दुनिया में शायद भारत ही एकमात्र ऐसा देश होगा जहां कुछ राजनेता कभी किसी फिल्म से डर जाते हैं तो कभी किसी नाटक के मंचन से। कभी कोई किताब या किसी चित्रकार का बनाया कोई चित्र उन्हें लोगों की भावनाएं आहत करने वाला लगता है तो कभी कोई गीत या कविता उन्हें आपत्तिजनक लगती है। फिलहाल कुछ राजनेता प्रकाश झा जैसे जिम्मेदार फिल्मकार की फिल्म "आरक्षण" से डरे हुए नजर आ रहे हैं। सबसे ज्यादा भयभीत उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार है और उसने तय किया है कि इस फिल्म को रिलीज होने से पहले उसकी बनाई एक कमेटी के सदस्य देखेंगे और वे ही फैसला करेंगे कि फिल्म को प्रदेश के सिनेमाघरों में दिखाए जाने की अनुमति दी जाए या नहीं। उधर महाराष्ट्र के लोकनिर्माण मंत्री छगन भुजबल और दलित नेता रामदास अठावले ने भी इसके प्रदर्शन का विरोध करने की चेतावनी दे रखी है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में बैठे कुछ राजनेताओं ने भी इस फिल्म को देखे बगैर ही फतवा दे दिया है कि यह दलित विरोधी फिल्म है। इसी तरह का विरोध कुछ दिनों पहले रिलीज हुई फिल्म "खाप" को लेकर भी हो रहा है, जो "ऑनर किलिंग" जैसे ज्वलंत मुद्दे पर बनी है। फिल्मों में क्या आपत्तिजनक है और क्या नहीं, यह तय करने के लिए हमारे यहां सेंसर बोर्ड नाम की एक संस्था है, जो अपना काम लगभग पूरी संजीदगी के साथ करती आ रही है। ऐसे में राजनेताओं को यह अधिकार देश के किस कानून ने दे दिया है कि वे यह तय करने लग जाएं कि कौन सी फिल्म प्रदर्शन के लायक है और कौन सी नहीं या फिल्म में क्या दिखाया जाए और क्या नहीं? अगर ऐसे अराजक सेंसर से ही यह सब कुछ तय होने लगेगा तो फिर सेंसर बोर्ड का औचित्य ही क्या रह जाएगा? बहरहाल पैसे के लेन-देन को लेकर एक विवाद के चलते मद्रास हाई कोर्ट ने १२ अगस्त को होने वाली "आरक्षण" की रिलीज पर रोक लगा दी है। लेकिन यह एक अलग मुद्दा है। सवाल उठता है कि जो राजनेता इन फिल्मों का विरोध कर रहे हैं क्या उन्होंने फिल्मों के बारे में कोई अकादमिक प्रशिक्षण ले रखा है या वे देश की जाति व्यवस्था और जातिवाद की समस्या को गहराई से जानते और समझते हैं? दरअसल, अपने घर की गंदगी को कालीन या चटाई के नीचे छिपा देने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में काफी हद तक व्याप्त है। उसे साफ करने को लेकर हमारे मन में झिझक है या उसके उजागर होने में एक तरह का अपराध बोध होता है। यही झिझक और अपराध बोध कभी किसी फिल्म, किसी नाटक, किसी किताब या किसी कलाकृति के विरोध के रूप में उजागर होता रहता है(संपादकीय,नई दुनिया,दिल्ली,9.8.11)।
6 अगस्त के नवभारत टाइम्स का संपादकीय भी कहता है कि हमारे राजनेता फिल्मों से डरते हैं। अक्सर वे किसी किताब या नाटक के मंचन से भी डर जाते हैं। उनका ताजा डर प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' को लेकर है। महाराष्ट्र के लोकनिर्माण मंत्री छगन भुजबल और आरपीआई के अध्यक्ष रामदास अठावले ने इसके प्रदर्शन का विरोध करने की चेतावनी दे रखी है। पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म 'खाप' का भी विरोध हो रहा है। इसे खाप की राजनीति से जुड़े नेता हवा दे रहे हैं। एक जमाने में 'आंधी' फिल्म पर इसलिए पाबंदी लगा दी गई थी, क्योंकि उसमें सुचित्रा सेन के चरित्र में कुछ लोगों को इंदिरा गांधी की झलक दिखाई दे रही थी। और 'शूल' फिल्म का बिहार में प्रदर्शन तभी हुआ, जब आरजेडी के एक नेता ने उसे इजाजत दी। इसी तरह का विरोध अक्सर कुछ किताबों या नाटकों के मंचन के मामलों में भी नजर आता है।
इस विरोध के पीछे कौन सा मनोविज्ञान काम करता है? एक कारण तो यह है कि पिछले कुछ समय से कंट्रोवर्सी और विरोध पब्लिसिटी का सबसे अच्छा तरीका साबित हो रहा है। आप खुद कुछ नहीं कर रहे हैं, पर यदि कहीं कुछ हो रहा है तो उसका विरोध कर आप खुद भी रोशनी में आ जाते हैं। या आप कुछ कर रहे हैं, मगर उसे कोई देख नहीं रहा, तो भी कंट्रोवर्सी आपको दूसरों की नजर में ला देती है। इसीलिए कंट्रोवर्सी आज की पीआर एजेंसियों का सबसे भरोसेमंद हथियार है।
लेकिन राजनीतिज्ञों के मामले में इसका एक कारण उनके भीतर बसा असुरक्षा बोध भी होता है। हमारे अनेक राजनीतिज्ञ भयानक रूप से असुरक्षा बोध से ग्रस्त हैं। असल में वे अपनी निष्ठा या वैचारिक समझ के कारण जनता के बीच नहीं टिके होते, बल्कि एक सम्मोहन के कारण होते हैं, जो वे अपनी लफ्फाजी से पैदा करते हैं। वे जनता को भ्रमित कर उसे अपना अनुयायी या समर्थक बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए जैसे ही कोई ऐसी ताकतवर चीज आती है, जो जनता की आंखें खोल सकती है, तो वे डर जाते हैं और किसी न किसी बहाने उसका विरोध शुरू कर देते हैं। वे नहीं चाहते कि लोग किसी मुद्दे पर दूसरे ढंग से भी सोचें। किताबें, फिल्में या थिएटर उन्हें दूसरे ढंग से सोचने का रास्ता दिखा देते हैं।
इस ब्लॉग पर केवल ऐसी ख़बरें लेने की कोशिश है जिनकी चर्चा कम हुई है। यह बहुभाषी मंच एक कोशिश है भोजपुरी और मैथिली फ़िल्मों से जुड़ी ख़बरों को भी एक साथ पेश करने की। आप यहां क्रॉसवर्ड भी खेल सकते हैं।
Tuesday, August 9, 2011
Saturday, August 6, 2011
गढ़वाली फिल्मों के निर्माण को बढ़े कदम
शिव आराधना स्टुडियोज एवं उज्जवल फिल्मस मुंबई जल्द ही उत्तराखंडी फिल्मों का निर्माण शुरू करेगा। इसके लिए 25 अगस्त से राज्य के प्रत्येक जिले में कलाकारों का टेस्ट लिया जाएगा। शुक्रवार को गांधी रोड स्थित एक होटल में आयोजित पत्रकार वार्ता में शिव आराधना स्टुडियोज के अजय मधवाल ने बताया कि तमिल फिल्मों में बतौर अभिनेता काम करने के बाद उन्होंने उत्तराखंडी फिल्म निर्माण की ओर कदम बढ़ाए हैं। उज्जवल फिल्मस के उज्वल राणा भी टेलीविजन धारावाहिकों व बॉलीवुड फिल्मों के निर्माण व निर्देशन से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्म निर्माण के लिए प्रदेश के जाने-माने गीतकार व संगीतकारों ने अपनी सहमति जतायी है। फिलहाल उन्होंने फिल्म से जुड़े अन्य पहलुओं का खुलासा करने से इनकार कर दिया है। अभी फिल्म की स्टार कास्ट व अन्य चीजें तय नहीं की गई हैं। गौरतलब है कि उज्जवल राणा मूलता टिहरी व अजय मधवाल मूलत पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं। मधवाल दक्षिण भारत की तमिल फिल्मों में बतौर अभिनेता काम कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि फिल्म में सभी कलाकारों का चयन स्थानीय स्तर पर ही किया जाएगा। इसके लिए पचीस अगस्त से ऑडिशन की प्रक्रिया आरंभ कर दी जाएगी। स्टुडियोज की ऑडिशन टीम 23 अगस्त को देहरादून पहुंचेगी। सितम्बर तक ऑडिशन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद ही फिल्म का निर्माण शुरू हो पाएगा(राष्ट्रीय सहारा,देहरादून,6.8.11)।
Monday, August 1, 2011
बड़े काम की है ये बॉडी
अभी कुछ साल पहले सैफ दिल के हाथों मजबूर हो कर अस्पताल में पहुंच गये थे। इसके बाद से उन्होंने अपने ट्रेनर चौरसिया के सुझाव पर ही अपनी बॉडी को मेंटेन कर रखा है। आमिर और सैफ अली खान जैसे कई हीरो के निजी ट्रेनर हैं।
सनी देओल, संजय दत्त, सलमान खान, इमरान हाशमी, आमिर खान और शाहरुख के बाद अब अजय देवगन की बारी है। सिंघम में अपने सिक्स पैक जिस्म के साथ जब वह परदे पर आराजक तत्वों को सबक सिखाते नजर आते हैं, तो स्वभाविक तौर पर उनकी जिस्मानी ताकत को दर्शकों का एक मौन समर्थन मिलता है। असल में हिंदी फिल्मों में नायक का जिस्म शुरू से ही बहुत अहम बना हुआ है। इसके लिए फिल्म के एक लोकप्रिय दृश्य का उदाहरण देना काफी होगा। रात्रि का पहला पहर। अचानक एक साया छत पर नजर आता है। दूर से एक ट्रेन आ रही है। जैसे ही ट्रेन एक घर के बगल से गुजरती है, वह साया छज्जे के सहारे लगे एक पटरे की मदद से छलांग लगाता है और पलक झपकते चलती ट्रेन में कूद पड़ता है। काफी देर से सांस रोक कर बैठी पब्लिक अब अपने आपको रोक नहीं पाती है। हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है। यह था फिल्म फूल और पत्थर का दृश्य। साया था धर्मेन्द्र का। वषरे पहले प्रदर्शित इस फिल्म का यह दृश्य आज भी दर्शकों के जेहन में एक रोमांच भर देता है।
यह उन गिनी-चुनी फिल्मों में से एक है, जिसमें नायक शाका (धर्मेन्द्र) के जिस्म की भरपूर नुमाइश मौजूद थी। सच तो यह है कि अभिनेता धर्मेन्द्र ही नहीं दूसरे कुछ अन्य नायकों ने वर्षों अपने इस जिस्मानी सौंदर्य के सहारे फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया है। आज के कई नायक भी मौका मिलते ही अपने मसल्स दिखाने में पीछे नहीं हटते। पिछले दिनों दबंग और रेडी में सलमान ने अपना जिस्म खूब दिखाया। फिल्म ओम शांति ओम में किंग खान का सिक्स पैक एब्स भी खूब चर्चा में आया था। जोधा अकबर में अकबर बने हृतिक ने भी बहुत शानदार ढंग से अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन किया।
अभी भी फिल्म गजनी में आमिर का सुगठित देह सभी के लिए जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। ट्रेड पंडित आमोद मेहरा कहते हैं, ‘अब दर्शकों को यह कतई पसंद नहीं है कि उनका नायक सिर्फ नायिका को पटाने में ही अपना समय खर्च करे।’ ठीक भी है, मैंने प्यार किया से लेकर रेडी तक का नायक सलमान भी दर्शकों को इसलिए पसंद आता है, क्योंकि वह अपने शारीरिक शक्ति और क्षमता के सहारे नायिका को पाना चाहता है। फिल्म मैंने प्यार किया को याद कर इसके निर्देशक सूरज बड़जात्या बताते हैं, ‘इसके कई दृश्यों में सलमान को कसरत करते हुए दिखाकर मैं सिर्फ यह बताना चाहता था कि नायक अपनी जिस्मानी ताकत को बढ़ाने के लिए भी सजग है ताकि मारपीट के दृश्यों में उसकी करतबबाजियां कृत्रिम न लगें।’
सिगरेट छोड़नी पड़ेगी
अब यह अहम सवाल उठता है कि बेहद अनियमित जीवन जीनेवाले हमारे हीरो कैसे अपने शरीर को मेंटेन करते है। सितारों के शरीर का जो फिजिकल ट्रेनर ध्यान रखते हैं, उनकी भी एक लंबी सूची है। इनमें सत्यजित चौरसिया का नाम इन दिनों सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। उनके बाद विक्रम कपूर, दिलीप हेवले, मिकी मेहता, प्रशांत सावंत, नीलेश निखंज आदि कई व्यस्त ट्रेनर हैं। इनमें से प्रत्येक का मुंबई के विभिन्न अंचल में अपना जिम है। उनके जिम में पूरे दिन छोटे-बड़े फिल्मवालों के चेहरे नजर आ जाते हैं। सत्यजित चौरसिया का लोखंडवाला में स्थित जिम बारबेरियन सितारों के बीच काफी लोकप्रिय है। वह आमिर और सैफ अली खान जैसे कई हीरो के निजी ट्रेनर भी हैं। अभी कुछ साल पहले सैफ दिल के हाथों मजबूर हो कर अस्पताल में पहुंच गए थे। इसके बाद से चौरसिया के सुझाव पर ही अपनी बॉडी को मेंटेन कर रखा है।
चौरसिया बीमारी को एक साधारण सी बात मानते हैं। उनके मुताबिक यदि आप सही ढंग से व्यायाम करें, तो ता-उम्र आप हमेशा स्वस्थ रह सकते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे सितारों को डॉक्टर जो हिदायत देता है, मैं उसी के मुताबिक सितारों के व्यायाम में रद्दोबदल करता हूं। यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे कई सितारे मेरे सारे सुझाव पर अमल करते हैं। अब जैसे कि सैफ ने सिगरेट पीना लगभग बंद कर दिया है। फिल्मवालों के एक और ट्रेनर विक्रम कपूर बताते हैं, ‘सितारों का लाइफस्टाइल, सोने और जागने का समय उनके अस्वस्थ होने की एक बड़ी वजह बन जाती है। किसी रोल के लिए अपनी बॉडी मेंटेन करने के लिए वह जिस तरह का बलिदान करते हैं, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। इनमें से कई तो आउटडोर में शूटिंग में अपने फिटनेस का सामान ले जाते हैं। हां, कई बार फिल्म पूरी होने के बाद उनका यह नियम भंग होता है। कई बार दूसरे काम में उलझ जाने की वजह से भी होता है। कुछ उनकी खुद की अनियमितता भी होती है। पर जब स्टारडम का सवाल आता है, तो वह बहुत कुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। हां, एक बात जरूर कहना चाहूंगा, शराब पीने के अगले दिन व्यायाम करके आप अतिरिक्त कैलौरी को बाहर निकाल सकते हैं। पर ज्यादा सिगरेट पीने से उत्पन्न बीमारी का मुकाबला किसी भी तरह के व्यायाम से संभव नहीं है। इसलिए मेरी यह पहली शर्त होती है कि यदि आपको अपना शरीर फिट रखना है, तो सिगरेट छोड़ना पड़ेगा।’
डोले शोले, धोबी पछाड़
वाकई में यह अटपटा लगता है, पर हिंदी फिल्मों में पतले-दुबले नायकों द्वारा दर्जन भर गुडों की पिटाई कोई नई बात नहीं है। सिंघम में जिस तरह से अजय देवगन कई गुडों को घोबी-पछाड़ लगाते हैं, आम जिंदगी में वह बहुत असहज लगता है। इसे सहज बनाने के लिए ही आमिर ने गजनी, सलमान ने बॉडीगार्ड, अजय ने सिंघम फिल्मों के लिए विशेष तैयारी की।
दूसरी और अक्षय कुमार, हृतिक रोशन जैसों की सफलता में उनकी कद-काया की अहम भूमिका है। ये दोनों ही अपने कठिन एक्शन दृश्यों को अंजाम देकर जिस्मानी करतब का एक नायाब उदाहरण पेश करते हैं। पचास के ऊपर हो चुके संजय दत्त इस चर्चा का विशेष हिस्सा हैं। कभी पहलवान नायक के तौर पर मशहूर और संजय दत्त के घनिष्ठ मित्र सुनील शेट्टी बताते हैं, ‘मेरी तरह बाबा भी अपने शरीर को लेकर बहुत गंभीर है। उसने भी अपनी बॉडी को बहुत मेहनत से बनाया है। शायद यह भी एक बड़ी वजह है कि एक्शन दृश्यों में वह खूब फबता है।’
गंभीर परिणाम ला सकती है लापरवाही
हृतिक बेहिचक मानते हैं कि करण अर्जुन की शूटिंग के समय से ही वह सलमान के कसरती जिस्म के प्रशंसक रहे हैं। बाद में एक-दो बार की बीमारी के बाद उन्होंने इस बात को अच्छी तरह से समझा है कि सेहत के प्रति लापरवाही कितने गंभीर परिणाम ला सकती है। वो कहते हैं, ‘मैं जबसे अपनी फिटनेस को लेकर सचेत हुआ, इसका सबसे बड़ा लाभ मुझे यह मिला कि किसी भी तरह के रोल को मैं आसानी से कबूल कर सकता हूं। इसके लिए मुझे कम-से-कम अपनी बॉडी की तैयारी नहीं करनी पड़ती। मेरा शरीर हर तरह के रोल के साथ फिट हो जाता है। यहां तक कि मैं किसी रोल के लिए यदि पांच-छह किलो वजन घटा भी लूं, तो मेरा शरीर उसे आसानी से एक्सेप्ट कर लेता है।’ मंहगे ट्रेनर और डॉयटिशियन के संरक्षण में रहकर यह बात और भी आसान हो जाती है।
कैसे करते हैं मेंटेन
सलमान की बॉडी की सबसे ज्यादा तारीफ होती है। उनके ट्रेनर सत्यजित चौरसिया बताते हैं, ‘सलमान कसरत अपने घर के जिम में ही करते हैं। इस मामले में वह बहुत सजग हैं। इसलिए वह जिस तरह की फिल्में करते हैं, उसके लिए उन्हें कुछ ज्यादा तैयारी करनी नहीं पड़ती है। वैसे वह कभी-कभी लोखंडवाला पर मेरे जिम में भी चले आते हैं। कार्डियो वस्कुलर व्यायाम में उनका जवाब नहीं। उनका शरीर इस कसरत को बहुत सहज ढंग से मैनेज करता है। मैंने उन्हें बहुत करीब से कसरत करते हुए देखा है। मैं उनकी बॉडी मेंटनेस का कायल हूं।’ इस प्रसंग में सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि शाहिद, रणबीर कपूर, इमरान खान जैसे चॉकलेटी हीरो भी अब बॉडी को लेकर बहुत सचेत हैं। शाहिद बताते हैं, ‘मैं अपने ऊपर चॉकलेटी हीरो की कोई इमेज नहीं लादना चाहता। इन दिनों मैं नयमित रूप से जिम जाता हूं। अब मैं एक प्योर एक्शन फिल्म करना चाहता हूं।’ कमीने के बाद अपनी आने वाली फिल्म मौसम में भी उन्होंने कई एक्शन दृश्यों को अंजाम दिया है। वैसे कई नायक भले ही इस बात को स्वीकार न करें, पर सभी जानते है कि उनके प्रेरणास्रोत सनी देओल, सलमान खान, सुनील शेट्टी जैसे नायक रहे हैं।
धर्मेन्द्र और बिग बी भी
सलमान से थोड़ा ध्यान हटाएं तो 73 के गरम धरम आज भी हल्का-फुल्का व्यायाम नियमित करते हैं। लेकिन इस मामले में अमिताभ इस उम्र में भी अपने पुत्र से ज्यादा गंभीर हैं। उनके करीबी कर्मियों से मिली जानकारी के मुताबिक बहुत सुबह उठ कर वह अपने जुहू स्थित बंगले जलसा के पास मौजूद पंच सितारा होटल के हेल्थ कल्ब में या हॉली डे इन के स्पा में जाकर व्यायाम करते हैं। यदि ऐसा संभव नहीं हुआ तो वह प्राणायाम के साथ ही अपने बंगले के प्रांगण में थोड़ा टहल लेते हैं। नाना पाटेकर आज भी एक्शन दृश्यों में काफी परफेक्ट हैं। नाना बताते हैं, ‘कोई भी व्यायाम अपनी उम्र और शरीर को ध्यान में रखकर करना चाहिए।’
गलती सुधार सकते हैं जॉन
कई नायक गलत तरह की फिल्मों में उलझ कर अपनी अच्छी बॉडी का उपयोग नहीं कर पाते हैं। जॉन इसके एक अच्छे उदाहरण हैं। प्रसिद्घ एक्शन डायरेक्टर टीनू वर्मा कहते हैं, ‘जॉन के पास अब भी वक्त है, अक्की की तरह जॉन को भी अभिनय के साथ ही एक्शन दृश्यों में भी अपनी बॉडी का पूरा उपयोग करना चाहिए।’ अब लगता है कि अपनी आनेवाली फिल्म फोर्स में जॉन ने इस भूल को सुधारने की कोशिश की है। फोर्स में जॉन का पोस्टर शर्टलेस फिल्माया गया है, जिसमें वह गजब के लगते हैं।
शाहिद के सिक्स पैक्स
फिल्म कमीने की चर्चा के दौरान जब निर्देशक विशाल भारद्वाज ने शाहिद के सामने सिक्स पैक्स का आइडिया रखा तो वह एकदम चौंक गए। अंदर से वह काफी उत्सुक थे, लेकिन समस्या ये भी थी कि इससे पहले शाहिद जिम की कठिन प्रैक्टिस से कभी नहीं गुजरे थे। बस फिर क्या था। शाहिद के जिस्म को एक नया रंग-रूप देने में सब जुट गए। उनके ट्रेनर ने उन्हें सख्त निर्देशानुसार एक प्लान डाइट पर रखा(असीम चक्रवर्ती,हिंदुस्तान,दिल्ली,1.8.11)।
Sunday, July 17, 2011
सिनेमाई प्रयोग में खो रहे बॉलीवुड से खलनायक
बॉलीवुड फिल्मों में प्रयोगों के चलते खलनायक खत्म होते जा रहे हैं। नो वन किल्ड जेसिका, यमला पगला दीवाना, धोबी घाट, सात खून माफ, तनु वेड्स मनु, चलो दिल्ली, रागिनी एमएमएस से लेकर डेल्ही बेली और जिंदगी ना मिलेगी दोबारा.. तक ये इस साल की ऐसी चर्चित फिल्में हैं जिनमें खलनायक की जरूरत महसूस ही नहीं होती। जबकि ये फिल्में अपनी कहानी अथवा मेकिंग में किसी न प्रयोग के लिए चर्चा में रही हैं। खलनायक की छवि वाले चेहरे पहले ही गुम हो चुके हैं। हालांकि अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, आमिर खान, अक्षय कुमार, रितिक रोशन, सलमान खान, विवेक ओबराय, संजय दत्त, सैफ अली खान, जॉन अब्राहम जैसे दिग्गज अभिनेताओं ने नकारात्मक भूमिकाओं को निभाने से गुरेज नहीं किया। इसके बावजूद अब ऐसी भूमिकाओं की जरूरत नहीं दिख रही। एक वक्त था जब पटकथा लेखक खास तौर पर विलेन का किरदार लिखते थे। मगर समय के साथ बॉलीवुड की फिल्मों में किरदारों की भूमिका में भी काफी बदलाव आया है। पिछले कुछ वर्षो में थ्री इडियट्स का रैंचो हो या दबंग का चुलबुल पांडे और माइ नेम इज खान का रिजवान खान, असल जिंदगी की हकीकत के ये इतने नजदीक हैं दर्शक को कहानी में अलग से किसी नायक या खलनायक की जरूरत महसूस नहीं होती। जबकि इनसे पहले नायकों को दर्शक खल भूमिकाओं में स्वीकार चुके हैं। धूम 2 में चोर की भूमिका निभाने वाले रितिक दर्शकों का दिल चुराने में कामयाब थे। डर, अंजाम और डॉन में शाहरुख और खाकी, काल, दीवानगी में अजय देवगन खलनायक के किरदारों को निभाने से गुरेज नहीं किया। ओंकारा में लगड़ा त्यागी का किरदार निभाकर सैफ ने खूब वाह-वाह लूटी थी। हीरोइनें भी नकारात्मक भूमिका में वाहवाही लूट चुकी हैं। खाकी में ऐश्र्वर्या राय, गुप्त में काजोल, गॉड मदर में शबाना आजमी, एतराज में प्रियंका चोपड़ा और फिदा में करीना कपूर ने भी इस किरदार में अपने जलवे दिखाए। बैड मैन के नाम से मशहूर गुलशन ग्रोवर कहते हैं फिल्मों से विलेन तो अब गायब ही हो गए हैं। चुनिंदा फिल्मों में ही विलेन के लिए कुछ गुंजाइश बची है। हालिया रिलीज डेल्ही बेली, मर्डर-2 भी प्रयोगात्मक फिल्म हैं। इसमें भी खलनायक की आवश्यकता महसूस नहीं की गई। वैसे रोचक तथ्य यह है कि आमिर धूम 3 वहीं विवेक ओबराय कृष 2 में नकारात्मक भूमिका में नजर आएंगे। वहीं बीते जमाने के खलनायक कादर खान, गुलशन ग्रोवर और शक्ति कपूर कॉमेडी में हाथ आजमा रहे हैं। जब वी मैट के निर्देशक इम्तियाज अली स्वीकार करते हैं कि खलनायक अब गायब होते जा रहे हैं। जैसे-जैसे सिनेमा वास्तविक के करीब होता जाएगा इन किरदारों में निश्चित रूप से परिवर्तन आएगा(दैनिक जागरण,दिल्ली,17.7.11)।
Friday, July 8, 2011
नए सिनेमा के मणि
अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यम हैं तो अपने आप में स्वतंत्र और काफी समृद्ध भी पर इनके आपस के सरोकार और संबंध इस कारण पूरी तरह अलगाए या खारिज नहीं किए जा सकते। इस लिहाज से माना यही जाता है कि ये माध्यम स्वतंत्र जरूर हैं पर स्वायत्त या पूरी तरह मुक्त नहीं। तभी तो रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर प्रेमचंद तक को सेल्यूलाइड तक ले जाने वाले सत्यजीत रे आजीवन यह मानते और समझाते रहे कि वह किसी भी कृति पर फिल्म बनाने की शुरुआत नए सिरे से करते हैं। उनका तकाजा विधा बदलने के साथ कृति के आस्वाद को बदल जाने की जरूरत को खारिज नहीं करता जबकि मणि कौल जैसे फिल्मकार इस तकाजे को दरकिनार कर न सिर्फ कृति को केंद्र में लाये बल्कि साहित्यक रचनाओं के फिल्मांकन का नया व्याकरण भी रचा। कौल अब हमारे बीच नहीं हैं पर 66 वर्ष का उनका जीवन और उस दौरान की उनकी उपलब्धियां हमारे बीच हैं। गाली-गलौज, आइटम नंबर और बोल्डनेस की नई कायिक और भाषिक समझ के बीच जिस भारतीय सिने जगत का कद आज ग्लोबली तय हो रहा है, उसमें मणि कौल के फिल्म बनाने के तरीके और उससे जुड़े सरोकार जलती मशाल की तरह हैं जिससे अंधकार और भटकाव के दौरान हम रोशनी पा सकते हैं। दिलचस्प है कि कौल का फिल्मी सफर निर्देशन के बजाय राजेंद्र यादव की कहानी ‘सारा आकाश’ में अभिनय से शुरू हुआ था। यह आगाज ही साहित्य से उनको आगे और गहरे जोड़ते चला गया। ‘घासीराम कोतवाल’, ‘आषाढ़ का एक दिन, ‘दुविधा’ जैसे इंडियन क्लासिक्स से लेकर दोस्तोवस्की की ‘इडियट’ जैसी महान रचना का फिल्मांकन भी उन्होंने किया। कौल की यह खासियत तो रही ही कि वह साहित्यिक कृतियों की मूलात्मा को फिल्म में भी बहाल रखना चाहते थे, उन्होंने प्रचलित और लोकप्रिय कथारूपों के बजाय विभिन्न शैलियों की रचनाओं पर काम करने का जोखिम भी उठाया। जिस मुक्तिबोध पर बोलते और लिखते हुए आज भी हिंदी साहित्य के दिग्गजों तक के पसीने छूटते हैं, कौल ने उनकी ‘सतह से उठता हुआ आदमी’ को परदे पर उतारने का चैलेंज न सिर्फ लिया बल्कि उसे बखूबी पूरा भी किया। कौल के काम करने के ढंग और उनके सरोकारों के जानकार नए भारतीय सिनेमा के इस बड़े हस्ताक्षर को उनके सौंदर्यबोध के लिए भी याद करते हैं। यह अलग बात है कि यह सौंदर्यबोध सनसनी उभारने के बजाय संवेदना के आत्मिक स्पर्श का धैर्य लिये थे। यही कारण है कि कौल के कई आलोचक यह भी कहते रहे हैं कि उनके साहित्य प्रेम ने उन्हें कभी सौ फीसद फिल्मकार बनने ही नहीं दिया। क्योंकि कैमरे में क्या बेहतर और कितना समा सकता है, इसके उसूलों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। अलबत्ता यह भी है कि लैंस की नजरों पर भरोसा करने वाले उसे पीछे से देख रही मानवीय आंखों के चढ़ते-उतरते पानी को अगर खारिज कर सकते हैं तो उन्हें कौल जैसे फिल्मकार को ज्यादा समझने का खतरा भी नहीं लेना चाहिए। दरअसल, कौल इन्हीं आंखों को नम और चमक से भर देने वाले फिल्मकार थे(राष्ट्रीय सहारा,8.7.11)।
Monday, July 4, 2011
सेंसर बोर्ड को सुनाई नहीं देते अश्लील गाने
हाल ही में आमिर खान की फिल्म "डेल्ही बेली" के गाने "डी के बोस भाग रहा है" के बोल भद्दे और अश्लील होने के बावजूद बेहद चर्चित हो रहे हैं। डेल्ही बेली का यह गाना पिछले एक महीने से भाग रहा है और अब इतना भाग चुका है कि उसकी रफ्तार को अब यदि थाम भी लिया जाए तो कुछ होने वाला नहीं है। सीधे-सीधे कहें तो गाली के बोल जैसी प्रतिध्वनि वाले डीके बोस गीत पर अब हो-हल्ला मचाने का कोई औचित्य नहीं रह गया है क्योंकि यह गाना न केवल टेलीविजन चैनलों और एफएम रेडियो के जरिए जबर्दस्त हिट हो चुका है बल्कि इसकी अच्छी- खासी चर्चा मीडिया में भी हो रही है। वैसे देर-सवेर जागे सूचना मंत्रालय ने सेंसर बोर्ड को इस गीत को पास करने की बाबत जवाब तलब किया है।
सूचना मंत्रालय ने सेंसर बोर्ड से पूछा है कि आखिर कैसे इस गाने को पास कर दिया गया जबकि इस गाने में साफ तौर पर गालियों की भरमार है। बेशक, किसी को ये गालियां भले ही न पसंद आई हों पर आमिर खान को खूब पसंद आई हैं। तभी तो आमिर इस गाने को और लोकप्रिय बनाने के लिए एक पार्टी का आयोजन करने जा रहे हैं। सवाल उठता है कि आमिर खान इस भोंडे गाने को जनता के सामने पेश कर क्या सिद्ध करना चाहते हैं। "डेल्ही बेली" में अब इस गीत के बोल कुछ बदल भी दिए जाएं तब भी कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि इस गाने की बदौलत फिल्म को जितनी पब्लिसिटी मिलनी थी, वह मिल चुकी है। सूचना मंत्रालय भी हमेशा की तरह तब लाठी चलाता है जब सांप बिल में घुस चुका होता है।
हैरानी की बात तो यह है कि इस तरह के अश्लील गाने का यह अकेला मामला नहीं है, इससे पहले भी कई गाने बाजार में आ चुके हैं जिन्हें सेंसर बोर्ड बड़ी आसानी से पास कर चुका है। इसके बावजूद सूचना मंत्रालय तमाशबीन बनकर देखता रहा है। तीसमार खां के गाने को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। शीला की जवानी गाना फिल्म के आने से पहले ही काफी हिट हो चुका था, जिसके चलते देश में शीला नाम की युवतियों को शर्मिंदा होना पड़ा था। शर्मिंदा होने का कारण था नाम को गलत तरीके से पेश करना। शीला नाम की युवतियों पर युवकों ने गाने के बहाने फब्तियां कसनी शुरू कर दी थीं।
वहीं फिल्म "दबंग" का गाना "मुन्नी बदनाम हुई" भी विवादों के साए में चर्चित हो गया। हमारे देश के अलावा पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी मुन्नी नाम की कई महिलाओं ने एतराज जताया। पाकिस्तान की मुन्नी नाम की एक महिला, जो अपने घर में दुकान चलाती थी, को गाने के हिट होने के बाद कई दिनों तक अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। फिल्मों में छोटे-छोटे दृश्यों को लेकर हल्ला मचाने वाले सेंसर बोर्ड को इन गानों की भद्दी गाली कैसे सुनाई नहीं दी। वैसे भी सेंसर बोर्ड पिछले कुछ सालों से उदार बना हुआ है(धनीश शर्मा,नई दुनिया,4.7.11)।
Thursday, June 30, 2011
Saturday, June 18, 2011
अब लीजिये भोजपुरी में 'देवदास' का मज़ा
अब भोजपुरी भाषा में भी जल्द 'देवदास' फिल्म रिलीज़ होने जा रही है। शुक्रवार को इस फिल्म का संगीत भी लांच कर दिया गया। यह फिल्म दो घंटे सत्रह मिनट की है।
12 अगस्त को यह फिल्म एक साथ बिहार, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और पडो़सी देश नेपाल में रिलीज़ होगी। फिल्म के निर्देशक किरणकान्त वर्मा ने बताया कि इस पूरी फिल्म को एक महीने में ही शूट किया गया है। यह फिल्म पूरी तरह से शरतचंद के उपन्यास देवदास पर आधारित है। जैसा उपन्यास में लिखा गया है वैसा ही फिल्म में देखा जा सकेगा।
पटना, गुजरात व मुम्बई में हुई है शूट
फिल्म की शूटिंग पटना, गुजरात और मुंबई के कई लोकेशनों पर की गई है। मूल रूप से बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले फिल्म निर्देशक केके वर्मा ने बताया कि अब तक 'देवदास' टाईटल की छह फ़िल्में बन चुकी हैं। ये सभी शरत जी के उपन्यास पर आधारित हैं। जिसमें तीन हिंदी में, दो बंगाली में और एक कन्नड़ में बनी हैं। भोजपुरी में बनी यह फिल्म इस कड़ी में सातवीं होगी। इस फिल्म में पटना की रहने वाली अक्षरा सिंह ने पारो का रोल निभाया है। पटना के कंकड़बाग़ कॉलोनी में रहने वाली अक्षरा की यह दूसरी भोजपुरी फिल्म होगी। बंगाली टर्न्ड भोजपुरी अभिनेत्री मोनालिसा इस देवदास में चंद्रमुखी का किरदार निभा रही हैं।
रविकिशन बने हैं 'देवदास', नहीं होगी फिल्म अश्लील
चर्चित अभिनेता रविकिशन इस भोजपुरी फिल्म के देवदास बने हैं। फिल्म में संगीत दिया है पटना स्थित महेन्द्रू इलाके के निवासी बैजू बंसी ने। उमेश सिंह फिल्म के प्रोडूसर हैं। अवधेश अग्रवाल सह-प्रोडूसर। फिल्म के निर्देशक केके वर्मा ने दावा किया है कि यह फिल्म पूरी तरह से परिवार के संग देखने लायक है, जिसमें कहीं भी कोई अश्लीलता नहीं होगी। फिल्म में करीब 10 गानें हैं, जिन्हें उदित नारायण, साधना सरगम, सपना अवस्थी जैसे चर्चित हस्तियों ने आवाज़ दी है।
(दैनिक भास्कर,18.6.11)
Saturday, June 11, 2011
गूगल से भी तेज सर्च करें एमपी 3 गाने
मनपसंद गाने सुनने के लिए गूगल पर दिखाई देने वाली हजारों वेबसाइट्स में से सिलेक्शन मुश्किल होता है। एनआईटी के विद्यार्थियों ने ऐसा सर्च इंजन बनाया है जहां दुनियाभर की वेबसाइट के गाने एक ही जगह सुने जा सकेंगे।
गूगल पर आने वाली ज्यादातर वेबसाइट पर गाने की जगह विज्ञापन होते हैं। कई वेबसाइट गाना सुनाने के पैसे लेती हैं। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) सूरत के विद्यार्थियों ने इंदौर एजुकेशन सेंटर सीडेक के प्रोजेक्ट के तहत यह सर्च इंजन बनाया है। इसमें मीडिया प्लेयर भी जोड़ा है। वेबसाइट को रिफ्रेश करने पर बिना रुकावट गाने सुने जा सकते हैं।
स्टूडेंट्स बताते हैं सर्च इंजन पर ऐसी साइट आएंगी ही नहीं, जिन पर गानों के केवल नाम दिए गए हैं। वे बताते हैं एनआईटी सूरत ने इंदौर में ट्रेनिंग के लिए भेजा है। छह महीने की मेहनत से सर्च इंजन बनाया है। प्रोजेक्ट आईआईटी पवई में रिसर्च पेपर के रूप में भेजा है। फैकल्टी एडवाइजर मनीष अरोरा ने बताया इंदौर से शुरू हुआ यह एकमात्र सर्च इंजन होगा जो एमपी3 गाने सर्च करने में गूगल से फास्ट है।
कम्प्यूटर साइंस के विद्यार्थी अली अब्बास मैनेजर, नील जिनवाला और पूरव मास्टर ने www.beta.mgoos.com सर्च इंजन बनाया है। इसमें जावा प्रोग्रामिंग के जरिये ऐसा ऑटोमेटिक सिस्टम बनाया गया है जो दुनियाभर के एमपी3 गानों को एक वेबसाइट से जोड़ता है। वायरस वाली या बिना काम की साइट्स इग्नोर कर दी जाएंगी(दैनिक भास्कर,इन्दौर,11.6.11)।
Wednesday, June 8, 2011
बड़े पर्दे पर चमकेंगे बाबा और अन्ना!
बॉलीवुड अब अपनी फिल्मों के लिए असल जिंदगी की शख्सियतों से पे्ररणा ले रहा है। लोकपाल विधेयक मामले में सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर करने समाजसेवी अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार तथा कालाधन मामले में सरकार की नाक में दम करने वाले योग गुरु बाबा रामदेव फिल्मकारों के लिए नजीर बन रहे हैं। बाबा के बहुत नजदीकी माने जाने वाले 16 दिसंबर, रुद्राक्ष और नॉक आउट जैसी फिल्मों के निर्देशक मणि शंकर उनके जीवन पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस फिल्म में वह संजय दत्त को लेंगे। संजू उनके अच्छे मित्र माने जाते हैं। क्या संजय दत्त फिल्म में बाबा की भूमिका निभाएंगे? मणिशंकर कहते हैं कि इस बारे में मैं अभी आपको कुछ नहीं बता सकता। उन्होंने कहा, मैं यह नहीं कह सकता कि वह (संजय दत्त) फिल्म में कौन सी भूमिका निभाएंगे। फिलहाल शंकर बाबा द्वारा चलाए जा रहे अभियान पर पूरी जानकारी इकट्ठा करने में जुटे हैं। फिल्म में शनिवार रात को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा और उनके समर्थकों के खिलाफ सरकार के बर्बरतापूर्ण रवैये को भी दिखाया जाएगा। अन्ना से प्रेरणा : निर्देशक इशराक शाह इन दिनों एक बुरा आदमी नाम से फिल्म बना रहे हैं। फिल्म में रघुवीर यादव एक समाज सेवी की भूमिका निभा रहे हैं, जो अन्ना हजारे के जीवन से पे्ररित है। हालांकि शाह इस बात से पर्दा उठाने को राजी नहीं हैं कि फिल्म में रघुवीर यादव का किरदार अन्ना हजारे से मिलता है। उन्होंने कहा, रघुवीर जी का किरदार अन्ना हजारे जैसा है या नहीं, यह फिल्म के प्रदर्शन के बाद पता चलेगा। मैं सिर्फ यह कह सकता हूं कि वह (रघुवीर यादव) एक समाजसेवी की भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म की शूटिंग उदयपुर में चल रही है। फिल्म से जुड़े सूत्रों की मानें, तो रघुवीर अन्ना हजारे के रोल में ही हैं। यह ऐसे समाजसेवी की कहानी है, जो चुनाव की राजनीति नहीं करता और सरकार के खिलाफ जागो भारत आंदोलन चलाता है। अरुणोदय सिंह फिल्म में रघुवीर के शिष्य की भूमिका में हैं, जो उनके आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं। फिल्म में ऐसा मोड़ भी आता है, जब रघुवीर यादव सरकार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं, ताकि लोग जागें(दैनिक जागरम,दिल्ली,8.6.11)।
Monday, June 6, 2011
कला में कोरा बॉलिवुड
नवभारत टाइम्स का मत
रीजनल सिनेमा से भी छोटा है उसका कद
इस बार के नैशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बॉलिवुड की फिल्मों ने तकरीबन दो दशक से कायम सिलसिले को ही दोहराया है। हिंदी की कुछ फिल्मों को पॉपुलर अवॉर्ड तो मिले हैं लेकिन मुख्य पुरस्कारों के मामले में उसकी झोली खाली ही रही है। हर बार की तरह मेन कैटिगरी के पुरस्कारों पर हिंदी के बजाय तमिल, मलयालम, मराठी और बांग्ला भाषा की फिल्मों का दबदबा है। अगर नैशनल फिल्म अवॉर्ड्स को कलात्मकता की एक कसौटी माना जाए तो हिंदी सिनेमा का इस पर खरा नहीं उतरना अफसोसजनक है।
सिनेमा का एक मकसद कई अर्थों में व्यावसायिक होते हुए सामाजिक उद्देश्यों को भी साधना है, लेकिन लगता है कि हिंदी सिनेमा इन्हें पाने में लगातार चूक कर रहा है। वैसे तो हिंदी फिल्में दर्शकों की नब्ज पकड़ने में काफी सफल मानी जाती हैं। हाल के वर्षों में गजनी, थ्री इडियट्स और दबंग जैसी हिंदी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कई रेकॉर्ड खड़े किए हैं। लेकिन जिस मर्म को भाषाई फिल्मकार पकड़ने में सफल रहे हैं, बॉलिवुड के लोग उसके पास भी नहीं फटक पा रहे हैं। मुंबइया मसालों की चाशनी में लपेटकर पेश की गई हिंदी फिल्में भारी कमाई भले ही कर ले रही हैं लेकिन कला की कसौटी पर उनकी नाकामी हॉलिवुड ही नहीं, क्षेत्रीय सिनेमा की चुनौती के आगे भी उन्हें बहुत छोटा साबित कर रही है। सामाजिक सरोकारों के प्रति अपने दायित्व और विषय चयन की अर्थवत्ता के मामले में रीजनल सिनेमा ने जो सतर्कता बरती है, बॉलिवुड अगर उसका दस फीसदी भी अपनी फिल्मों से जोड़ सके तो इससे हिंदी फिल्मों का कद बढ़ेगा।
वरिष्ठ फिल्मकार मुजफ्फर अली का मत
बॉलिवुड नहीं, अब इंडियन सिनेमा की सोचें
रीजनल सिनेमा के मुकाबले बॉलिवुड के पिछड़ेपन की एक अहम वजह यह है कि ज्यादातर हिंदी फिल्में हीरो-ओरिएंटेड होती हैं। विषयवस्तु से लेकर ट्रीटमेंट तक में ये फिल्में उसी ऊंचाई तक जा पाती हैं, जितनी हीरो की खुद की समझ होती है। यह बॉलिवुड की बुनियादी समस्या है और जब तक वह इससे बाहर नहीं निकलेगा, उसका उद्धार नहीं हो सकता। यह कहना सही नहीं है कि बॉलिवुड को नैशनल फिल्म अवॉर्ड की जरूरत नहीं है या वहां के फिल्मकार दर्शकों के मनोरंजनार्थ फिल्में बनाकर भरपूर कमाई करके असली मकसद तो पूरा कर ही रहे हैं।
असल में ऐसे अवॉर्ड्स सभी को चाहिए। इससे उनकी क्रेडिबिलिटी बढ़ती है। नैशनल अवॉर्ड देने वाली जूरी भी ईमानदारी से काम करती है और जो उसके सामने लाया जाता है, उसी में से वह सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करती है। पर अब हमें अपनी फिल्म इंडस्ट्री को बॉलिवुड-मॉलिवुड आदि खांचों में बांटने से परहेज करना चाहिए। मुंबइया बनाम रीजनल के बजाय अब हमें इंडियन सिनेमा की बात करनी चाहिए। अब चिंता इस बात की करनी चाहिए कि इंडियन सिनेमा की ग्लोबल प्रेजेंस कैसे बढ़े। इधर हमने स्पेशल इफेक्ट्स के मामले में महारत हासिल की है, पर हम स्क्रिप्ट राइटिंग और डिजाइनिंग आदि के मामले में हॉलिवुड से काफी पीछे हैं। इसमें भी सुधार करना चाहिए(नभाटा,21 मई,2011)।
Wednesday, June 1, 2011
वर्षों से मृत माने जा रहे अभिनेता राज किरण अटलांटा में मिले
फिल्म अभिनेत्री दीप्ति नवल ने पिछले महीने फेसबुक के जरिए अपने सह अभिनेता रहे मशहूर कलाकार राज किरण को खोजने की जो मुहिम शुरू की थी उसे अंजाम तक पहुंचाया है अभिनेता ऋषि कपूर ने। राज जीवित हैं और अमेरिका के अटलांटा में अपना इलाज करा रहे हैं। निर्माता-निर्देशक सुभाष घई की मशहूर फिल्म कर्ज में ऋषि कपूर ने राज किरन के पुनर्जन्म का किरदार निभाया था। राज किरण को हिंदी फिल्म जगत के ज्यादातर लोग मृत मान चुके थे और उनके सही सलामत होने की खबर पर फिल्म उद्योग ने खुशी जताई है।
सत्तर के दशक में कई हिट फिल्मों में काम करने वाले राज किरण के बारे में लोगों को हाल के दिनों तक कुछ पता नहीं था। कुछ अरसा पहले खबर ये भी आई थी कि राज किरण की मौत हो चुकी है। उनकी दिमागी हालत बिगड़ने का पहला किस्सा उनके स्टारडम के दिनों में ही तब सामने आया था, जब पुट्टपर्थी में सत्य साईं बाबा के आश्रम में उन्हें हिरासत में लिया गया था। वह तब बार-बार सत्य साईं के खिलाफ बातें किया करते थे और उन पर साईंबाबा की हत्या की कोशिश करने का आरोप भी लगा। राज किरण ने इसके बाद मुंबई के भायखला स्थित पागलखाने में लंबा वक्त गुजारा।
भायखला पागलखाने में ही हिंदी सिनेमा में उनके चंद शुभचिंतकों ने उनसे आखिरी मुलाकात की थी। बाद में हालत सुधरने के बाद राज किरण अमेरिका चले गए और वहां कुछ लोगों ने उन्हें न्यूयॉर्क में टैक्सी चलाते भी देखा। वहां से भी मे एक दिन एकाएक लापता हो गए। अभिनेता ऋषि कपूर भी दीप्ति नवल की तरह अरसे से राज किरण की तलाश में थे और हाल ही में अमेरिका की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने राज किरण के भाई गोविंद मेहतानी का पता तलाश कर उनसे मुलाकात की।
गोविंद ने ऋषि कपूर को बताया कि राज किरण जीवित हैं और अटलांटा के एक संस्थान में अपना मानसिक इलाज करा रहे हैं। राज किरण अपने इलाज के लिए आवश्यक रकम जुटाने के लिए इस संस्थान में ही काम भी करते हैं। सूत्रों के मुताबिक राज किरण की पत्नी और बेटे ने उन्हें उनके हाल पर बरसों पहले छोड़ दिया था और अपने भाइयों से मदद की आस में ही वह अमेरिका चले गए थे, लेकिन वहां भी उनका साथ किसी ने नहीं दिया।
ऩईदुनिया से बात करते हुए ऋषि कपूर ने कहा कि राज किरण को वह कभी भूल नहीं सकते और उनके बारे में मिली इस जानकारी ने उन्हें काफी परेशान भी किया है। वह राज के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हैं और ये भी चाहते हैं कि वह वापस हिंदी फिल्म जगत में लौटें। फिल्म निर्माता सुभाष घई के मुताबिक राज किरण की ये हालत शायद उन्हें अपेक्षित सफलता न मिल पाने की वजह से हुई। वह कहते हैं कि ग्लैमर जगत के इस पहलू को आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। राज की हालत के बारे में दुख जताते हुए घई ने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की है(नई दुनिया,दिल्ली,1.6.11)।
दैनिक जागरण की रिपोर्टः
बॉलीवुड में 70 और 80 के दशक के मशहूर अभिनेता राज किरण इन दिनों अमेरिका के एक पागलखाने में हैं। यह पता लगाया है उनके करीबी दोस्त ऋषि कपूर ने। राज किरण ने ऋषि की सुभाष घई निर्देशित सुपरहिट फिल्म कर्ज में उनके पूर्व जन्म के किरदार को निभाया था। महेश भट्ट की फिल्म अर्थ में शबाना आजमी और उन पर फिल्माया गया गाना, तुम इतना जो मुस्करा रहे हो.. आज भी लोग गुनगुनाते हैं। वह पिछले एक दशक से गायब हैं। ऋषि कपूर और दीप्ति नवल जैसे उनके मित्रों को छोड़कर प्राय: सभी उन्हें मृत मान लिया था। दीप्ति नवल ने पिछले दिनों फेसबुक पर भी राज किरण को खोजने के लिए एक पोस्ट किया था। उन्होंने लिखा, खबर थी कि राज को न्यूयॉर्क में कैब चलाते हुए आखिरी बार देखा गया था। उसके बाद ऋषि कपूर ने अपने दोस्त को खोजने की ठान ली। एक फिल्म की शूटिंग के लिए अमेरिका गए ऋषि कपूर ने वहां राज किरण के भाई गोविंद मेहतानी से मुलाकात की। उन्होंने पूछा कि राज अचानक कहां गायब हो गए? मेहतानी ने ऋषि को बताया कि राज किरण की दिमागी हालत ठीक न होने की वजह से वह अटलांटा के मेंटल हॉस्पिटल में हैं। बताया जाता है कि राज की पत्नी और बेटा उन्हें छोड़कर चले गए और वह इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। पारिवारिक जीवन में आए दूसरे संकटों की वजह से भी राज अवसाद से घिर गए। परिवार के बाकी सदस्यों ने भी राज की देखभाल नहीं की, शायद इसकी वजह उनका इलाज महंगा था। ऋषि ने कहा, यह काफी हृदय विदारक है। लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि वह जिंदा हैं। उनके जीवित होने की खबरों के बीच फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें वापस लाने की बातें कही जा रही हैं। निर्देशक सुभाष घई और महेश भट्ट ने कहा कि वह राज किरण को वापस लाने की कोशिश का हिस्सा बनने में खुशी महसूस करेंगे। दो दशक तक इस अभिनेता ने कागज की नाव, घर हो तो ऐसा, घर एक मंदिर, कर्ज, वारिस और अर्थ जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों में काम किया है।
दैनिक जागरण की रिपोर्टः
बॉलीवुड में 70 और 80 के दशक के मशहूर अभिनेता राज किरण इन दिनों अमेरिका के एक पागलखाने में हैं। यह पता लगाया है उनके करीबी दोस्त ऋषि कपूर ने। राज किरण ने ऋषि की सुभाष घई निर्देशित सुपरहिट फिल्म कर्ज में उनके पूर्व जन्म के किरदार को निभाया था। महेश भट्ट की फिल्म अर्थ में शबाना आजमी और उन पर फिल्माया गया गाना, तुम इतना जो मुस्करा रहे हो.. आज भी लोग गुनगुनाते हैं। वह पिछले एक दशक से गायब हैं। ऋषि कपूर और दीप्ति नवल जैसे उनके मित्रों को छोड़कर प्राय: सभी उन्हें मृत मान लिया था। दीप्ति नवल ने पिछले दिनों फेसबुक पर भी राज किरण को खोजने के लिए एक पोस्ट किया था। उन्होंने लिखा, खबर थी कि राज को न्यूयॉर्क में कैब चलाते हुए आखिरी बार देखा गया था। उसके बाद ऋषि कपूर ने अपने दोस्त को खोजने की ठान ली। एक फिल्म की शूटिंग के लिए अमेरिका गए ऋषि कपूर ने वहां राज किरण के भाई गोविंद मेहतानी से मुलाकात की। उन्होंने पूछा कि राज अचानक कहां गायब हो गए? मेहतानी ने ऋषि को बताया कि राज किरण की दिमागी हालत ठीक न होने की वजह से वह अटलांटा के मेंटल हॉस्पिटल में हैं। बताया जाता है कि राज की पत्नी और बेटा उन्हें छोड़कर चले गए और वह इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। पारिवारिक जीवन में आए दूसरे संकटों की वजह से भी राज अवसाद से घिर गए। परिवार के बाकी सदस्यों ने भी राज की देखभाल नहीं की, शायद इसकी वजह उनका इलाज महंगा था। ऋषि ने कहा, यह काफी हृदय विदारक है। लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि वह जिंदा हैं। उनके जीवित होने की खबरों के बीच फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें वापस लाने की बातें कही जा रही हैं। निर्देशक सुभाष घई और महेश भट्ट ने कहा कि वह राज किरण को वापस लाने की कोशिश का हिस्सा बनने में खुशी महसूस करेंगे। दो दशक तक इस अभिनेता ने कागज की नाव, घर हो तो ऐसा, घर एक मंदिर, कर्ज, वारिस और अर्थ जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों में काम किया है।
Friday, May 27, 2011
लखनऊःबीएनए का कलाकार हालीवुड की फिल्म में
2003 में बीएनए से डिप्लोमा लेने के बाद आरिफ शहडोली ने राजधानी लखनऊ को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। उन्होंने बच्चों को अभिनय के गुर सिखाये और बहुत से नाटकों में अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। बीएनए से अभिनय सीखने वालों में से कम ही कलाकार होंगे जिनको विदेशी फिल्म में काम करने का मौका मिला होगा, लेकिन आरिफ अब वह हॉलीवुड के लिए निर्मित होने वाली अंग्रेजी फिल्म ‘एन अमेरिकन इन इण्डिया’ में मुख्य विलेन का किरदार निभा रहे हैं। इलाहाबाद में शूटिंग पूरी करने के बाद बुधवार को वह राजधानी में थे और बताया कि यह फिल्म अंग्रेजी भाषा में बन रही है, जिसके निर्देशक अक्सर इलाहाबादी है। फिल्म में हालीवुड के कलाकार एडर्वड मुख्य किरदार निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बीएनए से डिप्लोमा लेने के बाद उनकी जिन्दगी में एक नया मोड़ आया, क्यों कि किसी भी अभिनय संस्थान में डिप्लोमा को महत्व ही नहीं दिया जा रहा था सभी लोग डिग्री मांगते थे। इस कारण बीएनए का डिप्लोमा बेकार हो गया। इसे लेकर उन्होंने आरटीआई के जरिये बीएनए से खूब सवाल जवाब भी किया, लेकिन अभिनय की क्षमता को बनाये रखा और संघर्ष जारी रहा, जिससे यह मुकाम मिला। आरिफ ने सुधाकर की फिल्म ‘धीर’, मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ और राजा बुन्देला की फिल्म ‘सन आफ फ्लावार’ में महत्वपूर्ण किरदार निभाया है। उन्होंने बताया कि हालीवुड की फिल्म में महत्वपूर्ण किरदार करना उनकी जिन्दगी का एक पड़ाव है, जिससे निश्चित रूप से उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलेगा। फिल्म की शूटिंग पूरी हो गयी है और अब तकनीक पक्ष पर काम बचा है, फिर कुछ ही महीनों में पूरी दुनिया में फिल्म प्रदर्शित की जाएगी(आरिफ शहडोली,राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,27.5.11)
Saturday, May 21, 2011
पहली बार भोजपुरी सिनेमा के लिए अवॉर्ड
भोजपुरी सिनेमा के 50 साल पूरे होने पर मुंबई की ‘भोजपुरी सिटी‘ पत्रिका ने पहली बार भोजपुरी सिनेमा के लिए हर श्रेणी में अवॉर्ड देने की घोषणा मुंबई मे एक प्रेस कांफ्रेंस में की। ‘भोजपुरी मीडिया’ के प्रकाशन का यह चौथा वर्ष है और इस बीच पत्रिका ने न सिर्फ भोजपुरी, वरन पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना ली है। उल्लेखनीय है कि 2 जून को होने वाले इस अवॉर्ड समारोह का मीडिया पार्टनर सहारा न्यूज नेटवर्क है। मंच से बोलते हुए समारोह के सव्रेसर्वा किशन खदरिया ने स्वीकार किया कि ‘सहारा इंडिया परिवार ने मुझे सही मायने में सहारा दिया है। आज मेरी खुशी का कोई ओर छोर नहीं है। हमारी पत्रिका प्रकाशन के चौथे वर्ष में प्रवेश कर गई है और आज भोजपुरी सिनेमा सौ करोड़ रुपए का कारोबार कर रहा है। वैसे तो मैं राजस्थानी हूं, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे बिहार और भोजपुरी सिनेमा से प्यार हो गया है।’
मंच पर सहारा इंडिया परिवार का प्रतिनिधित्व श्री रूबल दत्ता ने किया। उन्होंने कहा, ‘सहारा इंडिया परिवार कामना करता है कि यह अवॉर्ड ट्रेंड सेटर बने।’ दीप प्रज्जवलन युवा अभिनेता आफताब शिवदासानी और अभिनेत्री अदिति गोवित्रीकर के हाथों संपन्न हुआ। इस मौके पर आफताब ने कहा, ‘मुझे पहली बार पता चला कि भोजपुरी सिनेमा को 50 वर्ष हो गए। आप पहली बार अवॉर्ड देने जा रहे हैं। मेरी कामना है कि भोजपुरी सिनेमा और आगे बढ़े। हिंदी में तो इतने सारे अवॉर्ड हैं कि हर अवॉर्ड का नाम भी याद नहीं रहता।’
भोजपुरी सिनेमा के लीजेंड कहे जानेवाले कलाकार राकेश पांडे ने भोजपुरी सिनेमा की यात्रा और दशा-दिशा पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि कैसे भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने चाहा था कि भोजपुरी सिनेमा का भी निर्माण हो। उनकी प्रेरणा से भारत की पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’
सन् 1961 में बननी शुरू हुई और सन् 1962 में रिलीज हुई। इस फिल्म को बनाने में नजीर हुसैन साहब की महत्वपूर्ण भूमिका थी और उन्हीं की कहानी पर फिल्म बनी थी। इस फिल्म के निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी और निर्देशक कुंदन कुमार थे। फिल्म में असीम कुमार, कुमकुम, हेलन और बेबी पद्मा खन्ना ने काम किया था। भोजपुरी की यह पहली ही फिल्म सुपर डुपर हिट हुई थी। कार्यक्रम समाप्त होने तक भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार मनोज तिवारी भी पहुंच गए। उन्होंने पहुंचते ही अपने दिलकश अंदाज में कहा, ‘मैं तो हूट का हकदार हूं, क्योंकि मैं इतनी देर से आया। इस पर भी मेरा स्वागत हो रहा है जिससे मैं खुश हूं। मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि भोजपुरी सिनेमा पर केंद्रित पत्रिका ‘भोजपुरी सिटी‘ को ही भोजपुरी सिनेमा के अवॉर्ड देने का हक है।’
‘भोजपुरी सिटी’ के संपादक अखिलेश ने बताया कि, ‘अब हम पूरी फिल्म इंडस्ट्री को रिप्रजेंट करने लगे हैं। हम दो प्रकार के अवॉर्ड देने जा रहे हैं। पहला जूरी अवॉर्ड और दूसरा पॉपुलर अवॉर्ड। यह अवॉर्ड जनवरी से दिसम्बर 2010 के बीच रिलीज हुई भोजपुरी फिल्मों में से प्रत्येक श्रेणी में दिया जाएगा।’
अंत में उदित नारायण, आफताब शिवदासानी, राकेश पांडे और अदिति गवित्रीकर के हाथों अवॉर्ड की ट्रॉफी का अनावरण किया गया। इस कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि हिंदी फिल्मों के सफल गायक उदित नारायण ने अपना वक्तव्य शुद्ध भोजपुरी में दिया और उन्होंने एक पॉपुलर भोजपुरी गीत की दो पंक्तियां भी गाकर सुनाई जिस पर पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। इस कार्यक्रम में भोजपुरी सिनेमा के प्रमुख निर्देशक, कलाकार और निर्माता मौजूद थे(राष्ट्रीय सहारा,मुंबई,20.5.11)।
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