण, यशपाल शर्मा, रजित कपूर आदि भी अपनी भूमिकाओं में जमे हैं।

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और अंत मे,साढे तीन स्टार के साथ समय ताम्रकार वेबदुनिया परः

श्याम बेनेगल का कहना है कि वे युवाओं को गाँव से जोड़ना चाहते हैं क्योंकि भारतीयों का एक बहुत बड़ा हिस्सा गाँवों में बसता है जो शाइनिंग इंडिया से बहुत दूर है। इसलिए उन्होंने ‘वेल डन अब्बा’ में चिकटपल्ली नामक गाँव को दिखाया है। ग्रामीण जीवन और उनकी समस्याओं को यह फिल्म बारीकी से दिखाती है।

इस फिल्म के जरिये उन्होंने उन सरकारी योजनाओं पर प्रहार किया है जो गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए बनाई जाती है। मुफ्त का घर, मुफ्त का कुआँ, मुफ्त की शिक्षा, चिकित्सा जैसी योजनाएँ सरकार से गरीब तक पहुँचने में कई लोगों के हाथ से गुजरती है और लाख रुपए सैकड़े में बदल जाते हैं।

अरमान अली (बोमन ईरानी) मुंबई में ड्रायवर है। छुट्टी लेकर वह अपनी बेटी मुस्कान (मिनिषा लांबा) के लिए लड़का ढूँढने चिकटपल्ली जाता है। मुस्कान अपने चाचा-चाची के साथ रहती है जो मस्जिद से जूते भी चुराते हैं और बावड़ियों से पानी भी क्योंकि गाँव में पानी का संकट है।
अरमान को पता चलता है कि कपिल धारा योजना के अंतर्गत सरकार गरीबों को बावड़ी के लिए मुफ्‍त में धन दे रही है। वह अपनी जमीन पर बावड़ी बनवाना चाहता है ताकि थोड़ी-बहुत फसल पैदा कर सके। गरीबी रेखा के नीचे होने का वह झूठा प्रमाण-पत्र बनवाता है और बावड़ी के लिए आवेदन करता है।

उसका सामना भ्रष्ट अफसर, बाबू, मंत्री और इंजीनियर से होता है जो उसे मिलने वाले अनुदान में से अपना हिस्सा माँगते हैं। आखिर में अरमान के हाथों में चंद हजार रुपए आते हैं जिससे बावड़ी नहीं बनाई जा सकती।

उदास अरमान को उसकी 12 वीं कक्षा में पढ़ रही बेटी मुस्कान अनोखा रास्ता बताती है। वे बावड़ी की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करवाते हैं। उनका साथ वे लोग भी देते हैं जिनके साथ भी बावड़ी के नाम पर हेराफेरी की गई। मामला विधानसभा तक पहुँच जाता है और सरकार बचाने के लिए रातो-रात बावड़ी बना दी जाती है।

इस कहानी को ‘नरसैय्या की बावड़ी’ (जीलानी बानो), ‘फुलवा का पुल’ (संजीव) और ‘स्टिल वॉटर्स’ को आधार बनाकर तैयार किया गया है। इस तरह की कहानी पर कुछ क्षेत्रीय भाषाओं में भी फिल्म बनी है और कुछ दिनों पहले ‘लापतागंज’ टीवी धारावाहिक के एक एपिसोड में भी ऐसी कहानी देखने को मिली थी। लेकिन श्याम बेनेगल का हाथ लगने से यह कहानी ‘वेल डन अब्बा’ में और निखर जाती है।

बेनेगल ने सरकारी सिस्टम और इससे जुड़े भ्रष्ट लोगों को व्यंग्यात्मक और मनोरंजक तरीके से स्क्रीन पर पेश किया है कि किस तरह इन योजनाओं को मखौल बना दिया गया है और गरीबों का हक अफसर/मंत्री/पुलिस छीन रहे हैं। कई ऐसे दृश्य हैं जो चेहरे पर मुस्कान लाते हैं साथ ही सोचने पर मजबूर करते हैं। ये सारी बातें बिना लाउड हुए दिखाई गई हैं।

मुख्‍य कहानी के साथ-साथ मुस्कान और आरिफ का रोमांस और शेखों द्वारा गरीब लड़कियों को खरीदने वाला प्रसंग भी उल्लेखनीय है। फिल्म की धीमी गति और लंबे क्लायमेक्स से कुछ लोगों को शिकायत हो सकती है, लेकिन इसे अनदेखा भी किया जा सकता है।

गाँव की जिंदगी में एक ठहराव होता है और इसे फिल्म के किरदारों के जरिये महसूस किया जा सकता है। फिल्म में कई ऐसे कैरेक्टर हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहते हैं। चाहे वो भला आदमी अरमान हो, उसकी तेज तर्रार बेटी मुस्कान हो या इंजीनियर झा हो जिसके दिमाग में हमेशा सेक्स छाया रहता है।
अरमान अली के रूप में बोमन ईरानी की एक्टिंग बेहतरीन है, लेकिन अरमान के जुड़वाँ भाई के रूप में उन्होंने थोड़ी ओवर एक्टिंग की है। मिनिषा लांबा का यह अब तक सबसे उम्दा अभिनय कहा जा सकता है। रवि किशन, रजत कपूर, इला अरुण, समीर दत्ता, राजेन्द्र गुप्ता ने भी अपना काम अच्छे से किया है। सोनाली कुलकर्णी को ज्यादा अवसर ‍नहीं मिल पाए।

‘वेल डन अब्बा’ एक वेल मेड फिल्म है और इसे देखा जा सकता है।

Saturday, March 27, 2010

प्रतिभा सिंह के भिखारी ठाकुर सम्मान

भोजपुरी के चर्चित गायिका अउर अभिनेत्री प्रतिभा सिंह के आज एह वर्ष के भिखारी ठाकुर सम्मान दीहल जा रहल बा। ई पुरस्कार भिखारी ठाकुर सामाजिक शोध संस्थान, भोजपुर, आरा द्वारा दीहल जाला। पुरस्कार आज आरा में आयोजित एक रंगारंग संगीत समारोह में दीहल जाइ।
प्रतिभा सिंह पिछला एक दशक से भोजपुरी गायिकी में आपन विशिष्ट स्थान बनवले बाड़ी। उनुकर एक दर्जन से ज्यादा कैसेट अउर सीडी रिलीज हो चुकल बा जवन के एचएमवी-सारेगामा, प्राइम, न्यू विक्टोरिया अउर स्काइ जइसन प्रतिष्ठित म्यूजिक कंपनी द्वारा रिलीज कईल गइल ह। उनकर 'पनवा खिला दे सैंया', 'पिया नम्बर वन' अउर 'छैला रंगदार चाहीं' एलबम धूम मचा देले रहे। हाले से प्रतिभा जी एक्टिंग भी शुरू कइले बाड़ी। रउआ 'भाई होखे त भरत नियन' फिल्म में उनका के देख चुकल बानी। 'आई हो दादा', 'बहिना तोहरे खातिर' अउर 'माटी मांगे खून' में भी उनकर एक्टिंग आ गीत देखे-सुने के मिली।
प्रतिभाजी बलिया जिला के रोहुआं-तिवारी गांव के बाड़ी सन। रउआ बाकायदा शास्त्रीय संगीत में शिक्षित बानी। प्रयाग संगीत समिति,इलाहाबाद से शास्त्रीय संगीत गायन में संगीत प्रभाकर (छह वर्षीय पाठ्यक्रम) कइले बाड़ी। शास्त्रीय संगीत के विधिवत तालीम रउआ विख्यात तबलावादक पं.ज्ञान प्रकाश घोष के शिष्य पं.स्व.सुधीर चौधरी से प्राप्त कइनी। देश भर में सैकड़ों स्टेज शो कर चुकल बानी आ उनका के एह से पहिले आकांक्षा संस्कृति सम्मान मिल चुकल बा। उनकर कार्यक्रम अउर इंटरव्यू रउआ ईटीवी, महुआ, ताजा़ टीवी, अहिंसा, दूरदर्शन आदि पर भी देखले होखब। पश्चिम बंगाल सरकार पहिली बेर प्रचार खातिर भोजपुरी के सहारा लेले बा। यूनिसेफ के साझा तत्वावधान में पोलियो के प्रति जागरुकता अभियान के तहत प्रतिभा जी के गावल गीत के कैसेट बनावल गइल ह जे हिन्दी भाषी क्षेत्र में पोलियो बूथ पर बजावल जाला। प्रतिभा जी स्थायी रूप से कोलकाता में रहेली।

Friday, March 26, 2010

अमिताभ और आमंत्रण

मुंबई में बांद्रा-वर्ली एक्सटेंशन सेतु के उद्घाटन समारोह में अमिताभ के शामिल होने को लेकर उठे विवाद पर पढिए नई दुनिया का यह संपादकीय-
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे यहां छोटी-छोटी बातों को लेकर आए दिन विवाद खड़े किए जाते हैं और बिना किसी बात के लोगों को निशाना बनाने की कोशिश की जाती है। अमिताभ बच्चन हमारे समय में मनोरंजन उद्योग के महानायक हैं और यह रुतबा उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन से अर्जित किया है। महाराष्ट्र के सार्वजनिक उपक्रम मंत्री जयदत्त क्षीरसागर ने महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम के अध्यक्ष की हैसियत से अमिताभ बच्चन को गत बुधवार को सी-लिंक के उद्घाटन के मौके पर आमंत्रित किया था और इस बारे में अखबारों में विज्ञापन भी छपे थे, हालांकि निमंत्रण पत्र में अमिताभ बच्चन का नाम शामिल नहीं था। बच्चन का मानना है कि उनकी उपस्थिति को लेकर जो विवाद है, वह वास्तव में मीडिया आदि द्वारा गढ़ा गया है। अमिताभ बच्चन दिवंगत राजीव गांधी के मित्र थे जिन्हें मतभेदों के कारण अब १०, जनपथ पसंद नहीं करता लेकिन अमिताभ बच्चन के गुजरात के ब्रांड एमबेस्डर बनने से कांग्रेस जैसे तिलमिला उठी। कांग्रेस में स्वामिभक्ति हर दौर में रही है लेकिन बच्चन के आमंत्रित किए जाने पर अचानक कांग्रेसियों के माथे पर जो बल पड़ गए, उस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है। खुद मुख्यमंत्री ने उन्हें आमंत्रित करने के नैतिक दायित्व से पल्ला झाड़ लिया है। क्या कांग्रेसियों ने अमिताभ बच्चन और उनके परिवार के सदस्यों की फिल्मों का बहिष्कार किया हुआ है जो "गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज" जैसा तेवर वे अपना रहे हैं? क्या रतन टाटा या अंबानी बंधुओं के मामले में भी कांग्रेसी ऐसा ही व्यवहार करते हैं? यदि नहीं तो दो मानदंड नहीं चल सकते। जयदत्त क्षीरसागर महाराष्ट्र में एनसीपी के कोटे से मंत्री हैं और बच्चन को बुलाकर उन्होंने कोई भी अपराध नहीं किया है मगर मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कह रहे हैं कि यह चूंकि एक सरकारी समारोह था, अतः निमंत्रण भेजते समय उचित सावधानी बरतनी चाहिए थी जबकि कांग्रेसी कह रहे हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि अमिताभ आने वाले हैं मानो अनजाने में उनसे अपराध हो गया हो। यही नहीं यह भी कहा जा रहा है कि बच्चन को आमंत्रित ही नहीं किया गया था यानी बच्चन के पास कोई काम ही नहीं है वे तो जैसे बिना बुलाए खुद ही कहीं भी पहुंच जाते हैं! यह मानसिकता घृणित है और एनसीपी ने अशोक चव्हाण की छीछालेदर करने के लिए अगर यह चाल चली है तो और भी घृणित है। मुंबई का नागरिक होने के नाते ही नहीं, हमारे समय के "आइकॉन" होने के नाते भी बच्चन को निमंत्रण पाने का पूरा बल्कि पहला अधिकार है। फिर यह सरकारी समारोह था कोई पार्टी का जलसा नहीं। खेद है कि कांग्रेसी क्षुद्र बातों में ही उलझे हुए हैं।
नोटःयह आईटम हरिभूमि अखबार मे 29 मार्च,2010 के अंक में लिखा गया था। क्लिक करें।

देवरा बड़ा सतावेला रिलीज खातिर तैयार। पहिली बेर रउआ देखब रविकिशन संग रानी चटर्जी के















(हिंदुस्तान,पटना,21.3.2010)

लखेरा के मुहूर्त भईल














(हिंदुस्तान,पटना,21.3.2010)

रण के सीक्वल में मनोज तिवारी पत्रकार













(हिंदुस्तान,पटना,21.3.2010)

Thursday, March 25, 2010

आज फारुख़ शेख़ का जन्मदिन है


















(हिंदुस्तान,पटना,25.3.2010)

अर्चना पूरण सिंह को टेपा सम्मान

1 अप्रैल को,अंतर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस पर,40 वें अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन में फिल्म अभिनेत्री व टीवी कलाकार अर्चना पूरन सिंह को हास्य-व्यंग्य का राधा लाला अमरनाथ स्मृति टेपा सम्मान प्रदान किया जाएगा।उन्हें यह सम्मान उज्जैन में कालिदास अकादमी में रात ८ बजे होने वाले सम्मेलन में  प्रदान किया जाएगा। वे कार्यक्रम में प्रस्तुति भी देंगी।  अर्चना ने अग्निपथ, सौदागर, मोहब्बतें, क्रिश, कुछ-कुछ होता है, दे दनादन, कल किसने देखा, लव स्टोरी २०५० आदि फिल्मों के साथ टीवी शो कॉमेडी सर्कस में निर्णायक की भूमिका अदा की है। उन्हें कुछ-कुछ होता है के लिए १९९९ में बेस्ट कॉमेडियन का स्टार स्क्रीन अवार्ड भी मिला है। उनसे पूर्व शेखर सुमन, गुलशन ग्रोवर, राजेश पुरी, हिमानी शिवपुरी, प्रेम चौपड़ा, असरानी को टेपा सम्मान दिया जा चुका है।

अदनान का पुनर्विवाह वैध

बंबई हाईकोर्ट ने पाक गायक अदनान सामी का अुनी पत्नी सबा के साथ २००७ में किए गए पुनर्विवाह को वैध बताया इसके साथ कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को सबा की तलाक याचिका पर निर्णय लेने का निर्देश भी दिए हैं। अदनान और सबा का विवाह २००१ में हुआ था। २००४ में तलाक हुआ और २००७ में दोनों ने पुनर्विवाह कर लिया। सबा ने गत साल तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। जज डीबी भोसले और आरवी गनू ने कहा कि सबा के लिए हलाला आवश्यक नहीं था क्योंकि अदनान ने उसे "अहसान" व पिछली बार तलाक दिया था। कोर्ट ने अदनान के तर्क को स्वीकार कर लिया कि दूसरा विवाह वैध नहीं था। हलाला के तहत तलाकशुदा पत्नी को पहले किसी गैर मर्द के साथ प्रतीकात्मक विवाह करना प़ड़ता है। उसके बाद तलाक लेकर फिर पूर्व पति से विवाह कर सकती है।
(नई दुनिया,दिल्ली,24.3.2010)

खुशबू मामले में सुनवाई पूरी

सुप्रीम कोर्ट ने विवाह पूर्व यौन संबंधों और कौमार्य के बारे में राय व्यक्त करके विवाद में घिरी दक्षिण भारत की अभिनेत्री खुशबू की याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है। अदालत इस मामले में अपना फैसला बाद में सुनाएगी। प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की खंडपीठ ने मंगलवार को मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अभिनेत्री खुशबू की याचिका पर सुनवाई की। खुशबू ने हाईकोर्ट के ३० अप्रैल २००८ के फैसले को चुनौती दे रखी है। वह चाहती हैं कि विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में उनकी टिप्पणियों को लेकर उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले निरस्त किए जाएं। इस मामले में सुनवाई के दौरान जजों ने सवाल किया कि यदि बिना शादी के दो वयस्क अपनी मर्जी से एक साथ रहते हैं तो किसी को इस पर आपत्ति कैसे हो सकती है और यह कैसे अपराध की श्रेणी में आएगा? खुशबू की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और इस अभिनेत्री की इन बेबाक टिप्पणियों को लेकर उनके खिलाफ कोर्ट में शिकायत दर्ज कराने वालों की ओर से अधिवक्ता वी. कनगराज, एटीएम रंगरामानुजम, जी. शिवबालमुरुगन और बी. बालाजी ने दलीलें पेश कीं।अभिनेत्री खुशबू ने २००५ में विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में एक पत्रिका में इंटरव्यू दिया था।
(नई दुनिया,दिल्ली,24.3.2010)

नर्मदा की कहानी अमिताभ की जुबानी

बॉलीवुड के शहंशाह नर्मदा कथा के लिए अपनी आवाज देंगे। यह घोषणा मंगलवार को उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जया बच्चन ने अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव के समापन सत्र को संबोधित करते हुए की। उन्होंने कहा कि "नर्मदा समग्र" में यदि पुण्यदायिनी मां नर्मदा को बचाने के लिए कोई "लाइट एंड साउंड" कार्यक्रम बनाने की पहल करता है तो उस कार्यक्रम में "बिग बी" अपनी आवाज सहर्ष देंगे। प्रदेश के दामाद होने के नाते यह उनका फर्ज भी होगा।


जया बच्चन ने स्वयं भी "नर्मदा समग्र" से जु़ड़ने की मंशा जाहिर की। विशिष्ट अतिथि के रूप में महोत्सव में शामिल हुई जया बच्चन ने कहा कि राज्यसभा में उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद वे "नर्मदा समग्र" से जु़ड़कर जल, जंगल, जमीन को बचाने के अभियान से जु़ड़ने की इच्छा रखती हैं।
(नई दुनिया,दिल्ली,24.3.2010)

Tuesday, March 23, 2010

शम्मी के साथ दीपिका की डेटिंग


ओम शांति ओम और लव आज कल जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेर चुकीं दीपिका पादुकोण अब गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता शम्मी कपूर के साथ डेटिंग करती नजर आएंगी । २४ साल की दीपिका ७८ साल के शम्मी कपूर के साथ डेटिंग करेंगी। दरअसल हाल के समय में काफी लोकप्रिय हो चुके सोशल नेटवकिंग साइट "ट्विटर" पर "याहू" फे म शम्मी ने "शांतिप्रिया" के साथ कॉफी डेट पर जाने की इच्छा जताई । दीपिका को जब शम्मी की इस इच्छा के बारे में पता चला तो उन्हें बहुत हैरानी हुई क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि शम्मी भी ट्विटर पर ट्विट करते हैं । लेकिन दीपिका को काफी खुशी भी हुई और उन्होंने फौरन ही शम्मी जी से मिलने का मन बना लिया ।

दीपिका ने बातचीत में कहा कि वह पहले भी शम्मी जी से दो बार मिल चुकी हैं और उनकी ताजगी और जिंदादिली से काफी प्रभावित हैं । शम्मी की पत्नी से मिलकर भी उन्हें काफी खुशी हुई । हालांकि दीपिका ने कहा कि उन्हें बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि वह भी ट्विटर पर होंगे । इसलिए जैसे ही वह अपनी फिल्म की शूटिंग खत्म कर मुंबई लौटेंगी शम्मी जी से जरूर मिलेंगी। इन दिनों दीपिका अपनी फिल्म "ब्रेक के बाद" की शूटिंग के सिलसिले में दिल्ली में हैं ।

इस फिल्म में उनके साथ इमरान खान हैं। अभी दीपिका अपनी साजिद खान निर्देशित फिल्म "हाउसफुल" की रिलीज का इंतजार कर रही हैं । इस फिल्म में उन्होंने पहली बार कॉमेडी में हाथ आजमाया है । उनका मानना है कि कॉमेडी करना एक ऐक्टर के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होता है ।
(नई दुनिया,दिल्ली,23.3.10)

प्रीति जिंटा को सम्मन

बॉलीवुड अभिनेत्री प्रिटी जिंटा और नेस वाडिया के संयुक्त स्वामित्व वाली किंग्स पंजाब एकादश को अदालत ने सम्मन जारी किया है। मामला आईपीएल में टीम प्रचार के दौरान पोस्टर में शहीद भगत सिंह और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों के इस्तेमाल का है।

सम्मन अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंशुल बेरी ने जारी किया है। शहर के एक एनजीओ ग्लोबल ह्यूमन राइट्स काउंसिल ने इस संबंध में कुछ दिन पहले शिकायत दर्ज की थी। प्रिटी और नेस वाडिया को दो अप्रैल को अदालत में हाजिर होने का सम्मन जारी किया गया है। शिकायत में एनजीओ ने किंग्स एकादश पंजाब के विज्ञापनों में भगत सिंह और राजगुヒ सहित कई स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि इससे जनभावनाओं को ठेस पहुंचती है। इस बाबत पंजाब पुलिस में शिकायत दर्ज की गई। एनजीओ के अध्यक्ष अरविंद ठाकुर ने कहा कि पहले प्रिटी और नेस को इसलिए सम्मन नहीं दिए जा सके क्योंकि वह टीम के मैचों के लिए देश के विभिन्न स्थलों का दौरा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पंजाब किंग्स एकादश के मालिकों का कहना है कि उन्होंने विभिन्न अखबारों में इस संबंध में सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है।

बॉलीवुड टूरिज्म

बॉलीवुड ने मुंबई को सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशी सैलानियों में भी लोकप्रिय किया हैं। मुंबई में आने वाले सैलानियों को फिल्म की शूटिंग और कलाकारों को देखने की इच्छा होती हैं।


इसे ध्यान में रखते हुए अब सरकार की ओर से मुंबई में बॉलीवुड टूरिजम की शुरुआत की जाने वाली हैं। इस नई योजना के तहत सैलानियों को मुंबई के स्टूडियो में ले जाया जाएगा और साथ ही मशहूर कलाकारों के घर भी दिखाए जाएंगे।


राज्य के पर्यटन मंत्री विजयकुमार गावित ने बताया, बॉलीवुड की क्रेज सैलानियों में जबरदस्त है और इसे भुनाने के लिए ही हम एक नई योजना बॉलीवुड टूरिजम के नाम से शुरु करने जा रहे हैं। इसके तहत सैलानियों को स्टुडियो में ले जाया जाएगा और धारावाहिक, फिल्मों की शूटिंगदिखाई जाएगी। कलाकारों से बातचीत करने का मौका भी सैलानियों को दिया जाएगा।
(नई दुनिया,दिल्ली,23.3.10)

ट्विटर पर भंडारकर और गुरूदत्त









(हिंदुस्तान,पटना,23.3.2010)

आज स्मृति ईरानी का जन्मदिन है

मित्रो, मेरा जन्म और परवरिश दिल्ली में हुई। इस तरह देखा जाए तो मैं दिल्ली की बेटी हूँ। मेरी स्कूल और आगे की पढ़ाई भी दिल्ली में ही हुई है। आज मैं स्पेक्ट्रम के तमाम पाठकों के साथ अपने बचपन के दिनों की कुछ बातें बाँट रही हूँ। दोस्तो,मुझे पता है इन दिनों आपकी एक्जाम खत्म हो चुकी होगी और अब रिजल्ट के आने का इंतजार होगा। मैं आपको अपने दिनों के बारे में बताती हूँ कि जब रिजल्ट आने वाला रहता था तो मुझे भी डर लगा रहता था कि पता नहीं क्या होने वाला है। हालाँकि मेरे सारे पेपर अच्छे जाते थे और मैं हमेशा अच्छा स्कोर करती थी, पर थोड़ा-बहुत रोमांच तो रिजल्ट का रहता ही है। वैसे अगर सालभर ईमानदारी से मेहनत की है तो रिजल्ट अच्छा ही होगा। जिन मित्रों के रिजल्ट अच्छे नहीं रहे उन्हें अगले साल उसे बेहतर करने के बारे में सोचना चाहिए। अभी से मेहनत करना चाहिए और छुट्टियों में अपनी कमजोरियों को दूर करना चाहिए।
मित्रो, अपने स्कूल के दिनों में मैं चुपचाप एक कोने में बैठने वाली लड़की हुआ करती थी। मेरे ज्यादा दोस्त नहीं थे, क्योंकि मैं ज्यादा बातचीत नहीं करती थी। चूँकि मैं स्कूल में कम बोलती थी इसलिए दूसरे मुझसे दोस्ती करना पसंद नहीं करते थे। मैं अपना लंच भी अकेले बैठकर ही करती थी। स्कूल के दिनों में मेरी हल्की-फुल्की रैगिंग भी हुई। मैं चुप रहती थी तो क्लास में यह ऐलान हो गया था कि स्मृति जब तक सभी से बातचीत नहीं करेगी तब तक उसके साथ कोई नहीं बैठेगा। पर यह ऐलान कोई नियम तो था नहीं और बाद में पता नहीं कब टूट गया। स्कूल में ज्यादातर स्टूडेंट्स के ग्रुप बने थे,पर मैं अकेली भी खुश रहती थी। मुझे अपनी किताबों की दुनिया अच्छी लगती थी। वैसे स्कूल के दिनों में मैं शांत और आज्ञाकारी स्टूडेंट थी। मैंने कभी क्लास बंक नहीं की और हर विषय पर पूरा ध्यान दिया। वैसे ज्यादातर बच्चों को गणित और इतिहास जैसे विषय अच्छे नहीं लगते हैं, पर आपको बताती हूँ कि इतिहास स्कूल के दिनों में और आगे भी मेरा पसंदीदा विषय रहा।
दोस्तो,अपने नानाजी निर्मल चंद्र जी के साथ मेरी बहुत खट्टी-मीठी यादें जुड़ी हैं। बचपन में नानाजी मेरे सबसे अच्छे दोस्त हुआ करते थे। उन्होंने मुझे बहुत-सी अच्छी बातें अच्छी तरह से सिखाईं। वैसे तो बच्चों को उनके नानाजी कहानियाँ सुनाते हैं, पर मेरे साथ उल्टा था। नानाजी मुझे कहानियाँ पढ़ने को देते और फिर मुझे उन कहानियों को ध्यान में रखकर संक्षेप में नानाजी को सुनाना पड़ता था। इस तरह मेरी याददाश्त पक्की होती गई। नानाजी और मैं मिलकर तरह-तरह के खेल खेलते थे। जैसे नानाजी मुझे कहते थे कि अगर तुम एक डाक टिकट होती तो तुम्हारी दिनचर्या क्या होती बताओ। बताओ, अगर तुम एक डाकिया होती तो तुम्हारी दिनचर्या क्या होती। फिर मैं सोचती और उन्हें अपनी दिनचर्या बताती। नानाजी ने ही मुझे तरह-तरह की कल्पना करना सिखाया।
नानाजी मेरे सबसे अच्छे मित्र यूँ भी थे कि वे मुझे बेटे की तरह प्यार करते थे। मुझे याद है कि मैंने जीवन में जो सबसे पहली फिल्म 'साउंड ऑफ म्यूजिक' देखी वह मुझे नानाजी ही दिखाने ले गए थे। यह और बात है कि यह फिल्म देखने के लिए हम दिल्ली के आरतीपुरम से चाणक्यपुरी तक करीब १५ किलोमीटर पैदल चलकर गए थे। पैदल चलते हुए खूब बातें हुईं और रास्ते का पता ही नहीं चला। दोस्तो, नानाजी ने मुझे रोज का यह काम सौंपा था कि मैं अखबार से पाँच बड़ी खबरें उनके लिए चुनकर रखूँ। अखबार पढ़ना और अपनी समझ बढ़ाने का काम भी इस तरह आसानी से आ गया। तो इस तरह मेरी पूरी ट्रेनिंग नानाजी के साथ रहकर ही हुई। आप सभी स्पेक्ट्रम के पाठकों को भी अपने दादा-दादी और नाना-नानी से बहुत कुछ सीखना चाहिए। उनके पास कहानियों, बातों और जानकारियों का खजाना होता है। प्यार से यह खजाना जैसा मेरा हो गया वैसा आपका भी हो सकता है।
दोस्तो, बचपन में मैंने खूब कहानियाँ पढ़ी, स्पोर्ट्स में भी दिलचस्पी ली। जूडो में मैं नेशनल लेवल तक पहुँची। बास्केटबॉल,लॉन्ग जंप सभी में रुचि ली। इतने काम करने के बाद भी मैं पढ़ाई में कभी नहीं पिछड़ी और हर साल फर्स्ट आती रही। तो मेरा आप सभी से यही कहना है कि सारे कामों के बीच पढ़ाई की चिंता थोड़ी-बहुत करो और प्लानिंग के साथ करो। वैसे अब आगे गर्मी की छुट्टियाँ आ रही हैं तो उसकी प्लानिंग करो। गर्मी की छुट्टियों के लिए आप सभी को खूब सारी बधाई।
आपकी सखा
स्मृति ईरानी
(स्पेक्ट्रम,नई दुनिया,19मार्च,2010)

Monday, March 22, 2010

कई सितारों के बीच फंसे दो सितारे

बिहार में नाइट शो का क्रेज

लव सिन्हा

रूह को सुकून देता है लोक संगीतःरेखा भारद्वाज

आज के दौर में किसी भी क्षेत्र में पहचान बनाना आसान नहीं है। इसके लिए सतत प्रयास और लगन की जरूरत होती है। लगातार प्रयास और धैर्य के साथ मंजिल की ओर बढ़ना... इसे गायिका रेखा भारद्वाज आवश्यक मानती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर प्लेबैक सिंगर वर्ष १९९६ में फिल्म "चाची-४२०" से की थी पर उन्हें करीब दस साल के लंबे इंतजार के बाद वर्ष २००६ में फिल्म "ओमकारा" के गीत "नमक इश्क का..." से पहचान मिली। रेखा मानती हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिल सकता है। आइए इस सप्ताह के रूबरू में गायिका रेखा भारद्वाज के संगीतमय सफर से मुखातिब होते हैं...

गायिका रेखा भारद्वाज कहती हैं कि मैंने दिल्ली के गांधर्व महाविद्यालय में पंडित विनयचंद्र मौदगल्य और पंडित मधुप मुद्गल से गायन सीखा। पंडित अमरनाथ जी की वजह से संगीत की बारीकियों से परिचित हुई। इन दिनों अमरजीत जी से मार्गदर्शन ले रही हूं, क्योंकि अमरजीत जी विदेश में ज्यादा रहती हैं इसलिए उनसे गर्मी की छुट्टियों में ही मुलाकात हो पाती है। दरअसल, अगर आप संगीत को सिर्फ प्रोफेशन न मानकर इबादत और पूजा की तरह अपनाते हैं तो आपकी रूह आपको रास्ता दिखाती है। वह मानती हैं कि यह सफर अकेले तय नहीं किया जा सकता। इसमें लोगों के सहयोग और समर्थन की जरूरत पड़ती है। रेखा भारद्वाज बताती हैं कि जब मेरी अलबम "इश्का-इश्का" आई थी तब गीतकार गुलजार साहब ने कहा था कि अब मैं ऑरबिट में आ गई हूं। इसके बाद कई वर्षों तक काम करती रही पर वो बात नहीं आई जिसकी मुझे जरूरत थी। इसी दौरान फिल्म "ओमकारा" आई और इसका गाना "नमक इश्क का..." हिट हुआ। मुझे याद है कि तब गुलजार साहब ने कहा था कि अब समय तुम्हारा है। रेखा कहती हैं कि मेरे पति संगीतकार और निर्देशक विशाल भारद्वाज ने मुझे कई फिल्मों में गाने का मौका दिया। वह मेरे हिसाब से म्यूजिक का स्केल रखते हैं। विशाल को वैसे तो मैं शादी के पहले से जानती थी पर उन्होंने मुझे बतौर इंसान और कलाकार बेहतर समझा। वह गुलजार जी को अपना गुरु मानते हैं। उनके आपसी संबंधों में बाप-बेटे, गुरु-शिष्य और प्रोफेशनल लेवल पर भी समझदारी दिखती है। अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए रेखा बताती हैं कि मुझे अस्सी के दशक में महान रंगकर्मी हबीब तनवीर जी के साथ काम करने का मौका मिला। उनके साथ "आगरा बाजार" नाटक में मैंने काम किया था। उस नाटक में गजल और छत्तीसगढ़ी लोक संगीत का ब्लेंड था। मुझे तवायफ की गायकी को बिना माइक के गाना था। उस पल को मैं कभी भूल नहीं पाती। वाकई, जिंदगी में आप जितना सीखते हैं, उतना आगे बढ़ते हैं। दरअसल, जिंदगी तो सीखने का दूसरा नाम है। रेखा लोक संगीत और सूफी दोनों ही तरह के संगीत से जुड़ी हुई हैं। फिल्मों में भी उन्होंने जो गीत गाएं हैं वे फोक बेस्ड हैं। इस बारे में रेखा भारद्वाज कहती हैं कि मुझे लगता है कि दुनिया के हर संगीत का जन्म लोक संगीत से हुआ है। सूफी संगीत भी लोक संगीत का हिस्सा है। "लोक संगीत" हर संगीत की जननी है। लोक संगीत आपको जीवन के रस से जोड़ता है। इसमें एक नरमाहट और अपनेपन का अहसास पलता है। जैसे मां-बाप से आप जुदा होकर नहीं रह सकते, वैसे ही लोक संगीत या सूफी संगीत की रूहानियत को नहीं भूल सकते। यह संगीत दिल को सुकून देने वाला है। यह संगीत उस समय का है जब ट्रेवलिंग की सुविधा नहीं थी। घोड़े या ऊंट की सवारी से आने-जाने में बहुत वक्त लगता था। महिलाएं घर पर अकेली होती थीं। स्त्री-पुरुष दोनों में एक दूरी थी जिसमें विरह पलता था और खूबसूरत लोक गीत बन जाते थे। भावों की उस अदायगी में विरह और उल्लास की उम्मीद पलती थी जिसे आज हमने लोक संगीत का नाम दे दिया है। सच लोक संगीत विरह का पर्याय है। यह मासूमियत, सादगी, सरलता और अकेलेपन की एकरसता में रस का फव्वारा है। मैंने हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, पंजाबी आदि भाषाओं में गाने गाए हैं जो लोक संगीत की देन हैं। युवा कलाकारों को संदेश देते हुए रेखा भारद्वाज कहती हैं कि कोई भी कलाकार रातों-रात मशहूर नहीं होता। उसे सही समय आने की धैर्य से प्रतीक्षा करनी चाहिए।
(शशिप्रभा तिवारी,नई दुनिया,दिल्ली,22.3.2010)

आदमी जो फिल्मों में उभर कर आते हैं

उस रात हम वासुदा चटर्जी के साथ बैठे थे। वासुदा से मैंने चेतन भगत और "थ्री इडियट्स" के बारे में बात शुरू की। रोकते हुए वासुदा कहने लगे कि मैं तुम्हें एक नई बात बताता हूं। जब मैं "खट्टा मीठा" फिल्म बना रहा था तब मेरे पास एक नौजवान स्टोरी लेकर आया। अद्भुत स्टोरी थी जिसमें एलिक पद्मसी के कुछ बच्चे हैं, अशोक कुमार के कुछ बच्चे हैं, जब ये दोनों शादी करते हैं तब क्या होता है कि मेरे मित्र खण्डेलवाल भी उसमें थे थोड़ा है थोड़े की जरूरत है गाना उन पर फिल्माया गया है। राजेश मोहन भी थे खट्टा मीठा फिल्म में तो वासुदा ने बताया कुछ दो महीनों बाद एक और फिल्म बन गई "हमारे तुम्हारे" और उसकी भी स्टोरी वही, तब क्या हुआ? हमने उन पर मुकदमा लगाया उन्होंने हम पर तब पता चला कि ये जो कहानी जिसने बेची वही आदमी चोर है वह हॉलीवुड की चुराकर लाया था और हम दोनों को बेच गया एक ही कहानी। यह फिल्म इंडिस्ट्रीज में पहली बार नहीं हुआ। दुनिया की सबसे बेहतरीन फिल्म रोमन होली डे की कॉपी "चोरी-चोरी" राजकपूर, नरगिस "जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हो" उसकी दिल है कि मानता नहीं।

थ्री इडियट्स की मूलतः कहानी न तो चेतन भगत की है और न ही आमीर खान की या राजकुमार हीरांनी की है बल्कि लेबनान के विद्रोही लेखक जिब्रान की है। कहानी इस प्रकार है । इस प्रकार है पागल खाने में दरवाजे पर उस बच्चे से पूछा कि तुम पागल खाने में क्यों आ गए? इतने से बच्चे तो हो, उस बच्चे ने कहा कि साहेब आप पूछ रहे हैं तो बता ही देता हूं कि मैं पागल क्यों हो गया हूं, मेरा पिता बड़े संगीतकार थे, वे मुझे मार-मार कर, अपनी तरह संगीतकार बनाना चाहते थे। मेरी मां बड़ी चित्रकार थी, वह मुझे चित्रकार बनाना चाहती थी। बड़े भाई साहब पहलवान थे, और मुझे अखाड़े ले जाते थे । यही हॉल मेरे जीजाजी का था, वे मल्लाह थे, वे मुझे नाविक बनाना चाहते थे और मेरी बड़ी बहन अपनी तरह मुझे सितार वादक बनाना चाहती थी और सर, यही हाल अध्यापकों का था, सो मैं आजकल यहां हूं फिर उस बच्चे ने पलटकर कहा-मगर आप यहां क्यों है? जिब्रान ने झिझकते हुए कहा-मैं पागल थोड़े ही हूं, तो बच्चे ने पलटकर कहा, अच्छा-अच्छा अब मैं समझा आप दीवार के उस तरफ वाले पागलखाने में रहते हैं। यह जिब्रान की १९३६ की कहानी है फ्लाट थ्री इडियट में इसलिए उठाया है कि मैं शिक्षा के इस सिस्टम के बहुत खिलाफ हूं कि जो मशीन बनाती है वर्षों से, मैं इसके खिलाफ रहा हूं जो डॉक्टर बनाती हूं, इंजीनियर बनाती है, पर इनसान नहीं बनाती हैं।

अवाक फिल्में जो शुरू हुई हरिश्चंद्र, तारामती से लेकर फिल्में जो बनी हैं पहली फिल्म विजयभट्ट की रामराज्य जब बनी, तो इनके संवाद बड़े-बड़े लेखकों ने लिखे। सबसे बड़ा संवाद लेखक फिल्म इंडस्ट्रीज में हुआ है। वह उर्दू का लेखक है जिसने प्यासा के संवाद लिखे हैं वे हैं अख्तर उडिमान। अख्तर साहब के दो संवाद गौरतलब हैं। एक फिल्म है "अनाड़ी"। राजकपूर की इस फिल्म में मोतीलाल काम कर रहे हैं, उस फिल्म में वे एक होटल के मालिक हैं और उनका पर्स गिर गया है और गांव से आए राजकपूर को मिल गया वह पर्स। नायक को, कुछ गुंडों ने घेर लिया और उसे बहुत मार रहे हैं, बहुत पीट रहे हैं ताकि पर्स छीन लिया जाए लेकिन राजकपूर एक देहाती हैं, ग्रामीण हैं, ईमानदार हैं। वो गुंडों की खूब मार खाते हैं परंतु उस पर्स को नहीं छोड़ते हैं। अंत में पुलिस वहां आ जाती है तब तक गुण्डे भाग जाते हैं। राजकपूर साहब उस पर्स को लेकर पता ढूंढ़कर उस होटल पहुंचते हैं, जिस होटल के मालिक है मोतीलाल। जहां रौक एण्ड रोल चल रहा है मोतीलाल हैट लगाए पाइप पीते हुए खड़े हैं। अभी तक सीन में एक भी संवाद नहीं है।

राजकपूर होटल के गेट पर खड़े हैं। द्वार पर खड़े गेटकीपर उसे भगाने ही वाले हैं कि मोतीलाल आंख से इशारा करते हैं कि उसे आने दो। सीन बोल रहा है एक भी डायलॉग नहीं है। नायक वह पर्स लौटाता है। मोतीलाल उसमें से सौ-सौ के दो नोट निकालते हैं और देते हैं परंतु वह इनकार कर देता है। मोतीलाल जेब में पर्स रखने से पहले इस नौजवान से पूछते हैं "जानते हो ये कौन लोग हैं।" दीन-हीन नायक कहता है, नहीं। मोतीलाल कहते हैं ये वे लोग हैं, जिन्हें दूसरों के पर्स मिले थे, वे लौटाने नहीं गए थे।

हमने सब कुछ सिखा ना सीखी होशियारी। अख्तर उडियान का प्यासा में एक सीन है कि गुरुदत्त अपनी रचना छपवाने के लिए प्रकाशक के पास जा रहे हैं। प्यासा शायरी दे रहे हैं तो प्रकाशक क्या कह रहा है? ये क्या लिख लाए हो शराब, शबाब की क्या शायरी होती है। इस पर गुरुदत्त से कहलवाया "और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवाय"।

आप क्या कर रहे हैं? दीवार फिल्म बना रहे हैं जिसमें एक सड़क पर पॉलिश करने वाला कहता है। मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता ये फिल्म है जो रियल लाइफ में ऐसा नहीं होता जो चब्बनी पोलिस वाला मुंह पर सिक्का मार दे तो वह अमिताभ हो जाएगा। ये फिल्म है, वह बिलकुल नहीं होगा वह हाजी मस्तान हो जाएगा। यह फिल्म है लेकिन रियल लाइफ में जो मुंह पर सिक्का फेंका है मैं फेंके हुए पैसा नहीं उठाता आपने उसे झूठा अहंकार दे दिया है ये फिल्म वो अहंकार दे रही है बच्चों को।
(राजशेखर व्यास,नई दुनिया,दिल्ली,21.3.2010)

Saturday, March 20, 2010

लाहौरःफ़िल्म-समीक्षा

कलाकार : फारूख शेख , नफीसा अली , सुशांत सिंह , श्रद्धा निगम
निर्माता : साई ओम फिल्म्स
डायरेक्टर : संजय पूरन सिंह
संगीत : एम . एम . करीम
सेंसर सर्टिफिकेट : यू /
अवधि : 126 मिनट
हमारी रेटिंग : /photo.cms?msid=5704303
क्रिकेट बॉलिवुड मेकर्स का चहेता सब्जेक्ट रहा है। क्रिकेट पर बनी दर्जन भर से ज्यादा फिल्मों में से बॉक्स ऑफिस पर केवल लगान या इकबाल ही हिट रही हैं , लेकिन आज भी मेकर्स क्रिकेट पर फिल्म बनाना फायदे का सौदा समझते हैं। पिछले कुछ अर्से में बॉक्स ऑफिस पर महिला हॉकी पर बेस्ड चक दे इंडिया की रेकॉर्ड कामयाबी , फुटबॉल पर बेस्ड दे दना दन और बॉक्सिंग पर चालू मसाला फिल्म अपने की औसत कामयाबी ने मेकर्स को दूसरे खेलों पर फिल्म बनाने को प्रेरित किया।

' लाहौर ' भारत - पाक के बीच राजनीतिक रिश्तों या बॉर्डर पर तनाव या गुप्तचर एजेंसियों पर बनी फिल्म नहीं है। किक बॉक्सिंग पर बनी इस फिल्म की खासियत यही है फिल्म के डायरेक्टर किक बॉक्सिंग के मंझे खिलाड़ी हैं , इसलिए फिल्म में किक बॉक्सिंग दृश्यों को उन्होंने जीवंत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इस फिल्म की टैग लाइन में लिखा है ' बियोन्ड बॉर्डर नेशन्स लाइज बैटल टु एंड ऑल वॉर ' से साफ है कि फिल्म की कहानी खेल में हार जीत से ऊपर उठकर देश प्रेम के जज्बे और रिश्तों को और बेहतर बनाने की सार्थक पहल है। फिल्म की रिलीज से फिल्म को कई प्रतिष्ठित इंटरनैशनल अवॉर्ड मिल चुके हैं।

कहानी : धीरेंद्र सिंह ( सुशांत सिंह ) और वीरेंद्र सिंह ( अन्नाहाद ) भाई हैं। जहां धीरेंद्र का सपना किक बॉक्सिंग में देश का नाम ऊंचा करना है तो वहीं वीरेंद्र क्रिकेट में अपना अलग मुकाम बनाना चाहता है। मां ( नफीसा अली ) को गर्व है कि बेटों ने अपनी फील्ड में अलग मुकाम बना लिया है। मलयेशिया में हो रहे किक बॉक्सिंग टूर्नामेंट की टीम में धीरेंद्र का सिलेक्शन होता है। धीरेंद्र अपने कोच ( फारूख शेख ) के साथ देश के लिए किक बॉक्सिंग मेडल लाने का सपना लेकर टूर्नामेंट में जाता है।

यहां फाइनल राउंड में धीरेंद्र का मुकाबला पाकिस्तानी टीम के नूरा ( मुकेश ऋषि ) से है जिसे कोच ने सिर्फ यह सिखाया है कि हर हाल में जीतना है। यहीं कुछ ऐसा होता है जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की। नूरा धोखे से धीरेंद्र की गर्दन पर ऐसा घातक वार करता है कि धीरेंद्र रिंग में ही दम तोड़ देता है। तब छोटा भाई वीरेंद्र क्रिकेट के स्थापित करियर को छोड़ भाई का अधूरा सपना पूरा करने की खातिर किक बॉक्सिंग टीम में अपनी जगह बनाता है और लाहौर में भारत - पाक के रिश्तों को और बेहतर बनाने के मकसद से हो रहे किक बॉक्सिंग टूर्नामेंट में नूरा के सामने है।

ऐक्टिंग : कोच के रूप में फारूख शेख पूरी फिल्म में छाए हुए हैं। राजनीति के धुरंधरों और ब्यूरोक्रेट्स के बीच टीम में बेहतर खिलाड़ियों के लिए संघर्ष करते कोच के रोल को फारूख के लाजवाब अभिनय ने जीवंत कर दिखाया। वहीं , नफीसा , सौरभ शुक्ला , केली दोरजी अपनी भूमिका में जमे हैं। इस फिल्म से बॉलिवुड में डेब्यू कर रही जोड़ी अन्नाहाद और श्रद्धा निगम में बेशक अन्नाहाद ने अपनी ऐक्टिंग से दर्शकों की वाहवाही लूटी है।

डाइरेक्शन : इंटरनैशनल किक बॉक्सिंग में नाम कमा चुके संजय पूरन सिंह चूंकि बॉक्सिंग के साथ बरसों से जुड़े है यही वजह है उनकी फिल्म पर अच्छी पकड़ है। इंटरवल से पहले फिल्म की गति बेहद धीमी है तो वहीं फिल्म का क्लाइमेक्स दिल को छू जाता है।

संगीत : एम . एम . करीम का संगीत फिल्म के माहौल पर फिट है।

क्यों देखें : भारत - पाक रिश्तों को और बेहतर बनाने में खेल को अहम माध्यम बनाती , किक बॉक्सिंग पर नेक मकसद के लिए बनी यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।
(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स,20 मार्च,2010)

Friday, March 19, 2010

शापितःफिल्म-समीक्षा

कलाकार: आदित्य नारायण, श्वेता अग्रवाल , राहुल देव, शुभा जोशी
निर्माता: विक्रम भट्ट
डायरेक्टर: विक्रम भट्ट
गीत: नजम शेराज, आदित्य नारायण
संगीत: चिरंतन भट
सेंसर सर्टिफिकेट : एडल्ट
अवधि: 137 मिनट
रेटिंग: /photo.cms?msid=5701005
ऐसा लगता है, बिपाशा बसु, डिनो स्टारर राज को बॉक्स ऑफिस पर मिली जबर्दस्त कामयाबी के बाद डायरेक्टर विक्रम भट्ट ने मान लिया कि हॉरर फिल्मों को बनाना आसान, सस्ता तो है ही साथ ही दर्शकों की एक खास क्लास के दम पर ऐसी फिल्में टिकट खिड़की पर अपनी लागत बटोरने के अलावा अच्छा खासा मुनाफा भी कमाती है। यहीं वजह है 'राज' के बाद राज का सिक्वल और उसके बाद '1920' में विक्रम ने कुछ ऐसे ही प्रयोग किए और हर बार बॉक्स ऑफिस पर अगर उनकी हॉरर फिल्में हिट नहीं हुई तो घाटे का सौदा भी नहीं बनी। कुछ यहीं हाल आज रिलीज हुई उनकी इस फिल्म का भी है इस बार फिर डायरेक्टर ने भूत, प्रेत, शैतानी आत्मा के तांडव के साथ एक ऐसी फैमिली को अपनी कहानी का बेस बनया है जो बरसों से पीढ़ीदर पीढ़ी शापित चली आ रही है।

विक्रम ने अपनी और से इस कहानी को अच्छा ट्रीटमेंट देने की कोशिश तो जरूर की लेकिन इंटरवल से पहले कहानी का तानाबाना बुनने और फिल्म के हीरो अमन (आदित्य नारायण) और हीरोइन काया (श्वेता अग्रवाल) के रोमांस को पेश करने में इतना वक्त लिया कि दर्शक खुद को हॉरर से बांध नहीं पाता तो एकबार फिर विक्रम ने भूत प्रेत और शैतानी रूह के इंतकाम की कहानी में गानों का सहारा क्यों लिया यह समझ नहीं आता। दरअसल विक्रम की पिछली हॉरर फिल्मों का संगीत हिट रहा और शायद यहीं वजह रही कि इस बार उन्होंने एक ऐसी कहानी में गानों को फिट करने किया जहां गानों की कतई जरूरत नहीं थी।

कहानी: अमन (आदित्य )और काया (श्वेता अग्रवाल) एक दूसरे को चाहते हैं। इन दोनों के मासूम प्यार को उस वक्त नजर लग जाती है जब काया को कोई शैतानी रूह अपने बस में करती है। अमन अपने खास दोस्त शुभ (शुभा जोशी) के साथ काया को उस शैतानी रूह से निजात दिलाने में लग जाता है जिसने उसे जकड रखा है। इस काम में अमन को साथ मिलता है प्रफेसर पशुपति नाथ (राहुल देव) का जिन्होंने भटकती रूहों और शैतानी ताकतों पर कितनी किताबें लिखी हैं। अमन , शुभ और प्रफेसर को पता लगता है पिछली कई पीढ़ियों से काया की फैमिली शॉपित है जिसके चलते उसकी फैमिली में जब भी किसी लडकी की शादी होती है उसके चंद दिनों बाद ही उसकी मौत हो जाती है। यहीं वजह है काया के पिता अमन और काया के प्यार को जानते हुए भी उनकी शादी करने को तैयार नहीं होते। आखिर काया की फैमिली शापित क्यों है और क्या कभी इस परिवार को इस शाप से मुक्ति मिल सकती है? इसकी तलाश में यह तीनों महिपालपुर पहुंचते है, यहां आने के बाद उन्हें पता चलता है किकरीब तीन सौ साल पहले महाराज गजराज सिंह की हत्या के साथ काया की फैमिली के शाप का नाता है। अब काया और उसकी फैमिली को इस शाप से मुक्ति दिलाने के दिलाने के लिए अमन प्रफेसर पशुपति नाथ के साथ एक ऐसी तंत्र मंत्र की विधा को शुरू करता है जिसमें उसकी जान भी जा सकती है ।

ऐक्टिंग: सिंगर से हीरो बने आदित्य नारायण ने अपनी पहली फिल्म में साबित किया कि ऐक्टिंग की फील्ड में वह होम वर्क के बाद ही आए हैं, लेकिन आदित्य के चेहरे सपाट चेहरे पर उन दृश्यों में भी डर और खौफ नजर नहीं आ पाता जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। वहीं न्यूकमर श्वेता अग्रवाल को तो डायरेक्टर ने कुछ ज्यादा करने का जैसे मौका ही नहीं दिया; इंटरवल के बाद कोमा की शिकार श्वेता फिल्म के आखिर तक बिस्तर पर ही नजर आई। हां, प्रफेसर पशुपति नाथ की भूमिका में राहुल देव जरूर कुछ प्रभावित करते है।

डायरेक्शन: विक्रम भट्ट ने एकबार फिर यहीं साबित करने की कोशिश की है कि हॉरर फिल्म को बनाने में बैक ग्राउंड म्यूजिक कितना सशक्त पक्ष है। वहीं इंटरवल से पहले विक्रम ने कहानी को पटरी पर लाने में इतना ज्यादा वक्त लिया कि हॉल में बैठे दर्शक उकताने लगते है। फिल्म का क्लाइमेक्स गजब का है, ट्रिक फटॉग्रफी के अलावा फिल्म के तकनीकी पक्ष को मजबूत करने में विक्रम ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। लेकिन अगर बेफिजूल के गानों के मोह से विक्रम खुद को बचा पाते तो फिल्म की स्पीड और बढ़ सकती थी।

संगीत: भले ही फिल्म के साथ किसी जाने माने संगीतकार का नाम ना जुडा हो, लेकिन फिल्म में गानों की कमी नहीं है, मजे की बात है कि इन गानों का जिस सिचुएशन पर फिट किया गया है। वहां गाने की कतई जरूरत नहीं थी। अजनबी हवाएं फिर तुझे बुलाए आ जा आ जा, तेरे बिना जिया ना जाए सोचा ना जाए के लिए अगर कहानी में अच्छा प्लॉट रखा जाता तो गाने कहानी का अहम हिस्सा बन सकते थे।

क्यों देंखे: अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन है और इक्कीसवी सदी में भूत प्रेत शैतानी रूहों पर यकीन करते है तो फिल्म एकबार देख सकते है। फैमिली के साथ एंटरटेनमेंट के मकसद से अगर आप फिल्म जा रहे है तो फिल्म आपके लिए नहीं है, वैसे भी फिल्म को सेंसर ने एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ पास किया है ।
(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,19.3.2010)