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Monday, December 5, 2011
देवानंद की कहानी,नीरज की ज़ुबानी
Sunday, April 17, 2011
गीतों के राजकुमार थे गोपाल सिंह नेपाली
Wednesday, March 9, 2011
हिन्दी फिल्मों की पहली ड्रीमगर्ल थीं देविका रानी
Sunday, November 14, 2010
शशि कपूर
बलबीर राज कपूर वर्ष 1938 में एक जाने-माने फिल्मी घराने कपूर खानदान में जन्मे थे। अपने पिता पृथ्वीराज कपूर और बड़े भाई राज कपूर व शम्मी कपूर के नक्शेकदम पर चलते हुए बलबीर ने भी फिल्मों में ही अपनी तकदीर आजमाई। अलबत्ता कई मायनों में उनका कॅरियर पिता और भाइयों से अलहदा था। दुनिया बलबीर को शशि कपूर के नाम से जानती है।शशि कपूर ने 40 के दशक में ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने कई धार्मिक फिल्मों में बाल कलाकार की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने बंबई के माटुंगा स्थित डॉन बोस्को स्कूल में पढ़ाई की थी। पिता पृथ्वीराज कपूर उन्हें छुट्टियों के दौरान स्टेज पर अभिनय करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
इसी का नतीजा रहा कि शशि के बड़े भाई राज कपूर ने उन्हें आग (1948) और आवारा (1951) में भूमिकाएं दी। आवारा में उन्होंने राज कपूर के बचपन का रोल किया था। 50 के दशक के मध्य में पिता की सलाह पर वे गॉडफ्रे कैंडल के थिएटर ग्रुप ‘शेक्सपियराना’ में शामिल हो गए और उसके साथ दुनियाभर की यात्राएं कीं। इसी दौरान गॉडफ्रे की बेटी और ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से उन्हें प्रेम हुआ और 1958 में मात्र 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने उनसे विवाह कर लिया।
शशि कपूर ने गैरपरंपरागत किस्म की भूमिकाओं के साथ सिनेमा के पर्दे पर आगाज किया था। उन्होंने सांप्रदायिक दंगों पर आधारित फिल्म धर्मपुत्र (1961) में काम किया और उसके बाद चार दीवारी और प्रेम पात्र जैसी ऑफ बीट फिल्मों में नजर आए। वे हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने हाउसहोल्डर और शेक्सपियर वाला जैसी अंग्रेजी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं।
वर्ष 1965 शशि कपूर के लिए एक महत्वपूर्ण साल था। इसी साल उनकी पहली जुबली फिल्म जब जब फूल खिले रिलीज हुई और यश चोपड़ा ने उन्हें भारत की पहली मल्टी स्टारर ईस्टमैन कलर फिल्म वक्त के लिए कास्ट किया।
बॉक्स ऑफिस पर लगातार दो बड़ी हिट फिल्मों के बाद व्यावहारिकता का तकाजा यह था कि शशि कपूर परंपरागत भूमिकाएं करें, लेकिन उनके भीतर बैठा अभिनेता इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद उन्होंने ए मैटर ऑव इनोसेंस और प्रिटी पॉली 67 जैसी फिल्में कीं, वहीं हसीना मान जाएगी, प्यार का मौसम ने एक चॉकलेटी हीरो के रूप में उन्हें स्थापित किया।
वर्ष 1972 की फिल्म सिद्धार्थ के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी मौजूदगी कायम रखी। ७क् के दशक में शशि कपूर सबसे व्यस्त अभिनेताओं में से थे और वे तीन-तीन शिफ्टों में काम करते थे। इसी दशक में उनकी चोर मचाए शोर, दीवार, कभी-कभी, दूसरा आदमी और सत्यम शिवम सुंदरम जैसी फिल्में रिलीज हुईं।
वर्ष 1971 में पृथ्वीराज कपूर की मृत्यु के बाद शशि कपूर ने जेनिफर के साथ मिलकर पिता के स्वप्न को जारी रखने के लिए मुंबई में पृथ्वी थिएटर का पुनरुत्थान किया। अमिताभ बच्चन के साथ आई उनकी फिल्मों दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, सिलसिला, नमक हलाल, दो और दो पांच, शान ने भी उन्हें बहुत लोकप्रियता दिलाई। लेकिन शशि कपूर ने सार्थक सिनेमा का दामन कभी नहीं छोड़ा। वर्ष 1977 में उनकी प्रोडक्शन कंपनी फिल्मवालाज ने पांच प्रोजेक्टों की घोषणा की।
इनमें श्याम बेनेगल की जुनून और कलयुग, गोविंद निहलानी की विजेता, गिरीश कर्नाड की उत्सव और अपर्णा सेन की ३६ चौरंगी लेन जैसी फिल्में शामिल थीं। उनके आलोचकों ने कहा कि वे पेशेवर रूप से आत्मघात कर रहे हैं, लेकिन शशि कपूर ने केवल यही कहा कि सिनेमा में भरोसा करते हैं, व्यावसायिक और कला फिल्मों के विभाजन में नहीं।
शशि कपूर ने मर्चेट आइवरी प्रोडक्शन की फिल्मों में बेहतरीन अदाकारी की है। इनमें हीट एंड डस्ट, सैमी एंड रोजी गेट लेड जैसी फिल्में शामिल हैं। जेनिफर की मृत्यु के बाद उन्हें अवसाद ने घेर लिया। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्होंने फिल्मों और थिएटर में दिलचस्पी लेना बंद कर दी।
लेकिन वर्ष 1986 में न्यू देहली टाइम्स के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर उन्होंने एक बार फिर खुद को साबित कर दिया। शशि कपूर अब सिनेमा से पूरी तरह रिटायर हो चुके हैं, लेकिन वे अब भी पृथ्वी थिएटर के प्रेरणास्रोत हैं। फिल्म दीवार में शशि कपूर का यह संवाद बहुत लोकप्रिय हुआ था : ‘मेरे पास मां है।’ इसी तर्ज पर हम भी गर्व से कह सकते हैं : ‘हमारे पास शशि कपूर हैं।’(भावना सोमाया,दैनिक भास्कर,14.11.2010)
Saturday, September 18, 2010
..जिसे दुनिया म़ुग़ले-आजम के नाम से याद करती है
मुगल-ए-आजम की शुरुआत एक आवाज से होती है। एक ऐसी आवाज, जो आज तक सिनेमा के आशिकों के कानों में गूंजती है।और हां, फिल्म को आगाज देती हुई यही आवाज उसे अंजाम तक भी पहुंचाती है।
‘..और इस तरह, मेरे चाहने वाले शहंशाह जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर ने अनारकली की जिंदगी बख्श दी। और दुनिया की नजरों में जुल्म और बेरहमी का दाग़ अपने दामन पर ले लिया।
मैं उस शहंशाह के इंसाफ की यादगार हूं, जिसे दुनिया मुग़ल-ए-आजम के नाम से याद करती है।’
जमाने पर जादू की तरह छा जाने वाली यह बलंद आवाज है अमानुल्ला ख़ान की। जिसने जमाने की सहूलियत के लिए अपने नाम को छोटा बनाकर कर लिया था- अमान। और इस तीन लफ्ज के छोटे से नाम के साथ ही इतना बड़ा काम कर दिखाया कि दुनिया में चाहे तमाम चीजं हर रोज बदलती रहें, लेकिन इस एक हक़ीक़त के साथ उनका नाम कायम रहेगा कि फिल्म ‘मुग़ल-ए-आजम’ का स्क्रीन-प्ले के. आसिफ के साथ अकेले उन्होंने ही लिखा था। फिल्म के अमर डायलॉग लिखने में भी वजाहत मिर, अहसन रिजवी और कमाल अमरोही के साथ बहुत बड़ा योगदान था। इसी वजह से फिल्म के टाइटल्स में भी सबसे पहला नाम भी उन्ही का आता है। रही बात उनकी आवाज की, तो उसके बारे में मुझे क्या कहना है। आप सब ख़ुद ही जानते हैं। हां, अलबत्ता यह बात जरूर एक बार और दोहरा देता हूं कि जीनत अमान उन्ही की बेटी हैं।
मैं आज अमान साहब की बात इसलिए कर रहा हूं कि यूं तो ‘मुग़ल-ए-आजम’ की हर शै लासानी है, लेकिन इस फिल्म के डायलॉग और गीत ही ऐसी चीज हैं, जो हम लोग फिल्म से लौटते हुए अपने साथ ले आते हैं। जिन्हें हम जिंदगी में कभी-कभी, कहीं-कहीं दोहरा भी लेते हैं। सो इन्हें रचने वालों को याद करना जरूरी है। सो बात तो हम चारों कलमवीरों की करेंगे, लेकिन आज शुरुआत में बात करेंगे अमान साहब और शकील बदायूंनी की मिलकर लिखी गई एक तहरीर से। इस तहरीर का इस्तेमाल ‘मुग़ल-ए-आजम’ को लेकर बनी एक काफी पुरानी डॉक्युमेंट्री फिल्म में इस्तेमाल किया गया था। आवाज एक बार फिर वही अमान की।
इसे सुन लीजिए, इसमें फिल्म के बनने को लेकर बहुत ही ख़ूबसूरत बयान है। अगले हफ्ते हम लोग चारों डायलॉग राइटर्स की कंप्लीट बात कर लेंगे। ठीक ? ..तो सुनिए-
‘406 बरस पहले जलालउद्दीन मोहम्मद अकबर नाम का एक बादशाह इस देश में गुजरा है, जिसे दुनिया मुग़ल-ए-आजम के नाम से जानती है। अकबर का जमाना गुजरे सैकड़ों साल बीते, मगर इंसाफ और प्यार के साथ आज भी अकबर का नाम जिंदा है।
और फिर 406 बरस बाद इसी देश में एक और इंसान ने जन्म लिया। उसका नाम के. आसिफ है। उसके दिल में अकबर की मोहब्बत जागी। वतन की तारीख़ और सभ्यता का प्यार उमड़ा। और वो मुग़लों के शानदार दौर की एक झलक दिखाने को तड़पने लगा।
ये तड़प, ये आरजू, आसिफ की जिंदगी की धड़कन बन गई और वो मुग़ल-ए-आजम का ख्वाब देखने लगा। उसने सबसे अलग हटकर सोचा। उसके दिमाग में मुग़लों की शानो-शौकत का असली नक्शा खिंचने लगा। ख़ाके बनते चले गए। झलकियां आती चली गईं। इन बिखरे हुए ख्यालों को एक तारीख़ी कहानी में ढालने के लिए आसिफ ने इंडस्ट्री के बेहतरीन दिमाग़ों की खि़दमात हासिल कीं। वजाहत , अहसन रिजवी, कमाल अमरोही और ख़ास तौर पर अमान ने अपने-अपने कलम के जौहर दिखाए। और फिर कल्पना और आर्ट के और माहिर अजीम शायर शकील बदायूंनी, मौसीकी के बादशाह नौशाद। लाजवाब फोटोग्राफर आर.डी.माथुर।
बेहतरीन साउंड रिकॉर्डिस्ट अकरम शेख। नामी एडीटर धरमवीर। एसोसिएट डायरेक्टर एस.टी.जैदी। आर्ट डायरेक्टर एम.के.सईद, मुग़ल-ए-आजम में शरीक हो गए।
दिमाग़ों ने ख़ाका खींचा। हाथों ने गुल-बूटे खिलाए। और मुग़ल-ए-आजम के सेट्स की धूम हिंदुस्तान भर में मच गई। उन्हें देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आने लगे।
आहिस्ता-आहिस्ता सेट्स की शोहरत हिंदुस्तान के बाहर दूसरे मुल्कों में भी फैल गई। अफग़ानिस्तान और सऊदी अरब के शाही मेहमान। नेपाल के वजीरे-आजम। इटली के मशहूर डायरेक्टर रोजोलिनी। इंगलैंड के मशहूर हिदायतकार डेविड लीन और चीन का एक कल्चरल डेलीगेशन मुगल-ए-आजम के सेट्स देखने के लिए आए और हिंदुस्तान के लाजवाब कारीगरों की तारीफ किए बग़ैर न रह सके।
इन सच्चे कलाकारों ने मुग़ल-ए-आजम को तारीख़ का सच्चा नमूना बनाने के लिए कोई कसर उठाकर नहीं रखी। एक-एक लिबास पूरी जांच-पड़ताल के बाद तैयार किया गया। अपनी ख़ूबसूरती और बनावट में मु़ख्तलिफ आराइशी सामान, हजारों जंगी लिबास, ढालें, तलवारें और मुजसिमे, अकबरी जमाने के सामान से किसी तरह कम लागत और मेहनत से तैयार नहीं हुए। हर चीज आर्ट और दिलकशी का एक ख़ूबसूरत संदेश बनकर आंखों के सामने आए।
लाखों इंसानों ने मुग़ल-ए-आजम के सामान की उस नुमाइश को देखा, जो बंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में सजाई गई थी। और इस तरह डेढ़ करोड़ रुपए की लागत और दस बरस की मेहनत से हिंदुस्तान की सबसे बड़ी तस्वीर ‘मुग़ल-ए-आजम’ तैयार हो गई।
आसिफ का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा।
आज हिंदुस्तान के लाखों इंसान, इनकी मेहनत की दाद देने के लिए बेताब हो गए। मुग़ल-ए-आज़म के टिकटों के लिए समंदर की मौजों की तरह लोग सिनेमा घरों पर टूट पड़े। जिधर आंख जाती, लाखों इंसान नजर आते थे।
मर्द, औरत, बच्चे, बूढ़े, मुग़ल-ए-आजम देखने की आरजू में दो-दो मील लंबी कतारों में खड़े हो गए। कई मनचलों ने तो अपनी कतारों में बिस्तर भी बिछा दिए। फिल्म इंडस्ट्री की तारीख़ में किसी तस्वीर के लिए ऐसा हुजूम न पहले कभी आंखों ने देखा है और न शायद आइंदा देख सके। आज का दिन (5 अगस्त 1960) फिल्म इंडस्ट्री के लिए बड़े फक्र का दिन था। हिंदुस्तान के हर छोटे-बड़े शहर में एक धूम मची हुई थी।
और फिर मुग़ल-ए-आजम का किरदार अदा करने वाले पृथ्वीराज और मुग़ल-ए-आजम बनाने वाले के. आसिफ ख़ुशी में एक-दूसरे से लिपट गए।’ इसके आगे का बयान कहानी को व़क्त से बहुत आगे ले जाना होगा, क्योंकि आगे फिल्म के प्रीमियर का मंजर है। अब यह मंजर इतना ख़ूबसूरत है कि मैं न ख़ुद को रोक पा रहा हूं और न आपको इंतजार करवाना चाहता हूं। सो बात एक बार फिर अमान साहब के हवाले करता हूं।
हां, एक बात जरूर पहले ही बता दूं कि इस प्रीमियर शो पर न तो दिलीप कुमार आए थे और न मधुबाला। मधुबाला तो शायद बीमार थीं, लेकिन दिलीप कुमार तो एक नाराजगी के तहत नहीं आए। फिल्म के ख़त्म होते-होते आसिफ और दिलीप कुमार के रिश्तों में जबरदस्त कड़वाहट आ गई थी, क्योंकि आसिफ ने दिलीप कुमार की बहन अख्तर से शादी कर ली थी। इस पर विस्तार से आगे बात करेंगे।
ख़ैर। अब आगे की बात अमान साहब की जुबानी- ‘बंबई के सबसे ख़ूबसूरत सिनेमा ‘मराठा मंदिर’ को दुल्हन की तरह सजा दिया गया और प्रीमियर की रात को आसिफ ख़ुद मेहमानों के स्वागत के लिए खड़े हो गए।
मुअजिज मेहमान आने लगे।
सर कावसजी जहांगीर, ये पहली बार हिंदुस्तानी फिल्म देखने आए हैं। शकील, अमान, कारदार, नौशाद और शफी, आज कितने ख़ुश हैं। राजकुमार। सबकी तरह आज फिल्म स्टार्स भी मुग़ल-ए-आजम देखने को बेताब हैं। हंसमुख ओमप्रकाश। अ-ह-हा, मुकरी साहब जरा एक इधर तो देखिए। .. शुक्रिया।
राज कपूर अपनी धर्मपत्नी के साथ। ये आज ही मुग़ल-ए-आग़म के प्रीमियर में शामिल होने बर्लिन से आए हैं.. शम्मी कपूर और गीता बाली। जी आप पिक्चर देखने को बहुत बेचैन मालूम होते हैं.. ओ हो, इनके पीछे तो नादिरा हैं।
अ हा! रफी साहब। नौशाद साहब और शकील साहब इन्हें ख़ुश-आमदीद कह रहे हैं। ये हैं नसीम अपनी बेटी सायरा (बानो) के साथ। ख़ूबसूरत हीरो राजेंद्र कुमार अपनी धर्मपत्नी के साथ.. इन्हें पहचानने में ग़लती न कीजिएगा। ये सुरैया हैं। अपनी मम्मी के साथ।
अरे ये दुर्जन सिंह सूट पहनकर कहां से आ गया? ये अजीत हैं।
इन्होंने पिक्चर में दुर्जन सिंह का रोल अदा किया है। अहा! ये आर्टिस्टों का ख़ानदान है। नूतन, तनूजा और उनकी माता शोभना समर्थ। जरा मुस्कराइए तो सही। शुक्रिया। औए ये वहीदा रहमान हैं। जरा मुस्कराइए.. ये मुस्कराएंगी नहीं। इन्हें फिल्म देखने की जल्दी है। इनके पीछे हैं प्रोड्यूसर-डायरेक्टर गुरुदत्त.. मक़बूल हीरो देव आनंद और उनकी पत्नी कल्पना कार्तिक। बिमल राय और उनकी धर्मपत्नी.. म्यूजिक डायरेक्टर जयकिशन। ये हैं श्यामा। जरा मुस्कराइए तो साहब। वाह-वाह-वाह। क्या बात है।
ये हैं नग़मों की रानी लता मंगेशकर। ये जयश्री हैं। ये हैं माला सिन्हा। इनके साथ ये कौन हैं? ओ हो, इनके पिताजी। मगन भाई ओवरसीज के डिस्ट्रीब्यूटर के. टी. के साथ.. मीना कुमारी और उनके शौहर कमाल अमरोही.. जॉय मुखर्जी बहुत जल्दी में हैं। ये निगार सुल्ताना हैं.. इनको भी जरा देखिए। ये हैं आगा, अपने पूरे परिवार के साथ.. कुमारी नंदा।
हजारों सितारों का झुरमुट है। कोई कहीं है कोई कहीं।
वो जयराज हैं। वो निम्मी। भीड़-भाड़ से बहुत घबराती हैं। उनके पीछे हैं प्राण। इनके अलावा वो लोग भी आए, जिनके कांधों पर आज के हिंदुस्तान का बोझ है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री चौहान (यशवंतराव चौहान), श्री राधाकृष्णन और श्रीमती विजयालक्ष्मी पंडित ने अपना कीमती व़क्त निकालकर मुग़ल-ए-आज़म देखा और पसंद किया।
कला और आर्ट की चाहत ने ख़जानों का मुंह खोल दिया और आसिफ का देखा हुआ ख्वाब हिंदुस्तान के हर सिनेमा घर के पर्दे पर नजर आया। और इस तरह फर्ज और मोहब्बत की ग़ैर-फानी दास्तान मुग़ल-ए-आजम बनाकर के. आसिफ और उनके साथियों ने दुनिया में हिंदुस्तान की फिल्म इंडस्ट्री का नाम रोशन कर दिया(राजकुमार केसवानी,दैनिक भास्कर,13.9.2010)।
Tuesday, September 14, 2010
आम आदमी की बात आम जबान में कहते थे साहिर
"साहिर लुधियानवी मूलतः एक रोमांटिक कवि थे। प्रेम में बार-बार मिली असफलता ने उनके व्यक्तित्व पर कुछ ऐसे निशान छोड़े जिसके नीचे उनके जीवन के अन्य दुख दब कर रह गए। अपनी प्रेमिका की झुकी आखों के सामने बैठ साहिर उससे मासूम सवाल कर बैठते हैं-"प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं।" यह कहना था कथाकार एवं कथा यू.के. के अध्यक्ष तेजेन्द्र शर्मा का। अवसर था लंदन के नेहरू सेन्टर में एशियन कम्युनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा आयोजित "साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी" कार्यक्रम का।तेजेंद्र शर्मा ने चित्रकार मकबुल फिदा हुसैन, फिल्मकार मुजफ्फर अली एवं संसद सदस्य वीरेन्द्र शर्मा की उपस्थिति में अपने पॉवर-पाइंट प्रेजेंटेशन की शुरूआत फिल्म हम दोनों के भजन अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम से करते हुए कहा कि आज ईद और गणेश चतुर्थी के त्यौहार हैं, तो चलिए हम अपना कार्यक्रम एक नास्तिक द्वारा लिखे गए एक भजन से करते हैं।
एशियन कम्युनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष काउंसलर जकीया जुबैरी ने ईद के कारण कार्यक्रम में शामिल न होने पर खेद प्रकट करते हुए श्रोताओं के लिए संदेश भेजा कि जो श्रोता आज ईद मना रहे हैं उनको गणेश चतुर्थी की बधाई और जो गणेश चतुर्थी मना रहे हैं उन्हें ईद की मुबारकबाद। इस तरह जकीया जी ने कार्यक्रम की शुरूआत में ही एक सेक्युलर भावना से दर्शकों के दिलों को सराबोर कर दिया।
तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि साहिर ने फिल्मों में जो भी लिखा वो अन्य फिल्मी गीतकारों के लिए एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया। उनका लिखा हर गीत जैसे मानक बन गए। उन्होंने फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ कव्वाली न तो कारवां की तलाश है (बरसात की रात), सर्वश्रेष्ठ हास्य गीत सर जो तेरा चकराए (प्यासा), सर्वश्रेष्ठ देशप्रेम गीत ये देश है वीर जवानों का (नया दौर), सूफी गीत लागा चुनरी में दाग छिपाऊं कैसे (दिल ही तो है) लिखा। यहां तक कि शम्मी कपूर को नई छवि देने में भी साहिर का ही हाथ था जब उन्होंने तुमसा नहीं देखा के लिए गीत लिखा यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं.. लिखा।
शर्मा ने साहिर के प्रेम प्रसंगों का भी जिक्र किया। जाहिर तौर पर उसमें सुधा मल्होत्रा और अमृता प्रीतम के नाम शामिल थे। अमृता और साहिर दोनों मॉस्को गए थे जहां साहिर को सोवियतलैण्ड पुरस्कार मिलना था। वहां एक अफसर की गलती से दोनों के नाम के बिल्ले बदल गए। साहिर ने अमृता से बिल्ले वापिस बदलने के लिए कहा। मगर अमृता ने कहा कि वह बिल्ला वापिस नहीं करेगी, इस तरह साहिर अमृता के दिल के करीब रहेगा। भारत वापिस आने पर साहिर की चन्द ही दिनों में मृत्यु हो गई। अमृता ये सोचकर रोती रही कि दरअसल मौत उसकी अपनी आई थी, मगर उसके नाम का बिल्ला साहिर के सीने पर था। इसलिए मौत गलती से साहिर को ले गई।
साहिर की भाषा पर टिप्पणी करते हुए तेजेन्द्र का कहना था कि किसी भी बड़े कवि या शायर की लिखी वही शायरी जिंदा रही है जो आम आदमी तक प्रेषित हो पाई है। संप्रेषण किसी भी साहित्य की मुख्य विशिष्टता है। साहिर ने भी अपनी साहित्यिक रचनाओं की भाषा को फिल्मों के लिए सरल और संप्रेषणीय बनाया। इसीलिए उसकी वो रचनाएं अमर हो पाईं(नई दुनिया,दिल्ली,13.9.2010)।
Sunday, August 29, 2010
डायनेमो ओमप्रकाश
‘मैंने कई फाकापरस्ती के दिन भी देखे हैं, ऐसी भी हालत आई जब मैं तीन दिन तक भूखा रहा। मुझे याद है इसी हालात में दादर खुदादाद पर खडा था। भूख के मारे मुझे चक्कर से आने लगे ऐसा लगा कि अभी मैं गिर ही पडूंगा। करीब की एक होटल में दाखिल हुआ। बढिया खाना खाकर और लस्सी पीकर बाहर जाने लगा तो मुझे पकड लिया गया। मैनेजर को अपनी मजबूरी बता दी और 16 रुपयों का बिल फिर कभी देने का वादा किया। मैनेजर को तरस आ गया वह मान गया। एक दिन जयंत देसाई ने मुझे काम पर रख लिया और 5,000 रुपये दिए। मैंने इतनी बडी रकम पहली बार देखी थीं। सबसे पहले होटल वाले का बिल चुकाया था और 100 पैकेट सिगरेट के खरीद लिए।’आगे चलकर, इन्हीं ओमप्रकाश ने लगभग 350 फिल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में पडोसन, जूली, दस लाख, चुफ-चुफ, बैराग, शराबी, नमक हलाल, प्याक किए जा, खानदान, चौकीदार,लावारिस, आंधी,लोफर, जंजीर आदि शामिल हैं। उनकी अंतिम फिल्म नौकर बीवी का थीं। अमिताभ बच्चन की फिल्मों में वे खासे सराहे गए थे। नमकहलाल का दद्दू और शराबी के मुंशीलाल को भला कौन भूल सकता है?
प्रारंभिक दौर
ओमप्रकाश का पूरा नाम ओमप्रकाश बक्शी था। उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई थीं। उनमें कला के प्रति रुचि शुरू से थी। लगभग 12 वर्ष की आयु में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। 1937 में ओमप्रकाश ने ऑल इंडिया रेडियो सीलोन में 25 रुपये वेतन में नौकरी की थी। रेडियो पर उनका फतेहदीन कार्यक्रम बहुत पसंद किया गया।
सिर्फ 80 रुपये वेतन
हिन्दी फिल्म जगत में ओमप्रकाश का प्रवेश बडे फिल्मी अंदाज में हुआ। वे अपने एक मित्र के यहां शादी में गए हुए थे, जहां दलसुख पंचोली ने उन्हें देखा। फिर पंचौली ने तार भेजकर उन्हें लाहौर बुलवाया और फिल्म ‘दासी’(1950) के लिए 80 रुपये वेतन पर अनुबंधित कर लिया। यह ओमप्रकाश की पहली बोलती फिल्म थीं। संगीतकार सी. रामचंद्र से ओमप्रकाश की अच्छी पटती थीं। इन दोनों ने मिलकर ‘दुनिया गोल है’, ‘झंकार’, ‘लकीरे’ का निर्माण किया। उसके बाद ओमप्रकाश ने खुद की फिल्म कंपनी बनाई और ‘भैयाजी’, ‘गेटवे आफ इंडिया’, ‘चाचा जिदांबाद’, ‘संजोग’ आदि फिल्मों का निर्माण किया।
खास बात
बहुत कम लोग जानते हैं कि ओमप्रकाश ने ‘कन्हैया’फिल्म का निर्माण भी किया था,जिसमें राज कपूर और नूतन की मुख्य भूमिका थी।
कई रंगारंग व्यक्ति उनके जीवन में आए। इनमें चार्ली चैपलिन, पर्ल एस.बक, सामरसेट मॉम,फ्रेंक काप्रा,जवाहरलाल नेहरू जी भी शामिल हैं।
जिदंगी जब उन पर मेहरबान रही है, तब दूसरा विश्व युद्ध खत्म ही हुआ था। उन दिनों हिंदी फिल्मों में बहुत बडे सितारे मोतीलाल, अशोककुमार, और पृथ्वीराज हुआ करते थे। अपने समय में लोग उन्हें ‘डायनेमो’ कहा करते थे(राज एक्सप्रेस,29.8.2010)।
Saturday, July 31, 2010
फिजाओं में गूँज रही है पंडित रफी की आवाज
जिस तरह की जीवनशैली हम जी रहे हैं और उसमें जैसी बेसब्री, भागमभाग और कामयाबियों की लोलुपता नजर आ रही है उसे देखकर तो नहीं लगता कि कोई एक शख्स इस दुनिया से रुखसत होने के तीस बरस बाद भी जमाने की यादों में बसा रह सकता है। ऐसा यदि है तो मानना होगा कि कुछ तो करिश्मा है उस इंसान के नाम और काम का जिससे वह सिर्फ और सिर्फ आवाज के बूते पर हमारे बीच मौजूद है।३१ जुलाई को यदि किसी पाक रूह की बात चल रही हो तो अमूमन लोग समझ जाते हैं कि इशारा मोहम्मद रफी की तरफ है। आज इस बात को दोहराना नहीं चाहता कि रफी साहब की पहली फिल्म कौन सी थी, उन्होंने कितने नगमों को स्वर दिया और कैसे वे सहगल का आशीर्वाद पाकर मुंबई पहुँचे और किस तरह का स्ट्रगल उन्होंने किया। ये सारी बातें तकरीबन हर रफी प्रेमी को मालूम है और उतनी ही मालूम है जितनी उनके परिजनों और मित्रों को मालूम होगी। ये रफी-प्रेमी भी ऐसे जिन्होंने रफी को देखा भी नहीं और सिर्फ उस आवाज के पारस-स्पर्श की अनुभूति दामन थाम कर उनके मुरीद बने रहे।
आज जरा यह तलाश लिया जाए या दोहरा लिया जाए कि तीस बरस बाद जुबान,पहनावा, लहजा और परिवेश बदल जाने के बाद भी रफी का जादू जस का तस क्यों बना हुआ है। दरअसल पहला कारण तो है लाजवाब संगीतकारों की धुनों के वे कारनामे जो अब दस्तावेज बन गए हैं। फेहरिस्त लंबी हो जाएगी इसलिए नहीं लिखना चाहता, लेकिन इशारा भर कर देता हूँ कि हुस्नलाल भगतराम, नौशाद, रोशन, एसडी बर्मन से लेकर मदनमोहन, आरडी बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल तक रफी साहब ने हमेशा एक विनम्र विद्यार्थी की तरह अपने संगीतकारों को उस्ताद जैसा मान दिया। जैसा बताया गया वैसा गाया और निभाया। उनकी गायन यात्रा में ही कई साजिंदे अपनी मेहनत और रचनाशीलता के बूते पर संगीतकार बनकर स्थापित हुए, लेकिन रफी साहब ने हमेशा संगीतकार नाम की संस्था को भरपूर इज्जत बख्शी और उनकी कम्पोजिशन्स पर ईमानदार परिश्रम किया।
दूसरी बात; मोहम्मद रफी कम पढ़े-लिखे जरूर थे लेकिन उन्हें कविता-शायरी की अद्भुत समझ थी। उनकी कोई भी फिल्मी, गैर फिल्मी या भाषाई रचना सुन लीजिए। आप महसूस करेंगे कि शब्द कुछ ऐसी शफ्फाक सफाई से झर रहे हैं कि शायद इन शब्दों का अल्टीमेट तलफ्फुज बस यही हो सकता है। हम सब जानते हैं रफी साहब जिस विधा के गायक थे वह शब्द-प्रधान गायकी है। वैसे यह काम इतना आसान नहीं जितना रफी गीतों में सुनाई देता है। यह इसलिए कि गीत के शब्द को संगीतकार अपनी सोच की सुरभि देता है और गमक, हरकत और मुरकी से उसे सजाता है। शब्द का आलोक भी बना रहे और धुन भी जगमगाए यह सुगम संगीत की पहली जरूरत होती है। रफी साहब यहाँ भी विलक्षण हैं। शब्द के वजन को अपने कंठ की कमानी पर तानते हुए वे कब एक प्लेबैक सिंगर से स्वर-गंधर्व बन जाते हैं मालूम ही नहीं पड़ता। देवास के मरहूम उस्ताद रज्जबअली खाँ साहब शास्त्रीय संगीत के दुर्वासा, परशुराम या विश्वामित्र थे। उनकी तेज तबीयत का सभी को अंदाज था। वे कभी सिनेमाघर में फिल्म देखने नहीं गए लेकिन जिन दिनों हातिमताई फिल्म का गीत परवरदिगारे आलम तेरा ही है सहारा गली-गली गूँज रहा था तब वे सिर्फ इस गीत के लिए सिनेमाघर पहुँचे और पूरे गीत के दौरान जार-जार रोते रहे। यह एक वाकया रफी साहब की आवाज की कैफियत का पता देने और पाए को साबित करने के लिए काफी है।
आखिरी में सबसे अहम बात, अच्छा गायक होने के पहले रफी साहब एक आलादर्जा इंसान थे। उनकी जिंदगी में कभी कोई विवादास्पद वाकया सुनने में नहीं आया। हमेशा उनकी नेकी, विनम्रता और सरलता के चर्चे चले जो आज तक जारी हैं। गाने-बजाने वालों की दुनिया में लफड़ों की कमी नहीं लेकिन रफी साहब हमेशा फिल्मी चक्करों से परे रहे।
रफी साहब की बरसी पर छोटे मुँह बड़ी बात कहने की जुर्रत कर रहा हूँ; क्षमा करें, तमाम गाने-बजाने वालों की बिरादरी के नुमाइंदो से कहना चाहता हूँ कि रफी के गले जैसी उस्तादी ईश्वर प्रदत्त होती है लेकिन शराफत के आदाब हमें खुद सीखने होते हैं। रफी के गीतों को फॉलो करने के पहले हमें उनके व्यक्तित्व की शुचिता और पवित्रता का अनुसरण शुरू करना होगा। गुलूकारी के कायदे तो रियाज से भी आ जाएँगे।
वक्त बेरहमी और बेशर्मी से बेसुरापन परोस रहा है। आसरा है तो मो. रफी और उनके समकालीन दीगर गायकों के गाए गीतों का। स्वर का ये बेजोड़ कारीगर हमारे बीच सरगम की कशीदाकारी करने आया था, अपना काम किया और चल दिया। सूफी, दरवेश और फकीर तबीयत वाले मोहम्मद रफी ने जिस धुन को स्वर दिया वह अमर हो गई; जिस कविता/शायरी को अपने कंठ के भीतर उतारा वह कालजयी हो गई। यह रफी का ही तो करिश्मा है जो किसी मुसलमान को अपने भजन से पिघला सकता है और किसी हिन्दू को नातिया-कलाम से रुला सकता है। अल्लाह तेरा अहसान कि पंडित मोहम्मद रफी को हमारे बीच भेजकर हमारे कान को सुरीलेपन का आचमन करवाया वरना हम संसारी कैसे जानते कि स्वर की पाकीजगी किस बला का नाम है(संजय पटेल,नई दुनिया,इन्दौर,31.7.2010)।
Thursday, July 22, 2010
मेरा जलवा जिसने देखा...

Wednesday, July 21, 2010
आए तुम याद मुझे

Thursday, July 8, 2010
मोतीलाल
हिंदुस्तानी सिनेमा में नेचुरल एक्टिंग की चर्चा चलने पर गिने-चुने चेहरे ही याद आते हैं। इनमें जिस कलाकार का नाम सबसे पहले चमका और टॉप पर पहुंचा, वे थे- मोतीलाल। इस अनूठे अदाकार के जन्मशती वर्ष पर 'बॉलीवुड' की भावभीनी श्रद्धांजलि।हर बार अलग अंदाज
हिंदी सिनेमा के आसमान में अब तक सैकडों नायक जगमगाए हैं। उनमें सिर्फ दो हीरो ऎसे हुए हैं, जिन्होंने अपनीे नेचुरल एक्टिंग से दर्शकों को लुभाया और कामयाब हुए। इनमें पहला नाम है- मोतीलाल का, और दूसरा- संजीव कुमार का। मोतीलाल ने अपने मैजिक से नायक और चरित्र अभिनेता के रूप में दो दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उन्होंने हिंदी फिल्मों को मेलोड्रामाई संवाद अदायगी और अदाकारी की तंग गलियों से निकालकर खुले मैदान की ताजी हवा में खडा किया। मोतीलाल की पहचान उनके सिर की फेल्ट-हैट थी, जिसे उन्होंने कभी मुडने नहीं दिया। शानदार चमचमाते शर्ट-पेंट, जूतों की चमक में झिलमिलाते अक्स। चाल-ढाल में नजाकत-नफासत। बातचीत में शाही अंदाज। मोतीलाल जिंदादिल एक्टर ही नहीं, जीते-जागते केलिडोस्कोप थे। जब देखो, जितनी बार देखो, हमेशा अलग अंदाज में नजर आते थे मोतीलाल।
स्मार्ट यंगमैन
शिमला में चार दिसंबर 1910 को जन्मे मोतीलाल राजवंश जब एक साल के थे, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। चाचा ने परवरिश की, जो उत्तरप्रदेश में सिविल सर्जन थे। चाचा ने मोती को बचपन से जीवन को बिंदास अंदाज में जीने और उदारवादी सोच का नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेजी स्कूल में शुरूआती पढाई के बाद उत्तरप्रदेश और फिर दिल्ली में उच्च शिक्षा हासिल की। अपने कॉलेज के दिनों में वे ऑलराउंडर स्टूडेंट थे। नेवी ज्वॉइन करने के इरादे से मुंबई आए थे। अचानक बीमार हो गए, तो प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए। शानदार ड्रेस पहनकर सागर स्टूडियो में शूटिंग देखने जा पहुंचे। वहां डायरेक्टर कालीप्रसाद घोष्ा एक सामाजिक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। अपने सामने स्मार्ट यंगमैन मोतीलाल को देखा, तो उनकी आंखें खुली रह गई। उन्हें अपनी फिल्म के लिए ऎसे ही हीरो की तलाश थी, जो बगैर बुलाए मेहमान की तरह सामने खडा था। उन्होंने अगली फिल्म 'शहर का जादू' (1934) में सविता देवी के साथ मोतीलाल को नायक बना दिया। तब तक पाश्र्वगायन प्रचलन में नहीं आया था। लिहाजा मोतीलाल ने के. सी. डे के संगीत निर्देशन में अपने गीत खुद गाए थे। इनमें 'हमसे सुंदर कोई नहीं है, कोई नहीं हो सकता' गीत लोकप्रिय भी हुआ। सागर मूवीटोन उस जमाने में कलाकारों की नर्सरी थी। सुरेंद्र, बिब्बो, याकूब, माया बनर्जी, कुमार और रोज जैसे कलाकार वहां कार्यरत थे। डायरेक्टर्स में महबूब, सर्वोत्तम बदामी, चिमनलाल लोहार अपनी सेवाएं दे रहे थे। मोतीलाल ने अपनी शालीन कॉमेडी, मैनरिज्म और स्वाभाविक संवाद अदायगी के जरिए तमाम नायकों को पीछे छोडते हुए नया इतिहास रचा। परदे पर वे एक्टिंग करते कभी नजर नहीं आए। मानो उसी किरदार को साकार रहे हो।
'दीवाली' से 'होली' तक बहुरंगी
वष्ाü 1937 में मोतीलाल ने सागर मूवीटोन छोडकर रणजीत स्टूडियो ज्वॉइन कर लिया। इस बैनर की फिल्मों में उन्होंने 'दीवाली' से 'होली' के रंगों तक, ब्राह्मण से अछूत तक, देहाती से शहरी छैला बाबू तक के बहुरंगी रोल से अपने प्रशंसकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस दौर की पॉपुलर गायिका-नायिका खुर्शीद के साथ उनकी फिल्म 'शादी' सुपर हिट रही थी। रणजीत स्टूडियो में काम करते हुए मोतीलाल की कई जगमगाती फिल्में आई- 'परदेसी', 'अरमान', 'ससुराल' और 'मूर्ति'। बॉम्बे टॉकीज ने गांधीजी से प्रेरित होकर फिल्म 'अछूत कन्या' बनाई थी। रणजीत ने मोतीलाल- गौहर मामाजीवाला की जोडी को लेकर 'अछूत' फिल्म बनाई। फिल्म का नायक बचपन की सखी का हाथ थामता है, जो अछूत है। नायक ही मंदिर के द्वार सबके लिए खुलवाता है। इस फिल्म को गांधीजी और सरदार पटेल का आशीर्वाद मिला था। 1939 में इन इंडियन फिल्म्स नाम से ऑल इंडिया रेडियो ने फिल्म कलाकारों से इंटरव्यूज की एक श्रृंखला प्रसारित की थी। इसमें 'अछूत' का विशेष्ा उल्लेख इसलिए किया गया था कि फिल्म में गांधीजी के अछूत उद्घार के संदेश को सही तरीके से उठाया गया था।
'दिल जलता है, तो जलने दे'
मजहर खान निर्देशित फिल्म 'पहली नजर' में मोतीलाल को उनके चचेरे भाई मुकेश ने प्ले-बैक दिया था। मुकेश का गाया यह पाश्र्वगीत था- 'दिल जलता है, तो जलने दे'। मोतीलाल की अदाकारी के अनेक पहलू हैं। कॉमेडी रोल से वे दर्शकों को गुदगुदाते थे, तो 'दोस्त' और 'गजरे' जैसी फिल्मों में अपनी संजीदा अदाकारी से लोगों की आंखों में आंसू भी भर देते थे।
'जिंदगी ख्वाब है'
वर्ष 1950 के बाद मोतीलाल ने चरित्र नायक का चोला धारणकर अपने अद्भुत अभिनय की मिसाल पेश की। विमल राय की फिल्म 'देवदास' (1955) में देवदास के शराबी दोस्त चुन्नीबाबू के रोल को उन्होंने लार्जर देन लाइफ का दर्जा दिलाया। सुघि दर्शकों के दिमाग में वह सीन याद होगा, जब नशे में चूर चुन्नीबाबू घर लौटते हैं, तो दीवार पर पड रही खूंटी की छाया में अपनी छडी को बार-बार लटकाने की नाकाम कोशिश करते हैं। 'देवदास' का यह क्लासिक सीन है। राज कपूर निर्मित और शंभू मित्रा-अमित मोइत्रा निर्देशित फिल्म 'जागते रहो' (1956) के उस शराबी को याद कीजिए, जो रात को सुनसान सडक पर नशे में झूमता-लडखडाता गाता है- 'जिंदगी ख्वाब है'। 'देवदास' और 'परख' फिल्मों की चरित्र भूमिकाओं के लिए मोतीलाल को फिल्मफेअर अवार्ड मिले थे। उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्घ में राजवंश प्रोडक्शन कायम करके फिल्म 'छोटी-छोटी बातें' बनाई थी। फिल्म को राष्ट्रपति का सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट जरूर मिला, पर मोतीलाल दिवालिया हो गए। फिल्म 'तीसरी कसम' शैलेंद्र के जीवन के लिए भारी साबित हुई थी। मोतीलाल का यही हाल 'छोटी छोटी बातें' कर गई।
(श्रीराम ताम्रकर,राजस्थान पत्रिका,3 जुलाई,2010)
Monday, June 21, 2010
अमरीश पुरी ने की थी बीमा कंपनी में नौकरी
रंगमंच तथा विज्ञापनों के रास्ते अपनी अदाकारी का लोहा मनवाकर हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर खलनायक के रूप में प्रसिद्धि बटोरने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब में हुआ। अपने बड़े भाई मदन पुरी का अनुसरण करते हुए फिल्मों में काम करने मुंबई पहुंचे अमरीश पुरी अपने लेकिन पहले ही स्क्रीन टेस्ट में विफल रहे और उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में नौकरी कर ली।
बीमा कंपनी की नौकरी के साथ ही वह नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों पर पृथ्वी थियेटर में काम करने लगे। रंगमंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें टीवी विज्ञापनों तक पहुंचाया, जहां से वह फिल्मों में खलनायक के किरदार तक पहुंचे।
अमरीश पुरी को 1960 के दशक में रंगमंच को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने दुबे और गिरीश कर्नार्ड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।
फिल्मों में खलनायक के किरदार में अमरीश पुरी को ऐसा पसंद किया गया कि फिल्म 'मिस्टर इंडिया' में उनका किरदार 'मुंगैबो' उनकी पहचान बन गया। इस फिल्म में 'मुगैंबो खुश हुआ' के अलावा तहलका में उनके द्वारा बोला गया संवाद 'डांग कभी रांग' नहीं होता भी लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा।
अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया।
उनके जीवन की अंतिम फिल्म 'किसना' थी जो 2005 में उनके निधन के कुछ दिन बाद प्रदर्शित हुई। अमरीश पुरी को अनेक फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का खिताब मिला।
'प्रेम पुजारी' से फिल्मों की दुनिया में प्रवेश करने वाले अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'मंथन', 'गांधी', 'मंडी', 'हीरो', 'कुली', 'मेरी जंग', 'नगीना', 'लोहा', 'गंगा जमुना सरस्वती', 'राम लखन', 'दाता', 'त्रिदेव', 'जादूगर', 'घायल', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.6.2010)।
Tuesday, June 15, 2010
माहिर फिल्मकार भी थे हेमंत कुमार

बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत की जानी-मानी शख्सियत हेमंत कुमार न सिर्फ मौसीकी के माहिर बल्कि बेहतरीन फिल्म निर्माता भी थे। बांग्ला भाषा के अनेक ग़ैर-फिल्मी एल्बम को सुर देने वाले कुमार ने कई मशहूर हिन्दी गीतों को भी अपनी पुरअसर आवाज़ दी। साथ ही उन्होंने एक ऐसी फिल्म का निर्माण भी किया जिसे राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।
फिल्म समीक्षक ज्योति वेंकटेश के मुताबिक हेमंत कुमार अपने दौर के सबसे प्रतिभाशाली फनकारों में से थे। संगीत की नब्ज़ का मिजाज़ समझने में दक्ष इस कलाकार को रवींद्रसंगीत का विशेषज्ञ भी माना जाता था।
उन्होंने बताया कि कुमार ने 1959 में हेमंत-बेला प्रोडक्शंस के बैनर तले नील अक्षर नीचे फिल्म बनाई। मृणाल सेन द्वारा निर्देशित इस फिल्म को भारत सरकार के सबसे बड़े फिल्म सम्मान राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से नवाज़ा गया।
उन्होंने बताया कि कभी बॉलीवुड अभिनेता देव आनंद की आवाज़ कहे जाने वाले कुमार ने साल 1954 में बनी फिल्म 'नागिन' में संगीत दिया। यह फिल्म बेहद कामयाब हुई और इसकी सफलता का ज़्यादातर श्रेय उसके संगीत को दिया गया।
कुमार को इस फिल्म के लिए साल 1955 के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर अवार्ड से नवाज़ा गया।
कुमार ने मुख्य रूप से 'आनंद मठ', 'अंजान', 'दो दिल', 'एक ही रास्ता', 'हमारा वतन', 'हम भी इंसान हैं', 'जागति', 'राहगीर' और 'उस रात के बाद' फिल्मों को संगीत से सजाया।
कुमार मुख्य रूप से बांग्ला संगीतकार थे और उनके ज़्यादा बांग्ला गीत बेहद लोकप्रिय हुए। बांग्ला गीतकार गौरीप्रसन्ना मजूमदार के साथ उनकी खास जुगलबंदी थी और इस जोड़ी ने बांग्ला सिनेमा और संगीत को उसके स्वर्णिम युग में पहुंचाया।
साल 1980 में कुमार को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी गायन क्षमता भी प्रभावित हुई। ख़ासतौर से सांस पर नियंत्रण में उन्हें दिक्कतें होने लगीं लेकिन इस कलाकार ने अपनी इच्छाशक्ति के बलबूते इस कमज़ोरी पर काफी हद तक काबू पा लिया।
सितम्बर 1989 में कुमार माइकल मधुसूदन अवार्ड लेने के लिए ढाका गए और वहां उन्होंने एक कार्यक्रम भी पेश किया। अपनी उस यात्रा से लौटने के फौरन बाद उन्हें एक बार फिर दिल का दौरा पड़ा और 26 सितम्बर 1989 को इन फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।(Hindustan,15.6.2010)
Friday, June 11, 2010
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी:भावना सोमाया
बीते माह कैफी आजमी को गुजरे आठ साल हो गए। फादर्स डे के मौके पर अब्बा की याद आना लाजिमी ही है। आजमी परिवार से नजदीकी के चलते मुझे उनकी कद्दावर शख्सियत और विलक्षण बुद्धिमत्ता को गौर से देखने का मौका मिला था। उनके घर अक्सर होने वाली ‘महफिलों’ की भी मैं गवाह रही हूं। मैंने लोगों पर उनकी शायरी का जादू चलते देखा है। एक शाम मैंने उनसे पूछा, ऐसा कौन सा अहसास था, जिसने आपको हंसते जख्म फिल्म का वह गमगीन नगमा ‘दिल की नाजुक रगें टूटती हैं, याद इतना भी कोई ना आए..’ लिखने के लिए मजबूर कर दिया। वे देर तक खाली आंखों से मेरी तरफ देखते रहे और फिर दूसरी तरफ नजरें घुमा लीं। उन्हें अपनी शख्सियत के परदे में रहना पसंद था।
मेरे जेहन में अब्बा (मैं उन्हें इसी नाम से पुकारने लगी थी) से जुड़ी जाने कितनी ही यादें हैं। चाहे वह चाय और खारी बिस्किट के साथ चुपचाप कोई मर्डर मिस्ट्री फिल्म देखना हो या सर्जरी के बाद उनसे बॉम्बे हॉस्पिटल मिलने जाना हो। उम्र बढ़ने के साथ ही अब्बा का अस्पतालों से नाता भी बढ़ता रहा। डॉक्टर बदल जाते, फ्लोर बदल जाते, कमरे बदल जाते, लेकिन मरीज वही रहता। जिंदगी के आखिरी दिनों में वे काफी कमजोर हो चले थे। उन्हें दवाइयों के आसरे पर जीना अच्छा नहीं लगता था, लेकिन उन्होंने कभी अपनी तकलीफ जाहिर नहीं होने दी।
आखिरी वक्त में तो ऐसा भी लगा, जैसे उनका अपनी शायरी तक से मोह जाता रहा हो। जब शबाना वॉकमैन में उनके पुराने गीत बजातीं तो उनके चेहरे पर किसी तरह के भाव नहीं आते थे। लेकिन उनके गांव फूलपुर के विकास की कोई खबर आने पर उनकी दिलचस्पी जाग जाती। उनकी चिंताएं हमेशा व्यापक जनसमुदाय के प्रति थीं, खुद के लिए नहीं।
जिस रोज वे गुजरे, वह बहुत गर्म शाम थी। और लग रहा था, वह रात तो जैसे कभी खत्म ही न होगी। मुझे उनकी नज्म मकान की ये पंक्तियां बेतरह याद आती रहीं- ‘आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है/आज की रात ना फुटपाथ पे नींद आएगी/सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो/कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी..’। लेकिन उस रात ऐसी कोई खिड़की नहीं खुली, जो हमें हौसला दे पाती। दुख बर्दाश्त से बाहर था। शाम डूबने के साथ ही घर पर उदासी भी गहरा गई।
अब्बा के इंतकाल के बाद संगीतकार जतिन-ललित ने संगीत के जरिए उन्हें शोकांजलि अर्पित की थी। सबसे पहले जतिन ने अब्बा के यादगार नगमों को गुनगुनाना शुरू किया और फिर ललित, जावेद अख्तर, नीलम शुक्ला, पार्वती खान इत्यादि भी उनका साथ देने लगे। वह अब्बा की जादुई शायरी से सजी यादगार शाम थी। चाहे वह उनका मार्मिक गीत ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम हो’ या गम में डूबा हुआ नगमा ‘जाने क्या ढूंढती रहती है ये आंखें मुझमें’।
चाहे वह उम्मीद की गर्मजोशी लिए ‘जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है’ हो या प्रेरणा जगाने वाला ‘इतने बाजू इतने सिर, सुन ले दुश्मन ध्यान से’। जिंदगी के हर लम्हे, हर अहसास पर अब्बा ने नगमे लिखे थे। अचानक हमारे दिलों में छाई उदासी कहीं खो गई। हम उम्मीदों से भर गए। हमें महसूस हुआ कि अब्बा कहीं नहीं गए हैं, क्योंकि उनके नगमों की फसल अब भी लहलहा रही थी। वे यहीं थे, हम सभी के बीच, हमेशा की तरह(Rajasthan Patrika,6 june,2010)।
Wednesday, June 2, 2010
राजकपूर ने हमेशा ख़ुद को पिता से कमतर माना

गिरते हैं, तो सुरक्षा का कोई जाल काम नहीं आता। राज कपूर की फिल्मों में उनके जीवन की झलक दिखाई देती है, परंतु अपने पिता की भी अनेक बातें उसमें शुमार होती हैं। उनकी फिल्मों की आधी हकीकत और आधे फसाने में पिता-पुत्र रिश्ते की अलसभोर हमेशा मौजूद होती है। Tuesday, June 1, 2010
बसंत स्टूडियो के वे दिन....
चालीस के दशक के शुरू में मुंबई में तीन नई फिल्म कंपनियों की शुरूआत हुई। ये तीन कंपनियां थीं- राजकमल कलामंदिर, फिल्मिस्तान स्टूडियो और बसंत पिक्चर्स। बसंत पिक्चर्स की स्थापना स्टंट, फंतासी और धार्मिक फिल्मों के मशहूर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर होमी वाडिया ने अपने बडे भाई जे. बी. एच. वाडिया की कंपनी वाडिया मूवीटोन से अलग होकर 1942 में की थी। होमी इससे पहले वाडिया मूवीटोन के बैनर पर फीयरलेस नाडिया को लेकर 'हंटरवाली', 'मिस तूफान मेल', 'लुटारू ललना', 'पंजाब मेल', 'डायमंड क्वीन' और 'जंगल प्रिंसेस' जैसी कई हिट फिल्में बना चुके थे। जे. बी. एच. के बेटे विंसी वाडिया के मुताबिक फिल्मी दुनिया में राम-लक्ष्मण की जोडी के नाम से मशहूर दोनों वाडिया भाइयों के बीच मतभेद की शुरूआत तब हुई, जब जे. बी. एच. का रूझान सामाजिक फिल्मों की तरफ होने लगा, जबकि होमी चाहते थे कि वाडिया मूवीटोन सिर्फ स्टंट, फैंटेसी और पौराणिक फिल्में बनाए, जिनके लिए यह बैनर मशहूर रहा। लेकिन जे. बी. एच. वाडिया इसके लिए तैयार नहीं थे। नतीजन दोनों भाइयों के बीच मतभेद इस हद तक बढ गए कि होमी ने फीयरलेस नाडिया को साथ लेकर खुद को वाडिया मूवीटोन से अलग कर लिया। इसके बावजूद बसंत पिक्चर्स के बैनर की पहली फिल्म 'मौज'(1942) सामाजिक फिल्म थी। बाबूभाई मिस्त्री के निर्देशन में बनी इस फिल्म में पहाडी सान्याल, कौशल्या और नाडिया लीड रोल में थे। लेकिन अभी तक परदे पर हैरतअंगेज स्टंट करने वाली नायिका नाडिया का इस फिल्म में सती-सावित्री बनकर आंसू बहाना दर्शकों को रास नहीं आया और यह फिल्म बुरी तरह पिट गई। विंसी बताते हैं, 'फिल्म 'मौज' की नाकामी के बाद होमी पूरी तरह से अपने मूड की फिल्में बनाने में उतर पडे। चालीस के दशक में उन्होंने बसंत पिक्चर्स के बैनर पर नाडिया को लेकर 'हंटरवाली की बेटी', 'शेरे बगदाद', 'फ्लाइंग प्रिंस', 'स्टंट क्वीन', 'टाइग्रेस', 'माया महल', 'कॉमेट' और 'सर्कसवाली' जैसी कई हिट फिल्में बनाई। 1948 में उन्होंने धार्मिक फिल्म 'श्री रामभक्त हनुमान' का निर्माण किया, जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया।
वर्ष 1950 में होमी ने मुंबई के उपनगर चैंबूर में बसंत स्टूडियो और बसंत सिनेमाघर की स्थापना की। इसके बाद अगले तीन दशकों में बसंत पिक्चर्स के बैनर पर 'अलादीन और जादुई चिराग', 'हनुमान पाताल विजय', 'नवदुर्गा', 'अलीबाबा चालीस चोर', 'वीर राजपूतानी', 'दिलेर डाकू', 'पवनपुत्र हनुमान', 'माया बाजार', 'सर्कस क्वीन', 'जबक', 'संपूर्ण रामायण', 'खिलाडी', 'हातिमताई', 'तूफान और बिजली' और 'महासती सावित्री' जैसी कई स्टंट, फैंटेसी और पौराणिक फिल्में बनीं और इनमें से ज्यादातर हिट साबित हुई। मीना कुमारी (श्री गणेश महिमा /1950), शम्मी कपूर (गुल सनोवर /1953), फिरोज खान (रिपोर्टर राजू /1962), संजीव कुमार (निशान /1965) और सचिन (श्रीकृष्ण लीला / 1970) जैसे सितारों ने बसंत पिक्चर्स की फिल्मों से ही कॅरियर की शुरूआत की थी। इसी बैनर ने महीपाल, बी. एम. व्यास, अनिता गुहा जैसे अदाकारों और बाबूभाई मिस्त्री, नानाभाई भट्ट और अस्पी ईरानी जैसे डायरेक्टरों को शोहरत दिलाई थी। 1961 में होमी ने नाडिया से शादी कर ली। शादी के बाद नाडिया 1968 में फिल्म 'खिलाडी' में एक बार फिर परदे पर नजर आई और इसके बाद उन्होंने एक्टिंग से संन्यास ले लिया। यह वो दौर था, जब सिने तकनीक में जबरदस्त बदलाव आ रहे थे। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मेें आउट ऑफ फोकस चुकी थीं। नई सोच के साथ फिल्मकारों की एक नई पीढी मैदान में उतर चुकी थी। फैंटेसी, स्टंट और धार्मिक फिल्मों में दर्शकों की दिलचस्पी खत्म होने लगी थी। ऎसे में होमी वाडिया ने 1980 में फिल्म 'महाबली हनुमान' के बाद बसंत स्टूडियो को बेचकर हमेशा के लिए फिल्मी दुनिया से किनारा कर लिया। 1996 में नाडिया रूखसत हुई और 2004 में औलाद की अधूरी आस लेकर होमी वाडिया भी दुनिया को अलविदा कह गए। तीन गुजराती और एक मराठी समेत कुल 63 फिल्मों का निर्माण करने वाले बसंत पिक्चर्स के स्टूडियो की जमीन पर अब रिहायशी और व्यापारिक इमारतें उग आई हैं, लेकिन उसके एक कोने पर खड़ा बसंत सिनेमाहॉल आज भी गुजरे जमाने की याद दिलाता है(शिशिरकृष्ण शर्मा,राजस्थान पत्रिका,22 मई,2010)
फिल्मों को मनोरंजन का चेहरा दिया था राज कपूर ने
हिन्दी फिल्मों में राज कपूर को पहला शोमैन माना जाता था क्योंकि उनकी फिल्मों में मौजमस्ती, प्रेम हिंसा से लेकर अध्यात्म और समाजवाद तक सब कुछ मौजूद रहता था और उनकी फिल्में एवं गीत आज तक भारतीय ही नहीं तमाम विदेशी सिने प्रेमियों की पसंदीदा सूची में काफी उपर बनी रहती हैं।राज कपूर हिंदी सिनेमा के महानतम शोमैन थे जिन्होंने कई बार सामान्य कहानी पर इतनी भव्यता से फिल्में बनाईं कि दर्शक बार बार देखकर भी नहीं थकते। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज के अनुसार राज कपूर वास्तविक शो मैन थे। बाद में सुभाष घई ने भले ही शो मैन बनने की कोशिश की लेकिन राज कपूर की बात ही कुछ और थी।
भारद्वाज के अनुसार राज कपूर की शुरूआती फिल्मों की कामयाबी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 'आवारा', 'श्री 420', 'जिस देश में गंगा बहती है' आदि फिल्मों में समाजवादी सोच विशेष रूप से उभर कर सामने आती है।
भारद्वाज के अनुसार राज कपूर ने महान अभिनेता चार्ली चैपलिन का भारतीयकरण शुरू किया और 'श्री 420' में यह नए मुकाम पर पहुंचता दिखता है। उन्होंने चैपलिन की छवि का जो भारतीयकरण किया, उसका अपना आकर्षण और महत्व है। राज कपूर एक संपूर्ण फिल्मकार के रूप में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे। उनकी फिल्मों मे शंकर जयकिशन, ख़्वाजा अहमद अब्बास, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, राधू करमाकर सरीखे नामों की अहम भूमिका रही। यही वजह है कि कई फिल्मकार राज कपूर का मूल्यांकन करते समय उन्हें एक महान संयोजक के रूप में भी देखते हैं।
राज कपूर को फिल्म की विभिन्न विधाओं की बेहतरीन समझ थी। यह उनकी फिल्मों के कथानक, कथा प्रवाह, गीत संगीत, फिल्मांकन आदि में स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। शायद इसकी वजह निचले दर्जे से सफर की शुरूआत थी। राज कपूर के पिता पथ्वीराज कपूर अपने दौर के प्रमुख सितारों में से थे लेकिन फिल्मों में राज कपूर की शुरूआत चौथे असिस्टेंट के रूप में हुई थी।
राज कपूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि पिताजी का नाम मेरे लिए कितना सहायक हुआ यह नहीं मालूम। उन्होंने फिल्मों में मुझे चौथे असिस्टेंट के रूप में भेजा। शायद यही वजह रही कि अपनी फिल्मों के हरेक मामले में उनकी अलग छाप स्पष्ट दिखती है।
समीक्षकों के अनुसार उनकी फिल्मों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक ओर प्रेम प्रधान फिल्में हैं जिनमें 'आग', 'बरसात', 'संगम', 'बॉबी' आदि हैं। दूसरी श्रेणी उन फिल्मों की है जिनमें स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी के सपने नज़र आते हैं और आज़ादी के बाद सब कुछ ठीक हो जाने का सपना है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सपनों के साथ उनकी फिल्में एक उम्मीद दिखाती है। इस क्रम में 'श्री 420', 'बूट पॉलिश', 'अब दिल्ली दूर नहीं', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'आवारा' आदि का नाम लिया जा सकता है।
राज कपूर की महत्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' एक ओर जहां गंभीर और मानव स्वभाव के दर्शन पर आधारित है वहीं 'आवारा' लीक से हटकर फिल्म थी। आवारा उनकी पहली फिल्म थी जिसे विदेश में भी खूब पसंद किया गया। इस फिल्म में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया है कि अपराध का खून से कोई संबंध नहीं है और एक भले घर का लड़का भी अपराधियों की संगत में पड़कर अपराध की दुनिया में उतर जाता है वहीं अपराधी का बच्चा भी बेहतर इंसान बन सकता है। यह सोच प्रचलित सोच के विपरीत थी जिसे काफी पसंद किया गया।
बतौर निर्माता निर्देशक राज कपूर अंत तक दर्शकों की पसंद को समझने में कामयाब रहे। 1985 में प्रदर्शित 'राम तेरी गंगा मैली' की कामयाबी से इसे समझा जा सकता है, जबकि उस दौर में वीडियो के आगमन ने हिंदी सिनेमा को काफी नुकसान पहुंचाया था और बड़ी बड़ी फिल्मों को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल रही थी।
'राम तेरी गंगा मैली' के बाद वह 'हिना' पर काम कर रहे थे पर नियति को यह मंजूर नहीं था और दादा साहब फाल्के सहित विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित महान फिल्मकार का दो जून 1988 को निधन हो गया(हिंदुस्तान,दिल्ली,1 जून,2010)।
Friday, May 7, 2010
Thursday, April 8, 2010
आशा पारेखःआंखों में मस्ती शराब की
हिंदी सिनेमा में चुलबुली नायिकाओं की तादाद अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। पुराने दौर की ऎसी हीरोइनों की बात चले, तो गीता बाली के साथ जेहन में आशा पारेख का नाम उभरता है। अहम बात यह है कि अपने फिल्मी कॅरियर की आधी सदी पूरा कर चुकी आशा पारेख आज भी सक्रिय हैं, जबकि उनकी पीढी की लगभग सभी नायिकाएं नंदा, माला सिन्हा, सायरा बानो, साधना-गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गई हैं। इस मामले में आशा पारेख की तुलना 'फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन' देविका रानी से की जा सकती है, जो रिटायर होने के पचास साल बाद तक लाइम-लाइट में बनी रही।महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन दो अक्टूबर (1942) को जन्मी आशा पारेख को घर पर कुछ अलग ही माहौल मिला। मां सुधा सामाजिक कार्यकर्ता थीं। बचपन से आशा को डांस का शौक था। पडोस के घर में संगीत बजता, तो आशा के पैर थिरकने लग जाते थे। यह देख मां ने कथक नर्तक मोहनलाल पांडे से उसे बाकायदा प्रशिक्षित कराया। बाद में गोपीकृष्ण और पं. बिरजू महाराज से आशा ने भरतनाट्यम सीखा। अपनी कला को अपने तक सीमित न रखते उन्होंने वैजयंतीमाला और हेमामालिनी की तरह नृत्य-नाटिकाएं- 'चौला देवी' 'अनारकली' और 'इमेज ऑफ इंडिया' तैयार कर पूरी दुनिया में स्टेज शो दिए। आशा को इस बात का गर्व है कि उन्होंने हिंदुस्तान की ओर से न्यूयॉर्क के लिंकन थिएटर में पहली बार प्रस्तुति दी थी।
स्कूल के एक कार्यक्रम में उनकी परफॉमेंस देखकर फिल्मकार विमल राय ने फिल्म 'बाप-बेटी' में आशा को एक छोटा रोल दिया था। लेकिन फिल्मकार विजय भट्ट ने अपनी फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' में यह कह कर मना कर दिया कि आशा में 'स्टार मैटेरियल' नहीं है। आशा के जीवन में नासिर हुसैन गॉड फादर की तरह आए। वे शशधर मुखर्जी के लिए फिल्म 'दिल देके देखो' के लिए नए चेहरे की तलाश में थे। 1959 में आशा के सत्रहवें जन्मदिन पर यह फिल्म उपहार बनकर आई और वे स्टार हीरोइन बन गईं। इस फिल्म से लेकर 'कारवां' (1971) तक आशा का कॅरियर जगमग रहा। उनकी ज्यादातर फिल्मों ने सिल्वर या गोल्डन जुबली मनाई। बॉलीवुड की नायिकाओं में आशा पारेख की इमेज हमेशा 'टॉम ब्वॉयज' की रही है, इसलिए नायकों ने कभी आशा पर लाइन मारने की कोशिश नहीं की। यही वजह है कि उनके बारे में मीडिया में कभी गॉसिप या स्कैंडल नहीं छपे। शम्मी कपूर जैसे दिलफेंक हीरो को वे शुरू से अब तक चाचा कहती रही हैं। आशा का साथ पाकर उनके नायक सफल रहे, पर उनकी समकालीन तारिकाओं-शर्मिला टैगोर, साधना, नूतन, माला सिन्हा और नंदा को बॉक्स ऑफिस पर उनके समान कामयाबी नसीब नहीं हुई।
आशा पारेख की ट्रेजेडी यह है कि नटखट तारिका मान लेने से उनकी छवि संजीदा अभिनेत्री की नहीं बन पाई। शक्ति सामंत की फिल्म 'कटी पतंग' में उन्होंने ग्लैमरहीन विधवा का रोल किया था, जिसे समीक्षकों ने काफी सराहा। राज खोसला निर्देशित 'दो बदन', 'चिराग' और 'मैं तुलसी तेरे आंगन की, फिल्मों में आशा पारेख को सीरियसली लिया गया। साठ के दशक के बाद नई हीरोइनों के आ जाने और अपनी उम्र बढ जाने से वे कैरेक्टर रोल करने लगीं।
फिल्मों से दूर होकर आशा ने टीवी सीरियल बनाकर छोटे परदे पर भी सफलता पाई। 'कोरा कागज' और 'कंगन' उनके यादगार धारावाहिक हैं। आशा ने शादी नहीं की और उन्हें इस बात का का अफसोस नहीं है। समाज सेवा के जरिए वे सुखी और संतुष्ट नजर आती हैं। वहीदा रहमान-नंदा और आशा- ये तीनों सहेलियां मुंबई के फिल्म सर्किल में मशहूर हैं। अपने प्रशंसकों के बीच आशा पारेख के आज भी पॉपुलर बने रहने में उनकी फिल्मों के फडकते-धडकते मधुर संगीत की अहम भागीदारी रही है। सिनेमा में पचास साल पूरे करने पर पिछले साल गोवा के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में उनका सम्मान किया गया था।
(श्रीराम ताम्रकर,राजस्थान पत्रिका,27 मार्च,2010)
Saturday, April 3, 2010
जयाप्रदा
पिछले साल उत्तरप्रदेश में रामपुर के टांडा में एक चुनावी रैली में अमर सिंह ने कहा कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार जयाप्रदा ने आप लोगों के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। अगर आप लोगों ने जयाप्रदा को अपना प्यार नहीं दिया और जयाप्रदा की साइकिल दिल्ली तक नहीं पहुंची, तो वह खुदकुशी कर लेंगी।अमर सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी नूरबानो की जयाप्रदा से तुलना करते हुए कहा कि वह नूरबानो हैं, और यह हूरबानो हैं। जयाप्रदा अक्ल, शक्ल और सीरत की हूरबानो हैं। वास्तव में,महान फिल्मकार सत्यजीत रे भी उन्हें रजतपट की सुंदरतम महिलाओं में से बताया था। रे जयाप्रदा के साथ काम करने के इच्छुक थे लेकिन उनकी अस्वस्थता और फिर निधन के कारण यह योजना मूर्त रूप नहीं ले पाई।
आज जयाप्रदा का जन्मदिन है। उनका मूलनाम ललिता रानी था। जन्म आंध्र प्रदेश में राजमंडी में हुआ था। पिता कृष्णा तेलुगू फ़िल्मों के फाइनेंसर थे। मां नीलवाणी ने उन्हें कम उम्र में ही नृत्य और संगीत की शिक्षा दिलानी शुरू कर दी थी। जयाप्रदा की कई फिल्मों में हम उनके नृत्य कौशल से परिचित हो चुके हैं।
जयाप्रदा को बॉलीवुड में लाने का श्रेय के. विश्वनाथ को जाता है जिन्होंने उनके साथ 1979 में सरगम बनाई। फ़िल्म ज़बरदस्त हिट रही और वे रातों रात स्टार बन गईं। लेकिन हिंदी न बोल सकने के कारण वे अपनी सफलता को भुना नहीं सकीं । उन्हें लेकर1 982 में कामचोर भी के. विश्वनाथ ने ही बनाई थी जिसमें दर्शकों ने पहली बार जयाप्रदा को धाराप्रवाह हिन्दी बोलते देखा।
परवीन बॉबी, जीनत अमान और राखी जैसी नायिकाओं का जादू ढल गया तो जयाप्रदा ने अमिताभ के साथ जोड़ी जमाई। जयाप्रदा शराबी, गंगा जमुना सरस्वती, आखिरी रास्ता, जादूगर, इंद्रजीत और आज का अर्जुन में अमिताभ के साथ थीं। इनमें से तीन फिल्में सुपरहिट थीं।
जयाप्रदा ने न केवल अमिताभ बच्चन और जीतेन्द्र के साथ सफल जोड़ी बनाई, बल्कि प्रतिद्वंद्वी श्रीदेवी के साथ भी उन्होंने लगभग एक दर्जन फ़िल्मों में अभिनय किया है। 'तोहफ़ा' (1984) ने उन्हें सिनेमाप्रेमियों का चहेता बना दिया और बाद में अपनी इस छवि का इस्तेमाल उन्होंने राजनीति में प्रवेश के लिए किया। वे 1994 में एन.टी.रामाराव की तेलुगूदेशम पार्टी में शामिल हुईं मगर बाद में चंद्रबाबू नायडू गुट में चली गईँ। 1996 में आंध्रप्रदेश के लिए राज्यसभा में मनोनीत की गईं। उनकी पहली बड़ी राजनीतिक कामयाबी वह थी जब उन्होंने 2004 के आम चुनावों के दौरान रामपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता।
1986 में, उन्होंने निर्माता श्रीकांत नाहटा से शादी की, जो पहले से ही चंद्रा के साथ विवाहित थे। उनका दाम्पत्य जीवन सामान्य नहीं रहा।
तीस साल के फिल्मी करियर में अब तक उन्होंने सात भाषाओं की 300 फिल्मों में काम किया है। वे चेन्नई में जयाप्रदा थियेटर की मालकिन भी हैं। उन्होंने हाल ही में बंगाली भाषा में ‘आखिरी संघर्ष’ नामक फिल्म बनाई है, जिसमें मुख्य किरदार उन्हीं का है। फिल्म की नायिका माओवादी है और अवाम के लिए संघर्ष करती है।
(तस्वीर जयाप्रदा डॉट नेट से साभार)



