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Wednesday, June 30, 2010

अलग रूप में रावणःडा. गौरीशंकर राजहंस

जब से मणिरत्नम की फिल्म रावण रिलीज हुई है, मीडिया में बहस छिड़ गई है कि क्या रावण सचमुच इतना बुरा था जितना उसे दर्शाया जाता है। इस संदर्भ में मुझे बरबस 1996 में कंबोडिया की रामलीला की याद आ गई। थाईलैंड, लाओस, म्यांमार, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया और सिंगापुर सहित पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में हर वर्ष किसी न किसी रूप में रामलीला का मंचन होता है। 1996 में जब मैं कंबोडिया में भारत का राजदूत था तो कंबोडिया की सरकार ने संसार के सबसे बड़े हिंदू मंदिर अंकोरवाट के पास विभिन्न देशों से आई हुई रामलीला मंडलियों द्वारा रामायण के मंचन का आयोजन किया था। भारत से भी एक रामलीला मंडली सरकार ने भेजी थी। दक्षिण-पूर्व एशिया के अलावा मॉरीशस, सूरीनाम, गयाना आदि देशों से भी जहां भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रह रहे हैं, रामलीला मंडलियां वहां आई थीं। कंबोडिया के महाराज और प्रधानमंत्री भी रामलीलाओं को चाव से देख रहे थे। हर मंडली को रामायण के किसी एक दृश्य का मंचन करना था। हर मंडली को रामायण के दृश्य के मंचन के बाद संक्षेप में कोई टिप्पणी करनी होती थी। सिंगापुर की एक 20-22 वर्ष की लड़की ने सीता का रोल किया था और नाटक के अंत में उसने अत्यंत दृढ़ शब्दों में कहा था, कब तक महिलाएं अग्नि में प्रवेश कर अपने सतीत्व की परीक्षा देती रहेंगी और इसके बावजूद कब तक उन्हें बनवास मिलता रहेगा? जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं, क्या उन्होंने स्त्री जाति का घोर अपमान नहीं किया? उसकी इस टिप्पणी से सभी सन्न रह गए। रामलीला के अंत में कंबोडिया के प्रधानमंत्री और दूसरे मेहमानों ने यही कहा कि सिंगापुर की लड़की ने जो कुछ कहा वह शत-प्रतिशत सही है। रामलीला के अंत में मैंने कंबोडिया के प्रधानमंत्री से पूछा कि ज्यादातर रामलीला मंडलियों ने रावण द्वारा धोखे से सीता के हरण का दृश्य क्यों दिखाया? इस पर उनका जवाब था कि महापंडित होने के बावजूद रावण में राक्षसी प्रवृति थी, जिसके कारण वह धोखे से सीता को हर ले गया। संस्कृत के प्रकांड विद्वान डॉ. जनार्दन मिश्र ने एक पुस्तक लिखी है-भारतीय संस्कृति में प्रतीकवाद। उनका कहना है कि देवी-देवताओं के बारे में जो कथाएं प्रचलित हैं उनका सत्य यह है कि वे मात्र प्रतीक हैं। दुर्गा को अष्टभुजा वाली इसलिए कहा जाता है कि वह एक ऐसी शक्ति थीं जो आठ हाथों से दानवों का या दुष्ट लोगों का नरसंहार करती थी। लक्ष्मी की चार भुजाएं इसलिए दर्शाई जाती हैं कि जिस पर उनकी कृपा होती है उस पर वह खुले हाथों से धन वर्षा करती हैं। इसी प्रकार रावण के बारे में कहा जाता है कि उसके दस मुख थे। सही अर्थ में उसके कोई दस मुख नहीं थे। महापंडित होने के बावजूद वह महाधूर्त था और दस लोगों से दस तरह की बातें करता था। सत्ता के मद में उसने अपने हितैषियों को यहां तक कि अपने भाई विभीषण को भी घर से निकाल दिया था। उनके कहने का अर्थ है कि महापंडित होने के बावजदू सत्ता के मद में लोग इतने चूर हो जाते है कि उन्हें अपने-पराये और अच्छे-बुरे का ज्ञान ही नहीं रहता। यह बात आज से पांच हजार वर्ष पहले भी सच थी और आज भी सच है। बात जब रावण की आती है तो भारतीय राजनीति रावणों से ही भरी दिखाई पड़ती है। अनेक राजनेता शराफत का मुखौटा ओढ़े रहते हैं और उसके पीछे वे सारे कृत्य करते हैं जो कभी रावण किया करता था। सही सलाह देने वालों को वे अपमानित कर अपनी पार्टी से निकाल देते हैं। सज्जन लोगों को तरह-तरह से प्रताडि़त करते हैं। ये विकास के सारे पैसे हड़प लेते हैं। ऐसे राजनेता प्राय: सभी पार्टियों में हैं और बड़े मजे से आज भी रावण राज चला रहे हैं। स्थिति अत्यंत निराशाजनक है। चाहे जितने कानून बना लिए जाएं, चाहे मीडिया में जितनी भ‌र्त्सना की जाए, सच तो यह है कि आधुनिक रावण आज भी फल-फूल रहे हैं। दुखी और निराश जनता आर्तनाद कर उठती है और बार-बार सोचती है कि उसे आज के इन रावणों से मुक्ति कब और कैसे मिलेगी?(दैनिक जागरण,30.6.2010)

Monday, June 28, 2010

यही सच है

महाराष्ट्र के नेताओं, अफसरों और माफिया के गठजोड़ पर वैसे तो कई हिंदी फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन इसी तरह की "दोस्ती" को फिल्म "यही सच है" में पहली बार एक ऐसे शख्स ने बयां किया है, जिसने इस गठजोड़ के बीच २० साल गुजारे हैं। भारतीय पुलिस सेवा के काबिल अफसरों में शुमार किए जाते रहे योगेश प्रताप सिंह देश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर पहली प्रामाणिक फिल्म लगभग पूरी कर चुके हैं। "नईदुनिया" ने इस फिल्म के जो भी अंश देखे हैं, वो आम आदमी को तो भीतर तक झकझोरते ही हैं, देश की मौजूदा नौकरशाही के लिए भी आंखे खोल देने वाले हैं।

देश की सेवा के लिए संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले एक नौजवान आईपीएस अफसर को अगर नौकरी के पहले ही दिन उसका भ्रष्ट वरिष्ठ अधिकारी जलील करे। उसकी ईमानदारी से की गई जांच की जद में अगर किसी राज्य का मुख्य सचिव से लेकर गृहमंत्री तक आ जाए तो क्या होता है, योगेश प्रताप इस सबका लेखा जोखा जनता के सामने एक फीचर फिल्म के जरिए जल्द पेश करने जा रहे हैं। योगेश प्रताप ने करीब पांच साल पहले महाराष्ट्र की नौकरशाही से तंग आकर भारतीय पुलिस सेवा की नौकरी छोड़ दी थी। नौकरी के दौरान ही उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से एलएलएम की पढ़ाई की और पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इन दिनों वह बंबई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं और आम नागरिकों के हित के लिए लगातार जनहित याचिकाएं दाखिल करते रहते हैं। उनकी याचिकाओं पर हुए फैसलों के चलते कई बार महाराष्ट्र सरकार को अपने फैसले बदलने पड़े हैं, जिनमें मुंबई के उपनगरों में बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने के लिए बढ़ाई गई एफएसआई के फैसले का इसी महीने उच्च न्यायालय में खारिज हो जाना भी शामिल है।

अपने बहुचर्चित उपन्यास कार्नेज बाइ एंजेल्स पर फिल्म बना रहे योगेश प्रताप ने इस फिल्म की पटकथा खुद लिखी है और निर्देशन की जिम्मेदारी भी खुद निभाई है। उपनगर के एक स्टूडियो में चल रहे फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान "नईदुनिया" को इसके काफी अंश देखने को मिले। फिल्म में जहां एक दृश्य में एक नए आईपीएस अफसर को एक हवलदार की ईमानदारी से प्रेरित होकर पूरी उम्र रिश्वत न लेने की कसम खाते दिखाया गया है, वहीं एक दृश्य ऐसा भी है जिसमें राज्य के एक दक्षिण भारतीय मुख्य सचिव को गृहमंत्री के पैरों पर गिरकर अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज न होने देने के लिए गिड़गिड़ाते दिखाया गया है। एक दूसरे दृश्य में मुंबई के एक पुलिस कमिश्नर को अपना कार्यकाल बढ़वाने के लिए अशोक की लाट लगी आईपीएस कैप गृहमंत्री के आगे निछावर करते दिखाया गया है। सूत्रों के मुताबिक ये दोनों दृश्य योगेश प्रताप ने अपने कार्यकाल के दौरान हुए अनुभवों से उठाए हैं।

फिल्म में राज्य के एक शक्तिशाली नेता के काम करने के तरीकों को बारीकी से दिखाया गया है, जो मौजूदा अशोक चव्हाण सरकार में भी काफी अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। फिल्म में उनके भतीजे और मुंबई के एक बहुचर्चित होटल मालिक का वह गठजोड़ भी दिखाया गया है, जिसके बारे में राज्य में मंत्रालय से लेकर कॉरपोरेट जगत का हर आदमीजानता है(पंकज शुक्ल,Nai Dunia,Delhi,28.6.2010) ।

Tuesday, June 22, 2010

रेडियो से गुम हो गया झुमरी तलैया

जाने कहां गए वो दिन ..। रेडियो पर यह गीत सुनते ही झुमरी तलैया की बरबस याद आ जाती है। एक समय था, जब विविध भारती और रेडियो सीलोन का कोई फरमाइशी फिल्मी गीत ऐसा नहीं होता था, जिसमें झुमरीतलैया और चाईबासा के फरमाइशी न शामिल हों। तब झुमरीतलैया एक छोटा सा बाजार था लेकिन अभ्रक मिलने के कारण व्यवसाय का बड़ा केंद्र माना जाता था। रेडियो पर फिल्मी गानों की फरमाइशों के कारण झुमरीतलैया का नाम न केवल देश बल्कि विदेश में भी मशहूर हो गया था। लेकिन अब झुमरीतलैया से फरमाइश करने वाले गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं। उनका नाम अब मनपसंद गीतों की फरमाइश करने वालों की फेहरिस्त में नहीं मिलता। वर्ष 1953 से 1980 तक रेडियो सीलोन, विविध भारती, रेडियो अफगानिस्तान, वॉयस ऑफ अमेरिका और रेडियो इंडोनेशिया के फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम में प्रतिदिन झुमरीतलैया का नाम कई बार सुना जाता था। यहां के श्रोताओं ने कई रेडियो श्रोता क्लबों का गठन किया था। इन क्लबों के बीच होड़ लगती थी कि कहां से कितने फरमाइशी पत्र भेजे जा रहे हैं। गीतों की फरमाइश भेजने में झुमरीतलैया के कुछ क्लबों को भारत में सर्वोच्च स्थान मिला था। झुमरीतलैया की पहचान बॉलीवुड में भी हुआ करती थी। कई फिल्मों में तो झुमरीतलैया के काल्पनिक पात्र का भी उपयोग किया गया है। फिल्मी गानों में तो झुमरीतलैया का नाम आना आम बात थी। पुरानी फिल्म हसीना मान जाएगी का चर्चित गीत था- मैं झुमरीतलैया जाऊंगी..नत्थू तेरे कारण जोगन बन जाऊंगी..मैं झुमरीतलैया जाऊंगी..। कालांतर में रेडियो के जरिये झुमरीतलैया का नाम बॉलीवुड तक पहुंचाने वाले और गीत-संगीत सुनने के शौकीन गुम होते गए। रेडियो के साथ मनोरंजन के अन्य साधनों ने सबकुछ उलट पुलट कर रख दिया। लोगों की मानसिकता में भी काफी बदलाव आ गया। रेडियो के प्रति रुझान घटता गया। फरमाइशों के माध्यम से झुमरीतलैया को चर्चित बनाने वालों में फिल्मी गीतों के दीवाने स्व. रामेश्र्वर वर्णवाल और स्व. गंगा लाल मगधिया का विशेष योगदान रहा। वर्ष 1953 के आसपास रामेश्र्वर वर्णवाल ने रेडियो में गीतों की फरमाइश भेजने की शुरुआत की थी। बाद में उनका यह शौक आदत में शरीक हो गया। उसके बाद गंगालाल मगधिया ने भी उनकी देखा-देखी रेडियो में फरमाइश भेजनी शुरू की। इसके बाद तो फरमाइश करने वालों की बाढ़ आ गई। झुमरीतलैया इतना चर्चित हुआ कि कई फिल्मी गानों के बोल और फिल्मों की कथाओं में झुमरीतलैया के नाम का उपयोग किया जाने लगा। इतना ही नहीं, उद्घोषक अमीन सायानी को प्रख्यात बनाने में झुमरीतलैया के श्रोताओं का काफी योगदान रहा है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,22.6.2010)।

Monday, June 21, 2010

अमरीश पुरी ने की थी बीमा कंपनी में नौकरी

लंबा कद, मज़बूत कद काठी, बेहद दमदार आवाज़ और ज़बर्दस्त संवाद अदायगी जैसी खूबियों के मालिक अमरीश पुरी को हिंदी सिने जगत के कुछ सबसे सफल खलनायकों में गिना जाता है, लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम है कि अमरीश पुरी को मुंबई आने के बाद संघर्ष के दिनों में एक बीमा कंपनी में नौकरी करनी पड़ी थी।

रंगमंच तथा विज्ञापनों के रास्ते अपनी अदाकारी का लोहा मनवाकर हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर खलनायक के रूप में प्रसिद्धि बटोरने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब में हुआ। अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे अमरीश पुरी अपने लेकिन पहले ही स्क्रीन टेस्ट में विफल रहे और उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली।

बीमा कंपनी की नौकरी के साथ ही वह नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थियेटर में काम करने लगे। रंगमंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें टीवी विज्ञापनों तक पहुंचाया, जहां से वह फिल्मों में खलनायक के किरदार तक पहुंचे।

अमरीश पुरी को 1960 के दशक में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दुबे और गिरीश कर्नार्ड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।

फिल्मों में खलनायक के किरदार में अमरीश पुरी को ऐसा पसंद किया गया कि फिल्म 'मिस्टर इंडिया' में उनका किरदार 'मुंगैबो' उनकी पहचान बन गया। इस फिल्म में 'मुगैंबो खुश हुआ' के अलावा तहलका में उनके द्वारा बोला गया संवाद 'डांग कभी रांग' नहीं होता भी लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा।

अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया।

उनके जीवन की अंतिम फिल्म 'किसना' थी जो 2005 में उनके निधन के कुछ दिन बाद प्रदर्शित हुई। अमरीश पुरी को अनेक फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का खिताब मिला।

'प्रेम पुजारी' से फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करने वाले अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'मंथन', 'गांधी', 'मंडी', 'हीरो', 'कुली', 'मेरी जंग', 'नगीना', 'लोहा', 'गंगा जमुना सरस्वती', 'राम लखन', 'दाता', 'त्रिदेव', 'जादूगर', 'घायल', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.6.2010)।

जैक्सन पर वृत्तचित्र का भारत में प्रीमियर

किंग ऑफ पॉप के नाम से मशहूर रहे माइकल जैक्सन की मौत को एक साल पूरा हो रहा है और इस मौके पर उन्हें याद करने के लिए उनसे बातचीत, मंच के पीछे की उनकी चहलकदमी को दर्शाने वाले वृत्तचित्र का प्रदर्शन भारत में छोटे पर्दे पर किया जा रहा है। पिक्स चैनल पर 25 जून को रात नौ बजे इस वृत्तचित्र दिस इज इट का भारतीय प्रीमियर किया जाएगा। चैनल के सूत्रों ने कहा कि माइकल जैक्सन की मौत के एक साल पूरा होने पर उन्हें इस फिल्म के माध्यम से याद किया जाएगा। इसमें उनसे की गई बातचीत, मंचीय प्रस्तुतियों से पहले किए गए उनके रिहर्सल और उनकी अन्य तस्वीरों का समावेश है। चैनल पिक्स के बिजनेस हैड सुंदर ऑरोन ने कहा, पॉप स्टार माइकल जैक्सन की मौत से पूरी दुनिया स्तब्ध थी।

Sunday, June 20, 2010

सिलसिला पार्ट 2 : देखने वाले रह गए हैरान

यह ऐसी स्कि्रप्ट थी, जो पहले से नहीं लिखी गई थी। शुक्रवार को फिल्मी दुनिया के वरिष्ठ फोटोग्राफर गौतम राजाध्यक्ष की पुस्तक चेहरे का विमोचन था और इसमें गुजरे चार दशकों के वे तमाम खूबसूरत चेहरे मौजूद थे, जिन्हें इस फोटोग्राफर ने कैमरे में कैद किया था। जब पुस्तक का विमोचन हो गया और लगा कि अब कुछ बाकी नहीं, तब ऐसा कुछ हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। कार्यक्रम में मौजूद रेखा ने आगे बढ़ कर जया बच्चन को गले लगा लिया! 1981 में आई फिल्म सिलसिला में परदे पर रेखा और जया आखिरी बार आमने-सामने दिखी थीं। उसके बाद करीब तीन दशक बीतने को आए, दोनों को साथ नहीं देखा गया। बात करना तो बहुत दूर। दोनों एक कार्यक्रम में शामिल होने से बचती रहीं। यदि ऐसा हुआ भी, तो एक-दूसरे से नजर मिलाने से बचती रहीं। महानायक अमिताभ बच्चन और जया के विवाह के बाद अमिताभ-रेखा की प्रेम चर्चा तमाम फिल्मी पत्रिकाओं में सुर्खियां बनती रहीं और लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते रहें। लेकिन आठवें दशक के अंत तक तस्वीर बदल गई और अमिताभ-रेखा कई कार्यक्रमों में दिखने के बावजूद एक-दूसरे को नजर अंदाज करते रहे। कहानी में ट्विस्ट पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में जया बच्चन ने रेखा को नजरअंदाज करने की पूरी कोशिश की। मंच से उन्होंने उम्दा अभिनेत्रियों के रूप में हेमा मालिनी, पद्मिनी कोल्हापुरे और काजोल के नाम तो लिए, लेकिन सामने पहली पंक्ति में बैठीं रेखा का नाम नहीं लिया। लेकिन जब वह मंच से उतरीं, तो उनका सामना अचानक रेखा से हो गया। दरअसल, रेखा गायिका आशा भोंसले के बगल की सीट पर बैठी थीं। जया समारोह से निकलने से पहले आशा से मिलने पहुंची और उनकी नजर रेखा से टकरा गई। जया ने रेखा को अनदेखा करने की कोशिश की, लेकिन तब तक रेखा मुस्कुराते हुए खड़ी हो गई और उन्होंने जया की तरफ अपने दोनों हाथ बढ़ा दिए। जया कुछ झिझकीं, लेकिन फिर आगे बढ़ीं। तब रेखा ने उन्हें गले लगा लिया। जया ने इसकी कल्पना नहीं की थी, इसलिए उनके चेहरे पर खुशी से अधिक आश्चर्य के भाव आए। जया और रेखा का गले मिलना हर देखने वाले के लिए हैरानी का विषय बन गया। जया और रेखा कुछ पल ऐसे हंसकर बातें करती रहीं जैसे उनके बीच कभी मनमुटाव ही नहीं था(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,20.6.2010)।

Saturday, June 19, 2010

फिल्म और प्रेम




















(हिंदुस्तान,17.6.2010)

उंगली थाम के रखना पा

इंडस्ट्री के पा (पापा) अपने बेटों-बेटियों के फिल्मी करियर को सहारा देने में जुटे हैं। अपने बेटे या बेटी के करियर पर किसी तरह की आंच न आए, इसके लिए वह हमेशा चिंतित रहते हैं। आज फादर्स डे की पूर्व संध्या पर हम इंडस्ट्री के कुछ ऐसे ही पिताओं के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं, जो अपने बच्चों के करियर के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे। विशाल ठाकुर की रिपोर्ट।

निर्माता वाशु भगनानी अपने बेटे जैकी भगनानी को फिर से लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं तो उधर अभिनेता हरमन बावेजा के पिता हैरी बावेजा को लगातार ये चिंता खाए जा रही है कि उनके बेटे के एक्टिंग करियर के साथ ऐसा क्या गलत हुआ, जिसे वह आज तक समझ नहीं पाए। हैरी अब हरमन के एक्टिंग करियर को फिर से तराशने पर जोर दे रहे हैं और एक बढ़िया स्क्रिप्ट के साथ एक नए निर्देशक की भी तलाश कर रहे हैं, जो हरमन के डूबते करियर को एक नई दिशा दे सके। अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती अपने बेटे मिमोह को लेकर भी कुछ ऐसी ही कशमकश में हैं।

लंबे समय से स्क्रीन से दूरी बनाए रखने वाले धर्मेन्द्र को जब लगा कि उनकी बेटी ऐशा की री-लांचिंग में कोई कमी न रह जाए तो उन्होंने हेमा के एक हल्के से इशारे पर ऐशा देओल को लेकर बनाई जा रही उनकी होम प्रोडक्शन फिल्म ‘टैल मी ओ खुदा’ में ऐशा का साथ देने में जरा भी देरी नहीं की। हालांकि धर्मेन्द्र इन दिनों न केवल अपने बैनर विजेता फिल्म्स को दोबारा से लॉन्च करने में जुटे हैं, बल्कि अपने बेटों के साथ मिल कर ‘यमला पगला दीवाना’ में भी व्यस्त हैं। यह फिल्म धर्मेन्द्र को अपने बेटों सनी और बॉबी के साथ दोबारा लांच करने का प्रोजेक्ट है। गौरतलब है कि इससे पहले धर्मेन्द्र फिल्म ‘अपने’ के माध्यम से अपने बेटों के साथ फिल्म में आये थे। यह फिल्म कुछ खास नहीं चली थी।

उपरोक्त कुछ बातों से इशारा मिलता है कि किस तरह से आज इंडस्ट्री के पा (पापा) अपने बेटों-बेटियों के फिल्मी करियर को सहारा देने में जुटे हैं। अपने बेटे या बेटी के करियर पर किसी तरह की आंच न आए, इसके लिए वह हमेशा चिंतित रहते हैं। अब अभिनेता अनिल कपूर को ही लीजिए। फिल्म ‘आयशा’ में उनकी बेटी सोनम कपूर हैं। साथ में हैं बॉबी देओल। अनिल कपूर इस फिल्म की मेकिंग की शुरुआत से ही हर छोटी से छोटी चीज से जुड़े हैं। सोनम को लेकर ये उनकी होम प्रोडक्शन की पहली फिल्म होगी। अनिल चाहते हैं कि इस फिल्म के जरिये सोनम को एक बड़े लॉन्च जैसा लुक मिले, क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि सोनम को तमाम ग्रूमिंग के बावजूद विभिन्न फिल्में करने के बाद भी सही तरीके से स्क्रीन पर पेश नहीं किया गया है। उधर साउथ में कुछ ऐसी ही भागदौड़ कमल हासन भी कर रहे हैं। हालांकि कमल हासन ने अपनी बेटी श्रुति को लॉन्च करने जैसा कुछ तो नहीं किया, लेकिन उन्होंने उसे स्टारडम पर लाने की तैयारी काफी पहले से करनी शुरु कर दी थी। छह साल की उम्र में उन्होंने फिल्म ‘थेवर मगन’ में श्रुति से एक गीत गवाया। 2009 में कमल ने ‘उन्नाईपोल ओरुवन’ से श्रुति को एक बड़ा मौका दिया कि वह खुद को एक कंपोजर के रूप में स्थापित कर सके। यह फिल्म प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म ‘ए वेडनस्डे’ का रीमेक थी। साउथ के ही सुपरस्टार रजनीकांत की वजह से ही उनकी बेटी सौंदर्या ‘सुल्तान दि वारियर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं, जिसे लेकर रजनीकांत इन दिनों खासे चिंतित हैं। बॉलीवुड में आरके बैनर को दोबारा से लॉन्च करने की तैयारी कर रहे कपूर ब्रदर्स की निगाहें करीना और रणबीर पर टिकी हुई हैं। गौरतलब है कि ‘बचना ए हसीनो’ का टाइटल ऋषि कपूर ने ही दिया था, लेकिन जिस तरह से राकेश रौशन अपने बेटे रितिक रौशन को प्रोमोट करते हैं, उसकी बराबरी शायद ही कोई कर सकता हो। इस साल की बहुचर्चित फिल्म ‘काइट्स’ जब बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी तो उन्होंने रितिक को इससे साफ-साफ बचा लिया। अब राकेश रितिक को लेकर ‘कृष 2’ के निर्माण में जुटे हैं, जिसका बजट 200 करोड़ रुपये आंका जा रहा है। उधर अभिषेक को लेकर बिग का सपोर्ट तो जग-जाहिर है। अभिषेक के पहले टीवी शो में पहले एपिसोड में बिग बी ही विशेष मेहमान बन कर आये थे, जिससे शो को अच्छी टीआरपी मिली थी। जैकी श्रॉफ भी अपने बेटे टाइगर श्रॉफ को लेकर एक बड़े प्रोजेक्ट की तैयारी में हैं। हालांकि जैकी ने टाइगर से साफ कह दिया था कि उन्हें खूब मेहनत करनी होगी। यही वजह है कि तमाम प्रचार मिलने के बावजूद उन्होंने टाइगर को फिलहाल फिल्मों से दूर रखा हुआ है। इंडस्ट्री में उड़ती-उड़ती खबर है कि टाइगर को सुभाष घई अपनी अगली फिल्म में लेने वाले हैं।

ओ मेरे पापा दि ग्रेट

फादर्स डे की पूर्व संध्या पर कुछ स्टार किड्स अपने पापा द्वारा दिये गये ज्ञान, सीख और अच्छाइयों का जिक्र कुछ इस तरह से कर रहे हैं।

मिमोह चक्रवर्ती

मेरी पहली फिल्म ‘जिम्मी’ का हश्र जो भी रहा हो, लेकिन पापा ने इस फिल्म के माध्यम से मुझे लॉन्च करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मैं अभिनय में आना चाहता था। यह मेरा निर्णय था। उन्होंने मुझ पर कभी दबाव नहीं बनाया कि मैं एक एक्टर बनूं। एक अभिनेता के तौर पर मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है। डैड इस ग्रेट!

अभिषेक बच्चन

हम दोनों जब-जब कैमरे के सामने होते हैं तो हमारे बीच एक अजीब सी कैमिस्ट्री काम करती है। विभिन्न सीन्स को लेकर यह ट्यूनिंग गजब की होती है। मुझे लगता है कि उनसे मिलने वाला ज्ञान कभी खत्म नहीं होगा, जिसके लिए मैं हमेशा लालायित रहता हूं। मैंने हर कदम पर उनसे कुछ न कुछ सीखा है। वह महान हैं।

रणबीर कपूर

पापा (ऋषि कपूर) को हमेशा लगता था कि मैं एक्टिंग के लिए फिट नहीं हूं, लेकिन जब उन्होंने फिल्मों में मेरी रुचि देखी तो उन्होंने खुद आकर मुझसे फिल्में करने के लिए कहा। मैंने सोचा कि लोग पापा से मेरी तुलना करेंगे तो मैं तो नर्वस हो जाऊंगा तो उन्होंने मुझे पास बैठा कर बड़े प्यार से समझाया कि इस दौर से हर स्टार किड को गुजरना पड़ता है, लेकिन तुम अपना काम करो बस। अपने तरह के अभिनय को स्क्रीन पर पेश करो। कोई दिक्कत नहीं होगी।

सोनम कपूर

पापा को कभी नहीं लगता था कि मैं एक्टिंग भी कर पाऊंगी। मेरी पहली फिल्म के ऑफर के समय भी वो पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थे, पर जब मैंने उन्हें अपने दिल की बात बताई तो उन्होंने कहा कि तुम चिंता मत करो। सब ठीक होगा। मुझे उनकी बेटी होने पर गर्व है। आई लव यू डैड!

श्रद्धा कपूर

पापा (शक्ति कपूर) ने मेरी पहली फिल्म में मेरी परफॉरमेंस देख कर कहा कि मैं अभिनय के मामले में उनके जैसी बिलकुल नहीं हूं। ऐसा कह कर उन्होंने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया, वर्ना तो इंडस्ट्री में हर स्टार किड पर उसके पेरेन्टस के अभिनय को कॉपी करने का टैग लगा दिखता है। थैंक्स पापा !

अध्ययन सुमन

मुझे लगता है कि मैं अपने पापा (शेखर सुमन) जैसा प्रतिभाशाली कलाकार तो शायद ही बन सकूं, लेकिन इतना तय है कि अभिनय के जिस क ख ग से उन्होंने मुझे लबरेज किया है, उससे मेरे आत्मविश्वास को हमेशा बढ़ावा मिला है। मैं यह पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता कि मेरे अभिनय में उनका अक्स झलकता है या नहीं, लेकिन यह निश्चित है कि जब भी मैं कैमरे के सामने होता हूं तो मेरे दिमाग में उन्हीं के दिये सूत्र घूमते रहते हैं। इससे मेरे अभिनय में तो नयापन आता ही है, साथ ही मेरा सिर भी गर्व से ऊंचा हो जाता है कि मैं एक ऐसे इंसान का बेटा हूं, जिसने अभिनय के शिखर तक पहुंचने में बहुत मेहनत की है। आई लव यू ऑलवेज पापा!

टाइगर श्रॉफ

एक्टिंग को लेकर पापा (जैकी श्रॉफ) का हमेशा से ही यही कहना था कि मैं इसे कभी हल्के में न लूं। मैं कभी ये सोच कर इस फील्ड में न जाऊं कि मैं एक स्टार का बेटा हूं। उन्होंने कहा कि मेहनत करो और मेरी तरह स्टार बन कर दिखाओ, क्योंकि मैंने इस इंडस्ट्री में जमने के लिए बहुत पापड़ बेले हैं। उनकी ये बातें मुझे हमेशा प्रेरित करती हैं।
(विशाल ठाकुर,हिंदुस्तान,18.6.2010)

सीता की नियतिःउमा पाठक

बरसों पहले जब हम छोटे थे, तब पुरानी दिल्ली के एक सिनेमा हॉल में 'राम-राज्य' नामक फिल्म देखने गए थे। पूरी फिल्म तो अब याद नहीं है, पर बच्चों की वह जोड़ी याद है जो गा- गाकर रामकथा सुना रही थी, 'भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...।' जब राम दरबार में खड़े लव-कुश से भावुक होकर पूछते हैं, क्या यही राम दरबार, कहां वैदेही, कहां वैदेही, कहां वैदेही?.... तब उनकी निरंतर ऊपर उठती आवाज की मार्मिकता से विचलित होकर आसपास के लोग सुबकने लगे।
हम उस दर्द से अनजान, चकराए से इधर-उधर देखते रह गए। पर क्या हॉल से निकलने के बाद किसी के मन में सीता के साथ हुए अन्याय के बारे में कोई प्रश्न उठा होगा?

मुश्किल ही है। क्योंकि आस्तिक परिवारों में अपने भगवान के प्रति जो अटूट आस्था होती है, उसके कारण संशय के लिए कोई जगह नहीं बचती। भक्त अपने इष्ट को आदर्श मानता है, भला उनसे कोई चूक कैसे हो सकती है?

हिंदू धर्म के सभी अवतारों में राम का चरित्र सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। बाल्मीकि ने उन्हें एक महामानव के रूप में चित्रित किया है, पर वे इस प्रसंग का वर्णन नहीं करते। पर उत्तरकांड में (जिसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है) राम सीता की पवित्रता पर संदेह करते हैं और कहते हैं कि वे दसों दिशाओं में जहां चाहें जा सकती हैं। उन्होंने उनको केवल अपने नाम के लिए छुड़ाया है। सीता के अग्नि परीक्षा देने पर वे उन्हें साथ ले जाते हैं। उत्तरकांड के संकलन कर्ताओं ने इस कहानी को बरकरार रखा है। बौद्ध जातक अनामकं जातकम् का 251 ई. के बाद चीनी अनुवाद हुआ। उसमें सीता के त्याग की कथा नहीं है। पर अयोध्या लौटने पर राम, सीता से अपने परिवार में लौट जाने को कहते हैं। रानी शपथ लेकर अपनी निर्दोषिता सिद्ध करती हैं और तब राम के वामांग में सुशोभित होती हैं। रविखेण ने पद्म चरित में सीता को वापस ले लेने के दुष्परिणाम स्वरूप समाज को मर्यादा रहित होता दिखाया।

विमल सूरि के पउम चरियं में सीता परित्याग का विस्तृत वर्णन मिलता है। लेखक ने बताया है कि राम गर्भवती सीता को चैत्यालय दिखलाने के लिए ले गए थे। वहां कुछ नागरिकों ने आकर राम से सीता के अपवाद की बात कही। राम ने लक्ष्मण से परामर्श किया। लक्ष्मण, सीता त्याग के विरुद्ध थे, पर राम के मन में संदेह था जिसके कारण उन्होंने अपने सेनापति से सीता को मंदिर दिखाने के बहाने गंगा पार छोड़ आने को कहा।

रामकथा के अधिकांश लेखक बाल्मीकि रामायण के ही आधार पर लिखते रहे। कुछ ने सीता परित्याग को बिल्कुल नहीं छुआ तो कुछ ने अलग - अलग कारण दिए। लोकगीतों और लोककथाओं में इन कारणों के अलावा श्रापों और वरदान को भी इस प्रसंग का कारण माना है , इस प्रकार राम के कृत्य के पीछे उनका नहीं दूसरे कारकों का हाथ बताया है। इस प्रकार राम को दोषमुक्त करने के रास्ते निकाल लिए गए हैं।

सीता पूरे रामकथा के केंद्र में हैं। बाल्मीकि और तुलसीदास ने समान रूप से सीता के रूप सौंदर्य का चित्रण किया है। तुलसी की सीता में अलौकिकता है , उनके चरित्र का सबसे ज्यादा चर्चित और विवादास्पद अंश है परित्याग से उपजा अपवाद और निर्वासन के बाद की उनकी मन : स्थिति। सभी रामकथाओं में उन्हें आदर्श पतिव्रता नारी के रूप में चित्रित किया गया है , पर बार - बार परीक्षा ली गई है। सबसे श्रद्धा और स्तुति मिली है पर पति ने चरित्र पर सवाल उठाकर लांछित किया है। कारण सिर्फ यह है कि जब भी कोई सीता लक्ष्मण रेखा लांघेगी तो उसका अपहरण होगा और उसे पुरुष का दुर्व्यवहार सहना पड़ेगा। उससे यह उम्मीद की जाती है कि पुरुष ने उसे जो देवीपद दिया है वह उसे स्वीकार कर मुंह बंद रखकर शांति से बैठे , फैसलों के लिए पिता , भाई , पति और पुत्र हैं , उसे कुछ कहने या करने की जरूरत नहीं है , जब जब वह गलती करेगी तब तब उसे ऋषि पत्नी अहल्या की तरह पति के श्राप से शिला बनना पड़ेगा।

राम ने पर पत्नी ( अहल्या ) के प्रति संवेदनशील होकर उन्हें अपने पैर के स्पर्श भर से पुन : जीवन दे दिया , पर अपनी पत्नी पर भरोसा नहीं कर पाए। लंका में अग्नि परीक्षा लेने के बाद अयोध्या में लोकापवाद सुनकर सहधर्मिणी को गर्भावस्था में निर्वासित कर दिया। इसके पीछे राम की कोई अपनी मनोवैज्ञानिक ग्रंथि रही होगी या राजसत्ता के लिए लोगों को खुश रखने की इच्छा ? सीता को दी गई सजा युगों से पुरुष वर्चस्व का उदाहरण बनकर जीवित है। सीता की अभिशप्त नियति आज भी स्त्री की नियति है।

रामकथाओं में सीता के सौंदर्य का चित्रण मिलता है। विवाह के बाद वे राम की अनुगामिनी के रूप में दिखाई गई हैं , जो हर समय उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करती हैं , यहां तक कि रास्ता तो दूर , कदम भी हटकर नहीं रखतीं। यही सीता सबको प्रिय और आदर्श लगीं। वाल्मीकि ने लंका में सीता को बहुत दुखी दिखाया , जो रावण के आने पर हवा में हिलते केले के पत्ते के समान कांपती थीं। तुलसी ने उस सीता में थोड़े प्राण डालते हुए उसे रावण को धिक्कारने और अधम कहने की शक्ति दी।

किंतु वास्तव में सीता का चरित्र राम की छत्रछाया से दूर जाने के बाद ही जीवंत हुआ है। सदा परजीवी के रूप में जीनेवाली पत्नी , मां के रूप में आत्मनिर्भर और विवेकपूर्ण दिखती हैं , जो रोने - कलपने की जगह चारित्रिक दृढ़ता का परिचय देती हैं। इस तेजोमय चरित्र के सामने राम संदेहों से घिरे , नियति के आगे बेबस व्यक्ति के रूप में दिखते हैं। धोबी तक की बात को महत्व देनेवाले राम वही लोकतांत्रिक अधिकार अपनी पत्नी को क्यों नहीं देते ? सीता निर्वासन के बाद राम के चरित्र का औदात्य फीका पड़ जाता है , तभी तो उनके परम भक्त बाल्मीकि और तुलसी भी इस प्रसंग को छिपाकर रखते हैं।

दूसरी ओर सीता राजमहल की सुख - सुविधाओं से दूर रहकर भी अपने पुत्रों को तन - मन की वह शक्ति दे पाती हैं कि वे अपने पिता के अश्वमेध यज्ञ हेतु छोड़ गए घोडे़ को रोकने का साहस करते हैं , राम की सेना का सामना करने को तैयार दिखते हैं। तिरस्कृत पत्नी को राजदरबार में बुलाया जाता है , सीता गर्विणी मां के रूप में पहुंचती हैं। पर इस बार परीक्षा देने की जगह धरती मां को पुकारती हैंं और अंतत : उन्हीं में समाकर समस्त लांछना से मुक्त हो जाती हैं। पीछे रह जाते हैं ठगे से , रोते बिलखते राम जो उनके रहते हुए उनकी मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाए थे। राजसी ठाठबाट रहित अकेली मां माता - पिता दोनों के दायित्वों को भलीभांति निभाती है। आज के युग में एकल मां के दायित्व को निभानेवाली युवती को सबकी वाहवाही मिलती है , पर उस युग में उसने सब कर्त्तव्य चुपचाप पूरे किए(नभाटा,दिल्ली,19.6.2010)।

बॉलीवुड ने बनाया पेंटर

चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्ट्स से ग्रेजुएशन करने वाले रंजीत दाहिया की एग्जिबीशन तीन जुलाई से पेरिस में लगने वाली है। पेरिस जाने से पहले रंजीत अपनी कॉलेज लाइफ की यादें ताजा करने के लिए शुक्रवार को चंडीगढ़ आए। रेलवे स्टेशन और ढ़ाबे पर पेंट करके रंजीत ने अपने करियर की शुरुआत की। बॉलिवुड पोस्टर मेकिंग में महारथ हासिल करने वाले रंजीत ने लाइफ के स्ट्रगल और खूबसूरत पलों को शेयर किया पूजा परमार के साथ-ड्रीम से बढ़कर पैशन है पेटिंगरंजीत दाहिया से पेटिंग के बारे में पूछा तो एकदम खुश होकर कहते हैं कि मुझे बचपन से ही पेटिंग का क्रेज था। पेटिंग के कोर्स जैसी चीजों के बारे में मुझे कोई समझ नहीं थी, लेकिन मैं जब चार साल का था, तब घर के दरवाजों पर बॉलिवुड स्टार्स के पोस्टर बनाता था। मुझे लगता है कि मेरे ऊपर सरस्वती जी का आर्शीवाद है। एक बार स्कूल में मेरे टीचर ने मुझे बोला कि तुम्हें सरस्वती जी का पोस्टर दीवार पर बनाना है। जब मैंने पोस्टर बनाया तो मेरी पेटिंग को खूब सराहा गया। तभी से पेटिंग मेरा ड्रीम कम पैशन ज्यादा है। आर्टिस्ट बनाया चंडीगढ़ नेचंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आटर्स के दिनों को याद करते हुए रंजीत कहते है कि चंडीगढ़ ने मुझे रंगों से भर दिया है। यही वो जगह है, जहां से मैंने प्रफेशनल पेटिंग करना सीखा था। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था। शुरू में जब सोनीपत से दिल्ली आया तो यह समझ नहीं आता था कि मैं क्या करूं । फिर मैंन कच्ची दीवारों पर पेटिंग करना शुरू किया। थोड़े दिन ही इसमें मन लगा। फिर ट्राली पर जय जवान, जय किसान और हम दो हमारे दो जैसे कोट्स लिखने लगा। हंसकर वो कहते है खैर छोडिए, पुराने दिन। मेरी किस्मत तो बॉलिवुड के पोस्टर्स ने बदल दी।पेरिस में चमकी किस्मतजब पेरिस में सेलून डू सिनेमा लाइव पेंटिग कॉन्सर्ट में मैंने बॉलिवुड मूवी सरकार राज का पोस्टर बनाया तो वहां मेरा पोस्टर बेस्ट माना गया। यह पेटिंग कॉन्सर्ट इंडिया के गरीब बच्चों के लिए था। पेरिस के लोगों ने मेरी खूब तारीफ की और मुझे रुपए ऑफर किए। मैंने वो रुपए नहीं लिए, गरीब बच्चों की चैरिटी को दे दिए। पेरिस के कॉन्सर्ट में अमिताभ बच्चन भी थे। उन्होंने मेरे पोस्टर को देखकर कहा, कैसे बनाते हो यार। मैं बहुत खुश था क्योंकि अमिताभ बच्चन ने मेरे पोस्टर पर ऑटोग्राफ दिया था। तीन जुलाई से पेरिस में लगने वाली एग्जिबीशन हिस्ट्री ऑफ बॉलिवुड में 31 पोस्टर्स को दिखाया जाएगा। जिसमें 1913 में बनी दादा साहेब फालके मूवी से लेकर 2009 में बनी स्लमडॉग मिलेनियर मूवी तक के पोस्टर शामिल किए जाएंगे(पूजा परमार,दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,19.6.2010)।

नेपाली उद्योगपति के साथ परिणय सूत्र में बंधीं मनीषा

बॉलीवुड की नेपाली बाला मनीषा कोईराला शुक्रवार को यहां अपने से सात साल छोटे उद्योगपति सम्राट दहल के साथ परिणय सूत्र में बंध गई। नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब 10 किलोमीटर दूर गोकर्ण वन रिजॉर्ट में 41 वर्षीय नेपाली सुंदरी मनीषा और 34 वर्षीय सम्राट दहल ने मंत्रोच्चार के बीच एक दूसरे के गले में वरमाला डाली और अंगूठी पहनाई। इस दौरान पीली साड़ी में मनीषा बेहद खूबसूरत नजर आ रही थीं। इस अवसर पर केवल दोनों परिवार के लोग और नजदीकी रिश्तेदार एवं दोस्त ही मौजूद थे। मनीषा के पिता प्रकाश कोईराला और मां सुषमा, बॉलीवुड अभिनेत्री सुमन रंगनाथन, सौदागर फिल्म में उनके सह कलाकार विवेक मुश्राम, गोविंदा की पत्नी सुनीता आदि मौजूद थे। शादी में पारंपरिक नेपाली गीत पंचाई बाजा और सांस्कृतिक नृत्य पेश किए गए। मेहमानों को नेपाली, भारतीय और कंटीनेंटल व्यंजन परोसे गए। आज मुख्य कार्यक्रम होगा जब दुल्हन दुल्हे के घर जाएगी। कल शादी के स्वागत समारोह में जैकी श्रॉफ और गोविंदा के हिस्सा लेने की उम्मीद है। इस समारोह में राष्ट्रपति रामबरन यादव, प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल, माओवादी प्रमुख प्रचंड, पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र जैसी जानी मानी हस्तियों समेत 3000 मेहमान हिस्सा लेंगे। प्रकाश कोइराला ने कहा कि शादी के बाद भी मनीषा अभिनय करती रहेंगी। हालांकि वह अब वह नेपाल में रहेंगी और अपना ज्यादातर समय नेपाली फिल्मों में लगाएंगी। सुभाष घई की फिल्म सौदागर से दर्शकों के दिलों में अपना स्थान बनाने वाली मनीषा ने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 1942 : ए लव स्टोरी, मणिरत्नम की बांबे, दिल से और संजय लीला भंसाली की खामोशी में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री बिश्वेश्वर प्रसाद कोईराला की पोती मनीषा रविवार की पार्टी होटल सोआलटी क्राउन प्लाजा में देंगी(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,19.6.2010)।

Thursday, June 17, 2010

अमर सिंह का धोखा

भारतीय राजनीति पर बनी प्रकाश झा की फिल्म अभी सफलता के झंडे गाड़ रही है, इसी बीच एक और ‘राजनीति’ के लिए जमीन तैयार हो रही है। हालांकि ये नई ‘राजनीति’ भोजपुरी की होगी और इस नई फिल्म के पीछे होंगे पूर्व समाजवादी पार्टी नेता अमर सिंह। यह फिल्म उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 2012 में रिलीज होगी। चर्चा है कि फिल्म का नाम ‘धोखा’ रखा गया है।
उम्मीद है कि अमर इस फिल्म के जरिए अपने उन राजनीतिक विरोधियों पर जवाबी प्रहार करेंगे जिन्होंने उनका अपमान किया है या उनको नजरअंदाज किया है। बुधवार को लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे एक ऐसी फिल्म बना रहे हैं जो सच्चई के काफी करीब होगी।

अमर ने कहा,‘हम ‘धोखा’ की स्क्रिप्ट के साथ तैयार है। फिल्म को मनोज तिवारी बना रहे हैं। फिल्म दो राजनेताओं-चालू और टालू प्रसाद- के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फिल्म पूर्वाचल की जनता की स्थिति बयां करती है जिसे सभी राजनेताओं ने धोखा दिया है।’ अमर का साथ देने के लिए उनके पुराने दोस्त भी तैयार हैं।

अमर ने कहा कि जयाप्रदा और संजय दत्त फिल्म में काम करने के लिए तैयार हैं। हालांकि उन्होंने कलाकार चुनने की जिम्मेदारी मनोज तिवारी को सौंपी है। वैसे अमर ने कहा कि वे भी इस फिल्म में अभिनय कर सकते हैं।
(Dainik Bhaskar,Lucknow,17.6.2010)।

Tuesday, June 15, 2010

माहिर फिल्मकार भी थे हेमंत कुमार

बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत की जानी-मानी शख्सियत हेमंत कुमार न सिर्फ मौसीकी के माहिर बल्कि बेहतरीन फिल्म निर्माता भी थे। बांग्ला भाषा के अनेक ग़ैर-फिल्मी एल्बम को सुर देने वाले कुमार ने कई मशहूर हिन्दी गीतों को भी अपनी पुरअसर आवाज़ दी। साथ ही उन्होंने एक ऐसी फिल्म का निर्माण भी किया जिसे राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।

फिल्म समीक्षक ज्योति वेंकटेश के मुताबिक हेमंत कुमार अपने दौर के सबसे प्रतिभाशाली फनकारों में से थे। संगीत की नब्ज़ का मिजाज़ समझने में दक्ष इस कलाकार को रवींद्रसंगीत का विशेषज्ञ भी माना जाता था।

उन्होंने बताया कि कुमार ने 1959 में हेमंत-बेला प्रोडक्शंस के बैनर तले नील अक्षर नीचे फिल्म बनाई। मृणाल सेन द्वारा निर्देशित इस फिल्म को भारत सरकार के सबसे बड़े फिल्म सम्मान राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।

उन्होंने बताया कि कभी बॉलीवुड अभिनेता देव आनंद की आवाज़ कहे जाने वाले कुमार ने साल 1954 में बनी फिल्म 'नागिन' में संगीत दिया। यह फिल्म बेहद कामयाब हुई और इसकी सफलता का ज़्यादातर श्रेय उसके संगीत को दिया गया।
कुमार को इस फिल्म के लिए साल 1955 के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया।

कुमार ने मुख्य रूप से 'आनंद मठ', 'अंजान', 'दो दिल', 'एक ही रास्ता', 'हमारा वतन', 'हम भी इंसान हैं', 'जागति', 'राहगीर' और 'उस रात के बाद' फिल्मों को संगीत से सजाया।

कुमार मुख्य रूप से बांग्ला संगीतकार थे और उनके ज़्यादा बांग्ला गीत बेहद लोकप्रिय हुए। बांग्ला गीतकार गौरीप्रसन्ना मजूमदार के साथ उनकी खास जुगलबंदी थी और इस जोड़ी ने बांग्ला सिनेमा और संगीत को उसके स्वर्णिम युग में पहुंचाया।

साल 1980 में कुमार को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी गायन क्षमता भी प्रभावित हुई। ख़ासतौर से सांस पर नियंत्रण में उन्हें दिक्कतें होने लगीं लेकिन इस कलाकार ने अपनी इच्छाशक्ति के बलबूते इस कमज़ोरी पर काफी हद तक काबू पा लिया।

सितम्बर 1989 में कुमार माइकल मधुसूदन अवार्ड लेने के लिए ढाका गए और वहां उन्होंने एक कार्यक्रम भी पेश किया। अपनी उस यात्रा से लौटने के फौरन बाद उन्हें एक बार फिर दिल का दौरा पड़ा और 26 सितम्बर 1989 को इन फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।(Hindustan,15.6.2010)