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Wednesday, December 12, 2012

नीला आसमां सो गया....



 " है रूप में वो खटक, वो रस, वो झंकार
                 कलियों के चटकते वक्त जैसे गुलजार
या नूर की उंगलियों से देवी कोई
   जैसे शबे-माह में बजाती हो सितार "
                                
                                       - फ़िराक़

Friday, October 26, 2012

व्यंग्य का पॉवर-कट

अपनी बेलाग बातों, अटपटी भाषा, व्यंग्यात्मक शैली और खुले विचारों से आम आदमी को गुदगुदाने वाले हंसी के बादशाह जसपाल भट्टी बृहस्पतिवार को रुला गए। तड़के जालंधर के निकट शाहकोट में सड़क दुर्घटना में 57 वर्षीय हास्य कलाकार तथा फिल्म निर्माता का निधन हो गया। इस हादसे में उनका बेटा जसराज तथा उनकी फिल्म की नायिका सुरीली गौतम गंभीर रूप से घायल हो गए। ‘उल्टा पुल्टा’ और ‘फ्लाप शो’ जैसे व्यंग्यात्मक प्रस्तुतियों के जरिये आम आदमी की समस्याओं को उठाया था। उनके ये दोनों शो 1980 के दशक के आखिर और 1990 के दशक के शुरू में दूरदर्शन के सुनहरे दौर में दर्शकों को गुदगुदाने में सफल रहे थे। बहुत छोटे बजट की श्रृंखला ‘फ्लॉप शो’ तो मध्यम वर्ग के लोगों की समस्याओं को विशिष्टता के साथ उठाने के लिए आज भी याद की जाती है। दुर्घटना के वक्त जसपाल भट्टी फिल्म पावर कट का प्रोमोशन कर लौट रहे थे जो पंजाब में लगातार की जाने वाली बिजली कटौती पर आधारित है।। यह फिल्म इसी शुक्रवार को रिलीज हो रही है। आज नभाटा ने उन पर संपादकीय लिखा हैः 

"टीवी में हंसी अभी जिस तरह एक प्रॉडक्ट की तरह बेची जा रही है, उसे जेहन में रख कर जसपाल भट्टी के बारे में कोई राय नहीं बनाई जा सकती। जब देश का ज्यादातर टीवी परिवेश ब्लैक ऐंड वाइट था और आम लोगों के लिए इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ दूरदर्शन हुआ करता था, तब जसपाल भट्टी ने अपने छिटपुट कार्यक्रमों के जरिये हमें हंसी की ताकत समझाई थी। 'उल्टा-पुल्टा' नाम से आने वाले उनके छोटे-छोटे कैपसूलों के लिए लोग जम्हाइयां लेते हुए दूरदर्शन के लंबे-लंबे समाचार विश्लेषण देख जाया करते थे। फिर दस एपिसोड चले फ्लॉप शो ने तो कमाल ही कर दिया। इसमें भट्टी और उनके पात्र अलग से कुछ कहने की कोशिश नहीं करते थे। जो कुछ लोगों के इर्द-गिर्द चल रहा होता था, उसी को चुस्त फिकरों और सधी हुई स्क्रिप्ट में बांधकर पेश कर दिया जाता था। इतने कम खर्चे में कि अभी चल रहे किसी भी सीरियल के एक एपिसोड में फ्लॉप शो के दसों एपिसोड बन जाएं और कुछ पैसे उसके बाद भी बचे रहें। 

सरकारी इंजिनियरों और बिल्डरों की सांठ-गांठ पर केंद्रित इसके एक एपिसोड में एक पुरानी फिल्मी कव्वाली 'इशारों को अगर समझो, राज को राज रहने दो' को इस तरह पेश किया गया कि काफी समय तक लोगों को असली गाना ही भूल गया। ध्यान रहे, उल्टा-पुल्टा और फ्लॉप शो का समय वही था, जब पंजाब खालिस्तानी हिंसा का शिकार था और पूरे देश में यह शक पैदा हो गया था कि अपनी जिंदादिली के लिए पूरी दुनिया में मशहूर इस राज्य का जनजीवन कभी पटरी पर आ पाएगा या नहीं। उस कठिन दौर में सोशल-पॉलिटिकल कॉमिडी के सरताज जसपाल भट्टी और गजलों के बादशाह जगजीत सिंह ने अपने-अपने हुनर के जरिये बिना किसी शोरशराबे के देश को कुछ खतरनाक स्टीरियोटाइप्स का शिकार होने से बचा लिया। 

उसी माहौल में किसी ने भट्टी से पूछा था कि आपने हर चीज पर अपनी धार आजमाई, लेकिन पंजाब समस्या पर कुछ क्यों नहीं कहा? जवाब था कि जिसे भी मौका मिलता है, वह इस पर कुछ न कुछ कह ही डालता है, ऐसे में पंजाब समस्या पर मेरी चुप्पी को ही क्यों न इसके समाधान में मेरा योगदान मान लिया जाए। महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक हर बड़े मुद्दे पर अपने इसी धारदार विट के साथ जसपाल भट्टी अंत तक सक्रिय रहे और अपने पीछे एक रेखा खींचकर गए कि हास्य-व्यंग्य में किसी को कुछ खास करना है तो उसको यहां तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।"

राष्ट्रीय सहारा ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी हैः
मौजूदा दौर कड़वाहट और फूहड़ता के साझे का दौर है। यह साझा हम निजी से लेकर सार्वजनिक जीवन में हर कहीं देख सकते हैं। गंभीर विमर्श के खालीपन को आरोप-प्रत्यारोप, तर्क-कुतर्क और ज्ञान के वितंडावादी प्रदर्शन भर रहे हैं, तो हास्य और व्यंग्य की चुटिलता भोंडेपन में तब्दील होती जा रही है। ऐसे में जो काम जसपाल भट्टी कर रहे थे और जिस तरह की उनकी सोच और रचनाधर्मिता थी, वह महत्वपूर्ण तो था ही समय और परिवेश की रचना के हिसाब से एक जरूरी दरकार भी थी। भट्टी का सड़क दुर्घटना में असमय निधन काफी दुखद है। इसने तमाम क्षेत्र के लोगों को मर्माहत किया है। अपनी ऊर्जा और लगन के साथ वे लगातार सक्रिय थे। उनके जेहन और एजेंडे में तमाम ऐसे आइडिया और प्रोजेक्ट थे, जिस पर वे काम कर रहे थे। आज ही उनकी एक फिल्म ‘पावर कट’ रिलीज हो रही है, जिसका अब लोगों को पहले से भी ज्यादा बेसब्री से इंतजार है। भट्टी ने इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी पर उनकी हास्य-व्यंग्य के प्रति दिलचस्पी कॉलेज के दिनों से थी, जो बाद में और प्रखर होती गई। उनका हास्य नाहक नहीं बल्कि सामाजिक सोद्देश्यता से भरा था और उनकी चिंता के केंद्र में हमेशा आम आदमी रहा। आमजन के जीवन की बनावट, उसका संघर्ष और उसकी चुनौतियों को उन्होंने न सिर्फ उभारा बल्कि इस पर उनके चुटीले व्यंग्यों ने व्यवस्था और सत्ता के मौजूदा चरित्र पर भी खूब सवाल उछाले। नाटक से टीवी और सिनेमा तक पहुंचने के उनके रास्ते का आगाज दरअसल एक काटरूनिस्ट के तौर पर हुआ था। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि एक जमाने में जसपाल भट्टी ‘ट्रिब्यून’ अखबार के लिए काटरून बनाया करते थे। काटूर्निस्ट सुधीर तैलंग ने उनके निधन पर सही ही कहा कि एक ऐसे दौर में जब लोग हंसना भूल गए हैं और काटरून व व्यंग्य की दूसरी विधाओं के जरिए सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले शासन के कोप का शिकार हो रहे हैं, भट्टी की हास्य-व्यंग्य शैली का अनोखापन न सिर्फ उन्हें लोकप्रिय बनाए हुए था बल्कि वे अपने ‘मैसेज’ को लोगों तक पहुंचाने में सफल भी हो रहे थे। सही मायने में कहें तो जसपाल भट्टी के सरोकार जिस तरह के थे और जिस तरह के विषयों को वे सड़क से लेकर, नाटकों और टेलीविजन सीरियलों में उठाते रहे थे, वह उन्हें एक कॉमेडी आर्टिस्ट के साथ एक एक्टिविस्ट के रूप में भी गढ़ता था। विज्ञापन जगत और सिने दुनिया ने उनकी लोकप्रियता का व्यावसायिक इस्तेमाल जरूर किया पर खुद भट्टी कभी अपनी लीक और सरोकारों से नहीं डिगे। उनकी यह उपलब्धि खास तो है ही, उन लोगों के लिए एक मिसाल भी है, जो प्रसिद्धि की मचान पर चढ़ते ही जमीन से रिश्ता खो देते हैं। गौरतलब है कि उनका व्यक्तित्व पंजाबियत में रंगा था। उनके हास्य-व्यंग्य में भी पंजाबियत झांकती है। पंजाब की जमीन और लोगों से उनका रिश्ता आखिरी समय तक कायम रहा, जबकि इस बीच मुंबई की माया ने उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए हाथ खूब लंबे किए। जसपाल भट्टी की स्मृतियों को नमन।

Friday, July 8, 2011

नए सिनेमा के मणि

अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यम हैं तो अपने आप में स्वतंत्र और काफी समृद्ध भी पर इनके आपस के सरोकार और संबंध इस कारण पूरी तरह अलगाए या खारिज नहीं किए जा सकते। इस लिहाज से माना यही जाता है कि ये माध्यम स्वतंत्र जरूर हैं पर स्वायत्त या पूरी तरह मुक्त नहीं। तभी तो रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर प्रेमचंद तक को सेल्यूलाइड तक ले जाने वाले सत्यजीत रे आजीवन यह मानते और समझाते रहे कि वह किसी भी कृति पर फिल्म बनाने की शुरुआत नए सिरे से करते हैं। उनका तकाजा विधा बदलने के साथ कृति के आस्वाद को बदल जाने की जरूरत को खारिज नहीं करता जबकि मणि कौल जैसे फिल्मकार इस तकाजे को दरकिनार कर न सिर्फ कृति को केंद्र में लाये बल्कि साहित्यक रचनाओं के फिल्मांकन का नया व्याकरण भी रचा। कौल अब हमारे बीच नहीं हैं पर 66 वर्ष का उनका जीवन और उस दौरान की उनकी उपलब्धियां हमारे बीच हैं। गाली-गलौज, आइटम नंबर और बोल्डनेस की नई कायिक और भाषिक समझ के बीच जिस भारतीय सिने जगत का कद आज ग्लोबली तय हो रहा है, उसमें मणि कौल के फिल्म बनाने के तरीके और उससे जुड़े सरोकार जलती मशाल की तरह हैं जिससे अंधकार और भटकाव के दौरान हम रोशनी पा सकते हैं। दिलचस्प है कि कौल का फिल्मी सफर निर्देशन के बजाय राजेंद्र यादव की कहानी ‘सारा आकाश’ में अभिनय से शुरू हुआ था। यह आगाज ही साहित्य से उनको आगे और गहरे जोड़ते चला गया। ‘घासीराम कोतवाल’, ‘आषाढ़ का एक दिन, ‘दुविधा’ जैसे इंडियन क्लासिक्स से लेकर दोस्तोवस्की की ‘इडियट’ जैसी महान रचना का फिल्मांकन भी उन्होंने किया। कौल की यह खासियत तो रही ही कि वह साहित्यिक कृतियों की मूलात्मा को फिल्म में भी बहाल रखना चाहते थे, उन्होंने प्रचलित और लोकप्रिय कथारूपों के बजाय विभिन्न शैलियों की रचनाओं पर काम करने का जोखिम भी उठाया। जिस मुक्तिबोध पर बोलते और लिखते हुए आज भी हिंदी साहित्य के दिग्गजों तक के पसीने छूटते हैं, कौल ने उनकी ‘सतह से उठता हुआ आदमी’ को परदे पर उतारने का चैलेंज न सिर्फ लिया बल्कि उसे बखूबी पूरा भी किया। कौल के काम करने के ढंग और उनके सरोकारों के जानकार नए भारतीय सिनेमा के इस बड़े हस्ताक्षर को उनके सौंदर्यबोध के लिए भी याद करते हैं। यह अलग बात है कि यह सौंदर्यबोध सनसनी उभारने के बजाय संवेदना के आत्मिक स्पर्श का धैर्य लिये थे। यही कारण है कि कौल के कई आलोचक यह भी कहते रहे हैं कि उनके साहित्य प्रेम ने उन्हें कभी सौ फीसद फिल्मकार बनने ही नहीं दिया। क्योंकि कैमरे में क्या बेहतर और कितना समा सकता है, इसके उसूलों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। अलबत्ता यह भी है कि लैंस की नजरों पर भरोसा करने वाले उसे पीछे से देख रही मानवीय आंखों के चढ़ते-उतरते पानी को अगर खारिज कर सकते हैं तो उन्हें कौल जैसे फिल्मकार को ज्यादा समझने का खतरा भी नहीं लेना चाहिए। दरअसल, कौल इन्हीं आंखों को नम और चमक से भर देने वाले फिल्मकार थे(राष्ट्रीय सहारा,8.7.11)।

Thursday, March 24, 2011

नहीं रहीं लिज टेलर

अपनी मादक खूबसूरती, अत्याधुनिक रफ्तार भरी जीवन शैली और बिंदास बातों के लिए मशहूर हॉलीवुड के इतिहास की सबसे आकर्षक अभिनेत्री लिज टेलर का बुधवार को हृदयगति रुकने से निधन हो गया। वह 79 वर्ष की थीं। अस्वस्थ होने के कारण वह पिछले दो महीनों से लॉस एंजिलिस के सीडार्स-सिनाई अस्पताल में भर्ती थीं। जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तब उनके चारों बच्चे उनके पास थे। उनके दस नाती-पोते और चार पड़-नाती, पड़-पोते भी हैं। उनकी प्रवक्ता सैली मॉरीसन के हवाले से सीएनएन ऑनलाइन ने कहा कि लिज गंभीर रूप से बीमार थीं, फिर भी उन्हें विश्वास था कि वह स्वस्थ हो कर घर लौट जाएंगी। हॉलीवुड में उनकी शोहरत की मिसालें दी जाती है। माना जाता है कि नीली आंखों वाली लिज ने जितनी शोहरत अपने जीवन काल में पाई, वह किसी शख्स को आज तक हासिल नहीं हुई। उनकी खूबसूरती, उनका अभिनय और उनकी निजी जिंदगी हमेशा चर्चा का विषय रही। पूरी दुनिया में उन्हें चाहने वाले मौजूद हैं। अपनी आठ शादियों के अतिरिक्त पॉप संगीत के दिवंगत बादशाह माइकल जैक्सन के साथ उनकी मित्रता ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। उनकी बिंदास जीवन शैली ने अगर असंख्य दिल जीते, तो जाने कितने दिल तोड़े भी। अभिनेता रिचर्ड बर्टन के साथ उनके प्रेम और विवाह ने खूब चर्चा पाई। बर्टन से लिज ने दो बार शादी की और दो बार तलाक लिया। हॉलीवुड की फिल्म और टेबुलायड पत्रकारिता को ग्लैमरस बनाने में उनके जीवन से पांचवें और छठे दशक में जुड़े स्कैंडलों का का बड़ा योगदान रहा। एलिजाबेथ टेलर का निधन हॉलीवुड सिनेमा के एक युग का अंत है।
पूरा नाम : डेम एलिजाबेथ रोजमंड टेलर। वह लिज टेलर के नाम से लोकप्रिय हुईं। 
बाल कलाकार : लिज की मां रंगमंच की अभिनेत्री थीं। लिज ने बाल कलाकार के रूप में फिल्मी दुनिया में कदम रखा। मात्र नौ साल की उम्र में पहली फिल्म देयर इज वन बॉर्न एवरी मिनट की। निर्माता कंपनी, यूनिवर्सल पिक्चर्स ने उनका आगे का अनुबंध रद कर दिया और कहा कि नन्हीं लिज को न नाच आता है, न गाना और न अभिनय। 
पहली सफलता : फिल्म नायिका के रूप में उन्हें पहली सफलता अ प्लेस इन द सन (1951) में मिली। उस वक्त उनकी उम्र 21 वर्ष थी। 
ऑस्कर : लिज को तीन ऑस्कर अवार्ड मिले। बटरफील्ड 8 (1960) और हू इज अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वूल्फ (1966) फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए। उन्हें तीसरा ऑस्कर मानवता की सेवा के कार्यो के लिए 1993 में दिया गया। 
प्रमुख फिल्में : पांचवे दशक में वह हॉलीवुड की सबसे बड़ी शख्सीयत के रूप में उभरीं। उनकी प्रमुख फिल्में हैं-फादर ऑफ द ब्राइड, अ प्लेस इन द सन, बटरफील्ड 8, रेन ट्री कंट्री, हू इज अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वूल्फ, कैट ऑन द हॉट रूफ टिन, सडनली लास्ट समर, द अपार्टमेंट, क्लियोपेट्रा। 
सबसे पहले 10 लाख : टेलर हॉलीवुड की पहली अभिनेत्री थीं, जिन्होंने फिल्म के लिए 10 लाख डॉलर की फीस प्राप्त की। 1960 में उन्होंने ट्वेंटिएथ सेंचुरी फॉक्स कंपनी से फिल्म क्लियोपेट्रा के लिए यह रकम ली। फिल्म तीन साल में बनकर पूरी हुई। करीब साढ़ चार करोड़ डॉलर में अपनी अपने समय की यह सबसे महंगी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। 
शादियां और संतानें : एलिजाबेथ टेलर की ख्याति आठ शादियों के लिए भी है। उनके सात पति थे। अभिनेता रिचर्ड बर्टन से उन्होंने दो बार शादी की। उनके दो बेटे और दो बेटियां हुई(दैनिक जागरण,24.3.11)।

Wednesday, July 28, 2010

रवि वासवानी नहीं रहे

भारतीय सिनेमा के इतिहास की एक बेहद चर्चित और महत्वपूर्ण फिल्म 'जाने भी दो यारो' के अभिनेता रवि वासवानी का मंगलवार को ह्वदयाघात से निधन हो गया। मुम्बई से प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका निधन नैनीताल से दिल्ली ले जाते समय हुआ। वासवानी 64 वर्ष के थे1 उन्होंने अपना फिल्मी करियर 1981 में चश्मे बद्दूर फिल्म से शुरू किया था। जाने भी दो यारों फिल्म के लिए उन्हें 1984 में फिल्मफेयर का श्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार मिला था।उन्होंने टेलीविजन पर भी काम किया। फिल्म ‘बंटी और बबली’ एवं ‘प्यार तून क्या किया’ में चरित्र भूमिकाएं भी कीं।

Wednesday, June 2, 2010

नहीं रहीं उजरा बट

प्रसिद्ध थियेटर अभिनेत्री और भारतीय अभिनेत्री जोहरा सहगल की बहन उजरा बट का पूर्वी पाकिस्तान के सांस्कृतिक शहर लाहौर में निधन हो गया है। वह ९३ वर्ष की थीं। बट ने अपना अंतिम स्टेज कार्यक्रम २००८ में दी थी। उन्होंने अपना ९३ वां जन्मदिन २२ मई को अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाया था।

भारत में उत्तराखंड के रामपुर में १९१७ में जन्मी बट ने अपने कैरियर की शुरुआत नृत्यांगना के रूप में १९३७ में की थी। १९४० और १९५० के बीच वह प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर की महत्वपूर्ण महिला में शुमार हो गई। उन्होंने ख्वाजा अहमद अब्बास के नाटक जुबैदा में अभिनय किया और पृथ्वीराज कपूर के साथ महत्वपूर्ण रोल की। पृथ्वी थियेटर के साथ कई वर्षों तक जुड़ी रही बट ने शंकुतला, पठान, किसान, गद्दार और दिवार में अपनी बहन जोहरा के साथ काम किया और लगभग पूरे अविभाजित भारत का अपने समूह के साथ दौरा की। लेकिन १९६४ में वह अपने पति हामिद बट के साथ पाकिस्तान चली गईं। वे रावलपिंडी में शांति का जीवन गुजारने लगीं। बाद में अक्टूबर १९८५ में वह अजोका थियेटर में शामिल हो गईं।

वह इस समूह की अध्यक्ष भी बनी। अजोका के साथ उन्होंने पहला नाटक चाक चक्कर किया था। उन्होंने इस समूह के साथ बारी, दुखनी, दुख दरिया, तालिसमती टाटा, तीसरी दस्तक, काली घटा, अधुरी जैसे प्रसिद्ध नाटक किए।
(नई दुनिया,दिल्ली,2 जून,2010. चित्र में बहन जोहरा सहगल के साथ उजरा बट)

Tuesday, June 1, 2010

नदिया के पार और गोविंद मूनीस

राजश्री की जज्बाती 'दोस्ती' ज्यादातर लोगों की फेवरिट फिल्म रही होगी। लेकिन इसकी चुस्त स्क्रिप्ट और दमदार डायलॉग के राइटर का नाम कितने लोग बता पाएंगेक् इसी बैनर की एक और यादगार 'नदिया के पार' आज भी ऑडियंस को लुभाती है, पर कितने दर्शकों को इस सुपर हिट फिल्म के डायरेक्टर का नाम याद होगा? इन फिल्मों में अपने लेखन और निर्देशन का कमाल दिखाने वाले फनकार का नाम है- गोविंद मूनीस, जो अब सिर्फ यादों में सिमटकर रह गए हैं। पांच मई को मूनीस जीवन के पार चले गए।
चढते सूरज को सलाम करने वाली फिल्मी दुनिया में मूनीस की विदाई पर कोई हलचल नहीं हुई। किसी कामयाब फिल्म में मामूली रोल करने वाले कलाकार अखबारों में पहले पेज पर मुकाम पा जाते हैं और परदे के पीछे काम करने वाली हस्तियां अक्सर पीछे रह जाती हैं। कभी-कभी तो निधन की खबर तक नहीं छपती। गुणी लेखक-निर्देशक गोविंद मूनीस भी खामोशी से गुजर गए।
उत्तरप्रदेश में उन्नाव जिले के पासाखेडा में 2 जनवरी 1929 में जन्मे गोविंदनारायण दुबे लिखने-पढने के संस्कार लेकर पले-बढे। बाद में 'मूनीस' उपनाम अपनाया और अपना साहित्यिक सफर शुरू किया। 1952 में वे कोलकाता पहुंचे, जहां सिने कला के धनी ऋत्विक घटक ने उन्हें अपना सहायक बना लिया। घटक उन दिनों बांग्ला में अपनी पहली फिल्म 'बेदिनी' बना रहे थे, जो अधूरी रह गई। फिर ऋत्विक'दा ने 'नागरिक' शुरू की, जो 1954 में पूरी तो हुई, पर 23 साल बाद रिलीज हो पाई। ऋत्विक घटक से फिल्मी गुर लेकर मूनीस अगले साल मुंबई चले आए और बंगाल के ही एक और काबिल फिल्मकार सत्येन बोस के असिस्टेंट बन गए। बाद में वे सत्येन'दा की फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखने लगे और उनकी लगभग हर फिल्म से जुडे रहे। 'जागृति'(1954), 'बंदिश'(1955), 'चलती का नाम गाडी' (1958) और 'मासूम'(1960) मूनीस की शुरूआती फिल्में हैं।
सत्येन बोस की क्लासिक फिल्म 'दोस्ती'(1964) से गोविंद मूनीस बतौर लेखक बुलंदी पर पहंुचे। एक नेत्रहीन और एक अपाहिज की अनूठी दोस्ती पर आधारित, बिलकुल नए कलाकारों को लेकर बनी राजश्री प्रोडक्शन की इस इमोशनल फिल्म, इसके संवाद तथा गीत-संगीत को याद करके लोग आज भी भावविभोर हो जाते हैं। बांग्ला फिल्म 'लालू भुलु' की इस हिंदी रीमेक के असरदार संवादों के लिए गोविंद मूनीस को बेस्ट डायलॉग राइटर के फिल्मफेअर अवार्ड से सम्मानित किया था। 'दोस्ती' के बाद मूनीस ने सत्येन बोस निर्देशित 'आसरा', 'मेरे लाल', 'रात और दिन', 'जीवन मृत्यु' और 'उपहार' जैसी फिल्मों को अपने दमदार लेखन से सजाया। जीवन मूल्य, नैतिक मर्यादा, सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक परंपराएं और परिवेश उनके लेखन की विशेषता रही।
मूनीस को भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति अपनी जन्मभूमि से विरासत में मिली थी। संयोग से स्वतंत्र निर्देशन का पहला मौका भी उन्हें अपनी मातृभाषा की फिल्म में ही मिला। 1966 में बनी यह फिल्म थी-'मितवा'। इसमें परदे पर अमिता और शेखर तथा परदे के पीछे शैलेंद्र और सी. रामचंद्र की जोडी थी। लेकिन तब तक भोजपुरी सिनेमा का पहला दौर बीत चुका था। राजश्री की भोजपुरी रंगों में रची-बसी 'नदिया के पार' (1982) का लेखन-निर्देशन करके गोविंद मूनीस देशभर में छा गए। मूनीस ने इसके बाद राजश्री की 'बाबुल', बी. पी. शाहाबादी की 'ससुराल', शिवानी की रचना पर 'बंधन बाहों का' और 'साजन का दर्द' जैसी पारिवारिक फिल्मों का लेखन/निर्देशन किया, पर 'दोस्ती' और 'नदिया के पार' जैसी शोहरत और कामयाबी दोहरा नहीं पाए। मूनीस ने इस दौरान छोटे परदे पर धारावाहिक 'डॉन' के अलावा'रिश्ते', 'गुब्बारे' और 'बेस्टसेलर्स' जैसे शो के चुनिंदा एपीसोड भी डायरेक्ट किए। भोजपुरी में बनी 'गंगा जइसन पावन पिरीतिया हमार'(2004) बतौर निर्देशक उनकी आखिरी फिल्म थी। अपने पडोस में रहने वाली माधुरी दीक्षित को मूनीस ने ही राजश्री कैंप में इंट्रोड्यूस किया था।
बहुत कम लोग जानते हैं कि गोविंद मूनीस गीतकार भी थे। सत्येन बोस की 'ज्योत जले'(1968), 'आंसू बन गए फूल'(1969) और 'तुम्हारे बिना'(1981) सरीखी गिनी-चुनी फिल्मों में उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा का इस्तेमाल किया था। 'आंसू बन गए फूल' का पॉपुलर गाना 'जाने कैसा है मेरा दीवाना, कभी अपना सा लगे कभी बेगाना' उन्हीं की कलम से निकला था। मूनीस ने ही राजश्री बैनर की 40 फिल्मों के 80 लोकप्रिय, सरस गानों को लेकर 1986 में 'रिमझिम गीतों की' टाइटल से फुल लेंथ संकलन पेश किया था। फिल्मों में लेखक-निर्देशक तो आएंगे-जाएंगे, पर 'दोस्ती' जैसा मजबूत राइटर और 'नदिया के पार' जैसा गहरा डायरेक्टर फिर कहां पाएंगे!
(एम. डी. सोनी,राजस्थान पत्रिका,29 मई,2010)

Monday, May 24, 2010

वह पचास हज़ारी वन लाइनर

मोहन माखीजानी अर्थात् मैकमोहन की पहली फिल्म हकीकत 1964 में रिलीज हुई थी और शोले आई थी 1975 में। इन ग्यारह वर्षों में उन्होंने कुल 25 फिल्मों में काम किया। आवाज़,कद-काठी,स्टाइल-किसी भी एंगल से उनका करिअर आश्वस्त नहीं करता था। खलनायक के तौर पर तो कतई नहीं। मगर बाद के पैंतीस वर्षों में उन्हें 175 फिल्में मिलीं और इनमें से अधिकतर में वे खलनायक थे ।यह संभव हुआ था शोले से। गब्बर पूछता है, "अरे ओ सांभा, कितना इनाम रखा है सरकार हम पर"? और सांभा बने मैकमोहन जवाब देते हैं, "पूरे पचास हजार।" पूरी फिल्म में बस एक डायलॉग। शोले से पहले उनके खाते में आया सावन झूम के,अभिनेत्री,हंसते ज़ख्म,हीरा-पन्ना,जंजीर और मज़बूर जैसी हिट फिल्में शामिल थीं। मगर, मैकमोहन के करियर को मानो इस वन लाइनर का ही इंतज़ार था । ऐसा कोई उदाहरण बिरले ही मिले जब किसी एक डायलॉग के बूते ही किसी कलाकार का करियर इतना लंबा खिंचा हो। संवाद लेखन की विधा को सलीम-जावेद ने जिस ऊंचाई पर पहुंचाया था,वह हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक मिसाल है। उनके हिस्से में और भी नगीने हैं मगर मैकमोहन का पूरा करियर इस पचास हजारी डायलॉग का पर्याय बन गया। 22 मई के राजस्थान पत्रिका में,प्रदीप सरदाना जी ने उन्हें याद किया हैः
"ऑल टाइम हिट और एवरग्रीन फिल्म 'शोले' का लगभग हर किरदार लोगों को आज भी याद है। इन्हीं में एक किरदार है सांभा का, जिसे परदे पर मैक मोहन ने प्ले किया था। 10 मई को मैक इस दुनिया से कूच कर गए, हमेशा के लिए हमारी यादों का हिस्सा बन गए।
मैक मोहन के निधन के साथ बॉलीवुड से एक ऎसे शख्स की विदाई हो गई, जो फिल्मों में ज्यादातर 'बैड मैन' के रोल करता था, पर असल जिंदगी में एक जेंटलमैन था। एक ऎसा इंसान, जिसके दोस्त दूर-दूर तक थे, पर दुश्मन ढूंढे से भी नहीं मिलता था। उन्होंने अपनी जिंदगी पूरे स्टाइल से जी, पर स्टाइलिश लाइफ में भी उनकी सादगी और शराफत देखते ही बनती थी। मैक ने 200 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें बडे रोल भी थे और छोटे भी। पर मैक को जिस रोल से सबसे ज्यादा लोकप्रियता और पहचान मिली वह 'शोले' में सांभा का रोल था। लाहौर में 24 अप्रेल 1938 को जन्मे मोहन मखीजानी (मैक का असली नाम) देश विभाजन के बाद लखनऊ आ गए। पढाई के साथ क्रिकेट का भी उन्हें बहुत शौक था। बीए ऑनर्स की पढाई के बाद क्रिकेटर बनने का सपना लेकर वे साठ के दशक में मुंबई आ गए। पर क्रिकेटर बनने की बजाय वे थिएटर पहंुच गए, जहां एक्टर बनने की तमन्ना जाग उठी। शुरू में वे इप्टा से जुडे, फिर फिल्मालय एक्टिंग स्कूल से एक्टिंग भी सीखी। बाद में वे चेतन आनंद के सहायक बन गए। 1964 में चेतन आनंद ने ही अपनी फिल्म 'हकीकत' में मैक को एक रोल दिया। हिंदी के अलावा मैक ने पंजाबी, हरियाणवी, बांग्ला और दक्षिण की फिल्मों में भी काम किया। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में उनकी शुरूआत बृजमोहन नाम से हुई। पर उनके दोस्त उन्हें मोहन मखीजानी की जगह मैक या मैकी कहकर बुलाते थे। इसीलिए इंडस्ट्री में वे मैक के रूप में मशहूर हो गए। कुछ फिल्में उन्होंने मैक नाम से की और 1973 में आई 'शरीफ बदमाश' से उनका फिल्मी नाम मैक मोहन हो गया। बाद में उन्होंने 'हंसते जख्म', 'हीरा पन्ना', 'प्रेम कहानी', 'अनहोनी', 'हिमालय से ऊंचा', 'मनोरंजन', 'रफू चक्कर', 'विश्वनाथ', 'छैला बाबू', 'जॉनी दुश्मन', 'लहू के दो रंग', 'कर्ज', 'कुर्बानी', 'धरमकांटा', 'हादसा' और 'नाखुदा' जैसी कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए। यह एक संयोग ही है कि उनकी सबसे ज्यादा फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ रहीं। अमिताभ की पहली हिट फिल्म 'जंजीर' से दोनों का साथ ऎसा बना, जो 'मजबूर', 'कसौटी', 'महान', 'सत्ते पे सत्ता', 'काला पत्थर', 'हेरा फेरी', 'खून पसीना', 'ईमान-धर्म', 'डॉन', 'दोस्ताना', 'शान', 'अजूबा' और 'लाल बादशाह' जैसी कई फिल्मों तक चलता रहा।
एक वक्त था, जब मैक मोहन इतने बिजी थे कि दो-दो शिफ्ट में काम करते थे। पर बाद में काम काफी कम हो गया। इस बीच में उन्होंने कुछ सीरियल भी किए, जिनमें 'झरोखा', 'ग्राहक दोस्त', 'कृष्णा अर्जुन' और 'कोई है' शामिल हैं। हाल के और में वे 'उलझन', 'सोच', 'स्टम्प्ड', 'इंसान' और 'जर्नी बॉम्बे टू गोवा' जैसी फिल्मों में नजर आए थे। उनकी आखिरी फिल्म जोया अख्तर की 'लक बाई चांस' थी। उन्हें हालिया रिलीज फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' के लिए साइन किया गया था, पर उन्हीं दिनों उनकी तबीयत खराब हो गई। उन्हें कोकिला बेन अस्पताल ले जाया गया, जहां उनके फेफडे में कैंसर का पता लगा। पिछले एक साल से वे अस्पताल के चक्कर लगाते रहे। 10 मई को थककर उन्होंने अस्पताल में दम तोड दिया।"
(ऊपर के चित्र में-मैकमोहन की बेटी अंतिम संस्कार के समय। बीबीसी डॉट कॉम से साभार)

Saturday, February 20, 2010

भोजपुरी फिल्म प्रोड्यूसर नवीन सिंह आत्महत्या कर लेलन

उनुकर फिलिम तू जान हउ हमार 5 मार्च के रिलीज होखे के रहे। एह फिलिम मे पवन सिंह आ उपासना सिंह के अलावा रउआ शक्ति कपूर के भी देखब।


Thursday, February 18, 2010

निर्मल पांडेःस्मृति शेष

(निर्मल पांडे की पत्नी अर्चना)
फूलन देवी के वास्तविक जीवन पर बनी शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में विक्रम मल्लाह के किरदार से चर्चित हुए निर्मल पांडे का आज दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे महज 48 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी अर्चना पांडेय (लखनऊ की सिटी मांटेसरी स्कूल की प्रिंसिपल) और दो बच्चे हैं। दायरा(जिसमे महिला की भूमिका निभाने के लिए उन्हे 1996 में फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का वेलेंती पुरस्कार और अपने यहां भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था),इस रात की सुबह नही,गॉडमदर,प्यार किया तो डरना क्या,हद कर दी आपने,प्यार किया तो डरना क्या,शिकारी, ट्रेन टू पाकिस्तान,दीवानगी और आजा नचले आदि उनकी कुछ अन्य चर्चित फिल्में थीं। उनकी अगली फिल्म लाहौर है जो 19 मार्च को रिलीज हो रही है और जिसमें उनके साथ आप अनहद,श्रद्धा दास,सव्यसाची चक्रवर्ती और नफीसा अली को देखेंगे। वे एक बेहतरीन गायक और गीतकार भी थे। 2002 में उनका एक एलबम जज्बा रिलीज हुआ था। धर्मवीर भारती के बहुचर्चित नाटक अंधायुग का निर्देशन भी उन्होंने किया था। निर्मल पांडे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पैदाईश थे। निर्मल पांडे के पिता उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट तहसील के पान गांव के मूल निवासी थे। जो नैनीताल आकर बस गए थे। निर्मल पांडे की शिक्षा-दीक्षा नैनीताल में ही हुई थी। उनका परिवार आज भी नैनीताल में ही रहता है। उनका भाई नैनीताल क्लब का व्यवस्थापक है। निर्मल पांडे नैनीताल की संस्था युगमंच से लंबे समय तक जुड़े रहे थे। वे गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में एक अभिनय प्रशिक्षण संस्थान खोलने पर बहुत गंभीरता से काम कर रहे थे। इस बारे में और अधिक जानकारी के इस लिंक पर उपलब्ध है।

निर्मल पांडे के बारे में और जानने के लिए क्लिक करें।