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Monday, June 6, 2011

कला में कोरा बॉलिवुड

नवभारत टाइम्स का मत
रीजनल सिनेमा से भी छोटा है उसका कद
इस बार के नैशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बॉलिवुड की फिल्मों ने तकरीबन दो दशक से कायम सिलसिले को ही दोहराया है। हिंदी की कुछ फिल्मों को पॉपुलर अवॉर्ड तो मिले हैं लेकिन मुख्य पुरस्कारों के मामले में उसकी झोली खाली ही रही है। हर बार की तरह मेन कैटिगरी के पुरस्कारों पर हिंदी के बजाय तमिल, मलयालम, मराठी और बांग्ला भाषा की फिल्मों का दबदबा है। अगर नैशनल फिल्म अवॉर्ड्स को कलात्मकता की एक कसौटी माना जाए तो हिंदी सिनेमा का इस पर खरा नहीं उतरना अफसोसजनक है।

सिनेमा का एक मकसद कई अर्थों में व्यावसायिक होते हुए सामाजिक उद्देश्यों को भी साधना है, लेकिन लगता है कि हिंदी सिनेमा इन्हें पाने में लगातार चूक कर रहा है। वैसे तो हिंदी फिल्में दर्शकों की नब्ज पकड़ने में काफी सफल मानी जाती हैं। हाल के वर्षों में गजनी, थ्री इडियट्स और दबंग जैसी हिंदी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कई रेकॉर्ड खड़े किए हैं। लेकिन जिस मर्म को भाषाई फिल्मकार पकड़ने में सफल रहे हैं, बॉलिवुड के लोग उसके पास भी नहीं फटक पा रहे हैं। मुंबइया मसालों की चाशनी में लपेटकर पेश की गई हिंदी फिल्में भारी कमाई भले ही कर ले रही हैं लेकिन कला की कसौटी पर उनकी नाकामी हॉलिवुड ही नहीं, क्षेत्रीय सिनेमा की चुनौती के आगे भी उन्हें बहुत छोटा साबित कर रही है। सामाजिक सरोकारों के प्रति अपने दायित्व और विषय चयन की अर्थवत्ता के मामले में रीजनल सिनेमा ने जो सतर्कता बरती है, बॉलिवुड अगर उसका दस फीसदी भी अपनी फिल्मों से जोड़ सके तो इससे हिंदी फिल्मों का कद बढ़ेगा।

वरिष्ठ फिल्मकार मुजफ्फर अली का मत
बॉलिवुड नहीं, अब इंडियन सिनेमा की सोचें
रीजनल सिनेमा के मुकाबले बॉलिवुड के पिछड़ेपन की एक अहम वजह यह है कि ज्यादातर हिंदी फिल्में हीरो-ओरिएंटेड होती हैं। विषयवस्तु से लेकर ट्रीटमेंट तक में ये फिल्में उसी ऊंचाई तक जा पाती हैं, जितनी हीरो की खुद की समझ होती है। यह बॉलिवुड की बुनियादी समस्या है और जब तक वह इससे बाहर नहीं निकलेगा, उसका उद्धार नहीं हो सकता। यह कहना सही नहीं है कि बॉलिवुड को नैशनल फिल्म अवॉर्ड की जरूरत नहीं है या वहां के फिल्मकार दर्शकों के मनोरंजनार्थ फिल्में बनाकर भरपूर कमाई करके असली मकसद तो पूरा कर ही रहे हैं।

असल में ऐसे अवॉर्ड्स सभी को चाहिए। इससे उनकी क्रेडिबिलिटी बढ़ती है। नैशनल अवॉर्ड देने वाली जूरी भी ईमानदारी से काम करती है और जो उसके सामने लाया जाता है, उसी में से वह सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करती है। पर अब हमें अपनी फिल्म इंडस्ट्री को बॉलिवुड-मॉलिवुड आदि खांचों में बांटने से परहेज करना चाहिए। मुंबइया बनाम रीजनल के बजाय अब हमें इंडियन सिनेमा की बात करनी चाहिए। अब चिंता इस बात की करनी चाहिए कि इंडियन सिनेमा की ग्लोबल प्रेजेंस कैसे बढ़े। इधर हमने स्पेशल इफेक्ट्स के मामले में महारत हासिल की है, पर हम स्क्रिप्ट राइटिंग और डिजाइनिंग आदि के मामले में हॉलिवुड से काफी पीछे हैं। इसमें भी सुधार करना चाहिए(नभाटा,21 मई,2011)।

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