स्वागत

Thursday, December 17, 2009

बिहार नहीं जानता अपने इस सपूत को


17 दिसम्बर,2009 के हिेंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

Tuesday, December 15, 2009

पूर्वांचल निर्माण देशहित में होईःरवि किशन


15 दिसम्बर,2009 के दैनिक जागरण लिखता कि सुपरस्टार रवि किशन के भी विचार बा कि पूर्वाचल राज्य के गठन में अब तनिको विलंब ना होखे के चाहीं। तेलंगाना राज्य के मांग पर केन्द्र सरकार के फैसला के स्वागत करत ऊ कहलन कि ई निर्णय देशहित में होई अउर जवना दिन पूर्वाचल राज्य के मांग पूरा हो जाई, ओही दिन एह पिछड़ल इलाका के विकास के रास्ता भी खुली। मुम्बई से बाबतपुर हवाई अड्डा पहुंच के रवि किशन कहलन कि पूर्वाचल के करोड़ों के आबादी सिर्फ इहे खातिर पिछड़ल ह कि ऊ एगो बड़हन प्रदेश के हिस्सा बा जवन तक विकास के किरण पहुंचते-पहुंचते मद्धिम पड़ जाला। रवि किशन भदोही में, मार देब गोली, केहू ना बोली फिल्म के शूटिंग के सिलसिला में आईल रहलन। एनडीटीवी इमेजिन पर आजकल खूब चल रहल शो राज पिछले जनम का के लोकप्रियता से उत्साहित रवि किशन के विचार बा कि छोटका-छोटका राज्य में विकास के रफ्तार तेज होला। एह से, में केन्द्र सरकार के पूर्वाचल के मुद्दा पर विलम्ब ना करे के चाही। मार देब गोली, केहू ना बोली फिल्म में रवि किशन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अफसर की भूमिका में बाड़न, जवन के लक्ष्य अपराध नष्ट करे के बा।

पूर्वांचल बने के चाहीःमनोज तिवारी


दैनिक भास्कर में 15 दिसम्बर,2009 के छपल खबर के मुताबिक, आपन भोजपुरी अमिताभ बच्चन मनोज तिवारी के कहनाम बा कि पूर्वांचल राज्य बने के चाहीं। रउआ के ध्यान होई कि मनोज भईया समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से लोक सभा चुनाव लड़ले रहलन। मगर उहे सपा उत्तर प्रदेश के बंटवारा के खिलाफ बा। जब एह बाबत उनुका से पूछल गईल कि जब उत्तर प्रदेश के बंटवारा के मसला पर सपा अउर अमर सिंह सख्त खिलाफ बाड़ें,तs रउआ पूर्वाचल राज्य के गठन के समर्थन कइसे कर रहल बानी। एह पर उनुकर जवाब रहे कि जवन पूर्वाचल अउर भोजपुरी के बात करिहें,उहे हमार दिल पर राज करिहें। मनोज भईया ईहो कहलन कि सपा चाहे जे सोचे, ई उनुकर व्यक्तिगत सोच बा कि विकास के खातिर पूर्वांचल राज्य के निर्माण हर हाल में होखे के चाहीं। उनुकर इहो कहनाम रहे कि ऊ एह मुद्दा पर अमर सिंह से मिलि कए उनुका के समझइहें-बुझइहें कि विकास के खातिर पूर्वाचल राज्य केतना जरूरी बा।

रेडियो सीलोन के वे दिन............

There are many aficionados in remote corners of India, Pakistan and Bangladesh who become restless if their radio set does not catch the 7.30 a.m. slot on the Sri Lanka Broadcasting Corporation. The inimitable ‘Purani Filmon Ke Geet’ has been a rich offering of rare Hindi film songs of the 1940s and 50s. A genius named Clifford Dodd, in 1949, understood the potential of Hindi broadcasts when a stubborn B V Keskar banned film sangeet on All India Radio. Dodd convinced the Ceylon government, as it was known at the time, of the urgency of grabbing the opportunity. He found another dedicated soul in Vijay Kishore Dubey, who had resigned from AIR in disgust. The combination gave birth to the Hindi service on Radio Ceylon. It proved so lethal that for the next 30 years, Radio Ceylon ruled the hearts of Hindi film music lovers. The pinnacle of popularity, undoubtedly, was ‘Binaca Geetmala’, immortalised by Amin Sayani speaking from a tiny cubicle in Mumbai’s Colaba.
The Hindi section of Radio Ceylon was a hit overnight. It started receiving a mountain of letters daily, with Dubey selecting most captivating songs. It became so popular that the Indian government soon had to launch its own commercial service, Vividh Bharati. Kumar Nawathe correctly said in a recent memoir that though the films of that era were quite ordinary, the power of music was such that crowds thronged cinema houses just to watch song sequences. Dubey’s successor, Gopal Sharma, started peppering his commentary with anecdotes and personal recollections of the stars and film-making and scaled new heights of popularity. Even today, there are people who long to hear his voice. It was Sharma who laid down the convention that the last song in the ‘Purani Filmon Ke Geet’ would be a K L Saigal song, a convention which continues. Over the years, though, the popularity of the Hindi service has been on the wane. The Sri Lankan government has curtailed its expenditure on the service for want of returns. The new generation in India is not all that interested. Padmini Pereira and Jyoti Parmar, both born Sri Lankan nationals, have been trying their best to keep the service afloat. Their endurance is strengthened by a band of listeners who will feel like they’ve lost a close relative if the service is stopped.
(द टाइम्स ऑफ इंडिया,दिल्ली, 15 दिसम्बर,2009 में दिलीप चावड़े का आलेख)

Sunday, December 13, 2009

अबरार अल्वीःस्मृति शेष

19 नवम्बर को मुंबई में अबरार अल्वी ने दुनिया से खामोश विदाई ले ली। उनकी अंत्येष्टि की जानकारी लोगों को नहीं मिली इसलिए परिवार के सदस्यों के अलावा और कोई नहीं पहुंच पाया। किसी निजी तो कभी दूसरों की खामोशी की वजह से हिंदी फिल्मों में अबरार अल्वी के योगदान को सही महत्व नहीं मिल पाया। पिछले साल गुरुदत्त के साथ बिताए दस सालों पर उनकी एक किताब जरूर आई, लेकिन घटनाओं को सहेजने में उम्र के कारण उनकी यादें धोखा देती रहीं। उनके भांजे और थिएटर के मशहूर निर्देशक सलीम आरिफ बताते हैं कि अबरार मामू मीडिया और खबरों से दूर ही रहे। उन्होंने गुरुदत्त से अपनी संगत को सीने से लगाए रखा। नागपुर से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबे-छरहरे अबरार अल्वी एक्टर बनने के इरादे से मुंबई आए थे। गीता बाली के बहनोई जसवंत को वे जानते थे। उनके माध्यम से ही गुरुदत्त से परिचय हुआ। गुरुदत्त की फिल्म बाज का प्रायवेट शो था। उसमें जसवंत ने अबरार अल्वी को बुला लिया था। फिल्म देखने के बाद गुरुदत्त ने अबरार अल्वी से उनकी राय पूछी तो उन्होंने बेलौस जवाब दिया, आप बहुत फोटोजेनिक हैं। इस जवाब का आशय समझते हुए गुरुदत्त ने आगे पूछा, कुछ एक्टोजेनिक हैं। इस जवाब का आशय समझते हुए गुरुदत्त ने आगे पूछा, कुछ एक्टोजेनिक भी हैं या नहीं? गुरुदत्त से परिचय का यह सिलसिला कालांतर में सहयोग में बदला। अबरार अल्वी उनकी फिल्मों का लेखन करने लगे। आज यह जोड़ी इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। गुरुदत्त की फिल्मों में अबरार अल्वी के लेखन का खास महत्व है। गुरुदत्त की सोच को स्कि्रप्ट में ढालना और फिर उन्हें समुचित संवादों से प्रभावशाली बनाने में अबरार का हुनर सामने आया। गुरुदत्त बेहतर लेखक की तलाश में थे। उन्हें लगता था कि उनके विचारों को सही शब्द नहीं मिल पाते। अबरार अल्वी ने उनकी यह जरूरत पूरी की। अगर गुरुदत्त के कैरिअर पर ध्यान दें तो उनका आरंभिक रुझान थ्रिलर की तरफ था। वे आर-पार और बाजी जैसी फिल्मों में अधिक रुचि लेते थे। अबरार अल्वी ने उन्हें प्रेरित किया कि वे अपनी प्रतिभा का उपयोग बेहतरीन फिल्मों के लिए करें। इस तरह प्यासा की नींव पड़ी। प्यासा में गुरुदत्त का किरदार अबरार अल्वी के निजी जीवन से प्रेरित था। इसके पहले गुरुदत्त अबरार अल्वी के नाटक मार्डन मैरिज पर मिस्टर एंड मिसेज 55 बना चुके थे। प्यासा में अबरार अल्वी के योगदान को साहिर लुधियानवी ने रेखांकित किया था। कहते हैं कि साहिर की इस तारीफ से गुरुदत्त खफा हो गए थे। उसी नाराजगी में उन्होंने अपनी अगली फिल्मों के गीत कैफी आजमी से लिखवाए। अबरार अल्वी ने हिंदी फिल्मों के संवाद लेखन में इस पर जोर डाला कि किरदारों की भाषा उनकी पृष्ठभूमि के अनुरूप हो। पहले राजा और रंक या नायक और सामान्य किरदार लगभग एक जैसी भाषा बोलते थे। अबरार अल्वी ने भाषा में ग्राम्य प्रभाव पैदा किया। बाद में यह भदेसपन ऐसी रूढि़ बन गयी कि हर फिल्म में नौकर और ड्रायवर पुरबिया मिश्रित हिंदी बोलते ही नजर आए। अबरार अल्वी के लेखन की गुणवत्ता देखते हुए महबूब खान ने उन्हें अपनी टीम से जुड़ने का निमंत्रण दिया था और छूट दी थी कि वे चाहें तो उनके साथ काम करते हुए भी गुरुदत्त को प्राथमिकता दे सकते हैं। अबरार अल्वी ने गुरुदत्त से इस संदर्भ में बात की तो उन्होंने दो टूक कहा कि तुम एक बार उनके साथ काम शुरू करोगे तो स्वाभाविक रूप से उन्हें ही प्राथमिकता दोगे, क्योंकि वे कामयाब नाम हैं। अगर मेरे साथ रहे तो मैं तुम्हारी क्षतिपूर्ति जरूर करूंगा। साहब बीवी गुलाम के निर्देशन की जिम्मेदारी देकर गुरुदत्त ने अबरार अल्वी की क्षतिपूर्ति अवश्य की, लेकिन वे उस फिल्म के गानों की शूटिंग से खुद को नहीं रोक पाए। अंत तक कंफ्यूजन रहा कि साहब बीवी गुलाम के निर्देशक गुरुदत्त ही हैं। गुरुदत्त या उनकी टीम के किसी दूसरे सदस्य ने स्पष्टीकरण नहीं दिया। अकाल मृत्यु ने गुरुदत्त को छीन लिया और अबरार अल्वी गुमनामी में खो गए। बाद में उन्होंने लेख टंडन और आत्माराम के लिए कुछ फिल्में जरूर लिखीं, लेकिन उनमें गुरुदत्त की गहराई और गंभीरता नहीं आ पाई। गुरुदत्त की आत्महत्या की रात अबरार अल्वी उनसे मिलकर लौटे थे। उन्हें जिंदगी भर इस बात का अफसोस रहा कि अगर वे अन्य रातों की तरह उस रात भी वहीं रुक गए होते तो शायद गुरुदत्त आत्महत्या का दुस्साहस नहीं करते। अबरार अल्वी कहा करते थे कि पारिवारिक और फिल्मी कारणों से गुरुदत्त टूट चुके थे। वे एकाग्रचित होकर काम नहीं कर पा रहे थे। अजय ब्रह्मात्मज (यह लेख अबरार अल्वी के भांजे सलीम आरिफ से हुई बातचीत पर आधारित है।)
दैनिक जागरण,पटना में 07 दिसम्बर,2009 को यथाप्रकाशित

Saturday, December 12, 2009

मोनालिसा बनिहें चंद्रमुखी


12 दिसम्बर,2009 के हिंदुस्तान,पटना में प्रकाशित

पवन के ओढनियां कमाल करे......


12 दिसम्बर,2009 के हिंदुस्तान,पटना में प्रकाशित

ताजा फिल्म सर्वे और शोले


12 दिसम्बर,2009 के हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

आ रहल बाड़न लाट साहेब लोग.......


12 दिसम्बर,2009 के हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

पा की कमेंट्री

अब तक हमने लगान सहित कुछ चर्चित फिल्मों में अमिताभ को परदे के पीछे रहकर कमेंट्री करते देखा। अब लीजिए मजा उनकी ऑनस्क्रीन कमेंट्री काः

12 दिसम्बर,2009 को हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

जेंटलमैन सचिन इडियट आमिर के प्रचार में


12 दिसम्बर,2009 कए हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

Thursday, December 10, 2009

संभावनाः पिछले जन्म में बार डांसर,अब बिग बॉस का सपना


08 दिसम्बर,2009 को हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

रिटायर्ड जूही को मिला कामःब्रांड एंबेसडरी से जुड़ेगा नाम


09 दिसम्बर,2009 को हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित

आमिरःऑस्कर नहीं तो सनडांस सही


08 दिसम्बर,2009 को हिंदुस्तान,पटना में यथाप्रकाशित