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Friday, April 29, 2011

दो-दो संथाली फिल्मोत्सव

संथाली फिल्म इतिहास में यह पहला मौका है जब एक साथ दो-दो संथाली फिल्म महोत्सव होने जा रहे हैं। ये महोत्सव भले ही संथाली फिल्म जगत के भीतरी विवाद की उपज हों, लेकिन इससे वर्षो से बीमार संथाली फिल्म उद्यम के साथ एक बार फिर ग्लैमर की चकाचौंध जुड़ गई है। एक तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांस्कृतिक कला मंच के प्रदेश अध्यक्ष रमेश हांसदा ने ऑल इंडिया संथाली फिल्म एसोसिएशन का झंडा बुलंद किया हुआ है तो वहीं दूसरी ओर पूर्व विधायक व झारखंड पीपुल्स पार्टी के मुखिया सूर्य सिंह बेसरा ने पंडित रघुनाथ मुर्मू एसोसिएशन ऑफ संथाली सिनेमा एंड आर्ट (रास्का) के बैनर तले मोर्चा संभाला है। दोनों गुट पांच मई को दम दिखाएंगे।

होगा आदिवासी 'टैलेंट हंट'
पंडित रघुनाथ मुर्मू अकादमी फॉर संथाली सिनेमा एंड आर्ट (रास्का) पांच मई को होने वाले फिल्म समारोह व रास्का अवार्ड समारोह की तैयारी कर चुका है। इससे साहित्य अकादमी अवार्ड विजेता भोगला सोरेन सरीखे दिग्गज जुड़े हैं तो संथाली फिल्म जगत (बड़े पर्दे) के सर्वप्रथम अभिनेता प्रेम मार्डी जैसी शख्सियत भी संबद्ध है। संथाली सिनेमा अवार्ड देने की शुरुआत 2008 में उस समय शुरू हुई, जब सूर्य सिंह बेसरा ने अपनी वर्षो पुरानी परिकल्पना को पूरा किया। इस बार यह महोत्सव माइकल जॉन प्रेक्षागृह में आयोजित होगा।

रास्का के ज्यूरी मेंबर
भोगला सोरेन, सीआर माझी, मेघराय टुडू, प्रो. लखाई बास्के व प्रो. दिगंबर हांसदा।
रास्का की निदेशक मंडली
सूर्य सिंह बेसरा, डा. शीला बेसरा, रतन कुमार बेसरा व जोबारानी बास्के।
रास्का की राज्य स्तरीय संयोजक मंडली
प्रेमचंद किस्कू (झारखंड), प्रेम मार्डी (पश्चिम बंगाल), शायबा सुशील कुमार हांसदा (उड़ीसा) व अनिल मरांडी (असम)।

किसको क्या जिम्मेदारी
स्मारिका प्रकाशन के लिए सूर्य सिंह बेसरा। रतन कुमार बेसरा को फीचर फिल्म संग्रह। चंदन किस्कू को वीडियो फिल्म संग्रह। फातु मुर्मू को प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार। जोबा बास्के को अतिथि स्वागत। धानु टुडू को आदिवासी टैलेंट हंट। लखाई बास्के को जूरी टीम में समन्वय। कुशल हांसदा को सांस्कृतिक कार्यक्रम। रवींद्रनाथ मुर्मू को कार्यक्रम संयोजन। जयपाल मुर्मू को स्टेज सजावट। विनय टुडू को विडियो व फोटोग्राफी का प्रभार। महात्मा टुडू को जनसंपर्क प्रभारी। डा. पिंकू बास्को को मंच संचालन।

संथाली फिल्म का विकास
ऑल इंडिया संथाली फिल्म एसोसिएशन द्वारा आयोजित द्वितीय संथाली एवं क्षेत्रीय फिल्म महोत्सव का आगाज शुक्रवार को कर दिया जाएगा। पहले दिन हेमंत सोरेन को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया है। यह महोत्सव 29 अप्रैल से शुरू होकर लगातार पांच मई तक चलेगा। पंडित रघुनाथ मुर्मू जयंती के उपलक्ष्य पर पांच मई को गोपाल मैदान में झारखंड सिने अवार्ड समारोह का आयोजन होगा। इस बार कार्यक्रम के सफल आयोजन की जिम्मेदारी रमेश हांसदा ने उठा रखी है। वे अकेले ही इसके सफल आयोजन को दिन-रात एक किए हुए हैं। इस बार आयोजन पर करीब 20 लाख रुपए खर्च करने का अनुमान है।

आइसफा के ज्यूरी मेंबर
सीआर माझी, शिवलाल सागर, रविलाल टुडू, रामचंद्र हेम्ब्रम व दिगंबर हांसदा।
कहां-कहां दिखाई जाएगी फिल्म

तिथि-फिल्म-स्थान
29 अप्रैल : धूल व बिदलई , एक्सएलआरआई
30 अप्रैल जनुम पीड, जनुम दादा, - माइकल जॉन बिष्टुपुर
30 अप्रैल निसार्थी (संथाली), - करनडीह जाहेरथान
01 मई प्यार कर मेहंदी रचाई लेलो रे, करनडीह जाहेरथान
01 मई तोर आशिक मोर, माइकल जॉन बिष्टुपुर
01 मई तेतांग जिवी, (संथाली) करनडीह जाहेरथान
01 मई जुवन मोन, (संथाली) राजनगर
02 मई लावड़िया व कथांतर, माइकल जॉन बिष्टुपुर
02 मई तेतांग जिवी (संथाली), करनडीह जाहेरथान
02 मई आस (संथाली) जादूगोड़ा कॉलोनी
03 मई बिस्किल (संथाली) जादूगोड़ा कॉलोनी
03 मई अंगिर (संथाली) गम्हरिया
03 मई करमा (नागपुरी) माइकल जॉन बिष्टुपुर

सक्रिय सदस्य : रमेश हांसदा, अर्जुन टुडू, पीतांबर हांसदा, दशरथ हांसदा, जॉन दास, रमेश मार्डी, विनोद सोरेन, होंदा टुडू, दिनेश हांसदा, विक्रम सोरेन व बिंदे सोरेन(भादो माझी,दैनिक जागरण,जमशेदपुर,29.4.11)।

Friday, April 22, 2011

राज ठाकरे के करीबी की पत्नी बना रहीं भोजपुरी फिल्म

एक समय मुंबई में भोजपुरी फिल्म दिखाने वाले सिनेमाघरों में तोड़फोड़ करने वाली राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के एक नेता अब खुद ही भोजपुरी फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं और पार्टी को इससे कोई आपत्ति नहीं है। मनसे के उपाध्यक्ष (चित्रपट कामाचार सेना) सतीश बाविस्कर की पत्नी नंदा बाविस्कर नी शेलर भोजपुरी फिल्म त्रिदेव का निर्माण कर कर रही हैं। फिल्म को छठ पूजा के मौके पर प्रदर्शित किया जाएगा। सतीश ने भोजपुरी फिल्म निर्माण को महज व्यवसाय एक व्यवसाय बताया है। पार्टी भी एक सुर में इसे केवल व्यवसाय ही मान रही है। भोजपुरी फिल्मों से मुनाफा कमाने पर मनसे का नरम रवैया इसलिए सवाल खड़े करता है, क्योंकि वह भाषा के नाम पर महाराष्ट्र में लगातार उत्पात मचाती रही है। मनसे कार्यकर्ता शहर के कई सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्म प्रदर्शित करने पर हमले कर चुके है। दिलचस्प यह है कि सतीश को यह काम पार्टी की उत्तर भारतीय भगाओ वाली विचारधारा के खिलाफ नहीं लगता। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, भोजपुरी फिल्म निर्माण में क्या बुराई है? जब कोई दुबे, चौबे या मिश्रा मराठी फिल्म बना कर कमाई कर सकता है तो मराठी लोग ऐसा क्यों नहीं कर सकते? वे यहां से धन कमा कर अपने राज्य भेज देते हैं जबकि मराठी लोग कमाई को अपने ही राज्य में रख सकते हैं। मैने यह बात पार्टी के वरिष्ठ अधिकारियों को भी बता दी है। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2008 में थाणे के प्रताप टाकिज और जुलाई 2008 में लोअर परेल के दीपक टाकीज पर मनसे कार्यकर्ताओं ने भोजपुरी फिल्म प्रदर्शित करने पर जमकर तोड़फोड़ की थी। मनसे उपाध्यक्ष वागेश सरास्वत ने कहा, यह सिर्फ व्यवसाय है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,22.4.11 में मुंबई से संजीव देवासिया की रिपोर्ट)।

Sunday, April 17, 2011

गीतों के राजकुमार थे गोपाल सिंह नेपाली

भारतीय सिनेमा जगत में गीतों के राजकुमार के नाम से मशहूर गोपाल सिंह नेपाली का नाम एक ऐसे गीतकार के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने लगभग दो दशक तक प्रेम, विरह, प्रकृति और देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत गीतों की रचना करके श्रोताओं के दिल पर राज किया। बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त 1911को जन्मे इस गीत सम्राट के पिता रेलबहादुर सिंह फौज में हवलदार थे। उनके पिता मूल रूप से नेपाल के रहने वाले थे लेकिन नौकरी के लिए भारत और फिर बेतिया में ही बस गए। विषमताओं, अभावों और संघर्षो में पले-बढ़े नेपाली अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए लेकिन संघर्षो के मध्य जीवन की पाठशाला में आम लोगों की भावनाओं को उन्होंने नजदीक से जाना-समझा और उनकी अपेक्षा तथा आकांक्षाओं को अपनी कविताओं और गीतों में वाणी दी। नेपाली जी ने जब होश संभाला तब चंपारण में महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चरम पर था। उन दिनों पंडित कमलनाथ तिवारी, पंडित केदारमणि शुक्ल और पंडित राम ऋषिदेव तिवारी के नेतृत्व में भी इस आंदोलन के समानान्तर एक आंदोलन चल रहा था। नेपाली जी इस दूसरी धारा के ज्यादा करीब थे। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली जी की पहली कविता 'भारत गगन के जगमग सितारे' 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा सम्पादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद उनके कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम चार हिन्दी पत्रिकाओं, रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का सम्पादन किया। युवावस्था में नेपाली जी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें कवि सम्मेलनों में आमंत्रित किया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' उनके एक गीत को सुनकर गद्गद हो गए थे। उस दौर में नेपाली जी के गीतों की धूम मची हुई थी लेकिन उनकी आर्थिक हालत खराब थी और कवि सम्मेलनों से मिलने वाली रकम से परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो रहा था। वर्ष 1944 में वह अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुंबई आए थे। उस कवि सम्मेलन में फिल्म निर्माता शशिधर मुखर्जी भी मौजूद थे, जो उनकी कविता सुनकर बेहद प्रभावित हुए। उसी दौरान उनकी ख्याति से प्रभावित होकर फिल्मिस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान ने उन्हें दो सौ रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में चार साल के लिए अनुबंधित कर लिया। नेपाली जी ने सबसे पहले 1944 में फिल्मिस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म 'मजदूर' के लिए गीत लिखे। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित इस फिल्म का संवाद लेखन प्रसिद्ध साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने किया था। इस फिल्म के गीत इतने लोकप्रिय हुए कि बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से नेपालीजी को 1945 का सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया गया। फिल्मी गीतकार के तौर पर अपनी कामयाबी से उत्साहित होकर नेपाली जी फिल्म इंडस्ट्री में ही जम गए और लगभग दो दशक 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। फिल्म इंडस्ट्री में नेपाली की भूमिका गीतकार तक ही सीमित नहीं रही। उन्होंने गीतकार के रूप में स्थापित होने के बाद फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा और हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्र्चस फिल्म कंपनी की स्थापना करके उसके बैनर तले तीन फिल्मों का निर्माण किया(राष्ट्रीय सहारा,मुंबई,17.4.11)।

Friday, April 15, 2011

फर्स्ट डे फर्स्ट शो अब आपके घर पर

तकनीक का चमत्कार यूं ही जारी रहा तो वो दिन दूर नहीं जब अपने पसंदीदा सितारे की ताजातरीन फिल्म देखने के लिए फिल्म की रिलीज के दिन आप अपने घर के भीतर बाहर से ताला लगाकर बैठें। क्योंकि, आप नहीं चाहेंगे कि आपकी ये पसंदीदा फिल्म बजाय सिनेमाघर के जब आप अपने घर में अपने खास दोस्तों के साथ देख रहे हों तो कोई आपको डिस्टर्ब करे। उपग्रहों से सीधे आपके टेलीविजन के लिए तमाम चैनल पकड़ने वाले छोटी सी छतरी का दिमाग बड़ा हो रहा है और इसके जरिए आपकी जेब से पैसा निकालने की एक चुपचाप लेकिन चौंकाने वाली कोशिश शुरू हो गई है।

देश में फिल्मों को थिएटरों तक पहुंचाने के तरीकों में पिछले तीन-चार साल में क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुका है। अब तमाम सिनेमाघरों के मालिक वितरकों के पास फिल्म के प्रिंट लेने के ना तो अपने कर्मचारी भेजते हैं और ना ही शुक्रवार की दोपहर तक ट्रेन लेट होने या रास्ते में ट्रैफिक जाम लग जाने के चलते प्रिंट न आने पर उनकी सांसें ही फूलती हैं। कभी जी समूह के लिए देश में पहली ऑन लाइन लॉटरी प्लेविन की परिकल्पना सोचने और उसे अमली जामा पहनाने वाले और पेशे से इंजीनियर संजय गायकवाड़ ने छह साल पहले एक ऐसी तकनीक की परिकल्पना की जिसके जरिए फिल्मों का सिनेमाघरों में प्रदर्शन और वितरण एक जगह से नियंत्रित किया जा सके। पूरे देश में करीब ढाई हजार सिनेमाघर अब इसी तकनीक से सैटेलाइज के जरिए फिल्में दिखाते हैं।

सैटेलाइट के जरिए एमपीईजी ४ स्तर का डिजिटल प्रसारण मुहैया कराने वाली दुनिया की इकलौती कंपनी यूएफओ मूवीज को चलाने वाले वैल्यूएबल ग्रुप के भीतर अब एक और क्रांतिकारी काम चल रहा है। ये कदम है देश में सिनेमा के शौकीनों का एक ऐसा क्लब तैयार करने का, जो नई फिल्में देखने के लिए ५० हजार से लेकर एक लाख रुपए प्रति फिल्म तक खर्च करने का माद्दा रखते हों। ये कीमत सदस्यों की संख्या बढ़ने पर आगे कम भी हो सकती है। क्लब एक्स नाम के इस समूह में अब तक हर्ष गोयनका, अमित बर्मन और छगन भुजबल के अलावा शाहरूख खान,अजय देवगन और सचिन तेंदुलकर शामिल हो चुके हैं। क्लब की सदस्यता फिलहाल केवल आमंत्रण से है और जाहिर है,इसका सदस्य बनने से पहले आपकी कोठी में दस-बारह लोगों के एक साथ बैठने लायक छोटा सा थिएटर भी होना चाहिए(पंकज शुक्ल,नई दुनिया,दिल्ली,15.4.11)

Wednesday, April 6, 2011

भोजपुरी फिल्मों पर बड़ी कंपनियों की नजर

कार्पोरेट कंपनियां अब सिर्फ बड़े शहरों पर ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी पहुंचना चाहती हैं और इसके लिए वह फिल्मों का सहारा ले रही हैं। इमामी कंपनी ने अपने तेल की ब्रान्डिंग के लिए भोजपुरी फिल्म की मदद लेते हुए फिल्म का एक पूरा गाना स्पॉन्सर किया हैं। जंग नाम की फिल्म में नजर आने वाले इस गाने का रिकार्डिंग तक का पूरा खर्च इमामी ने किया है। फिल्मों के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है। झंडू बाम गाने की सफलता से कंपनियों को यह अनोखी कल्पना सूझी है। इमामी कंपनी का हिमानी नवरत्न एक्स्ट्रा ठंडा ऑयल के प्रमोशन के लिए कंपनी ने यह अनोखा कदम उठाया हैं।

हालांकि, कंपनी के तेल का विज्ञापन शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन कर ही रहे हैं, बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में अपनी पैठ बनाने के लिए कंपनी ने गाना स्पॉन्सर किया है। सूत्रों के मुताबिक, भोजपुरी में बनने वाली फिल्म जंग में संभावना सेठ पर यह गाना फिल्माया गया है।मुंबई (ब्यूरो)। कार्पोरेट कंपनियां अब सिर्फ बड़े शहरों पर ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी पहुंचना चाहती हैं और इसके लिए वह फिल्मों का सहारा ले रही हैं। इमामी कंपनी ने अपने तेल की ब्रान्डिंग के लिए भोजपुरी फिल्म की मदद लेते हुए फिल्म का एक पूरा गाना स्पॉन्सर किया हैं। जंग नाम की फिल्म में नजर आने वाले इस गाने का रिकार्डिंग तक का पूरा खर्च इमामी ने किया है। फिल्मों के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है। झंडू बाम गाने की सफलता से कंपनियों को यह अनोखी कल्पना सूझी है। इमामी कंपनी का हिमानी नवरत्न एक्स्ट्रा ठंडा ऑयल के प्रमोशन के लिए कंपनी ने यह अनोखा कदम उठाया है(नई दुनिया,दिल्ली,6.4.11)।

Tuesday, March 29, 2011

लीला सैमसन हो सकती हैं सेंसर बोर्ड की अगली अध्यक्ष

हफ्तों तक चली कोशिशों के बाद भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय किसी भी फिल्मी हस्ती को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) का अध्यक्ष बनने के लिए राजी नहीं कर सका। बोर्ड की मौजूदा अध्यक्ष शर्मिला टैगौर का कार्यकाल ३१ मार्च को समाप्त हो रहा है और सूत्रों के मुताबिक संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली की अध्यक्ष लीला सैमसन का नाम बोर्ड की अगली अध्यक्ष के तौर पर तय हो गया है। हालांकि, इसकी आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है। सेंसर बोर्ड का नया अध्यक्ष तलाशने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय पिछले कई दिनों से हिंदी फिल्म उद्योग के कुछ लोगों से लगातार संपर्क कर रहा था। सूत्रों के मुताबिक इस पद के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की पहली पसंद फिल्म अभिनेत्री और पूर्व सांसद शबाना आजमी थीं। शबाना के पति जावेद अख्तर इन दिनों राज्यसभा के सदस्य हैं और इसके चलते ही शबाना ने और राजनीतिक अनुग्रह से बचने के लिए इस पद की जिम्मेदारियां संभालने से इंकार कर दिया। इसके बाद इस पद के लिए फिल्म निर्देशकों रमेश सिप्पी, गोविंद निहलानी और सईद मिर्जा का भी मन टटोला गया। मंत्रालय के अफसरों ने रमेश सिप्पी को अध्यक्ष बनाने के लिए खास कोशिशें की, लेकिन फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स गिल्ड के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे सिप्पी ने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पद को अपनी मौजूदा जिम्मेदारी से टकराव मानते हुए इसके लिए मना कर दिया। बीच में फिल्म अभिनेत्री रवीना टंडन के नाम की चर्चा भी सेंसर बोर्ड के मुंबई कार्यालय में जोरों पर रही। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पद पर किसी गैर फिल्मी शख्सियत की तैनाती हाल के दिनों में कोई ११ साल पहले हुई थी, जब भाजपा नेता बी.पी. सिंघल को ये पद सौंपा गया था। फिल्म जगत में ये आम धारणा बन चुकी है कि सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पर अब राजनीतिक दबाव काफी ज्यादा रहता है जिसके चलते कई बार इस पद पर बैठे शख्स को अपनी ही बिरादरी के लोगों के गुस्से का शिकार बनना पड़ता है।

निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म राजनीति और निर्देशक सुधीर मिश्रा की फिल्म ये साली जिंदगी को लेकर हाल के दिनों में सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष का पद काफी विवादों में घिरा रहा है। संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली की अध्यक्ष लीला सैमसन को १९८२ में संस्कृति पुरस्कार, १९९० में पद्मश्री पुरस्कार और २००० में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। पिछले साल ही अपनी गुरु रुक्मिणी देवी के जीवन पर लिखी उनकी एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी है(पंकज शुक्ल,नई दुनिया,दिल्ली,29.3.11)।

Thursday, March 24, 2011

नहीं रहीं लिज टेलर

अपनी मादक खूबसूरती, अत्याधुनिक रफ्तार भरी जीवन शैली और बिंदास बातों के लिए मशहूर हॉलीवुड के इतिहास की सबसे आकर्षक अभिनेत्री लिज टेलर का बुधवार को हृदयगति रुकने से निधन हो गया। वह 79 वर्ष की थीं। अस्वस्थ होने के कारण वह पिछले दो महीनों से लॉस एंजिलिस के सीडार्स-सिनाई अस्पताल में भर्ती थीं। जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तब उनके चारों बच्चे उनके पास थे। उनके दस नाती-पोते और चार पड़-नाती, पड़-पोते भी हैं। उनकी प्रवक्ता सैली मॉरीसन के हवाले से सीएनएन ऑनलाइन ने कहा कि लिज गंभीर रूप से बीमार थीं, फिर भी उन्हें विश्वास था कि वह स्वस्थ हो कर घर लौट जाएंगी। हॉलीवुड में उनकी शोहरत की मिसालें दी जाती है। माना जाता है कि नीली आंखों वाली लिज ने जितनी शोहरत अपने जीवन काल में पाई, वह किसी शख्स को आज तक हासिल नहीं हुई। उनकी खूबसूरती, उनका अभिनय और उनकी निजी जिंदगी हमेशा चर्चा का विषय रही। पूरी दुनिया में उन्हें चाहने वाले मौजूद हैं। अपनी आठ शादियों के अतिरिक्त पॉप संगीत के दिवंगत बादशाह माइकल जैक्सन के साथ उनकी मित्रता ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। उनकी बिंदास जीवन शैली ने अगर असंख्य दिल जीते, तो जाने कितने दिल तोड़े भी। अभिनेता रिचर्ड बर्टन के साथ उनके प्रेम और विवाह ने खूब चर्चा पाई। बर्टन से लिज ने दो बार शादी की और दो बार तलाक लिया। हॉलीवुड की फिल्म और टेबुलायड पत्रकारिता को ग्लैमरस बनाने में उनके जीवन से पांचवें और छठे दशक में जुड़े स्कैंडलों का का बड़ा योगदान रहा। एलिजाबेथ टेलर का निधन हॉलीवुड सिनेमा के एक युग का अंत है।
पूरा नाम : डेम एलिजाबेथ रोजमंड टेलर। वह लिज टेलर के नाम से लोकप्रिय हुईं। 
बाल कलाकार : लिज की मां रंगमंच की अभिनेत्री थीं। लिज ने बाल कलाकार के रूप में फिल्मी दुनिया में कदम रखा। मात्र नौ साल की उम्र में पहली फिल्म देयर इज वन बॉर्न एवरी मिनट की। निर्माता कंपनी, यूनिवर्सल पिक्चर्स ने उनका आगे का अनुबंध रद कर दिया और कहा कि नन्हीं लिज को न नाच आता है, न गाना और न अभिनय। 
पहली सफलता : फिल्म नायिका के रूप में उन्हें पहली सफलता अ प्लेस इन द सन (1951) में मिली। उस वक्त उनकी उम्र 21 वर्ष थी। 
ऑस्कर : लिज को तीन ऑस्कर अवार्ड मिले। बटरफील्ड 8 (1960) और हू इज अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वूल्फ (1966) फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए। उन्हें तीसरा ऑस्कर मानवता की सेवा के कार्यो के लिए 1993 में दिया गया। 
प्रमुख फिल्में : पांचवे दशक में वह हॉलीवुड की सबसे बड़ी शख्सीयत के रूप में उभरीं। उनकी प्रमुख फिल्में हैं-फादर ऑफ द ब्राइड, अ प्लेस इन द सन, बटरफील्ड 8, रेन ट्री कंट्री, हू इज अफ्रेड ऑफ वर्जीनिया वूल्फ, कैट ऑन द हॉट रूफ टिन, सडनली लास्ट समर, द अपार्टमेंट, क्लियोपेट्रा। 
सबसे पहले 10 लाख : टेलर हॉलीवुड की पहली अभिनेत्री थीं, जिन्होंने फिल्म के लिए 10 लाख डॉलर की फीस प्राप्त की। 1960 में उन्होंने ट्वेंटिएथ सेंचुरी फॉक्स कंपनी से फिल्म क्लियोपेट्रा के लिए यह रकम ली। फिल्म तीन साल में बनकर पूरी हुई। करीब साढ़ चार करोड़ डॉलर में अपनी अपने समय की यह सबसे महंगी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। 
शादियां और संतानें : एलिजाबेथ टेलर की ख्याति आठ शादियों के लिए भी है। उनके सात पति थे। अभिनेता रिचर्ड बर्टन से उन्होंने दो बार शादी की। उनके दो बेटे और दो बेटियां हुई(दैनिक जागरण,24.3.11)।

Monday, March 14, 2011

आलम आरा के 80 साल

भारतीय सिनेमा के लिए वह दिन बहुत खास था। दर्शक रुपहले परदे पर कलाकारों को बोलते हुए देखने को आकुल थे। हर तरफ चर्चा थी कि परदे पर कैसे कोई कलाकार बोलते हुए दिखाई देगा। आखिरकार 14 मार्च 1931 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब बंबई (अब मुंबई) के मैजिस्टक सिनेमा में आलम-आरा के रूप में देश की पहली बोलती फिल्म रिलीज की गई। उस समय दर्शकों में इसे लेकर काफी कौतूहल रहा था। फिल्म में अभिनेत्री जुबैदा के अलावा पृथ्वी राज कपूर, मास्टर विट्ठल, जगदीश सेठी और एलवी प्रसाद प्रमुख कलाकार थे, जिन्हें लोग पहले परदे पर कलाकारी करते हुए देख चुके थे, लेकिन पहली बार परदे पर उनकी आवाज सुनने की चाह सभी में थी। दादा साहेब फाल्के ने अगर भारत में मूक सिनेमा की नींव रखी तो अर्देशिर ईरानी ने बोलती फिल्मों का नया युग शुरू किया। हालांकि इससे पूर्व कोलकाता तब कलकत्ता की फिल्म कंपनी मादन थिएटर्स ने चार फरवरी 1931 को एंपायर सिनेमा (मुंबई) में दो लघु फिल्में दिखाई थी, लेकिन इस फिल्म में कहानी को छोड़कर नृत्य और संगीत के दृश्य थे। इसलिए आलम-आरा को देश की पहली फीचर फिल्म कहा जाता है। चार साल पहले 25 मई 1927 को अमेरिका में दुनिया की पहली बोलती फिल्म रिलीज की गई थी। वार्नर ब्रदर्स ने द जॉज सिंगर के नाम से बोलती फिल्मों का इतिहास शुरू किया। यह फिल्म भी उस समय बहुत चर्चित रही और इसके बाद तो कई और कंपनियां बोलती फिल्मों के निर्माण में जुट गई। हालांकि मूक फिल्मों के सुपर स्टार चार्ली-चैपलिन को फिल्मों में आवाज डालने की परंपरा रास नहीं आई, इसे वह अभिनय में बाधक मानते थे। विश्व स्तर पर मूवी और टॉकी फिल्मों को लेकर जबर्दस्त बहस शुरू हो गई थी। जबकि भारत में इस नवीन प्रयोग को हाथों-हाथ लिया गया और एक के बाद एक फिल्में बनने लगीं। बोलती फिल्मों का युग शुरू होने से पूर्व मूक फिल्मों को मूवी कहा जाता था, क्योंकि इसमें कलाकार सिर्फ हिलते-डुलते थे। और जब बोलती फिल्मों का युग आया तो वह टॉकी के रूप में परिवर्तित हो गया। मूक फिल्मों की शुरुआत करने वाले दादा साहेब को भी अपनी मूक फिल्म सेतुबंध को बोलती फिल्म में तब्दील करना पड़ा था। इस स्तर से सेतुबंध भारत की पहली डब फिल्म बन गई। तब डब कराने में 40 हजार रुपये खर्च आया था। उस समय बोलती फिल्मों को बनाना आसान काम नहीं था। आज की तरह ढेरों सुविधाएं भी नहीं थीं। सवाक फिल्मों के आगमन से कई नई चीजें जुड़ीं तो कुछ चीजों का महत्व खत्म हो गया। मूक फिल्मों में कैमरे का कमाल होता था, लेकिन बाद में माइक्रोफोन के कारण इसकी आजादी पर अंकुश लग गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब स्टूडियो में गानों की रिकार्डिग नहीं होती थी और शूटिंग स्थलों पर ही संवाद के साथ-साथ गाने भी रिकॉर्ड किए जाते थे। गानों की रिकार्डिग के लिए संगीतकार अपनी पूरी टीम के साथ शूटिंग स्थल पर मौजूद रहते थे। कलाकार खुद अपना गाना गाते थे और साजिंदों को वहीं आसपास पेड़ के पीछे या झोपड़ी अदि में छिपकर बाजा बजाना पड़ता था। कभी-कभी तो उन्हें पानी में रहकर या पेड़ पर बैठकर बजाना पड़ता था। इस दौरान किसी से भी छोटी गलती हो जाने पर शूटिंग दोबारा करनी पड़ती थी। आलम-आरा में सात गाने थे। फिल्म का सबसे लोकप्रिय गीत दे दे खुदा के नाम पर.. वजीर मोहम्मद खान (डब्ल्यूएम खान) ने गाया था। हालांकि खान साहब इन फिल्म के मुख्य नायक नहीं थे, लेकिन उन्होंने इतिहास रचा और भारतीय सिनेमा जगत के पहले गायक बन गए। खान साहब इस फिल्म में एक फकीर की भूमिका में थे। बदला दिलवाएगा या रब.. गाने से अभिनेत्री जुबैदा भारत की पहली फिल्मी गायिका बनीं। फिल्म में संगीत दिया था फिरोज शाह मिस्त्री और बी ईरानी ने। इस फिल्म में संगीत के लिए महज तीन वाद्ययंत्रों का ही प्रयोग किया गया था। अपनी संवाद अदायगी के लिए पहचाने जाने वाले पृथ्वी राज कपूर की आवाज को तब फिल्मी समीक्षकों ने नकार दिया था। यह फिल्म उस समय चर्चित एक पारसी नाटक पर आधारित थी। एक राजकुमार और बंजारन लड़की के बीच प्रेम संबंधों पर आधारित इस फिल्म के लेखक जोसेफ डेविड थे, जो 124 मिनट लंबी थी। आलम-आरा फिल्म से सबसे चर्चित हस्ती में पृथ्वी राज कपूर का नाम आता है, जिन्होंने नौ मूक फिल्मों में काम करने के बाद बोलती फिल्म में काम किया था। फिल्मों में उनके अमूल्य योगदान के लिए 1971 में दादा साहेब फाल्के सम्मान से नवाजा गया। फिल्म की नायिका जुबैदा ने बोलती फिल्मों में आने से पहले गैर बोलती फिल्मों में भी काम किया था। उन्होंने काला नाग (1924), पृथ्वी वल्लभ (1924), बलिदान (1927) और नादान भोजाई (1927) जैसी कई मूक फिल्मों में काम किया। शरत चंद्र के उपन्यास देवदास पर 1936 में बनी पहली हिंदी फिल्म में पारो की भूमिका उन्होंने ही निभाई थी। इस फिल्म से अभिनेता के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले एलवी प्रसाद आगे चलकर हिंदी और तेलुगु फिल्मों के मशहूर निर्माता-निर्देशक बने। उनकी निर्देशित कुछ चर्चित हिंदी फिल्में शारदा (1957), छोटी बहन (1959) और जीने की राह (1969) है। बतौर निर्माता हमराही (1963), मिलन (1967), खिलौना (1970) और एक दूजे के लिए (1981) उनकी कुछ यादगार फिल्में हैं। प्रसाद को 1982 में भारतीय सिनेमा में अमूल्य योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के सम्मान से नवाजा गया। कई नायाब सितारे देने वाली यह फिल्म आज अपने अस्तित्व में नहीं है। दुर्भाग्य से आठ साल पहले 2003 में पुणे की राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में लगी आग से आलम-आरा फिल्म के नामोनिशान खाक हो गए। आलम-आरा ही नहीं, भारतीय सिनेमा की और भी कई अमूल्य धरोहर इसमें स्वाहा हो गई। इस अग्निकांड के बाद पूरे देश में इसके प्रिंट की खोज की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। फिल्म ही नहीं, इसके गाने भी उसी आग में नष्ट हो गए। उस समय फिल्मी गानों को ग्रामोफोन रिकार्ड तैयार करवाने की शुरुआत नहीं हुई थी, इसलिए उसे अलग से संरक्षित भी नहीं किया जा सका। आज इस फिल्म को रिलीज हुए 80 साल बीत चुके हैं। हमारा भारतीय सिनेमा कहां से कहां तक पहुंच गया है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम फिल्मी इतिहास के शुरुआती पन्ने ही बचाकर नहीं रख सके। हालांकि इस फिल्म के कुछ फोटो जरूर बचे हुए हैं, जिसे देखकर हम संतोष कर सकते हैं(सुरेन्द्र कुमार वर्मा,दैनिक जागरण,14.3.11)।

Wednesday, March 9, 2011

हिन्दी फिल्मों की पहली ड्रीमगर्ल थीं देविका रानी

भारतीय सिनेमा जगत में अपनी दिलकश अदाओं से दर्शकों को दीवाना बनाने वाली अभिनेत्री देविका रानी को आज कोई याद भी नहीं करता। देविका रानी का जन्म 30 मार्च 1908 को आंध्रप्रदेश के वाल्टेयर नगर में हुआ था। उनके पिता कर्नल एमएन चौधरी ऊंचे बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे जिन्हें बाद में भारत के प्रथम सर्जन जनरल बनने का गौरव प्राप्त हुआ। नौ वर्ष की उम्र में देविका रानी शिक्षा ग्रहण करने के लिए इंग्लैंड चली गई। पढ़ाई पूरी करने के बाद देविका रानी ने निश्चय किया कि वह फिल्मों में अभिनय करेगी लेकिन परिवार वाले इस बात के सख्त खिलाफ थे क्योंकि उन दिनों संभ्रान्त परिवार की लड़कियों को फिल्मों में काम नहीं करने दिया जाता था। इंग्लैंड में कुछ वर्ष रहकर देविका रानी ने रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट में अभिनय की विधिवत पढ़ाई की। इस बीच उनकी मुलाकात सुप्रसिद्ध निर्माता हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय मैथ्यू अर्नाल्ड की कविता लाइट ऑफ एशिया के आधार पर इसी नाम से एक फिल्म बनाकर अपनी पहचान बना चुके थे। हिमांशु राय देविका रानी की सुंदरता पर मुग्ध हो गए और उन्होंने देविका रानी को अपनी फिल्म "कर्मा" में काम देने की पेशकश की जिसे देविका ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह वह समय था जब मूक फिल्मों के निर्माण का दौर समाप्त हो रहा था और रुपहले पर्दे पर कलाकार बोलते नजर आ रहे थे। हिमांशु राय ने जब वर्ष 1933 में फिल्म कर्मा का निर्माण किया तो उन्होंने नायक की भूमिका स्वयं निभायी और अभिनेत्री के रूप में देविका रानी का चुनाव किया। फिल्म देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक "लिप टू लिप" दृश्य देकर उस समय के समाज को अंचभित कर दिया। इसके लिए देविका रानी की काफी आलोचना भी हुई और फिल्म को प्रतिबंधित भी किया गया। इसके बाद हिमांशु राय ने देविका रानी से शादी कर ली और मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर बांबे टॉकीज बैनर की स्थापना की और फिल्म जवानी की हवा का निर्माण किया। वर्ष 1935 में प्रदर्शित देविका रानी अभिनीत यह फिल्म सफल रही। बाद में देविका रानी ने बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी कई फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों में से एक फिल्म थी अछूत कन्या। वर्ष 1936 में प्रदर्शित "अछूत कन्या" में देविका रानी ने ग्रामीण बाला की मोहक छवि को रुपहले पर्दे पर साकार किया। फिल्म "अछूत कन्या" में अपने अभिनय से देविका ने दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया। फिल्म में अशोक कुमार एक ब्राह्मण युवक के किरदार मे थे जिन्हें एक अछूत लड़की से प्यार हो जाता है। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म काफी पसंद की गई और इस फिल्म के बाद देविका रानी फिल्म इंडस्ट्री में "ड्रीम गर्ल" के नाम से मशहूर हो गई। "अछूत कन्या" के प्रदर्शन के बाद देविका रानी "फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन" यानी भारतीय रजत पट की पहली पटरानी की उपाधि से सम्मानित किया गया। ड्रीम गर्ल और पटरानी जैसे सम्मान प्राप्त होने से देविका रानी के बारे में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में वह कितनी लोकप्रिय रही होंगी। फिल्म अछूत कन्या के देविका रानी ने अशोक कुमार के साथ कई फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों में वर्ष 1937 मे प्रदर्शित फिल्म "इज्जत" के अलावा फिल्म "सावित्री" (1938) और "निर्मला" (1938) जैसी फिल्में शामिल है। वर्ष 1945 में देविका रानी बांबे टॉकीज से अलग हो गई। पति की मौत और बांबे टॉकीज को छोड़ने के बाद देविका रानी लगभग टूट सी गई थी। इस बीच उनकी मुलाकात रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाब रोरिक से हुई। बाद में देविका रानी ने उनसे विवाह कर लिया और फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। फिल्म इंडस्ट्री में उत्कृष्ट योगदान देने के लिये भारत सरकार ने जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार की शुरुआत की तो इसकी सर्वप्रथम विजेता देविका रानी बनीं। इसके अलावा देविका रानी फिल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनी जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। अपने दिलकश अभिनय से दर्शकों के दिलो पर राज करने वाली देविका रानी 9 मार्च 1994 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं(राष्ट्रीय सहारा,9.3.11)।

Thursday, February 17, 2011

पटना में भोजपुरी फिल्म महोत्सव 22 मार्च से

बिहार दिवस पर तीन दिवसीय भोजपुरी फिल्म महोत्सव 22 मार्च से शुरु होगा. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के इस कार्यक्रम में 24 मार्च तक पटना के मोना सिनेमा में भोजपुरी की सात फिल्में दिखायी जायेंगी.

दर्शक इसका आनंद बिना शुल्क के उठा सकेंगे. विभाग के सचिव राजेश भूषण ने बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में बताया कि 25 से 27 मार्च तक एएन सिन्हा इंस्टीटय़ूट में डॉक्यूमेंट्री महोत्सव होगा. इसमें सरकारी विभागों और बिहार के विषय वस्तु पर बनी 14 डॉक्यूमेंट्री दिखायी जायेगी. फिल्मों की शॉर्टलिस्टिंग की जा रही है.

फिल्म महोत्सव का मकसद लोगों में बिहारी होने का गर्व पैदा करना है. मोना सिनेमा के मैनेजर शरद गुप्ता ने बताया कि भोजपुरी फिल्म महोत्सव बिल्कुल अलग होगी. इसमें दिखायी जानेवाली फिल्में बिहार पर आधारित होंगी.

फिल्म निर्माता व वितरक प्रमोद कुमार चौधरी ने बताया कि पुरानी भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन होगा. जिनके प्रिंट अभी मौजूद नहीं हैं, उन्हें भी शामिल किया जायेगा. राजकुमार शाहाबादी ने कहा कि भोजपुरी फिल्मों का स्तर गिर चुका है.1961 में जो संस्कृति शुरू हुई थी, अब वैसी नहीं रही. जब तक परिवार देखने नहीं जायेगा, भोजपुरी फिल्में आगे नहीं बढ़ेंगी(प्रभात खबर,पटना,17.2.11).

मुश्किल दौर से उबरा भोजपुरी सिनेमा

18 फरवरी 1961 को भोजपुरी सिनेमा की नींव पड़ी थी। इस वर्ष भोजपुरी सिनेमा अपना स्वर्ण जयंती वर्ष मना रहा है। इन पचास वर्षो में भोजपुरी सिनेमा ने कई उतार-चढ़ाव देखे है। आज स्थिती बदल चुकी है। भोजपुरी सिनेमा अब अपने मुश्किल दौर से गुजर चुका है। यह बातें भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार रवि किशन ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ से खास बातचीत में कही। भोजपुरी सिनेमा के पचास वर्ष पूरी होने की खुशी रवि किशन के चेहरे पर साफ दिख रही थी। उन्होंने कहा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद को मैं शत-शत नमन करना चाहूंगा। बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने ही सबसे पहले भोजपुरी भाषा में फिल्म बने, ऐसी मंशा नजीर हुसैन साहब के सामने जाहिर की। रवि किशन ने कहा कि नजीर हुसैन, विनाथ शाहाबादी, रामायण तिवारी, भगवना सिन्हा, लीला मिश्रा, कुंदन कुमार, असिम कुमार, कुमकुम, चित्रगुप्त, मोहन प्रसाद और सुजीत कुमार का भोजपुरी सिनेमा के प्रति यह समर्पण रहा कि आज लाखों लोग भोजपुरी फिल्मों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। रवि किशन ने कहा कि पहले और आज की भोजपुरी फिल्मों में काफी बदलाव आया है। बदलाव में मुख्य रूप से तकनीक और अभिनय पक्ष है। आज बड़ी-बड़ी कम्पनियां इस क्षेत्र में कदम रख चुकी है। भोजपुरी फिल्मों का दायरा काफी बढ़ गया है। फिल्मों का बाजार उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमाओं को लांघ कर पूरे देश में फैल गया है। उन्होंने कहा कि जल्द ही विदेश में भी नियमित रूप से भोजपुरी फिल्म जगत का सामना होगा। मैं खुद इस दिशा में प्रयासरत हूं। बालीवुड के बड़े नाम भोजपुरी फिल्मों में काम कर चुके है और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म ‘कब होई गवना हमार’

को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। जबकि ‘जरा देब दुनिया प्यार में’ का कांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया है। यह भोजपुरी फिल्म जगत की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने कहा कि आज भोजपुरी फिल्मों को समाज के हर तबके द्वारा गंभीरता से लिया जा रहा है। भोजपुरी फिल्मों से महिलाओं की बढ़ती दूरी का कारण रवि किशन छोटे पर्दे को मानते है। उन्होंने कहा कि टीवी की वजह से महिलाओं की संख्या में कमी आई है खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में यह देखने को मिल रहा है। बावजूद इसके कई फिल्में ऐसी है जिसे बड़ी संख्या में महिलाओं ने देखा और सराहा है। डा.चन्द्रप्रकाश द्विवेदी की ‘मोहल्ला अस्सी’ में टन्नी गुरु की भूमिका निभा रहे रवि किशन ने कहा कि भोजपुरी सिनेमा लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उनकी बदौलत आज भोजपुरी फिल्म की कायनात कायम है। बॉलीवुड को चुनौती देती भोजपुरी सिनेमा जगत की असली ताकत उसके लाखों -करोड़ों प्रशंसक है(शशि श्रीवास्तव,राष्ट्रीयसहारा,वाराणसी,17.2.11)।

Tuesday, February 15, 2011

20 साल बाद आई हरियाणवी फिल्म

हरियाणा के लोगों के मनोरंजन के लिए करीब 20 साल बाद एक हरियाणवी फिल्म आ रही है। फिल्म मुठभेड़ ‘ए प्लान्ड एन्काउंटर’ का प्रीमियर सोमवार को पंचकूला के सेक्टर 5 स्थित शालीमार मेगामॉल में किया गया।

इस दौरान हरियाणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमशेर सिंह सुरजेवाला, मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव के.के. खंडेलवाल, सीएम के पूर्व ओएसडी डॉ. के.वी. सिंह व पंजाब वेलफेयर बोर्ड से विजय लक्ष्मी भादू मौजूद थीं। सुरजेवाला ने सरकार से मांग उठाई कि इस फिल्म को मनोरंजन कर से छूट दी जाए। खंडेलवाल ने कहा कि लंबे समय बाद हरियाणवी फिल्म आ रही है।

हरियाणा ने देश को कई शायर और साहित्यकार दिए हैं। कई प्रसिद्ध अभिनेता भी हरियाणा से संबंध रखते हैं। फिल्म के निर्माता संजय शर्मा ने बताया कि फिल्म में मुकेश तिवारी और पूनम झावर ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। संजय शर्मा ने खुद विलेन का रोल किया है। शर्मा ने बताया कि फिल्म के निर्देशक सूरज भारद्वाज हैं। फिल्म की कहानी ऐसे युवाओं पर आधारित है, जो राजनीति के कारण रास्ता भटक चुके हैं।

यह एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसे बलात्कार के झूठे केस में फंसा दिया जाता है। फिल्म की शूटिंग ज्यादातर हरियाणा में ही की गई है। कुमार मंगत ने भी फिल्म के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुकेश तिवारी इससे पहले अपहरण, गोलमाल, रिफ्यूजी व चाइना टाउन फिल्मों में भूमिका निभा चुके हैं। पूनम झावर ने मोहरा, आंच व मराठी फिल्मों में अभिनय किया है। एक्शन टीटू सिंह का है। इस मौके पर मुक्ता आर्ट्स से संजय घई व अन्य लोग उपस्थित थे। फिल्म में पांच गीत हैं। गौरतलब है कि लंबे अर्से पहले बनी हरियाणवी फिल्म चंद्रावल हरियाणा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में सुपरहिट रही थी(अरविंद गोयल,दैनिक भास्कर,पंचकूला,15.2.11)।

दैनिक जागरण की रिपोर्टः
हरियाणवी फिल्मों के प्रशंसकों तथा हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री के लिए अच्छी खबर है कि दो दशक के अंतराल के बाद एक बड़े बजट की नई हरियाणवी फिल्म सोमवार को रिलीज हो गई है। मुठभेड़ ए प्लांड एनकाउंटर नामक इस फिल्म को बॉलीवुड के कलाकारों और तकनीशियंस ने पेश किया है। फिल्म का प्रीमियर पंचकूला के सेक्टर-6 स्थित शालीमार फेम सिनेमा में हुआ। इस इस मौके पर हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव केके खंडेलवाल, पूर्व मंत्री शमशेर सिंह सुरजेवाला और मुख्यमंत्री के पूर्व ओएसडी डॉ. केवी सिंह ने भी इस फिल्म का आनंद लिया। फिल्म के एक्शन सीन का निर्देशन टीटू सिंह ने किया है, जो मशहूर एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन के सहयोगी रहे हैं। फिल्म के निर्माता संजय शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि हरियाणवी में यह पहली फिल्म है, जिसे बालीवुड के टेक्नीकल सहयोग से तैयार किया गया है। फिल्म के निर्देशक सूरज भारद्वाज ने कहा कि हरियाणवी सिनेमा का पनप न पाने का मुख्य कारण इसका आम आदमी के साथ जुड़ न पाना है। भारद्वाज के मुताबिक यह भावनात्मक फिल्म है। यह ऐसे युवाओं के बारे में है जो राजनीति के कारण रास्ता भटक चुके हैं। यह एक्शन से भरपूर फिल्म है। यही नहीं इसकी सारी शूटिंग भी हरियाणा में ही हुई है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसे बलात्कार के झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता है। निर्माता संजय शर्मा के मुताबिक यह फिल्म हरियाणवी सिनेमा के लिए एक आशा की किरण बन कर आई है। फिल्म का निर्माण एसएस फिल्म एंटरटेनमेंट और ओमकारा फेम कुमार मंगत ने किया है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस प्रकार गंदी राजनीति के जरिये युवाओं को गुमराह किया जाता है। फिल्म में मुकेश तिवारी, पूरम झावर, संजय शर्मा आदि कलाकारों ने काम किया है। मुकेश तिवारी फिल्म अपहरण, गोलमाल, रिफ्यूजी और चाइना टाउन जैसी फिल्मों के माध्यम से अपना लोहा मनवा चुके हैं। पूनम झावर ने मोहरा और आंच जैसी फिल्मों में काम किया है। पूनम मराठी फिल्मों में भी अभिनय कर चुकी है। फिल्म के निर्माता संजय शर्मा इस फिल्म में विलेन के रोल में नजर आएंगे। निर्देशक सूरज भारद्वाज के मुताबिक यह फिल्म बनाना उनके लिए एक शानदार अनुभव था। उनका कहना है कि यह फिल्म हरियाणवी सिनेमा को दोबारा पटरी पर ले आएगी। फिल्म की शूटिंग हरियाणा के लोकेशंस पर पिंजौर, पंचकूला आदि में की गई है। टूरिस्ट कांप्लेक्स रेड बिशप में भी इसके कुछ दृश्य फिल्माए गए हैं। डबिंग और एडिटिंग मुंबई में की गई है।

Monday, January 31, 2011

जेएनयू में दो दिवसीय यूथ फिल्म फेस्टिवल कल से

फिल्म निर्माण, उसकी कहानी व तकनीकी पहलुओं से जुड़ी बारीकियों से युवाओं को रू-ब-रू कराने के लिए जेएनयू में एक बार फिर से यूथ फिल्म फेस्टिवल का आयोजन होने जा रहा है।

एक फरवरी से शुरू होने वाले इस दो दिवसीय इंटरनेशनल यूथ फिल्म फेस्टिवल को जेएनयू के फैकल्टी क्लब और फॉक, आर्ट, कल्चरल एंड एजुकेशनल सोसाएटी (फेसेज) मिलकर आयोजित कर रहे है, जिसमें दो दर्जन से ज्यादा शॉर्ट व डॉक्युमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा।

आयोजन से जुडे डॉ. डीके लोबियाल ने बताया कि द्वितीय इंडिया इंटरनेशनल यूथ फिल्म फेस्टिवल (आईआईवाईएफएफ) के जरिये युवाओं को फिल्म निर्माण की बारीकियों से रूबरू कराया जाएगा।


उन्होंने बताया कि इस आयोजन के दौरान न सिर्फ जेएनयू समुदाय बल्कि बाहरी लोगों को भी इस फेस्टिवल में शामिल होने का अवसर दिया जा रहा है। फेस्टिवल का शुभारंभ एक फरवरी को जेएनयू के एसएसएस-1 ऑडिटोरियम में किया जाएगा।

फेस्टिवल डायरेक्टर मुस्तजाक मलिक ने बताया कि इस मौके पर करीब दो दर्जन फिल्मों की स्क्रीनिंग की जाएगी। इनमें माइंड, अफगान गल्र्स कैन किक, व्हीजलिंग अंडर वॉटर, ब्लैकवुड, डिवाइन, डबल डेट, बैक टू रूट्स, द वॉच क्लीनिक, देवदासी, कल, डिप्लोमा, विदा आदि फिल्में शामिल होंगी।

इन फिल्मों का प्रदर्शन दोपहर तीन बजे से शाम सात बजे तक किया जाएगा। जहां पहले दिन फेस्टिवल में फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा, वहीं दूसरे दिन जेएनयू कैंपस के स्कूल ऑफ आर्ट एंड एस्थेटिक्स ऑडिटोरियम में शॉर्ट फिल्मों और डॉक्युमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा(दैनिक भास्कर,दिल्ली,31.1.11)।

Sunday, January 30, 2011

बॉलीवुडःपरम्परा उगते सूर्य को नमस्कार करने की

पाठकों की स्मृति को टटोलने जा रहा हूं। ललिता पवार के निधन के कितने दिन बाद लोगों को उनके बारे में पता चला था? पूरे तीन दिन बाद। अभिनेत्री परवीन बाबी के देहांत के कितने दिन बाद लोग इस सच्चाई को जान पाए थे? तीन दिन बाद। अब जब बीते दिनों की अभिनेत्री नलिनी जयवंत का निधन हुआ, तो उनके पड़ोसियों को कितने दिन बाद इस बारे में पता चला है? तीन दिन बाद। फिल्म इंडस्ट्री में शोकाहत करने वाली किसी सूचना को फैलने में कम से कम तीन दिन लगते हैं। विगत दिनों के किसी स्टार की मृत्यु के बारे में तो यह सोलह आने सच है। जब आप चमकते स्टार होते हैं, तो आपके हर कदम का नोटिस लिया जाता है, आपके द्वारा उच्चारित हर शब्द को ब्रेकिंग न्यूज बनाया जाता है। इस तरह आपके निजी जीवन में गोपनीयता की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। लेकिन एक बार लोकप्रियता की चोटी से गिरने के बाद विस्मृति के गटर में आपका समा जाना तय है। भारतीय फिल्मोद्योग चमकते हुए सूरज की ही पूजा करता है। हालांकि यह भी एक खर्चीला धंधा है और इन फिल्म कलाकारों को प्रशंसकों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। अतीत के महान कलाकारों को भुला दिए जाने की सूची बहुत लंबी है। ऐसे कलाकार दशकों तक विस्मृत रहते हैं, जब तक कि उनके निधन की सूचना न आ जाए। फिर उनके मृत्यु की वजह का पता लगाया जाता है और उसके बाद उन पर एक दोस्ताना श्रद्धांजलि लिख दी जाती है, ललिता पवार, परवीन बाबी और नलिनी जयवंत के मामले ऐसे ही हैं। निरूपा राय या अजित के निधन पर ऐसी बेरुखी देखने को नहीं मिली थी। इसकी वजह यह है कि उनके बारे में बताने के लिए उनके बेटी-बेटे मौजूद थे। ऐसा ही दुर्भाग्य भारतभूषण का था। बीते दिनों का इतना चर्चित कलाकार एक साधारण आदमी की मौत मरा। इस पर प्रसिद्ध संगीतकार ओ पी नैयर इतने दुखी हुए कि उन्होंने अपने शुभचिंतकों को आगाह कर दिया था कि उनकी मौत के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। वह नहीं चाहते थे कि उनके न रहने पर कोई उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े। लिहाजा उनकी मृत्यु के लगभग एक महीने बाद जब यह सूचना सार्वजनिक हुई, तो उनके संगीत के प्रशंसकों ने श्रद्धांजलि देते हुए हिंदी फिल्म संगीत में उनके योगदान को भावुकता के साथ याद किया। कलाकारों की दुनिया में यह सब काफी त्रासद है। इस दुनिया में सबसे योग्य ही टिक सकता है, सबसे महान नहीं। क्या आपने हाल के दिनों में कभी चंद्रमोहन, अशोक कुमार या नरगिस को याद किया? फिल्म इतिहास के बारे में हमारी स्मृति काफी कमजोर है। खुद फिल्म इंडस्ट्री के पास भी इसका इतिहास लिखने या यादगार दृश्यों को सहेजने की कोई योजना नहीं है। कई बार कलाकार खुद एकांतवासी होना पसंद करते हैं और जनता के सामने नहीं आना चाहते। बीते दिनों की गायिका-अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित को मैं आज इसी सूची में रखता हूं। ऐसी ही एक और एकांतवासी अभिनेत्री कोलकाता में सुचित्रा सेन हैं। खासकर पुराने दिनों की अभिनेत्रियां लोगों से बचना चाहती हैं। दरअसल अपार्टमेंट संस्कृति में सब लोग अपने में ही जीते हैं। ऐसे में यह कानून बनना चाहिए कि हर आदमी सप्ताह में कम से कम एक बार अपने पड़ोसियों से जरूर मिले, ताकि उनके बारे में नियमित तौर पर जानकारियां मिलती रहें। नलिनी जयवंत पर श्रद्धांजलियों का अभाव दुर्भाग्यपूर्ण रूप से बताता है कि उनका गौरवशाली फिल्म कैरियर वाकई इतना पीछे छूट गया था कि लोग जीते-जी उन्हें भूल चुके थे!(महेश भट्ट,दैनिक जागरण,भोपाल,30.1.11)