" है रूप में वो खटक, वो रस, वो झंकार
कलियों
के चटकते वक्त जैसे गुलजार
या
नूर की उंगलियों से देवी कोई
जैसे शबे-माह में बजाती हो सितार "
- फ़िराक़
इस ब्लॉग पर केवल ऐसी ख़बरें लेने की कोशिश है जिनकी चर्चा कम हुई है। यह बहुभाषी मंच एक कोशिश है भोजपुरी और मैथिली फ़िल्मों से जुड़ी ख़बरों को भी एक साथ पेश करने की। आप यहां क्रॉसवर्ड भी खेल सकते हैं।
भारतीय सिनेमा के इतिहास की एक बेहद चर्चित और महत्वपूर्ण फिल्म 'जाने भी दो यारो' के अभिनेता रवि वासवानी का मंगलवार को ह्वदयाघात से निधन हो गया। मुम्बई से प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका निधन नैनीताल से दिल्ली ले जाते समय हुआ। वासवानी 64 वर्ष के थे1 उन्होंने अपना फिल्मी करियर 1981 में चश्मे बद्दूर फिल्म से शुरू किया था। जाने भी दो यारों फिल्म के लिए उन्हें 1984 में फिल्मफेयर का श्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार मिला था।उन्होंने टेलीविजन पर भी काम किया। फिल्म ‘बंटी और बबली’ एवं ‘प्यार तून क्या किया’ में चरित्र भूमिकाएं भी कीं।
राजश्री की जज्बाती 'दोस्ती' ज्यादातर लोगों की फेवरिट फिल्म रही होगी। लेकिन इसकी चुस्त स्क्रिप्ट और दमदार डायलॉग के राइटर का नाम कितने लोग बता पाएंगेक् इसी बैनर की एक और यादगार 'नदिया के पार' आज भी ऑडियंस को लुभाती है, पर कितने दर्शकों को इस सुपर हिट फिल्म के डायरेक्टर का नाम याद होगा? इन फिल्मों में अपने लेखन और निर्देशन का कमाल दिखाने वाले फनकार का नाम है- गोविंद मूनीस, जो अब सिर्फ यादों में सिमटकर रह गए हैं। पांच मई को मूनीस जीवन के पार चले गए।
शराफत देखते ही बनती थी। मैक ने 200 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें बडे रोल भी थे और छोटे भी। पर मैक को जिस रोल से सबसे ज्यादा लोकप्रियता और पहचान मिली वह 'शोले' में सांभा का रोल था। लाहौर में 24 अप्रेल 1938 को जन्मे मोहन मखीजानी (मैक का असली नाम) देश विभाजन के बाद लखनऊ आ गए। पढाई के साथ क्रिकेट का भी उन्हें बहुत शौक था। बीए ऑनर्स की पढाई के बाद क्रिकेटर बनने का सपना लेकर वे साठ के दशक में मुंबई आ गए। पर क्रिकेटर बनने की बजाय वे थिएटर पहंुच गए, जहां एक्टर बनने की तमन्ना जाग उठी। शुरू में वे इप्टा से जुडे, फिर फिल्मालय एक्टिंग स्कूल से एक्टिंग भी सीखी। बाद में वे चेतन आनंद के सहायक बन गए। 1964 में चेतन आनंद ने ही अपनी फिल्म 'हकीकत' में मैक को एक रोल दिया। हिंदी के अलावा मैक ने पंजाबी, हरियाणवी, बांग्ला और दक्षिण की फिल्मों में भी काम किया। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में उनकी शुरूआत बृजमोहन नाम से हुई। पर उनके दोस्त उन्हें मोहन मखीजानी की जगह मैक या मैकी कहकर बुलाते थे। इसीलिए इंडस्ट्री में वे मैक के रूप में मशहूर हो गए। कुछ फिल्में उन्होंने मैक नाम से की और 1973 में आई 'शरीफ बदमाश' से उनका फिल्मी नाम मैक मोहन हो गया। बाद में उन्होंने 'हंसते जख्म', 'हीरा पन्ना', 'प्रेम कहानी', 'अनहोनी', 'हिमालय से ऊंचा', 'मनोरंजन', 'रफू चक्कर', 'विश्वनाथ', 'छैला बाबू', 'जॉनी दुश्मन', 'लहू के दो रंग', 'कर्ज', 'कुर्बानी', 'धरमकांटा', 'हादसा' और 'नाखुदा' जैसी कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए। यह एक संयोग ही है कि उनकी सबसे ज्यादा फिल्में अमिताभ बच्चन के साथ रहीं। अमिताभ की पहली हिट फिल्म 'जंजीर' से दोनों का साथ ऎसा बना, जो 'मजबूर', 'कसौटी', 'महान', 'सत्ते पे सत्ता', 'काला पत्थर', 'हेरा फेरी', 'खून पसीना', 'ईमान-धर्म', 'डॉन', 'दोस्ताना', 'शान', 'अजूबा' और 'लाल बादशाह' जैसी कई फिल्मों तक चलता रहा।
(निर्मल पांडे की पत्नी अर्चना)
फूलन देवी के वास्तविक जीवन पर बनी शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में विक्रम मल्लाह के किरदार से चर्चित हुए निर्मल पांडे का आज दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे महज 48 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी अर्चना पांडेय (लखनऊ की सिटी मांटेसरी स्कूल की प्रिंसिपल) और दो बच्चे हैं। दायरा(जिसमे महिला की भूमिका निभाने के लिए उन्हे 1996 में फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का वेलेंती पुरस्कार और अपने यहां भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था),इस रात की सुबह नही,गॉडमदर,प्यार किया तो डरना क्या,हद कर दी आपने,प्यार किया तो डरना क्या,शिकारी, ट्रेन टू पाकिस्तान,दीवानगी और आजा नचले आदि उनकी कुछ अन्य चर्चित फिल्में थीं। उनकी अगली फिल्म लाहौर है जो 19 मार्च को रिलीज हो रही है और जिसमें उनके साथ आप अनहद,श्रद्धा दास,सव्यसाची चक्रवर्ती और नफीसा अली को देखेंगे। वे एक बेहतरीन गायक और गीतकार भी थे। 2002 में उनका एक एलबम जज्बा रिलीज हुआ था। धर्मवीर भारती के बहुचर्चित नाटक अंधायुग का निर्देशन भी उन्होंने किया था। निर्मल पांडे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पैदाईश थे। निर्मल पांडे के पिता उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले की द्वाराहाट तहसील के पान गांव के मूल निवासी थे। जो नैनीताल आकर बस गए थे। निर्मल पांडे की शिक्षा-दीक्षा नैनीताल में ही हुई थी। उनका परिवार आज भी नैनीताल में ही रहता है। उनका भाई नैनीताल क्लब का व्यवस्थापक है। निर्मल पांडे नैनीताल की संस्था युगमंच से लंबे समय तक जुड़े रहे थे। वे गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में एक अभिनय प्रशिक्षण संस्थान खोलने पर बहुत गंभीरता से काम कर रहे थे। इस बारे में और अधिक जानकारी के इस लिंक पर उपलब्ध है।