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Friday, December 2, 2011

सिल्क स्मिता, विद्या बालन और मर्लिन मुनरो

आज मिलन लूथरिया की द डर्टी पिक्चर का प्रदर्शन है, जिसमें छोटे बजट की साहसी जंगली जवानी समान फिल्मों की नायिका की व्यथा-कथा है और मुंबई में मधुर भंडारकर की करीना कपूर अभिनीत Rहीरोइनञ्ज की शूटिंग शुरू हो रही है, जिसमें एक भव्य बजट वाली तथाकथित तौर पर शालीन फिल्मों की नायिका की कथा प्रस्तुत की जा रही है। 

डर्टी पिक्चर सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित है तो खबर है कि मधुर की प्रेरणा मर्लिन मुनरो हैं। सिल्क स्मिता और मर्लिन मुनरो दोनों ने ही आत्महत्या की थी और कुछ लोगों को संदेह रहा है कि ये राजनीतिक हत्याएं हैं। कुछ लोग अमेरिका में यह मानते रहे हैं कि मर्लिन मुनरो की अंतरंगता जॉन एफ. कैनेडी और उनके भाई से भी थी। ज्ञातव्य है कि अपनी मृत्यु के पूर्व मर्लिन जॉन कैनेडी के जन्मदिन पर आयोजित समारोह में कार्यक्रम प्रस्तुत करने आई थीं और इस घटना पर भी हॉलीवुड में फिल्म बन रही है। 

जहां तक महिला सितारों के शरीर प्रदर्शन की बात है तो भव्य बजट की तथाकथित तौर पर शालीन फिल्मों और छोटे बजट की तथाकथित अश्लील फिल्मों में समान रूप से अंग प्रदर्शन होता है, क्योंकि इसमें ब्रांड का मामला फंसा हुआ है। सच तो यह है कि भव्य फिल्मों में नायिकाएं ज्यादा शरीर प्रदर्शन करती हैं। 

आखिर विगत कुछ वर्षो में करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ, बिपाशा बासु, दीपिका पादुकोण इत्यादि को किस तरह प्रस्तुत किया गया है? इन खूब मेहनताना पाने वाली नायिकाओं ने आइटम प्रस्तुत करने वाली तारिकाओं के पेट पर लात मार दी है। करीना के छम्मक छल्लो और मलाइका के ‘मुन्नी बदनाम हुई’ में क्या अंतर है और बिपाशा का बीड़ी जलई ले कैसे भूल सकते हैं? दरअसल चमड़ी दिखाकर सभी दमड़ी कमा रहे हैं और अंतर केवल लेबल का है। सभी फिल्मों में मांसलता की लहर प्रवाहित है। सदियों पूर्व एक सनकी बादशाह ने सोने और तांबे के बदले चमड़े के सिक्के चलाए थे। उसने आज के दौर का पूर्वानुमान कर लिया था। 

फिल्मों में मांसलता के दौर के साथ ही हमें समाज में खुलेपन के दौर को देखना चाहिए। क्या आज के मध्यम वर्ग की महिला दो दशक पूर्व के मध्यम वर्ग की महिला की तरह कपड़े पहनती है? नाभिदर्शना साड़ियां बांधने का तरीका समाज से शुरू होकर फिल्मों में आया है। इसी तरह महिलाओं की शराबनोशी भी शीतल पेय में मिलाकर पीने से खुलेआम पीने तक जा पहुंची है और जो चीज समाज में कभी मात्र पुरुषोचित मानी जाती थी, वह अब समान रूप से जारी है। दरअसल समाज और सिनेमा में परिवर्तन तीव्र गति से हो रहे हैं। गुजरे हुए को हमेशा स्वर्ण युग मानने की फॉमरूलाई सोच से हमें बचना चाहिए। पहले हम जिन चीजों को घर में कालीन के नीचे छिपाकर उनके अस्तित्व को नकारते थे, अब हम उन्हें बुहारकर चौराहे पर ले आते हैं। 

यह समाजशास्त्री बता सकते हैं कि समाज में खुलेपन की लहर का काले धन और भ्रष्टाचार से क्या संबंध है। जो लोग हमारी असमान अन्यायपूर्ण सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों के कारण रातोंरात अमीर हो गए, उन लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को खर्च के लिए अधिक धन दिया। यह धन फैशन पर खर्च हुआ और छद्म आधुनिकता के मोह ने नकली जीवन प्रणाली विकसित की, जबकि असली आधुनिकता सोचने का एक दृष्टिकोण है। इसी धन ने बाजार और विज्ञापन की ताकतों को मजबूत किया। बाजार और विज्ञापन की दुनिया में नारी शरीर एक वस्तु है। 

दकियानूसी सेंसर के प्राणहीन नियमों ने अश्लीलता के लिए संकरी गलियां बनाईं। आदिम असंयमित इच्छाओं की पूर्ति ने उस बाजार को ताकत दी, जो सदियों से जारी रहा है। बदनाम गलियों में बसे मकानों में भी श्रेणी भेद रहा है। ऊंचे कोठे रहे हैं और परचून की दुकान भी रही है, जिसका एक दूसरा स्वरूप हम Rबीञ्ज ग्रेड फिल्मों की नायिकाओं और भव्य बजट की नायिकाओं में देखते हैं। सिल्क स्मिता और मर्लिन मुनरो को उनकी छवियों ने लील लिया। 

मनोरंजन उद्योग में टाइप्ड होने का खतरनाक खेल है। लोकप्रिय किरदार दोहराए जाते हैं और कलाकार का दम घुट जाता है। अफवाहों के लिए उर्वर जमीन बन जाती है। मनोरंजन उद्योग से ज्यादा अफवाहें राजनीतिक गलियारों में फैलती हैं। साहसी यथार्थवादी साहित्य रचने वाली महिला साहित्यकारों को भी बहुत कुछ सुनना व सहना पड़ता है। पुरुष अपनी कमतरी से जन्मी कुंठाओं को अनेक तरह से अभिव्यक्त करता है। अब विद्या बालन के लिए दुर्गम राह है। उन्हें पारंपरिक भूमिकाएं मिलना कठिन हो सकता है और टाइप कास्टिंग उन्हें सिल्क स्मिता की यंत्रणा जीने के लिए बाध्य कर सकती है। कभी-कभी लोकप्रिय भूमिकाएं कलाकार के अंतस में प्रवेश कर जाती हैं। भूमिकाओं का केंचुल उतार फेंकना आसान नहीं होता। जगाते-जगाते इच्छाएं जगाने वाले को भी डस लेती हैं(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,2.12.11)।

6 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति ||

    बधाई ||

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  2. मनोरंजन उद्योग में टाइप्ड होने का खतरनाक खेल है। लोकप्रिय किरदार दोहराए जाते हैं और कलाकार का दम घुट जाता है। अफवाहों के लिए उर्वर जमीन बन जाती है। मनोरंजन उद्योग से ज्यादा अफवाहें राजनीतिक गलियारों में फैलती हैं। साहसी यथार्थवादी साहित्य रचने वाली महिला साहित्यकारों को भी बहुत कुछ सुनना व सहना पड़ता है। पुरुष अपनी कमतरी से जन्मी कुंठाओं को अनेक तरह से अभिव्यक्त करता है। अब विद्या बालन के लिए दुर्गम राह है। उन्हें पारंपरिक भूमिकाएं मिलना कठिन हो सकता है और टाइप कास्टिंग उन्हें सिल्क स्मिता की यंत्रणा जीने के लिए बाध्य कर सकती है। कभी-कभी लोकप्रिय भूमिकाएं कलाकार के अंतस में प्रवेश कर जाती हैं। भूमिकाओं का केंचुल उतार फेंकना आसान नहीं होता। जगाते-जगाते इच्छाएं जगाने वाले को भी डस लेती हैं


    sundar. shukriya.

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  3. सदियों पूर्व एक सनकी बादशाह ने सोने और तांबे के बदले चमड़े के सिक्के चलाए थे। उसने आज के दौर का पूर्वानुमान कर लिया था।

    वाह...क्या बात कही है...बेजोड़...बधाई

    नीरज

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  4. सच कहा है आपने .. आज एंग प्रदर्शन का जोर है और पिक्चर चलने में इसका बड़ा हाथ है ... समाज की परवा किसी को नहीं ...

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  5. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति । मेर नए पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़एं । धन्यवाद ।

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