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Friday, March 19, 2010

शापितःफिल्म-समीक्षा

कलाकार: आदित्य नारायण, श्वेता अग्रवाल , राहुल देव, शुभा जोशी
निर्माता: विक्रम भट्ट
डायरेक्टर: विक्रम भट्ट
गीत: नजम शेराज, आदित्य नारायण
संगीत: चिरंतन भट
सेंसर सर्टिफिकेट : एडल्ट
अवधि: 137 मिनट
रेटिंग: /photo.cms?msid=5701005
ऐसा लगता है, बिपाशा बसु, डिनो स्टारर राज को बॉक्स ऑफिस पर मिली जबर्दस्त कामयाबी के बाद डायरेक्टर विक्रम भट्ट ने मान लिया कि हॉरर फिल्मों को बनाना आसान, सस्ता तो है ही साथ ही दर्शकों की एक खास क्लास के दम पर ऐसी फिल्में टिकट खिड़की पर अपनी लागत बटोरने के अलावा अच्छा खासा मुनाफा भी कमाती है। यहीं वजह है 'राज' के बाद राज का सिक्वल और उसके बाद '1920' में विक्रम ने कुछ ऐसे ही प्रयोग किए और हर बार बॉक्स ऑफिस पर अगर उनकी हॉरर फिल्में हिट नहीं हुई तो घाटे का सौदा भी नहीं बनी। कुछ यहीं हाल आज रिलीज हुई उनकी इस फिल्म का भी है इस बार फिर डायरेक्टर ने भूत, प्रेत, शैतानी आत्मा के तांडव के साथ एक ऐसी फैमिली को अपनी कहानी का बेस बनया है जो बरसों से पीढ़ीदर पीढ़ी शापित चली आ रही है।

विक्रम ने अपनी और से इस कहानी को अच्छा ट्रीटमेंट देने की कोशिश तो जरूर की लेकिन इंटरवल से पहले कहानी का तानाबाना बुनने और फिल्म के हीरो अमन (आदित्य नारायण) और हीरोइन काया (श्वेता अग्रवाल) के रोमांस को पेश करने में इतना वक्त लिया कि दर्शक खुद को हॉरर से बांध नहीं पाता तो एकबार फिर विक्रम ने भूत प्रेत और शैतानी रूह के इंतकाम की कहानी में गानों का सहारा क्यों लिया यह समझ नहीं आता। दरअसल विक्रम की पिछली हॉरर फिल्मों का संगीत हिट रहा और शायद यहीं वजह रही कि इस बार उन्होंने एक ऐसी कहानी में गानों को फिट करने किया जहां गानों की कतई जरूरत नहीं थी।

कहानी: अमन (आदित्य )और काया (श्वेता अग्रवाल) एक दूसरे को चाहते हैं। इन दोनों के मासूम प्यार को उस वक्त नजर लग जाती है जब काया को कोई शैतानी रूह अपने बस में करती है। अमन अपने खास दोस्त शुभ (शुभा जोशी) के साथ काया को उस शैतानी रूह से निजात दिलाने में लग जाता है जिसने उसे जकड रखा है। इस काम में अमन को साथ मिलता है प्रफेसर पशुपति नाथ (राहुल देव) का जिन्होंने भटकती रूहों और शैतानी ताकतों पर कितनी किताबें लिखी हैं। अमन , शुभ और प्रफेसर को पता लगता है पिछली कई पीढ़ियों से काया की फैमिली शॉपित है जिसके चलते उसकी फैमिली में जब भी किसी लडकी की शादी होती है उसके चंद दिनों बाद ही उसकी मौत हो जाती है। यहीं वजह है काया के पिता अमन और काया के प्यार को जानते हुए भी उनकी शादी करने को तैयार नहीं होते। आखिर काया की फैमिली शापित क्यों है और क्या कभी इस परिवार को इस शाप से मुक्ति मिल सकती है? इसकी तलाश में यह तीनों महिपालपुर पहुंचते है, यहां आने के बाद उन्हें पता चलता है किकरीब तीन सौ साल पहले महाराज गजराज सिंह की हत्या के साथ काया की फैमिली के शाप का नाता है। अब काया और उसकी फैमिली को इस शाप से मुक्ति दिलाने के दिलाने के लिए अमन प्रफेसर पशुपति नाथ के साथ एक ऐसी तंत्र मंत्र की विधा को शुरू करता है जिसमें उसकी जान भी जा सकती है ।

ऐक्टिंग: सिंगर से हीरो बने आदित्य नारायण ने अपनी पहली फिल्म में साबित किया कि ऐक्टिंग की फील्ड में वह होम वर्क के बाद ही आए हैं, लेकिन आदित्य के चेहरे सपाट चेहरे पर उन दृश्यों में भी डर और खौफ नजर नहीं आ पाता जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। वहीं न्यूकमर श्वेता अग्रवाल को तो डायरेक्टर ने कुछ ज्यादा करने का जैसे मौका ही नहीं दिया; इंटरवल के बाद कोमा की शिकार श्वेता फिल्म के आखिर तक बिस्तर पर ही नजर आई। हां, प्रफेसर पशुपति नाथ की भूमिका में राहुल देव जरूर कुछ प्रभावित करते है।

डायरेक्शन: विक्रम भट्ट ने एकबार फिर यहीं साबित करने की कोशिश की है कि हॉरर फिल्म को बनाने में बैक ग्राउंड म्यूजिक कितना सशक्त पक्ष है। वहीं इंटरवल से पहले विक्रम ने कहानी को पटरी पर लाने में इतना ज्यादा वक्त लिया कि हॉल में बैठे दर्शक उकताने लगते है। फिल्म का क्लाइमेक्स गजब का है, ट्रिक फटॉग्रफी के अलावा फिल्म के तकनीकी पक्ष को मजबूत करने में विक्रम ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। लेकिन अगर बेफिजूल के गानों के मोह से विक्रम खुद को बचा पाते तो फिल्म की स्पीड और बढ़ सकती थी।

संगीत: भले ही फिल्म के साथ किसी जाने माने संगीतकार का नाम ना जुडा हो, लेकिन फिल्म में गानों की कमी नहीं है, मजे की बात है कि इन गानों का जिस सिचुएशन पर फिट किया गया है। वहां गाने की कतई जरूरत नहीं थी। अजनबी हवाएं फिर तुझे बुलाए आ जा आ जा, तेरे बिना जिया ना जाए सोचा ना जाए के लिए अगर कहानी में अच्छा प्लॉट रखा जाता तो गाने कहानी का अहम हिस्सा बन सकते थे।

क्यों देंखे: अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन है और इक्कीसवी सदी में भूत प्रेत शैतानी रूहों पर यकीन करते है तो फिल्म एकबार देख सकते है। फैमिली के साथ एंटरटेनमेंट के मकसद से अगर आप फिल्म जा रहे है तो फिल्म आपके लिए नहीं है, वैसे भी फिल्म को सेंसर ने एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ पास किया है ।
(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,19.3.2010)

लव,सेक्स और धोखाःफिल्म समीक्षा

कलाकार : अंशुमान झा, नेहा चौहान, श्रुति, राज कुमार यादव, आर्य देव दत्ता
निर्माता : बालाजी टेलीफिल्म्स और एकता कपूर
डायरेक्टर : दिबाकर बनर्जी
संगीत : स्नेहा खानवेलकर
सेंसर सर्टिफिकेट : एडल्ट
अवधि : 102 मिनट 
रेटिंग : /photo.cms?msid=5700685
बेशक हिंदी सिनेमा बदलने लगा है। कभी जिन सब्जेक्ट पर फिल्म बनाने के बारे में कोई सोच नहीं पाता उन बोल्ड सब्जेक्ट्स पर अब फिल्म बनने लगी हैं। इसमें सोशल लाइफ में घटती वे घटनाएं भी शामिल हैं जो पेज थ्री कल्चर, या फिर रईसों की महफिलों में मजाक में उड़ा करती थीं।

इस फिल्म के डायरेक्टर ने अपनी पिछली फिल्मों 'खोसला का घोंसला' और 'ओये लकी, लकी ओये' में साबित किया कि उनमें इंडस्ट्री में जमे मेकर्स की भीड़ से कुछ हटकर अलग और नया करने का जज्बा है। इस बार जब उन्हें उनके वेरी हॉट सब्जेक्ट पर एकता कपूर ने फिल्म बनाने का ग्रीन सिग्नल दिया तो दिबाकर बनर्जी ने कुछ ऐसा कर दिखाया जो परंपरागत बॉलिवुड सिनेमा में कम ही दिखाई देता है। अपनी पिछली फिल्मों से हटकर बनर्जी ने इस बार पौने दो घंटे से भी कम अवधि की फिल्म में एक दो नहीं बल्कि अलग अलग मूड की तीन बोल्ड कहानियां पेश की है । इन कहानियों में आपको नितीश कटारा हत्याकांड, नई दिल्ली के एक नामी स्कूल में हुए एमएमएस कांड की याद ताजा होती है और तीसरी कहानी आपको किसी जाने माने पॉप सिंगर की याद दिलाती है तो निश्चित तौर से इसे बनर्जी की काबलियत कहा जाएगा।

कहानी : फिल्म में तीन कहानियां हैं, जिनका एक दूसरे से कोई लेना देना नहीं, लेकिन इसके बावजूद थिएटर में बैठे दर्शक को तीनों कहानियां ऐसे किसी हादसे की याद जरूर दिलाती हैं जिसने शहर ही देश को भी झकझोर कर रख दिया। फिल्म की पहली कहानी नाकाम प्यार की है जिसे जमाने की नजर लगी है। करोड़पति और सोशल लाइफ में अपना अलग मुकाम रखने वाली फैमिली की बेटी का किसी आम इंसान से रिश्ता। भला फैमिली को कैसे मंजूर होगा, नतीजा, प्रेमी की बेरहमी से हत्या। दूसरी कहानी सेक्स से जुड़ी है, जो इन दिनों टीन एजर्स के बीच लेटेस्ट तकनीक के मिसयूज को दर्शाती है। नई दिल्ली के एक नामी पब्लिक स्कूल में हुई एमएमएस घटना की याद ताजा कराती है इस कहानी में बनर्जी ने सेक्स को आज के नजरिए में पेश किया है। तीसरी कहानी पंजाब के एक जाने माने सिंगर से जुड़ी एक घटना की याद ताजा कराती है। इस गायक का सुपर हिट गाना है तू नंगी अच्छी लगती है और सिंगर साहब को इस गाने की विडियो ऐल्बम के लिए हीरोइन चाहिए। इसी पंजाबी को बेनकाब करने के लिए एक लड़की की मदद से किए स्टिंग ऑपरेशन की कहानी में हर कोई किसी ना किसी ना किसी को धोखा देता मिलेगा।

डायरेक्शन : पूरी फिल्म पर डायरेक्टर की अच्छी पकड़ है। घटनाक्रम इतनी तेज रफ्तार से आगे खिसकता है कि दर्शक को एक पल भी सोचने को नहीं मिलता। लगता है, बनर्जी ने पहले ही तय कर लिया था कि वह किस क्लास के लिए फिल्म बना रहे हैं। यही वजह है कि फ्रंट क्लास फिल्म में लंबे बोल्ड सेक्सी सीन देखने की चाह में हॉल में चली जाए तो उनकी कसौटी पर फिल्म शायद ही खरी उतर पाए।

ऐक्टिंग : इस कहानी की डिमांड भी यही थी कि ऐसे पात्रों को लिया जाए जिनकी अपनी कोई इमेज न बन चुकी हो। इसलिए अंशुमान झा, नेहा, श्रुति हर कोई अपने पात्र में खूब जमा है।

संगीत : फिल्म में गानों की कोई गुंजाइश भी नहीं थी और न ही बनर्जी ने बेवजह कोई गाना फिट किया। हां, फिल्म के बीच चलता टाइटिल ट्रैक कहानी का हिस्सा बना है।

क्यों देखें : लीक से हटकर बनी यह फिल्म कुछ अलग और नया देखने वालों की कसौटी खरी उतरने का दम रखती है। सेंसर ने फिल्म को ए सर्टिफिकेट तो दिया लेकिन बहुत बोल्ड सीन्स पर कैंची चलाने की जहमत नहीं उठाई। फैमिली क्लास के लिए फिल्म में कुछ नहीं है। 
(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,19.3.2010)
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दैनिक भास्कर मे राजेश यादव ने महज डेढ स्टार देते हुए लिखा हैः
रियलिस्टिक सिनेमा की जिस नई धुन पर बॉलीवुड के नए निर्देशक दौड़ लगा रहे हैं उसी की अगली कड़ी में फिल्म लव सेक्स और धोखा को भी गिना जा सकता है। लेकिन यह फिल्म ना तो सार्थक सिनेमा की बात करती है और ना ही वास्तविक सिनेमा की। दिबाकर बनर्जी ने दर्शनरति की जिस वास्तविकता को कैमरे में कैद करने का प्रयास किया है उसमें वह दम नहीं आ पाया है जो एक छाप छोड़ता हो, मनोरंजन तो बहुत दूर की बात है। दिबाकर का उद्देश्य तो बेहतर नजर आता है लेकिन कहानी कहने का अंदाज कुछ और होता तो बात कुछ हटके होती। रियलिस्टिक सिनेमा की फिल्मों के लिए पूर्व में आई अनुराग कश्यप की फिल्म देव डी ने एक आईना दिखाया था लेकिन उस परी पाटी पर दिबाकर बनर्जी की लव सेक्स और धोखा चलती नजर नहीं आती है।

फिल्म में गीत, संगीत तो बेदम है ही उस पर पटकथा में कसावट न होने से बात और बिगड़ गई। दरअसल रियलिस्टिक सिनेमा की जिस नई डपली को आधार बनाकर इस फिल्म को बनाया गया है उस पर यह फिल्म खरी नई उतरती है। युवा मानस, कैमरे की दुनिया और प्यार में शारीरिक संबंधो के नाम पर धोखे की दास्तान बयां करती यह फिल्म आम दर्शकों को निराश करती है और सच को दिखाने के अंदाज पर भी नई बहस को जन्म दे सकती है।

फिल्म में छोटी -छोटी तीन कहानियां है जिसे देखकर आप को वास्तविक समाज की कुछ कहानियां याद आ सकती है। ये कहानियां स्कूल कॉलेजों में आए दिन हो रहे एमएमएस कांड, मीडिया में आ रहे स्टिंग ऑपरेशन के कड़वे सच और सिनेमा की रंगीन संसार के परदे के पीछे का चरित्र उजागर करने का प्रयास है। पहली फिल्म में एक कॉलेज के लड़के और एक करोड़पति घराने की लड़की के प्यार की ऐसी कहानी है जिसे परिवार पसंद नहीं करता है और दोनों ऑनर किलिंग के शिकार हो जाते हैं। दूसरी फिल्म नई तकनीकी और प्यार में धोखे की कहानी कहती है जो आजकल के किशोर वय प्रेम में देखी जा रही है। तीसरी कहानी एक ऐसे सिंगर के स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ी है जो अपनी ख्याति के बल पर अवसर देने की बात कहकर नई लड़कियों के शरीर से खेलता है और इस खेल को एक्सपोज करने में मीडिया के लोगों के खास अंदाज और सोच पर भी सवाल उठाया गया है।

फिल्म में जो कहानियां ली गई है उसकी थीम में तो दम नजर आता है लेकिन पटकथा में वह बात नहीं आ पाई है। निर्देशन में भी दिबाकर प्रभाव नहीं छोड़ पाएं है। जिस सच को निर्देशक दिखाने की बात कर रहा है उसे कहने का अंदाज उतना खूबसूरत नहीं बन पाया। दरअसल दिबाकर बॉलीवुड के उन युवा निर्देशकों में से है जो रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर सेंसर की कैंची को पसंद नहीं करते और सच को दिखाने में वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। फिल्म एक ऐसी कला है जिसमें कैमरे के माध्यम से बिना नंगेपन और भाषा में गालियों के शोर से बचकर भी सच को बयां किया जा सकता है और इस मामले में दिबाकर की लव सेक्स और धोखा खरी नहीं उतरती है।

सच को कहने के लिए जिस साहस की जरूरत होती है वह तो निर्देशक ने दिखाया लेकिन सलीका इससे बेहतर हो सकता था, नाम में बोल्डनेस से चौंकाया तो जा सकता है लेकिन प्रभाव तो बस बेहतर फिल्म ही छोड़ती है चाहे वह किसी भी कैमरे से क्यों ना खींची गई हो। बॉक्स ऑफिस पर लव, सेक्स और धोखेबाजी पर बनी फिल्मों को दर्शक मिलते रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि लव सेक्स और धोखा दर्शकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी। कुल मिलाकर फिल्म लव सेक्स और धोखा बोल्ड फिल्म जरूर है लेकिन खूबसूरत फिल्म नहीं है , इन सब बातों के बावजूद दिबाकर बनर्जी के लिए एक बात कही जा सकती है कि उन्होंने कुछ नया करने का प्रयास जरूर किया है भले ही वे इसमें असफल हो गए हों।

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साढे तीन रेटिंग के साथ वेबदुनिया की टिप्पणीः
‘लव सेक्स और धोखा’ एक एक्सपरिमेंटल फिल्म है, जो कैमरे और टेक्नालॉजी की पर्सनल लाइफ में दखल को दिखाती है। हर आदमी के पास इन दिनों कैमरा है और जब चाहे वो इसका उपयोग/दुरुपयोग कर रहा है।

कैमरे की आँख हम पर लगातार नजर रखे हुए है। मीडिया इसके जरिये स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है। लेकिन उसका उद्देश्य सच्चाई को समाने लाने की बजाय सनसनी फैलाना और प्राइम टाइम में मनोरंजन देना है।

अश्लील एमएमएस की इन दिनों डिमांड है क्योंकि दूसरों के निजी क्षणों को देखना बड़ा अच्छा लगता है। हर कोई रियलिटी देखना चाहता है। कई बार लोगों को पता ही नहीं चलता और ये वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जाते हैं।

निर्देशक दिबाकर बैनर्जी ने अपनी फिल्म को तीन कहानियों में बाँटा है। पहली स्टोरी में लव दिखाया गया है। फिल्म इंस्टीट्यूट का स्टुडेंट डिप्लोमा फिल्म बनाते हुए हीरोइन से प्यार कर बैठता है। 
टीनएज में प्यार को लेकर तरह-तरह की कल्पनाएँ होती हैं। ‘डीडीएलजे’ जैसी फिल्मों का नशा दिमाग पर छाया रहता है। इस कहानी के किरदार भी राज और सिमरन की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन उनकी लव स्टोरी का ‘द एंड’ राज और सिमरन की तरह नहीं होता है क्योंकि रियलिटी और कल्पना में बहुत डिफरेंस है। तीनों कहानी में ये वीक है क्योंकि इसमें नाटकीयता कुछ ज्यादा हो गई है। इस स्टोरी को हाथ में कैमरा लेकर फिल्माया गया है।

दूसरी कहानी डिपार्टमेंटल स्टोर में लगे सिक्यूरिटी कैमरे की नजर से दिखाई गई है। इस कैमरे की मदद से वहाँ काम करने वाला आदर्श एक पोर्न क्लिप बनाना चाहता है। रश्मि नामक सेल्सगर्ल का वह पहले दिल जीतता है और फिर स्टोर में उसके साथ सेक्स कर वह क्लिप को महँगे दामों में बेच देता है। यहाँ बताने की कोशिश की गई है कि हर ऊँची दुकान या मॉल्स में आप पर कड़ी नजर सिक्यूरिटी के बहाने रखी जा रही है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।

तीसरी कहानी को स्पाय कैमरे के जरिये दिखाया गया है। एक डांसर को म्यूजिक वीडियो में मौका देने के बहाने एक प्रसिद्ध पॉप सिंगर उसका शारीरिक शोषण करता है। डांसर की मुलाकात एक जर्नलिस्ट से होती है, जिसकी मदद से वे सिंगर का स्टिंग ऑपरेशन करते हैं।

यहाँ मीडिया को आड़े हाथों लिया गया है, जो इस फुटेज के जरिये सच्चाई को सामने लाने के बजाय अपनी टीआरपी को ध्यान रखता है। वे इस कहानी को सीरियल की तरह खींचकर पैसा बनाना चाहते हैं।
तीनों कहानियों को बेहतरीन तरीके से जोड़ा गया है और आपको अलर्ट रहना पड़ता है कि कौन-सा कैरेक्टर किस स्टोरी का है और इस स्टोरी में कैसे आ गया है।

फिल्म के सारे कलाकार अपरिचित हैं, लेकिन उनकी एक्टिंग सराहनीय है। कभी नहीं लगता कि वे एक्टिंग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे हमारे आसपास मौजूद हैं और हम कैमरे के माध्यम से उन पर नजर रखे हुए हैं।

डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी की पकड़ पूरी फिल्म पर है। एक्सपरिमेंटल और रियलिटी के करीब होने के बावजूद फिल्म इंट्रस्टिंग लगती है। अपने एक्टर्स से उन्होंने बखूबी काम लिया। सिनेमाटोग्राफर निकोस ने कैमरे को एक कैरेक्टर की तरह यूज़ किया है। नम्रता राव की एडिटिंग तारीफ के काबिल है।

‘लव सेक्स और धोखा’ उन लोगों के लिए नहीं है जो टिपिकल मसाला फिल्म देखना पसंद करते हैं। आप कुछ डिफरेंट की तलाश में हैं तो इसे देखा जा सकता है। 

आज दादा साहब फाल्के पुरस्कार का सीधा प्रसारण

पिछले दिनों राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई थी। ये पुरस्कार आज दिए जा रहे हैं जिसका आज दूरदर्शन पर शाम साढे पांच बजे से सीधा प्रसारण किया जाएगा। पाठकों को ध्यान होगा कि इस बार दादा साहब फाल्के अवार्ड मशहूर छायाकार वी.के.मूर्ति को दिया जा रहा है। आज दैनिक जागरण ने मूर्ति जी के संबंध मे अमिताभ की प्रतिक्रिया छापी है। आप भी पढिएः

आज के दौर की फिल्मों में भी अपना लोहा मनवा रहे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन खुद पुरानी फिल्मों को दिवाने हैं। अमिताभ का कहना है कि पुरानी फिल्मों के कुछ दृश्यों को भुला पाना असंभव है। इन यादगार पलों को उस समय कैमरे में कैद करने में कभी- कभी पूरा दिन लग जाता था, लेकिन वीके मूर्ति जैसे तकनीशियन इस काम को पूरे समर्पण के साथ अंजाम देते थे। आज के दौर में काम के प्रति ऐसे समर्पण का अभाव है। बिग बी ने ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि गुरुदत्त की फिल्म कागज के फूल का वह दृश्य भला कौन भूल सकता है जब वहीदा रहमान गाती हैं वक्त ने किया । प्यासा फिल्म का एक यादगार दृश्य है जब थिएटर में ये दुनिया अगर मिल भी जाए गा रहे गुरुदत्त को बालकनी से वहीदा देखती हैं और क्लोजअप में उनकी पीड़ा नजर आती है। साहब बीवी और गुलाम में मीना कुमारी रात को घर से जा रहे पति रहमान को रोकने के लिए ना जाओ सैंयां गाती हैं। इन यादगार दृश्यों को कैमरे में मूर्ति ने कैद किया था। मूर्ति को इस साल फिल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया गया है। मूर्ति की और उनके काम की सराहना करते हुए अमिताभ ने लिखा है कि कुछ साल पहले आईआईएफए अवार्ड समारोह में मैं पिछली सीट पर मूर्ति के पास बैठा था। जैसे ही पुरस्कार के लिए उनके नाम की घोषणा की गई, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। मैंने उन्हें बधाई दी। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक तकनीशियन को सम्मानित किया जा रहा है। अमिताभ के अनुसार, उन्होंने दो फिल्में नास्तिक और राम बलराम मूर्ति के साथ की हैं, लेकिन उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम एक अन्य महान फिल्मकार गुरुदत्त की फिल्मों का छायांकन है।

Thursday, March 18, 2010

संत भूमिकाएं और कलाकार

शिरडी के साईं बाबा के जीवन पर जैकी श्रॉफ अभिनीत फिल्म ‘मालिक एक’ प्रदर्शन के लिए तैयार है। इस विषय पर 1955 में पहली फिल्म मराठी भाषा में बनाई गई थी। उस समय से आज तक इस विषय पर आठ फिल्में बन चुकी हैं और छोटे परदे पर भी कई प्रयास हुए हैं। मनोज कुमार के प्रयास से वर्ष 1977 में बनी ‘शिरडी के साईं बाबा’ फिल्म में शीर्षक भूमिका सुधीर दलवी ने इतनी विश्वसनीयता के साथ निभाई थी कि उन्हें लंबे समय तक कोई और भूमिका नहीं मिली और अनेक लोग उनके चरण छूते थे।
यही हाल रामानंद सागर के सीरियल में राम और सीता की भूमिकाओं को अभिनीत करने वाले कलाकारों का हुआ। धारावाहिक में सीता बनीं दीपिका चिखालिया तो लोकसभा का चुनाव भी जीती। ‘जय संतोषी मां’ प्रदर्शित करने वाले कस्बाई सिनेमाघरों में लोग जूते हॉल के बाहर उतारकर फिल्म देखने जाते थे। भारतीय जनमानस में श्रद्धा हमेशा हिलोरें लेती है और तर्क के छोटे-मोटे टापू प्राय: डूबे रहते हैं।
संत भूमिका के निर्वाह के लिए कलाकार स्वयं को तैयार करते हैं। मसलन बेन किंग्सले ने ‘गांधी’ फिल्म के लिए शाकाहार और योग को स्वीकार किया। जैकी श्रॉफ ने भी बाबा की भूमिका के समय मांसाहार और शराब का सेवन नहीं किया। सुधीर दलवी ने भी इसी तरह का संयम बरता था। मुद्दे की बात यह है कि क्या संत भूमिका निभाने वाले कलाकार के जीवन और सोच में कोई परिवर्तन आता है? क्या फिल्म के प्रदर्शन के बाद उनकी जीवनशैली में सात्विक तत्वों का प्रवेश होता है?

ज्ञातव्य है कि ‘जय संतोषी मां’ के निर्माता और अन्य वितरकों ने फिल्म से कमाया धन शीघ्र ही खो दिया था। अधिकांश कलाकारों के लिए संत भूमिकाएं भी अन्य भूमिकाओं की तरह अपने व्यवसाय का हिस्सा होती हैं। फिल्म के प्रचार के लिए कलाकार के समर्पण के कई झूठे किस्से फैलाए जाते हैं। शशधर मुखर्जी की ‘नागिन’ फिल्म के प्रदर्शन के समय अनेक कस्बाई सिनेमाघरों में बीन बजने के दृश्य में सांप के आने की बातें फैलाई गई थीं।
जीवन के असमान संग्राम में निहत्थे लड़ने वाले आदमी का संबल उसका धार्मिक विश्वास ही है। रहस्यमय ढंग से कष्टों के निवारण की उसकी अभिलाषा इतनी बलवती होती है कि वह हर दर पर माथा टेकता है। यह तो मजबूर व्यक्ति की विचार प्रक्रिया में श्रद्धा का पनपना हम देखते हैं और सफल मजबूत व्यक्ति को अपनी अर्जित संपदा के खोने का भय सताता है, इसीलिए डर से उपजती है उसकी श्रद्धा।
आम आदमी का जीवन अन्याय और असमानता से त्रस्त है। उसे तर्क के रास्ते से कोई उम्मीद नहीं है। अत: अजूबे के प्रति उसके मन में तीव्र इच्छा है। यह इच्छा इतनी बलवती हो जाती है कि अजूबे घटते से प्रतीत होते हैं। गणपति का दूध पीना या माहिम की मस्जिद के निकट समुद्र का पानी मीठा होता देखा गया है। रिचर्ड बर्टन की ‘बॉडी एंड सोल’ किताब में महीनों पानी के जहाज पर काम करने वाला इतनी तीव्रता से अपनी पत्नी को याद करता है कि उसे लगता है कि वह सशरीर उसके निकट मौजूद है। दरअसल मनुष्य के मन में अपार शक्ति है और उसकी कल्पना ब्रह्मांड के परे जाती है। वह अपनी आस्था को भी विराट कर सकता है और डर के हौव्वे को भी खौफनाक बना सकता है।
कोई एक शताब्दी पूर्व राल्फ इमर्सन ने अपनी ‘ब्रा’ नामक कविता में लिखा है कि मैं शंका करता हूं और स्वयं भी शंका हूं। मैं वह स्तुतिगान भी हूं, जिसे ब्राह्मण गाता है।
(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,18.3.2010)

Wednesday, March 17, 2010

अरुणा ईरानीःक्या गजब करते हो जी

"लव स्टोरी" में अरूणा ईरानी "क्या गजब करते हो जी" गाते हुए कुमार गौरव को रिझाती नजर आईं, तो "कुदरत" में मंच पर शास्त्रीय अंदाज में "हमें तुमसे प्यार कितना" गाते हुए आईं! गुलजार की क्लासिक कॉमेडी "अंगूर" में देवेन वर्मा की पत्नी के रूप में वे अपने किरदार में पूरी तरह डूबी हुई थीं। १९८४ में "पेट, प्यार और पाप" के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री अवॉर्ड मिला।
हीरोइन के तौर पर सफलता न पाते हुए भी रुपहले पर्दे पर लंबी पारी खेलते हुए दर्शकों के दिलो-दिमाग पर अपनी छाप अंकित कर देने वाली अभिनेत्रियों में से रही हैं अरुणा ईरानी। सत्तर-अस्सी के दशक की फिल्मों के एक दर्शक वर्ग का हमेशा यह मानना रहा कि अरुणा में हीरोइन बनने के सारे गुण मौजूद थे लेकिन कुछ खराब किस्मत, कुछ स्वयं के गलत फैसलों और कुछ फिल्म उद्योग की राजनीति के चलते उनकी पहचान मुख्यतः चरित्र अभिनेत्री के रूप में ही बन पाई। वैसे बाल कलाकार, कॉमेडियन, खलनायिका, हीरोइन, चरित्र अभिनेत्री... कई रूप रहे हैं अरुणा ईरानी के।
कम ही लोगों को पता है कि अरुणा ने अपने करियर की शुरुआत सर्वकालिक महान क्लासिक मानी जाने वाली फिल्म "गंगा जमना" (१९६१) से बाल कलाकार के रूप में की थी। इसमें उन्होंने चरित्र अभिनेत्री आजरा के बचपन की भूमिका निभाई थी और हेमंत कुमार के गीत "इंसाफ की डगर पे बच्चों दिखाओ चलके" में अपने गुरुजी के साथ गा रहे बच्चों में वे भी शामिल थीं। इसके बाद उन्होंने "जहाँआरा", "फर्ज", "उपकार" आदि जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए। फिर कॉमेडी किंग मेहमूद के साथ उनकी जोड़ी बनी, जो "औलाद", "हमजोली", "नया जमाना" जैसी फिल्मों में खूब पसंद की गई।


अरुणा के करियर में महत्वपूर्ण मोड़ आया १९७१ में "कारवाँ" के साथ। इस सुपरहिट म्यूजिकल फिल्म में उन्होंने तेज-तर्रार बंजारन की यादगार भूमिका निभाते हुए अपने अभिनय कौशल के साथ-साथ नृत्य की प्रतिभा का भी प्रदर्शन किया। "दिलबर दिल से प्यारे" और "चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी" जैसे गीतों से उन्होंने अपना लोहा मनवा लिया। निर्माताओं ने उन्हें ऐसी भूमिकाओं के लिए माकूल पाया, जिनमें कुछ नकारात्मकता का पुट हो और जिनमें एकाध डांस का भी स्कोप हो। इस बीच अरुणा को मेहमूद की "बॉम्बे टू गोवा" (१९७२) में हीरोइन का रोल मिला। हीरो थे अमिताभ बच्चन, जो तब तक एक संघर्षशील कलाकार ही थे। कहा तो यह भी जाता है कि मेहमूद ने पहले हीरो का यह रोल अमिताभ के मित्र और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के पुत्र राजीव गाँधी को ऑफर कर डाला था!


"बॉम्बे टू गोवा" हिट तो हुई लेकिन अरुणा हीरोइन के रूप में करियर न बना सकीं। हाँ, कई फिल्मों में सहायक भूमिका निभाते हुए वे हीरोइन पर भी भारी पड़ जाती थीं। १९७३ में राजकपूर की "बॉबी" में एक संक्षिप्त मगर दिलचस्प भूमिका में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। इसके बाद वे लगातार एक सशक्त चरित्र अभिनेत्री के तौर पर अपना स्थान पुख्ता करती गईं। "खेल-खेल में", "मिली", "लैला मजनू", "शालीमार" आदि उनकी महत्वपूर्ण फिल्में रहीं। "कुर्बानी" में उन्होंने बदले की आग में धधकती स्त्री के रोल में फिरोज खान, विनोद खन्नाा, जीनत अमान, अमजद खान जैसे कलाकारों में बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। "लव स्टोरी" में वे "क्या गजब करते हो जी" गाते हुए कुमार गौरव को रिझाती नजर आईं, तो "कुदरत" में मंच पर शास्त्रीय अंदाज में "हमें तुमसे प्यार कितना" गाते हुए आईं! गुलजार की क्लासिक कॉमेडी "अंगूर" में देवेन वर्मा की पत्नी के रूप में वे अपने किरदार में पूरी तरह डूबी हुई थीं। १९८४ में "पेट, प्यार और पाप" के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री अवॉर्ड मिला।

नब्बे के दशक में अरुणा ईरानी ने "बेटा" और "राजा बाबू" जैसी फिल्मों से माँ के रोल निभाने शुरू किए। "बेटा" में उन्होंने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता। इसके अलावा उन्होंने टीवी के क्षेत्र में भी कदम रखा और सीरियल निर्माण करने लगीं। कई गुजराती फिल्मों में भी उन्होंने काम किया है। सई परांजपे की "साज" (१९९८) अरुणा की यादगार फिल्मों में से है, हालाँकि बॉक्स ऑफिस पर वह नहीं चली। वे फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उतर चुकी हैं। आज के दौर के निर्देशकों में अरुणा करन जौहर और इम्तियाज अली के साथ काम करने की इच्छुक हैं क्योंकि उनके मुताबिक ये निर्देशक नए दौर के अनुरूप फिल्में तो बनाते हैं लेकिन इमोशंस पर भरपूर जोर देते हैं। बचपन से काम करती आईं अरुणा की कामना है कि अंतिम साँस तक वे काम करती रहें।
(मंजुल खांडेकर,नई दुनिया,13 मार्च,2010के ग्लैमर दुनिया परिशिष्ट मे)

फिल्म उद्योग के हितों की रक्षा करेगी सरकार

महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण ने कल फिक्की फ्रेमस २०१० का उद्घाटन करते हुए कहा कि कहा कि उनकी सरकार फिल्म इंडस्ट्री के हित के लिए जो भी जरूरी कदम होगा उठाएगी। पायरेसी के बारे में उन्होंने कहा कि सरकार इस बारे में काफी कुछ कर रही है लेकिन इंडस्ट्री के लोगों को भी इसके प्रति सजग और सतर्क रहना होगा। फिक्की मनोरंजन समिति के अध्यक्ष और जाने माने फिल्मकार यश चोपड़ा ने केंद्र और राज्य सरकार से पायरेसी के खिलाफ सख्त से सख्त कानून बनाने की मांग की थी। इस अवसर पर विशेष रूप से सम्मेलन में आए फॉक्स फिल्म इंटरटेनमेंट के चेयरमैन और सीईओ जेम्स निकोलस ने कहा कि भारत में क्रियेटिव लोगों की कमी नहीं है और यहां की फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे काफी लोग हैं। चव्हाण ने कहा कि इस देश में सिर्फ एक सेंसर प्रणाली है वह है सेंसर बोर्ड। सेंसर बोर्ड ने जिस फिल्म को पास कर दिया उस पर कोई भी दूसरी संस्था या व्यक्ति अपना सेंसरशिप नहीं थोप सकता।नई दिल्ली (प्रेट्र)। भारतीय मीडिया औरमनोरंजन उद्योग २०१४ तक १.०९ लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा। मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विज्ञापन में बढ़ते खर्च की उम्मीद, मीडिया की बढ़ती पैठ और अर्थव्यव्स्था में सुधार के कारण मीडिया उद्योग तेजी से ऊपर बढ़ रहा है।मुंबई में  मनोरंजन उद्योग पर आयोजित इस उद्घाटन कार्यक्रम में अभिनेता शाहरुख खान, अभिनेत्री कैटरीना कैफ, निदेशक यश चोपड़ा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और फिक्की समिति के सदस्य उपस्थित थे।

Monday, March 15, 2010

आइपीएल मे छप्पर फाड़

फर्राटा क्रिकेट का अवतार आईपीएल सबसे तेजी से ग्रो करने वाला ब्रांड बन गया है। इसमें हिस्सा लेने वाली टीमें भी कमाई के मामले में ब़ड़ा ब्रांड बनकर उभरी हैं। आईपीएल के पहले दो संस्करण ब्रिटेन की ब्रांड फाईनेंस संस्था के इस दावे पर सच्चाई की मुहर लगाते हैं। आईपीएल के चौथे संस्करण तक इस उद्योग की वृद्धि दर ५० फीसदी होने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है। फोर्ब्स की सूची में आईपीएल दो साल के भीतर चौथे सबसे ब़ड़े खेल आयोजन के तौर पर उभरा है। आईपीएल की लोकप्रियता और क्रिकेट तथा बॉलीवुड के गठजो़ड़ से होने वाली पैसों की बरसात बताती है कि दो साल पहले इस आयोजन के मुखिया ललित मोदी ने दुनिया के सबसे ब़ड़े ब्रांड बनने का जो दावा किया था वह तीसरे संस्करण के शुरू होते-होते सच होने के करीब है।

ब्रांड फाइनेंस ने सीजन-२ के दौरान इसे २.०१ बिलियन डॉलर यानी ९२०० करो़ड़ रुपए का उद्योग आंका था। दर्शकों, प्रायोजकों और नई टीमों के लिए नामी-गिरामी कंपनियों की दिलचस्पी से यह बात दूर की कौ़ड़ी लगती भी नहीं है। पहले संस्करण को जहां मात्र ४० प्रायोजक मिले थे वही तीसरे संस्करण तक आते-आते यह संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। जाहिर है कमाई लगातार ब़ढ़ रही है। जानकारों का मानना है कि तीसरे संस्करण में आमदनी का आंक़ड़ा ७०० करो़ड़ रुपए तक पहुंच सकता है। पिछले सीजन में कमाई के आंक़ड़े २०० करो़ड़ के इर्द-गिर्द रहे थे।

आईपीएल ने कमाई के तमाम विकल्पों को आजमाना शुरू कर दिया है। इसी सीजन में पहली बार आईपीएल के मुखिया ललित मोदी ने यूएफओ मूवीज को थियेटरों में मैचों के प्रसारण अधिकार बेचकर एक नई शुरुआत की है। हाईडिफिनेशन क्वालिटी की स्क्रीन पर मैचों के आयोजन अधिकार बेचकर मोदी ने ३३० करो़ड़ रुपए का इंतजाम किया है। इतना ही नहीं आईपीएल के ५६ लीग मैचों के आधार पर एक पुरस्कार समारोह का आयोजन करेगी। इसके प्रसारण का अधिकार कलर्स चैनल को बेचा गया है। इसी चैनल के साथ मैच के बाद होने वाली पार्टियों, आयोजन और फैशन शो इत्यादि दिखाने का भी करार हुआ है। यानी क्रिकेट, बॉलीवुड और फैशन के गठजो़ड़ के रूप में मोदी बाजार के सामने अपने तरह का अनोखा कॉकटेल पेश करने की अपनी मुहिम में कामयाब नजर आते हैं।
(प्रदीप,नई दुनिया,दिल्ली,14.3.2010)

बॉलीवुड पर आइपीएल का खुमार

आईपीएल-थ्री को शुरू हुए अभी सिर्फ तीन ही दिन हुए हैं लेकिन ट्वेंटी-२० के इस तूफानी टूर्नामेंट की खुमारी ने बॉलीवुड के दिग्गज सितारों को अपनी आगोश में ले लिया है।
आईपीएल का सुरूर इस कदर सिने सितारों के सिर च़ढ़ कर बोलने लगा है और अभिषेक बच्चन से दीया मिर्जा तक अपनी पसंदीदा टीमों के समर्थन में माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट टिवटर पर हाले दिल बयां कर रहे हैं। किंग्स इलेवन पंजाब और दिल्ली डेयरडेविल्स के मुकाबले को लेकर ऊहापोह में फंसे फिल्म निर्माता कुणाल कोहली ने लिखा कि दोनों टीमें अच्छी हैं। किसी एक का चुनाव मुश्किल है। फिर भी मैं पंजाब के साथ हूं। हालांकि कल मोहाली में हुए इस मैच में डेयर डेविल्स ने रोमांचक जीत हासिल कर ली थी। टीमों को समर्थन के मसले पर खुद को टुक़ड़ों में बंटा पाकर राहुल बोस ने टिवट किया "मैं आधा बंगाली और आधा पंजाबी-मराठी हूं लेकिन मेरी जिंदगी मुंबई से है और मैं आजीवन मुंबई इंडियंस के साथ हूं। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की टीम मुंबई इंडियंस की नई जर्सी पर फिदा छोटे बी अभिषेक बच्चन ने कहा कि मुंबई इंडियंस की जर्सी गजब की है।
"थ्री इडियट्स" से लोकप्रियता का आसमां छू चुके आर माधवन को भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स से थो़ड़ी सी शिकायत भी है। वह लिखते हैं कि सभी टीमों को शुभकामनाएं। उम्मीद है चेन्नई धमाल करेगी। हां मुझे बुरा लगा कि टीम ने मुझे अपना ब्रांड एंबेसडर बनाने की कोशिश नहीं की।
जन्मभूमि की ममता और कर्मभूमि के मोह में उलझी खूबसूरत अभिनेत्री दीया मिर्जा लिखती हैं कि मैं दीया हैदराबाद से हूं। डेक्कन चार्जर्स का समर्थन कर रही हूं। अब मैं मुंबई में रह रही हूं। मैं निश्चय ही मुंबई इंडियंस का भी समर्थन करूंगी। शाहरूख के केकेआर की आईपीएल थ्री में पहली जीत पर खुशी जताते हुए राजस्थान रायल्स की मालकिन शिल्पा शेट्टी ने भी टिवटर पर लिखा कि केकेआर को बधाई। आप जीत के हकदार थे। करण जौहर ने भी लिखा कि हिज नेम इज शाहरुख। वह हमेशा धूम मचाते हैं। ब़ढ़िया शाहरुख। और अच्छा करो।
(नई दुनिया,दिल्ली,15.3.10)

अमिताभ को लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार

अमिताभ बच्चन को हांगकांग इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में लाइफ टाइम एचिवमेंट अवार्ड दिया जाएगा । उन्हें यह सम्मान एशियन फिल्म अवार्ड समारोह के दौरान दिया जाएगा । अमिताभ बच्चन स्वयं यह सम्मान २२ मार्च को ग्रहण करेंगे । अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा में अपने चार दशक के कॅरिअर में सौ से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं । उनकी हालिया रिलीज फिल्में "द लास्ट लीयर", "सरकार राज" और "पा" बेहद चर्चित हुई है । उन्होंने विश्व सिनेमा पर अपनी अलग छाप छोड़ी है ।

मिलिए निद्रा जागरुकता माह की ब्रांड एंबेसडर से


Sunday, March 14, 2010

जो सिर्फ बॉलीवुड मे होता है......

कुछ ही दिन पहले इस ब्लॉग पर आपने पढा अजब-गजब अपना बॉलीवुड शीर्षक आलेख। इसी क्रम मे आज पढिए बॉलीवुड के कुछ और फार्मूलों की ओर ध्यान दिलाता यह आलेख जो 27 फरवरी,2010 के राजस्थान पत्रिका मे प्रकाशित हुआ थाः
कार का ब्रेक फेल होना
फिल्मों में हीरो के खिलाफ विलैन द्वारा किए षडयंत्रों की एक लंबी लिस्ट है। उनमें से एक षडयंत्र है, हीरो की कार के ब्रेक फेल कर देना। वह कार स्टार्ट करके रवाना होता है, तब उसे पता नहीं चलता कि ब्रेक काम नहीं कर रहे हैं। गाडी शहर से निकालकर वह सुनसान सडक तक ले आता है, तब तक उसे पता नहीं चलता कि ब्रेक काम नहीं कर रहे हैं। अब किसी पहाडी की ढलान पर हीरो को मालूम पडता है कि गाडी के ब्रेक फेल हो गए हैं।
विलैन का काम है ब्ा्रेक फेल कर देना। दुर्घटना के लिए पहाडी की ढलान खोजना खुद हीरो का काम है। हैलीकॉप्टर से जंप लगाने वाला हीरो न कार रोक पाता है, न चलती कार से कूद पाता है। बचने की कोशिशों के बाद सीधा हॉस्पिटल में पडा मिलता है।
होली गीत
एक गरीब गांव का सैट लगा हुआ है। पूरा गांव किसी ठाकुर या डाकू के आतंक के साए में जी रहा है। अभी-अभी एक सीन में एक गरीब ने इस गांव की गरीबी का रोना रोते हुए कहा था कि लोग भूखों मर रहे हैं। खाने के लिए अनाज का दाना तक नहीं है, तभी होली का सीन आता है। वे ही गरीब लोग हीरो के साथ होली का गीत गाते हैं और इतना रंग बर्बाद करते हैं, इतना रंग उडाते हैं कि हैरानी होती है, इतना रंग आया कहां से अभी-अभी तो तुम्हारे पास खाने को अनाज का दाना तक नहीं था और छोकरियां कतारबद्ध होकर, रंगीन और मैचिंग ड्रेस पहनकर ऎसे नाच रही हैं, जैसे इस गांव में बडी खुशहाली है। एक होली का गीत सब कुछ बदल देता है। गरीब को अमीर बना देता है।
होली के गीत में एक और खासियत होती है। रंग उड रहे हैं, पिचकारियां छूट रही हैं, गाल रंगे जा रहे हैं, जो कि सिर्फ होली में ही होता है, फिर भी गीत में एक पंक्ति जरूर होती है, 'होली है', ताकि दर्शक समझ जाएं कि होली है।
कपडे चेंज होना
फिल्मों में कमालों का कमाल है हीरो-हीरोइन के कपडे चेंज होना। खासकर नाच-गानों के दौरान वे इतने कपडे बदलते हैं, जितना गिरगिट भी रंग नहीं बदलता। हीरो ने लाल कपडों में आसमान की तरफ छलांग लगाई और जब वह वापस जमीन पर आया, तो ब्ल्यू रंग में था। कपडे चेंज, भैये, इतनी देर में आसमान में तुम्हारे कपडे चेंज हुए कैसे । चलो ड्रेस चेंज कैसे हुई, यह छोडो, लेकिन इतना तो बता दो कि जरूरत क्या थी ड्रेस चेंज करने की कहानी तो चेंज करते नहीं।
तुम्हारी फिल्म की कहानी तो वही बीस बार दोहराई हुई घिसी-पिटी है। उसको तो बदलते नहीं। ड्रेस पर ड्रेस चेंज किए जा रहे हो। ऎसा कब तक चलेगा
पार्ट- दो
बसंत, पार्ट- दो वह बसंत है, जो एक बार आ गया, तो बस, आ गया, फिर वापस नहीं जाता। एकदम हजरते दाग की तरह। जहां बैठ गए, वहां बैठ गए। हीरोइन जवान हुई, तब बसंत था। चार महीने बाद जब हीरोइन गाना गा रही थी, 'बाग में कली खिली बगिया महकी, पर हाय रे अभी इधर भंवरा नहीं आया' तब बसंत था, क्योंकि यह कली, भंवरा, तितली वगैरह सब बसंत के लक्षण हैं, फिर चार महीने बाद जब हीरोइन की हीरो से मुलाकात हुई, तब बसंत था, क्योंकि हीरो ने हीरोइन पर वे फूल फेंके थे, जो बसंत में ही खिलते हैं।
यानी बसंत, पार्ट- दो एक तरह से फिल्म वालों के लिए बंधुआ मजदूर की तरह बंधुआ बसंत है। हर वक्त फूल खिला के इस बसंत को रेडी रहना पडता है। पता नहीं, हीरो कब आदेश दे दे, 'बहारो फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है।'
पार्ट- तीन
बसंत, पार्ट- तीन वह बसंत है, जो एक जेनुइन बसंत होता है। यह बसंत मनोज कुमार की तकरीबन हर फिल्म में, पीली पगडी, पीली चुनरिया और पीली-पीली सरसों के संग आता रहा है।
यह बसंत, सार्वजनिक बसंत जैसा लगता है। किसी हीरो का गुलाम नहीं लगता। पूरे गांव और माहौल पर एक साथ आता है। वैसे एक तरह से ऎसा बसंत ही असली बसंत का आभास देता है। भले ही साल में एक ही बार आए। यह क्या कि हीरो ने आलाप लिया, कोयल कुहकी और बसंत आ गया! हीरोइन ने अंगडाई ली, तितली उडी और बसंत आ गया! फिल्मी बसंत का कोई ठिकाना नहीं। बसंत तो वैसे रंग-बिरंगा, अद्भुत, अनोखा, स्वर्गिक आनंद देने वाला होता है। अब अगर वह किसी फिल्म में आ गया हो, तो फिर देखिए आर्ट डायरेक्टर की परिकल्पना। बसंत को ऎसा बनाकर पेश करेंगे कि कभी धरती पर न देखा हो, न सुना हो। उस पर रोमांस में डूबे नायक-नायिका पर चलते कामदेव के बाण, खुदा की पनाह!
पार्ट- एक
बरसात के मौसम की तरह बसंत भी फिल्म वालों का प्रिय मौसम माना जाता है। इसलिए साल में एक से अधिक बार आता है। बसंत को भी तीन पार्ट में बांटकर समझेंगे, तो सहूलियत रहेगी।
बसंत, पार्ट- एक, एक छोटी सी बालिका भागी जा रही है। कैमरा उसे फॉलो कर रहा है। थोडी देर में कैमरा सरसों के खेत में पहुंच जाता है। जहां सरसों में फूल आ चुके हैं। कैमरा वापस पलटकर उसी बालिका पर आता है, जो अब बालिका नहीं रही। युवती बन गई है। खेतों में बसंत आया, हीरोइन पर जवानी आई।
यानी बसंत, पार्ट- एक हीरोइन को जवान बनाने के लिए आता है। इसलिए पूरी फिल्म में उपरोक्त बसंत एक बार आता है। वैसे तो हर हीरोइन बसंत के आने पर ही जवान होती है, लेकिन कोई बसंत के आने से पहले जवान हो जाए तो फिर बसंत, पार्ट- एक उस फिल्म में नहीं आता, क्योंकि जिस काम के लिए उसे आना था, वह काम तो हो गया।

ट्रम्प कार्डःफिल्म-समीक्षा

कलाकार : पंकज गुप्ता , विक्रम कुमार , हैदर खान , मानसी , विश्वजीत प्रधान
प्रड्यूसर : रीमा गुप्ता
डायरेक्टर : अरशद खान
संगीत : ललित पंडित
सेंसर सार्टिफिकेट : यू /
अवधि : 127 मिनट
रेटिंग : /photo.cms?msid=5681849
है , जिनमें तो बिकाऊ स्टार्स है और ही जाने - माने बैनर का सहारा है। ट्रंप कॉर्ड एक ऐसी ही फिल्म है। इसे थ्री इडियट्स के साथ रिलीज होना था , लेकिन किसी वजह से यह उस वक्त रिलीज हो नहीं पाई।

कहानी : फिल्म की कहानी तीन दोस्तों राहुल , राज और वीर की है। इनकी दोस्ती में उस वक्त बदलाव आता है , जब रानी यशोधरा देवी की वसीयत सामने आती है। वसीयत के मुताबिक , रानी की करीब 900 करोड़ की दौलत में इन तीनों का बराबर - बराबर का हिस्सा है। लेकिन इस वसीयत में एक अनोखी बात है। अगर इनमें से कोई एक गायब होता है या मिल नहीं पाता , तो रकम के दो हिस्से होंगे और अगर दो नहीं मिलते तो पूरी रकम इन तीनों में से बचे हुए इंसान को दे दी जाएगी। वसीयत में यह भी है कि अगर ये तीनों ही नहीं मिलते तो पूरी रकम एक एनजीओ चलाने वाले मल्होत्रा को सौंप दी जाएगी।

ऐक्टिंग : सीमित बजट में नई स्टार कास्ट के साथ बनी इस फिल्म में आमिर खान के सौतेले भाई हैदर खान हैं। पूरी फिल्म पंकज , विक्रम और हैदर के आसपास टिकी है और इन तीनों ने बस अपना काम निभा भर दिया है। फिल्म में न्यूकमर उर्वशी चौधरी और मानसी भी हैं। लेकिन दर्शकों को खींचने के लिए इनसे ऐक्टिंग से ज्यादा ब्यूटी परोसने का कॉम्पिटिशन करवा दिया गया है।

डायरेक्शन : शायद फिल्म के डायरेक्टर ने पहले से ही अपनी फिल्म के लिए खास क्लास को टारगेट कर लिया था , यही वजह रही कि उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ तड़के पर ही रहा।

संगीत : कभी जतिन - ललित की जोड़ी के जतिन पंडित का संगीत कहानी की डिमांड पर फिट बैठता है।

क्यों देखें : अगर वक्त काटने का कोई और विकल्प नहीं है तो चले जाइए।
(चंद्रमोहन शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,14.3.2010)

Saturday, March 13, 2010

इस हफ्ते की तीन फिल्में

"राइट या रॉन्ग"," हाइड एंड सीक"," न घर के न घाट के"- ये तीनों इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्मों के नाम हैं। ये फिल्में दर्शकों को भी सिनेमाहॉल में ऐसी ही स्थिति में छोड़ती हैं कि वह समझ नहीं पाता कि फिल्म देखने का उसका निर्णय क्या था - राइट या रॉन्ग। जवाब की तलाश में वह अपने मन से हाइड एंड सीक खेलता है और पाता है कि वह न घर का है न घाट का। इनमें से कोई भी फिल्म किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं कही जा सकती है। न तो उनमें कथानक है, न ही पटकथा। सिनेमैटिक विजन तो बहुत दूर की बात है।

पहले राइट या रॉन्ग की बात करते हैं। फिल्म एक ईमानदार अफसर को अपनी पत्नी से मिले धोखे को दर्शाती है। अफसर उसका बदला अपनी पत्नी और भाई को मारकर लेता है जो उसके पीठ पीछे रास रचाते हैं। अब उसके दोस्त अफसर के सामने संकट है कि वह क्या करे। अपने दोस्त को सजा दिलवाए या दोस्ती के नाम पर छोड़ दे। दोस्त कानून की राह पकड़ता है पर किसी भी तरह उसे हत्यारा साबित नहीं कर पाता। अंत में हत्यारा खुद अपना गुनाह कुबूल करता है लेकिन वही दोस्त अब दोस्ती की खातिर उसे जाने देता है। फिल्म इरफान के अंतर्संघर्ष को अंत में खुद ही बेमानी साबित कर देती है। इरफान खान फिल्म में जमते हैं। सन्नी देओल लंबे समय बाद की इस वापसी में निष्प्रभावी दिखते हैं। यह फिल्म दर्शकों को प्रभावित नहीं कर पाती।

हाइड एंड सीक एक खेल है जो हम बचपन में खूब खेलते हैं। जाहिर सी बात है इस छुपने-छुपाने के खेल में कुछ बदमाशियां भी होती हैं। यह फिल्म छह दोस्तों की कहानी है जो ऐसे ही एक गेम के शिकार हैं। उस एक रात ने उनकी सारी जिंदगी बदल दी। अब बारह साल बाद वह फिर से ऐसे ही एक खेल में फंस जाने को मजबूर कर दिए जाते हैं जब कोई उन्हें एक मॉल में खींच लाता है और हाइड एंड सीक खेलने का मजबूर करता है। पूरी फिल्म इसी छुपाछुपी और आपसी खींचतान में गुजर जाती है। कई नए राज खुलते हैं और बारह साल पहले हुई घटना की सच्चाई भी। लेकिन दर्शकों को इससे कुछ खास हाथ नहीं आता। हां, नए अभिनेता अपना प्रभाव छोड़ते हैं खासकर अर्जन बाजवा और समीर कोचर।

न घर के न घाट के ग्रामीण पृष्ठभूमि से शहर आए व्यक्ति पर व्यंग्यबाण छोड़ती है लेकिन उनकी जीवंतता को भी दर्शाती है। फिल्म में निर्देशक ने खुद को ही अभिनेता के तौर पर प्रोमोट किया है। यह फिल्म कुछ हंसी के पल भले देती है पर दर्शकों को बांध नहीं पाती। ओम पुरी, रवि किशन और परेश रावल कुछ दृश्यों में जान डालते हैं पर फिल्म हिट होने के लिए इतना काफी नहीं होता।
(मृत्युंजय प्रभाकर,नई दुनिया,दिल्ली,13.2.10)