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Tuesday, June 1, 2010

फिल्मों को मनोरंजन का चेहरा दिया था राज कपूर ने

हिन्दी फिल्मों में राज कपूर को पहला शोमैन माना जाता था क्योंकि उनकी फिल्मों में मौजमस्ती, प्रेम हिंसा से लेकर अध्यात्म और समाजवाद तक सब कुछ मौजूद रहता था और उनकी फिल्में एवं गीत आज तक भारतीय ही नहीं तमाम विदेशी सिने प्रेमियों की पसंदीदा सूची में काफी उपर बनी रहती हैं।

राज कपूर हिंदी सिनेमा के महानतम शोमैन थे जिन्होंने कई बार सामान्य कहानी पर इतनी भव्यता से फिल्में बनाईं कि दर्शक बार बार देखकर भी नहीं थकते। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज के अनुसार राज कपूर वास्तविक शो मैन थे। बाद में सुभाष घई ने भले ही शो मैन बनने की कोशिश की लेकिन राज कपूर की बात ही कुछ और थी।

भारद्वाज के अनुसार राज कपूर की शुरूआती फिल्मों की कामयाबी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 'आवारा', 'श्री 420', 'जिस देश में गंगा बहती है' आदि फिल्मों में समाजवादी सोच विशेष रूप से उभर कर सामने आती है।

भारद्वाज के अनुसार राज कपूर ने महान अभिनेता चार्ली चैपलिन का भारतीयकरण शुरू किया और 'श्री 420' में यह नए मुकाम पर पहुंचता दिखता है। उन्होंने चैपलिन की छवि का जो भारतीयकरण किया, उसका अपना आकर्षण और महत्व है। राज कपूर एक संपूर्ण फिल्मकार के रूप में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे। उनकी फिल्मों मे शंकर जयकिशन, ख़्वाजा अहमद अब्बास, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, राधू करमाकर सरीखे नामों की अहम भूमिका रही। यही वजह है कि कई फिल्मकार राज कपूर का मूल्यांकन करते समय उन्हें एक महान संयोजक के रूप में भी देखते हैं।

राज कपूर को फिल्म की विभिन्न विधाओं की बेहतरीन समझ थी। यह उनकी फिल्मों के कथानक, कथा प्रवाह, गीत संगीत, फिल्मांकन आदि में स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। शायद इसकी वजह निचले दर्जे से सफर की शुरूआत थी। राज कपूर के पिता पथ्वीराज कपूर अपने दौर के प्रमुख सितारों में से थे लेकिन फिल्मों में राज कपूर की शुरूआत चौथे असिस्टेंट के रूप में हुई थी।

राज कपूर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि पिताजी का नाम मेरे लिए कितना सहायक हुआ यह नहीं मालूम। उन्होंने फिल्मों में मुझे चौथे असिस्टेंट के रूप में भेजा। शायद यही वजह रही कि अपनी फिल्मों के हरेक मामले में उनकी अलग छाप स्पष्ट दिखती है।

समीक्षकों के अनुसार उनकी फिल्मों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक ओर प्रेम प्रधान फिल्में हैं जिनमें 'आग', 'बरसात', 'संगम', 'बॉबी' आदि हैं। दूसरी श्रेणी उन फिल्मों की है जिनमें स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी के सपने नज़र आते हैं और आज़ादी के बाद सब कुछ ठीक हो जाने का सपना है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सपनों के साथ उनकी फिल्में एक उम्मीद दिखाती है। इस क्रम में 'श्री 420', 'बूट पॉलिश', 'अब दिल्ली दूर नहीं', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'आवारा' आदि का नाम लिया जा सकता है।

राज कपूर की महत्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' एक ओर जहां गंभीर और मानव स्वभाव के दर्शन पर आधारित है वहीं 'आवारा' लीक से हटकर फिल्म थी। आवारा उनकी पहली फिल्म थी जिसे विदेश में भी खूब पसंद किया गया। इस फिल्म में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया है कि अपराध का खून से कोई संबंध नहीं है और एक भले घर का लड़का भी अपराधियों की संगत में पड़कर अपराध की दुनिया में उतर जाता है वहीं अपराधी का बच्चा भी बेहतर इंसान बन सकता है। यह सोच प्रचलित सोच के विपरीत थी जिसे काफी पसंद किया गया।

बतौर निर्माता निर्देशक राज कपूर अंत तक दर्शकों की पसंद को समझने में कामयाब रहे। 1985 में प्रदर्शित 'राम तेरी गंगा मैली' की कामयाबी से इसे समझा जा सकता है, जबकि उस दौर में वीडियो के आगमन ने हिंदी सिनेमा को काफी नुकसान पहुंचाया था और बड़ी बड़ी फिल्मों को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल रही थी।

'राम तेरी गंगा मैली' के बाद वह 'हिना' पर काम कर रहे थे पर नियति को यह मंजूर नहीं था और दादा साहब फाल्के सहित विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित महान फिल्मकार का दो जून 1988 को निधन हो गया(हिंदुस्तान,दिल्ली,1 जून,2010)।

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