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Tuesday, February 7, 2012

सितारे जमकर दे रहे हैं गालियां

एक ज़माना था, जब धर्मेन्द्र गुस्से में विलेन का खून पीने पर उतारू हो जाते थे, तब भी गाली के नाम पर 'कमीने... कुत्ते' से ज्यादा कुछ नहीं कह पाते थे। हीरो तो हीरो, 'शोले' के आइकॉनिक विलेन गब्बर सिंह यानी अमजद खान भी 'हरामज़ादो...' से बड़ी गाली पूरी फिल्म में नहीं दे पाए थे। तब 'साला' और 'साली' को भी गाली समझा जाता था। कॉमेडी सीक्वेंस में भी गाली वर्जित थी और भले ही एक्टर खुद को साला कह रहा हो, गाली तो गाली थी। इसीलिए जब दिलीप कुमार ने 'सगीना' में 'साला मैं तो साहिब बन गया...' गाया, सेंसर बोर्ड की भौंहें तन गईं और बड़ी मुश्किल से गाना पास कराया जा सका। 

लेकिन अब सिनेमा के साथ गालियों ने भी बड़ी उन्नति कर ली है। विलेन और वैंप तो छोडि़ए, हीरो-हीरोइन पर्दे पर गंदी से गंदी गालियां देते हैं। गालियों के मामले में न सिर्फ सेंसर बोर्ड उदार हो चुका है, बल्कि किरदार और पटकथा की मांग की आड़ में फिल्म मेकर और एक्टर्स भी इसे जायज़ मान चुके हैं। 'इश्किया' में भौंडी गालियां बकने वाले सम्मानित अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक को गालियों पर आपत्ति नहीं है। वे कहते हैं- 'इश्किया' में पृष्ठभूमि और किरदार उत्तर भारत के थे, जहां वैसी ही भाषा बोली जाती है। इस पर इतनी हाय-तौबा मचाने की जरूरत क्या है!' 

गालियों के प्रचलन का आलम यह है कि आज ऐसी फिल्म याद करना ही मुश्किल होगा, जिसमें गालियां न हों। गालियों के इतिहास के बारे में वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र जैन कहते हैं- 'पर्दे पर खुल्लम खुल्ला गालियों की शुरुआत शेखर कपूर ने 'बैंडिट क्वीन' से की, जिसमें हर डाकू खतरनाक गालियां देता है। लेकिन इस शुरुआत को परंपरा में बदलने वाले फिल्मकार प्रकाश झा, विशाल भारद्वाज, सुधीर मिश्रा जैसे लोग हैं। प्रकाश झा की 'गंगाजल' में भरपूर गालियां हैं तो 'राजनीति' और 'आरक्षण' भी गाली से खाली नहीं है। विशाल भारद्वाज की 'ओमकारा' में यू. पी.-बिहार की शुद्ध गालियां हैं। सुधीर मिश्रा ने 'हजारों ख़्वाहिशें ऐसी' में यशपाल शर्मा के मुंह से बहन की गालियां दिलवायी हैं तो पिछले दिनों आई अपनी फिल्म 'ये साली जि़ंदगी' के टाइटल तक में गाली पिरो दी है। 'पीपली लाइव', 'देहली-बेली', 'नो वन किल्ड जेसिका', 'चमेली', 'जब वी मेट', 'तीस मार $खां', 'गोलमाल-३', 'रा-वन' आदि कई फिल्में तो कहानी से ज्यादा गालियों के लिए याद की जाती हैं।' 

मज़े की बात यह है कि विभिन्न कार्यक्षेत्रों की तरह गाली के क्षेत्र में भी स्त्री अब पुरुष से पीछे नहीं रही। सच तो यह है कि गाली-प्रधान फिल्मों में ज्यादा दमदार गालियां स्त्री किरदारों ने ही दी हैं। नंबर १ हीरोइन करीना कपूर गाली के मामले में भी नं. १ हैं, जिन्होंने 'चमेली' में पहली बार गालियों का अभ्यास किया और आगे चलकर 'जब वी मेट', 'गोलमाल-३', 'रा-वन' जैसी फिल्मों में ज़बान निरंतर सा$फ की। रानी मुखर्जी उनसे थोड़ा ही पीछे हैं, जिन्होंने 'बिच्छू' से लेकर 'नो वन किल्ड जेसिका' तक कई फिल्मों में सामने वाले किरदारों को गालियों से नवाज़ा। 

साड़ी-बिंदी छाप भारतीय नारी की इमेज़ रखने वाली विद्या बालन तक 'इश्किया' और 'द डर्टी पिक्चर' में डर्टी-डर्टी गालियां बक चुकी हैं। हीरोइनें ही नहीं, सपोर्टिंग एक्ट्रेस भी पर्दे पर गालियों की शान बढ़ाती देखी गई हैं। क्या 'दिल्ली-६' में आप दिव्या दत्ता के मुंह से निकली गालियां भुला सकते हैं? बहरहाल, गालियों के बारे में करीना कपूर का कहना है- 'गालियां आज हमारी बोलचाल का हिस्सा हैं। इनका प्रचलन हर जगह हर सभ्यता में है। मुझे पर्दे पर गालियां देने में कोई संकोच नहीं होता। मेरे लिए वह सब $फन है।' 

पर्दे पर तो अमिताभ बच्चन सरीखे चंद अपवादों को छोड़कर सभी गालियां दे रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की पिक्चर ज़रा ज्यादा डर्टी है। कोई बात-बात में गाली देता है तो कोई सिर्फ गुस्से में और कोई सिर्फ प्यार में, लेकिन अधिकतर लोग गालियों का इस्तेमाल करते हैं। धीरेंद्र जैन बताते हैं- 'पुराने लोग गालियां कम देते थे। सिर्फ नरगिस, तनूजा, आर. डी. बर्मन, महमूद, पहलाज निहलानी जैसे चंद लोगों के मुंह से गालियां सुनी जाती थीं। राज कपूर, धर्मेन्द्र, राखी, गुलज़ार, शर्मिला टैगोर, माला सिन्हा, जीतेंद्र आद गुस्से में गालियां बक बैठते थे। 'हम साया' के सेट पर माला सिन्हा और शर्मिला टैगोर तथा 'दाग' के सेट पर शर्मिला टैगोर व राखी के बीच गाली-गलौच एक ऐतिहासिक गाली-गलौच थी। ज्यादातर फिल्मी हस्तियां नज़ाकत और शराफत से पेश आती थीं। लेकिन अब स्थिति उल्टी है।' 

आज निज़ी जीवन के गालीबाज लोगों में संजय दत्त, महेश मांजरेकर, शक्ति कपूर, फरहा, अजय देवगन, रानी मुखर्जी, विधु विनोद चोपड़ा, सलमान ख़ान, महेश भट्ट, शेखर कपूर, डेविड धवन, सचिन, प्रीति जिंटा, जैकी श्रॉफ, राजकुमार संतोषी, विजय राज आदि के नाम अग्रणी हैं। शाहरुख खान, अनिल कपूर, उदित नारायण, गोविंदा, मधुर भंडारकर, सोनू निगम, हिमेश रेशमिया, जीतेंद्र, कुमार शानू, करीना कपूर आदि अगल-बगल देखने के बाद गालियों का उच्चार करते हैं कि कोई अवांछित आदमी तो नहीं सुन रहा। 

इनसे अलग दिलीप कुमार, सायरा बानो, अमिताभ बच्चन, आमिर खान, रितिक रोशन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विवेक ओबेरॉय, लारा दत्ता, अमीषा पटेल, करिश्मा कपूर, श्रवण, शिल्पा शेट्टी आदि बहुत-सी फिल्मी हस्तियों को गाली से परहेज है। अमिताभ कहते हैं- 'मेरे पारिवारिक संस्कार मुझे पर्दे तक पर गाली देने की इज़ाजत नहीं देते। इसीलिए मैंने 'बुड्ढा होगा तेरा बाप' में गाली की जगह बीप की आवाज़ इस्तेमाल की थी।' 

कौन फिल्मी हस्ती कौन-सी गाली देती है, यह तो यहां नहीं लिखा जा सकता, पर गालियों के बारे में एक रोचक तथ्य उभर कर सामने आता है। देखिए न, शुरू में गालियां पशु-पक्षियों पर आधारित थीं- उल्लू, उल्लू का पट्ठा, गधा, बैल, ऊंट, (आस्तीन का) सांप...। फिर गालियों में अंधे, लंगड़े, बहरे, पागल जैसी चारित्रिक विशेषताएं और मां-बहन जैसे रिश्ते आ गए। लेकिन कमाल की बात यह है कि दुनिया की वजनदार गालियां इंसान के गुप्त अंगों पर केंद्रित हैं। एक-एक अंग पर सौ-सौ गालियां रची हुई होंगी। उससे भी कमाल की बात यह है कि ये किसी स्कूल में नहीं सिखाई जातीं, सभ्य समाज में वर्जित हैं, इनकी कोई डिक्शनरी भी नहीं है, फिर भी इनका ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर होता रहता है। बहरहाल, अपने उपयोग के लिए 'मां की आंख' जैसी सॉफ्ट गाली ईजाद कर चुके (या चुरा चुके) निर्देशक सुनील अग्निहोत्री कहते हैं- 'फिल्म इंडस्ट्री में हर भाषा और संस्कृति की गालियों का चलन है। इसका कारण यह है कि यहां देश के कोने-कोने से आए लोग अपनी-अपनी ज़मीन की गालियां साथ लेकर आए हैं।' 

पिछले कुछ सालों में पर्दे पर गालियों का प्रचलन निरंतर बढ़ा है। अब ऐसी फिल्म याद करना मुश्किल है, जिसमें गालियां न हों। विलेन-वैंप ही नहीं, हीरो-हीरोइन भी पर्दे पर गालियां देते नज़र आते हैं। 

पर्दे पर तो गालियां दी ही जा रही हैं, पर्दे के पीछे की तस्वीर और भी डर्टी है। चंद अपवादों को छोड़कर ज्य़ादातर फिल्मी हस्तियां आम बोलचाल में गालियों का प्रयोग करती हैं। इस मामले में हीरोइनें भी पीछे नहीं हैं...(अनिल राही,दैनिक भास्कर,4.2.12)

5 comments:

  1. सही है बहुत सही और सटीक लिखा है आपने !!! मैं आपकी बातों से सहमत हूँ

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  2. ऐसी पोस्ट्स निश्चित रूप से इनकी असलियत को सामने लाती है .....!

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  3. पर्दे पर तो अमिताभ बच्चन सरीखे चंद अपवादों को छोड़कर सभी गालियां दे रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की पिक्चर ज़रा ज्यादा डर्टी है।
    बहुत खूब

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  4. उत्तर भारत जैसी सभ्य भाषा किसी राज्य में नहीं होगी . हरयाणा में थोडा रफ है मगर वो दिल के बुरे नहीं., राजस्थान में तो कुत्ते को भी "जी" लगते हैं "दुर्र कुता जी " (दूर हटो कुता जी ) .उ.प और बिहार में तो एक साल के बच्चे से लेकर १०० सा के बूढ़े बुजर्ग तक को "आप" का सम्भोधन लगते हैं. पता नहीं नासुरिद्दीन को किसने बता दिया की उत्तर भारत में ऐसी भाषा बोलते हैं

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