इस ब्लॉग पर केवल ऐसी ख़बरें लेने की कोशिश है जिनकी चर्चा कम हुई है। यह बहुभाषी मंच एक कोशिश है भोजपुरी और मैथिली फ़िल्मों से जुड़ी ख़बरों को भी एक साथ पेश करने की। आप यहां क्रॉसवर्ड भी खेल सकते हैं।
Wednesday, June 30, 2010
अलग रूप में रावणःडा. गौरीशंकर राजहंस
Monday, June 28, 2010
यही सच है
देश की सेवा के लिए संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले एक नौजवान आईपीएस अफसर को अगर नौकरी के पहले ही दिन उसका भ्रष्ट वरिष्ठ अधिकारी जलील करे। उसकी ईमानदारी से की गई जांच की जद में अगर किसी राज्य का मुख्य सचिव से लेकर गृहमंत्री तक आ जाए तो क्या होता है, योगेश प्रताप इस सबका लेखा जोखा जनता के सामने एक फीचर फिल्म के जरिए जल्द पेश करने जा रहे हैं। योगेश प्रताप ने करीब पांच साल पहले महाराष्ट्र की नौकरशाही से तंग आकर भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी छोड़ दी थी। नौकरी के दौरान ही उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से एलएलएम की पढ़ाई की और पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इन दिनों वह बंबई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं और आम नागरिकों के हित के लिए लगातार जनहित याचिकाएं दाखिल करते रहते हैं। उनकी याचिकाओं पर हुए फैसलों के चलते कई बार महाराष्ट्र सरकार को अपने फैसले बदलने पड़े हैं, जिनमें मुंबई के उपनगरों में बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने के लिए बढ़ाई गई एफएसआई के फैसले का इसी महीने उच्च न्यायालय में खारिज हो जाना भी शामिल है।
अपने बहुचर्चित उपन्यास कार्नेज बाइ एंजेल्स पर फिल्म बना रहे योगेश प्रताप ने इस फिल्म की पटकथा खुद लिखी है और निर्देशन की जिम्मेदारी भी खुद निभाई है। उपनगर के एक स्टूडियो में चल रहे फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान "नईदुनिया" को इसके काफी अंश देखने को मिले। फिल्म में जहां एक दृश्य में एक नए आईपीएस अफसर को एक हवलदार की ईमानदारी से प्रेरित होकर पूरी उम्र रिश्वत न लेने की कसम खाते दिखाया गया है, वहीं एक दृश्य ऐसा भी है जिसमें राज्य के एक दक्षिण भारतीय मुख्य सचिव को गृहमंत्री के पैरों पर गिरकर अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज न होने देने के लिए गिड़गिड़ाते दिखाया गया है। एक दूसरे दृश्य में मुंबई के एक पुलिस कमिश्नर को अपना कार्यकाल बढ़वाने के लिए अशोक की लाट लगी आईपीएस कैप गृहमंत्री के आगे निछावर करते दिखाया गया है। सूत्रों के मुताबिक ये दोनों दृश्य योगेश प्रताप ने अपने कार्यकाल के दौरान हुए अनुभवों से उठाए हैं।
फिल्म में राज्य के एक शक्तिशाली नेता के काम करने के तरीकों को बारीकी से दिखाया गया है, जो मौजूदा अशोक चव्हाण सरकार में भी काफी अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। फिल्म में उनके भतीजे और मुंबई के एक बहुचर्चित होटल मालिक का वह गठजोड़ भी दिखाया गया है, जिसके बारे में राज्य में मंत्रालय से लेकर कॉरपोरेट जगत का हर आदमीजानता है(पंकज शुक्ल,Nai Dunia,Delhi,28.6.2010) ।
Saturday, June 26, 2010
Tuesday, June 22, 2010
रेडियो से गुम हो गया झुमरी तलैया
Monday, June 21, 2010
अमरीश पुरी ने की थी बीमा कंपनी में नौकरी
रंगमंच तथा विज्ञापनों के रास्ते अपनी अदाकारी का लोहा मनवाकर हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर खलनायक के रूप में प्रसिद्धि बटोरने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब में हुआ। अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे अमरीश पुरी अपने लेकिन पहले ही स्क्रीन टेस्ट में विफल रहे और उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली।
बीमा कंपनी की नौकरी के साथ ही वह नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थियेटर में काम करने लगे। रंगमंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें टीवी विज्ञापनों तक पहुंचाया, जहां से वह फिल्मों में खलनायक के किरदार तक पहुंचे।
अमरीश पुरी को 1960 के दशक में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दुबे और गिरीश कर्नार्ड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।
फिल्मों में खलनायक के किरदार में अमरीश पुरी को ऐसा पसंद किया गया कि फिल्म 'मिस्टर इंडिया' में उनका किरदार 'मुंगैबो' उनकी पहचान बन गया। इस फिल्म में 'मुगैंबो खुश हुआ' के अलावा तहलका में उनके द्वारा बोला गया संवाद 'डांग कभी रांग' नहीं होता भी लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा।
अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया।
उनके जीवन की अंतिम फिल्म 'किसना' थी जो 2005 में उनके निधन के कुछ दिन बाद प्रदर्शित हुई। अमरीश पुरी को अनेक फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का खिताब मिला।
'प्रेम पुजारी' से फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करने वाले अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'मंथन', 'गांधी', 'मंडी', 'हीरो', 'कुली', 'मेरी जंग', 'नगीना', 'लोहा', 'गंगा जमुना सरस्वती', 'राम लखन', 'दाता', 'त्रिदेव', 'जादूगर', 'घायल', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.6.2010)।
जैक्सन पर वृत्तचित्र का भारत में प्रीमियर
Sunday, June 20, 2010
सिलसिला पार्ट 2 : देखने वाले रह गए हैरान
Saturday, June 19, 2010
उंगली थाम के रखना पा

सीता की नियतिःउमा पाठक
बरसों पहले जब हम छोटे थे, तब पुरानी दिल्ली के एक सिनेमा हॉल में 'राम-राज्य' नामक फिल्म देखने गए थे। पूरी फिल्म तो अब याद नहीं है, पर बच्चों की वह जोड़ी याद है जो गा- गाकर रामकथा सुना रही थी, 'भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...।' जब राम दरबार में खड़े लव-कुश से भावुक होकर पूछते हैं, क्या यही राम दरबार, कहां वैदेही, कहां वैदेही, कहां वैदेही?.... तब उनकी निरंतर ऊपर उठती आवाज की मार्मिकता से विचलित होकर आसपास के लोग सुबकने लगे।हम उस दर्द से अनजान, चकराए से इधर-उधर देखते रह गए। पर क्या हॉल से निकलने के बाद किसी के मन में सीता के साथ हुए अन्याय के बारे में कोई प्रश्न उठा होगा?
मुश्किल ही है। क्योंकि आस्तिक परिवारों में अपने भगवान के प्रति जो अटूट आस्था होती है, उसके कारण संशय के लिए कोई जगह नहीं बचती। भक्त अपने इष्ट को आदर्श मानता है, भला उनसे कोई चूक कैसे हो सकती है?
हिंदू धर्म के सभी अवतारों में राम का चरित्र सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। बाल्मीकि ने उन्हें एक महामानव के रूप में चित्रित किया है, पर वे इस प्रसंग का वर्णन नहीं करते। पर उत्तरकांड में (जिसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है) राम सीता की पवित्रता पर संदेह करते हैं और कहते हैं कि वे दसों दिशाओं में जहां चाहें जा सकती हैं। उन्होंने उनको केवल अपने नाम के लिए छुड़ाया है। सीता के अग्नि परीक्षा देने पर वे उन्हें साथ ले जाते हैं। उत्तरकांड के संकलन कर्ताओं ने इस कहानी को बरकरार रखा है। बौद्ध जातक अनामकं जातकम् का 251 ई. के बाद चीनी अनुवाद हुआ। उसमें सीता के त्याग की कथा नहीं है। पर अयोध्या लौटने पर राम, सीता से अपने परिवार में लौट जाने को कहते हैं। रानी शपथ लेकर अपनी निर्दोषिता सिद्ध करती हैं और तब राम के वामांग में सुशोभित होती हैं। रविखेण ने पद्म चरित में सीता को वापस ले लेने के दुष्परिणाम स्वरूप समाज को मर्यादा रहित होता दिखाया।
विमल सूरि के पउम चरियं में सीता परित्याग का विस्तृत वर्णन मिलता है। लेखक ने बताया है कि राम गर्भवती सीता को चैत्यालय दिखलाने के लिए ले गए थे। वहां कुछ नागरिकों ने आकर राम से सीता के अपवाद की बात कही। राम ने लक्ष्मण से परामर्श किया। लक्ष्मण, सीता त्याग के विरुद्ध थे, पर राम के मन में संदेह था जिसके कारण उन्होंने अपने सेनापति से सीता को मंदिर दिखाने के बहाने गंगा पार छोड़ आने को कहा।
रामकथा के अधिकांश लेखक बाल्मीकि रामायण के ही आधार पर लिखते रहे। कुछ ने सीता परित्याग को बिल्कुल नहीं छुआ तो कुछ ने अलग - अलग कारण दिए। लोकगीतों और लोककथाओं में इन कारणों के अलावा श्रापों और वरदान को भी इस प्रसंग का कारण माना है , इस प्रकार राम के कृत्य के पीछे उनका नहीं दूसरे कारकों का हाथ बताया है। इस प्रकार राम को दोषमुक्त करने के रास्ते निकाल लिए गए हैं।
सीता पूरे रामकथा के केंद्र में हैं। बाल्मीकि और तुलसीदास ने समान रूप से सीता के रूप सौंदर्य का चित्रण किया है। तुलसी की सीता में अलौकिकता है , उनके चरित्र का सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद अंश है परित्याग से उपजा अपवाद और निर्वासन के बाद की उनकी मन : स्थिति। सभी रामकथाओं में उन्हें आदर्श पतिव्रता नारी के रूप में चित्रित किया गया है , पर बार - बार परीक्षा ली गई है। सबसे श्रद्धा और स्तुति मिली है पर पति ने चरित्र पर सवाल उठाकर लांछित किया है। कारण सिर्फ यह है कि जब भी कोई सीता लक्ष्मण रेखा लांघेगी तो उसका अपहरण होगा और उसे पुरुष का दुर्व्यवहार सहना पड़ेगा। उससे यह उम्मीद की जाती है कि पुरुष ने उसे जो देवीपद दिया है वह उसे स्वीकार कर मुंह बंद रखकर शांति से बैठे , फैसलों के लिए पिता , भाई , पति और पुत्र हैं , उसे कुछ कहने या करने की जरूरत नहीं है , जब जब वह गलती करेगी तब तब उसे ऋषि पत्नी अहल्या की तरह पति के श्राप से शिला बनना पड़ेगा।
राम ने पर पत्नी ( अहल्या ) के प्रति संवेदनशील होकर उन्हें अपने पैर के स्पर्श भर से पुन : जीवन दे दिया , पर अपनी पत्नी पर भरोसा नहीं कर पाए। लंका में अग्नि परीक्षा लेने के बाद अयोध्या में लोकापवाद सुनकर सहधर्मिणी को गर्भावस्था में निर्वासित कर दिया। इसके पीछे राम की कोई अपनी मनोवैज्ञानिक ग्रंथि रही होगी या राजसत्ता के लिए लोगों को खुश रखने की इच्छा ? सीता को दी गई सजा युगों से पुरुष वर्चस्व का उदाहरण बनकर जीवित है। सीता की अभिशप्त नियति आज भी स्त्री की नियति है।
रामकथाओं में सीता के सौंदर्य का चित्रण मिलता है। विवाह के बाद वे राम की अनुगामिनी के रूप में दिखाई गई हैं , जो हर समय उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करती हैं , यहां तक कि रास्ता तो दूर , कदम भी हटकर नहीं रखतीं। यही सीता सबको प्रिय और आदर्श लगीं। वाल्मीकि ने लंका में सीता को बहुत दुखी दिखाया , जो रावण के आने पर हवा में हिलते केले के पत्ते के समान कांपती थीं। तुलसी ने उस सीता में थोड़े प्राण डालते हुए उसे रावण को धिक्कारने और अधम कहने की शक्ति दी।
किंतु वास्तव में सीता का चरित्र राम की छत्रछाया से दूर जाने के बाद ही जीवंत हुआ है। सदा परजीवी के रूप में जीनेवाली पत्नी , मां के रूप में आत्मनिर्भर और विवेकपूर्ण दिखती हैं , जो रोने - कलपने की जगह चारित्रिक दृढ़ता का परिचय देती हैं। इस तेजोमय चरित्र के सामने राम संदेहों से घिरे , नियति के आगे बेबस व्यक्ति के रूप में दिखते हैं। धोबी तक की बात को महत्व देनेवाले राम वही लोकतांत्रिक अधिकार अपनी पत्नी को क्यों नहीं देते ? सीता निर्वासन के बाद राम के चरित्र का औदात्य फीका पड़ जाता है , तभी तो उनके परम भक्त बाल्मीकि और तुलसी भी इस प्रसंग को छिपाकर रखते हैं।
दूसरी ओर सीता राजमहल की सुख - सुविधाओं से दूर रहकर भी अपने पुत्रों को तन - मन की वह शक्ति दे पाती हैं कि वे अपने पिता के अश्वमेध यज्ञ हेतु छोड़ गए घोडे़ को रोकने का साहस करते हैं , राम की सेना का सामना करने को तैयार दिखते हैं। तिरस्कृत पत्नी को राजदरबार में बुलाया जाता है , सीता गर्विणी मां के रूप में पहुंचती हैं। पर इस बार परीक्षा देने की जगह धरती मां को पुकारती हैंं और अंतत : उन्हीं में समाकर समस्त लांछना से मुक्त हो जाती हैं। पीछे रह जाते हैं ठगे से , रोते बिलखते राम जो उनके रहते हुए उनकी मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाए थे। राजसी ठाठबाट रहित अकेली मां माता - पिता दोनों के दायित्वों को भलीभांति निभाती है। आज के युग में एकल मां के दायित्व को निभानेवाली युवती को सबकी वाहवाही मिलती है , पर उस युग में उसने सब कर्त्तव्य चुपचाप पूरे किए(नभाटा,दिल्ली,19.6.2010)।
बॉलीवुड ने बनाया पेंटर
चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्ट्स से ग्रेजुएशन करने वाले रंजीत दाहिया की एग्जिबीशन तीन जुलाई से पेरिस में लगने वाली है। पेरिस जाने से पहले रंजीत अपनी कॉलेज लाइफ की यादें ताजा करने के लिए शुक्रवार को चंडीगढ़ आए। रेलवे स्टेशन और ढ़ाबे पर पेंट करके रंजीत ने अपने करियर की शुरुआत की। बॉलिवुड पोस्टर मेकिंग में महारथ हासिल करने वाले रंजीत ने लाइफ के स्ट्रगल और खूबसूरत पलों को शेयर किया पूजा परमार के साथ-ड्रीम से बढ़कर पैशन है पेटिंगरंजीत दाहिया से पेटिंग के बारे में पूछा तो एकदम खुश होकर कहते हैं कि मुझे बचपन से ही पेटिंग का क्रेज था। पेटिंग के कोर्स जैसी चीजों के बारे में मुझे कोई समझ नहीं थी, लेकिन मैं जब चार साल का था, तब घर के दरवाजों पर बॉलिवुड स्टार्स के पोस्टर बनाता था। मुझे लगता है कि मेरे ऊपर सरस्वती जी का आर्शीवाद है। एक बार स्कूल में मेरे टीचर ने मुझे बोला कि तुम्हें सरस्वती जी का पोस्टर दीवार पर बनाना है। जब मैंने पोस्टर बनाया तो मेरी पेटिंग को खूब सराहा गया। तभी से पेटिंग मेरा ड्रीम कम पैशन ज्यादा है। आर्टिस्ट बनाया चंडीगढ़ नेचंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आटर्स के दिनों को याद करते हुए रंजीत कहते है कि चंडीगढ़ ने मुझे रंगों से भर दिया है। यही वो जगह है, जहां से मैंने प्रफेशनल पेटिंग करना सीखा था। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था। शुरू में जब सोनीपत से दिल्ली आया तो यह समझ नहीं आता था कि मैं क्या करूं । फिर मैंन कच्ची दीवारों पर पेटिंग करना शुरू किया। थोड़े दिन ही इसमें मन लगा। फिर ट्राली पर जय जवान, जय किसान और हम दो हमारे दो जैसे कोट्स लिखने लगा। हंसकर वो कहते है खैर छोडिए, पुराने दिन। मेरी किस्मत तो बॉलिवुड के पोस्टर्स ने बदल दी।पेरिस में चमकी किस्मतजब पेरिस में सेलून डू सिनेमा लाइव पेंटिग कॉन्सर्ट में मैंने बॉलिवुड मूवी सरकार राज का पोस्टर बनाया तो वहां मेरा पोस्टर बेस्ट माना गया। यह पेटिंग कॉन्सर्ट इंडिया के गरीब बच्चों के लिए था। पेरिस के लोगों ने मेरी खूब तारीफ की और मुझे रुपए ऑफर किए। मैंने वो रुपए नहीं लिए, गरीब बच्चों की चैरिटी को दे दिए। पेरिस के कॉन्सर्ट में अमिताभ बच्चन भी थे। उन्होंने मेरे पोस्टर को देखकर कहा, कैसे बनाते हो यार। मैं बहुत खुश था क्योंकि अमिताभ बच्चन ने मेरे पोस्टर पर ऑटोग्राफ दिया था। तीन जुलाई से पेरिस में लगने वाली एग्जिबीशन हिस्ट्री ऑफ बॉलिवुड में 31 पोस्टर्स को दिखाया जाएगा। जिसमें 1913 में बनी दादा साहेब फालके मूवी से लेकर 2009 में बनी स्लमडॉग मिलेनियर मूवी तक के पोस्टर शामिल किए जाएंगे(पूजा परमार,दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,19.6.2010)। नेपाली उद्योगपति के साथ परिणय सूत्र में बंधीं मनीषा
बॉलीवुड की नेपाली बाला मनीषा कोईराला शुक्रवार को यहां अपने से सात साल छोटे उद्योगपति सम्राट दहल के साथ परिणय सूत्र में बंध गई। नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब 10 किलोमीटर दूर गोकर्ण वन रिजॉर्ट में 41 वर्षीय नेपाली सुंदरी मनीषा और 34 वर्षीय सम्राट दहल ने मंत्रोच्चार के बीच एक दूसरे के गले में वरमाला डाली और अंगूठी पहनाई। इस दौरान पीली साड़ी में मनीषा बेहद खूबसूरत नजर आ रही थीं। इस अवसर पर केवल दोनों परिवार के लोग और नजदीकी रिश्तेदार एवं दोस्त ही मौजूद थे। मनीषा के पिता प्रकाश कोईराला और मां सुषमा, बॉलीवुड अभिनेत्री सुमन रंगनाथन, सौदागर फिल्म में उनके सह कलाकार विवेक मुश्राम, गोविंदा की पत्नी सुनीता आदि मौजूद थे। शादी में पारंपरिक नेपाली गीत पंचाई बाजा और सांस्कृतिक नृत्य पेश किए गए। मेहमानों को नेपाली, भारतीय और कंटीनेंटल व्यंजन परोसे गए। आज मुख्य कार्यक्रम होगा जब दुल्हन दुल्हे के घर जाएगी। कल शादी के स्वागत समारोह में जैकी श्रॉफ और गोविंदा के हिस्सा लेने की उम्मीद है। इस समारोह में राष्ट्रपति रामबरन यादव, प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल, माओवादी प्रमुख प्रचंड, पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र जैसी जानी मानी हस्तियों समेत 3000 मेहमान हिस्सा लेंगे। प्रकाश कोइराला ने कहा कि शादी के बाद भी मनीषा अभिनय करती रहेंगी। हालांकि वह अब वह नेपाल में रहेंगी और अपना ज्यादातर समय नेपाली फिल्मों में लगाएंगी। सुभाष घई की फिल्म सौदागर से दर्शकों के दिलों में अपना स्थान बनाने वाली मनीषा ने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 1942 : ए लव स्टोरी, मणिरत्नम की बांबे, दिल से और संजय लीला भंसाली की खामोशी में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री बिश्वेश्वर प्रसाद कोईराला की पोती मनीषा रविवार की पार्टी होटल सोआलटी क्राउन प्लाजा में देंगी(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,19.6.2010)।Thursday, June 17, 2010
अमर सिंह का धोखा
उम्मीद है कि अमर इस फिल्म के जरिए अपने उन राजनीतिक विरोधियों पर जवाबी प्रहार करेंगे जिन्होंने उनका अपमान किया है या उनको नजरअंदाज किया है। बुधवार को लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे एक ऐसी फिल्म बना रहे हैं जो सच्चई के काफी करीब होगी।
अमर ने कहा,‘हम ‘धोखा’ की स्क्रिप्ट के साथ तैयार है। फिल्म को मनोज तिवारी बना रहे हैं। फिल्म दो राजनेताओं-चालू और टालू प्रसाद- के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फिल्म पूर्वाचल की जनता की स्थिति बयां करती है जिसे सभी राजनेताओं ने धोखा दिया है।’ अमर का साथ देने के लिए उनके पुराने दोस्त भी तैयार हैं।
अमर ने कहा कि जयाप्रदा और संजय दत्त फिल्म में काम करने के लिए तैयार हैं। हालांकि उन्होंने कलाकार चुनने की जिम्मेदारी मनोज तिवारी को सौंपी है। वैसे अमर ने कहा कि वे भी इस फिल्म में अभिनय कर सकते हैं।
(Dainik Bhaskar,Lucknow,17.6.2010)।
Tuesday, June 15, 2010
माहिर फिल्मकार भी थे हेमंत कुमार

बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत की जानी-मानी शख्सियत हेमंत कुमार न सिर्फ मौसीकी के माहिर बल्कि बेहतरीन फिल्म निर्माता भी थे। बांग्ला भाषा के अनेक ग़ैर-फिल्मी एल्बम को सुर देने वाले कुमार ने कई मशहूर हिन्दी गीतों को भी अपनी पुरअसर आवाज़ दी। साथ ही उन्होंने एक ऐसी फिल्म का निर्माण भी किया जिसे राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।
फिल्म समीक्षक ज्योति वेंकटेश के मुताबिक हेमंत कुमार अपने दौर के सबसे प्रतिभाशाली फनकारों में से थे। संगीत की नब्ज़ का मिजाज़ समझने में दक्ष इस कलाकार को रवींद्रसंगीत का विशेषज्ञ भी माना जाता था।
उन्होंने बताया कि कुमार ने 1959 में हेमंत-बेला प्रोडक्शंस के बैनर तले नील अक्षर नीचे फिल्म बनाई। मृणाल सेन द्वारा निर्देशित इस फिल्म को भारत सरकार के सबसे बड़े फिल्म सम्मान राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।
उन्होंने बताया कि कभी बॉलीवुड अभिनेता देव आनंद की आवाज़ कहे जाने वाले कुमार ने साल 1954 में बनी फिल्म 'नागिन' में संगीत दिया। यह फिल्म बेहद कामयाब हुई और इसकी सफलता का ज़्यादातर श्रेय उसके संगीत को दिया गया।
कुमार को इस फिल्म के लिए साल 1955 के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया।
कुमार ने मुख्य रूप से 'आनंद मठ', 'अंजान', 'दो दिल', 'एक ही रास्ता', 'हमारा वतन', 'हम भी इंसान हैं', 'जागति', 'राहगीर' और 'उस रात के बाद' फिल्मों को संगीत से सजाया।
कुमार मुख्य रूप से बांग्ला संगीतकार थे और उनके ज़्यादा बांग्ला गीत बेहद लोकप्रिय हुए। बांग्ला गीतकार गौरीप्रसन्ना मजूमदार के साथ उनकी खास जुगलबंदी थी और इस जोड़ी ने बांग्ला सिनेमा और संगीत को उसके स्वर्णिम युग में पहुंचाया।
साल 1980 में कुमार को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी गायन क्षमता भी प्रभावित हुई। ख़ासतौर से सांस पर नियंत्रण में उन्हें दिक्कतें होने लगीं लेकिन इस कलाकार ने अपनी इच्छाशक्ति के बलबूते इस कमज़ोरी पर काफी हद तक काबू पा लिया।
सितम्बर 1989 में कुमार माइकल मधुसूदन अवार्ड लेने के लिए ढाका गए और वहां उन्होंने एक कार्यक्रम भी पेश किया। अपनी उस यात्रा से लौटने के फौरन बाद उन्हें एक बार फिर दिल का दौरा पड़ा और 26 सितम्बर 1989 को इन फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।(Hindustan,15.6.2010)

