सिनेमा की गौरवशाली परंपरा पर फख्र करने वाले सिने प्रेमियों को शायद इस बात से तकलीफ होगी कि अनेक कामयाब और चर्चित फिल्में देने वाला स्टूडियो 'बॉम्बे टॉकीज' अब इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है। अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला और किशोर कुमार जैसे कलाकारों को बॉम्बे टॉकीज ने ही पहचान दी थी और 'अछूत कन्या', 'किस्मत' तथा 'जीवन नैया' जैसी फिल्में भी बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले ही बनी थीं। लेकिन आज बॉम्बे टॉकीज 'बी.टी. कंपाउंड' के नाम से एक पूरी तरह विकसित इंडस्ट्रियल एरिया में बदल चुका है, जिसमें 900 से ज्यादा कारखाने काम कर रहे हैं। हालांकि बेतरतीब गलियों और कारखानों से भरे कंपाउंड के बीच थोडी खुली-सी जगह पर खडा हिमांशु राय का बंगला और ऑफिस का मेहराबदार ढांचा आज भी बॉम्बे टॉकीज के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है।इस ब्लॉग पर केवल ऐसी ख़बरें लेने की कोशिश है जिनकी चर्चा कम हुई है। यह बहुभाषी मंच एक कोशिश है भोजपुरी और मैथिली फ़िल्मों से जुड़ी ख़बरों को भी एक साथ पेश करने की। आप यहां क्रॉसवर्ड भी खेल सकते हैं।
Sunday, March 7, 2010
बांबे टाकीज के वे दिन....
सिनेमा की गौरवशाली परंपरा पर फख्र करने वाले सिने प्रेमियों को शायद इस बात से तकलीफ होगी कि अनेक कामयाब और चर्चित फिल्में देने वाला स्टूडियो 'बॉम्बे टॉकीज' अब इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है। अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला और किशोर कुमार जैसे कलाकारों को बॉम्बे टॉकीज ने ही पहचान दी थी और 'अछूत कन्या', 'किस्मत' तथा 'जीवन नैया' जैसी फिल्में भी बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले ही बनी थीं। लेकिन आज बॉम्बे टॉकीज 'बी.टी. कंपाउंड' के नाम से एक पूरी तरह विकसित इंडस्ट्रियल एरिया में बदल चुका है, जिसमें 900 से ज्यादा कारखाने काम कर रहे हैं। हालांकि बेतरतीब गलियों और कारखानों से भरे कंपाउंड के बीच थोडी खुली-सी जगह पर खडा हिमांशु राय का बंगला और ऑफिस का मेहराबदार ढांचा आज भी बॉम्बे टॉकीज के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है।Friday, March 5, 2010
थैंक्स मां : फिल्म-समीक्षा
मुख्य कलाकार : आलोक नाथ, रघुवीर यादव, संजय मिश्र, मुक्ता बर्वे
निर्देशक : इरफान कमल
तकनीकी टीम : निर्माता- अजीज मलकानी, लेखक- इरफान कमल
इरफान कमल की थैंक्स मां डैनी बाएल की स्लमडाग मिलियनेयर के पहले बन चुकी थी, लेकिन अभी रिलीज हो सकी। इस फिल्म में इरफान ने मुंबई की मलिन बस्तियों के आवारा और अनाथ बच्चों के माध्यम से अधूरे बचपन की मार्मिक कथा बुनी है। उन्होंने पेशेवर चाइल्ड एक्टर के बजाए नए चेहरों को चुना है और उनसे बेहतरीन काम लिया है।
म्युनैसिपैलिटी खुद अनाथ बच्चा है। वह खुद को सलमान खान कहलाना पसंद करता है। दूसरे आवारा और अनाथ बच्चों के साथ वह पाकेटमारी और चिंदीचोरी कर अपना गुजर-बसर करता है। उसकी एक ही इच्छा है कि किसी दिन अपनी मां से मिले। बाल सुधार गृह से भागते समय उसे दो दिनों का एक बच्चा मिलता है। वह उस निरीह बच्चे को संभालता है। अपने दोस्तों की मदद से वह उस बच्चे की मां तक पहुचने में सफल रहता है, लेकिन सच्चाई का पता चलने पर हतप्रभ रह जाता है।
फिल्म में बताया गया है कि देश में रोजाना 270 बच्चे अनाथ छोड़ दिए जाते हैं। इन बच्चों की जिंदगी शहर की गुमनाम गलियों में गुजरती है और वे आजीविका के लिए अपराध का आसान रास्ता चुन लेते हैं। इरफान कमल ने ऐसे अनाथ बच्चों के मर्म को पर्दे पर कुछ किरदारों के माध्यम से दिखाया है। अपनी ईमानदार कोशिश केबावजूद वे अनाथ बच्चों की परिस्थिति के प्रति मार्मिकता नहीं जगा पाते। कुछ ही दृश्य प्रभावित करते हैं। सभी बच्चों ने उम्दा और स्वाभाविक अभिनय किया है। संजय मिश्र और रघुवीर यादव को निर्देशक ने उचित उपयोग किया है।
**1/2 ढाई स्टार
(अजय ब्रह्मात्मज,दैनिक जागरण)
-------------------------------------------------------------------------
तीन स्टार के साथ नभाटा मे चंद्रमोहन शर्मा लिखते हैं-
अगर आपने दुनियाभर में धूम मचा चुकी ' स्लमडॉग मिलियनेयर ' देखी है , तो इस फिल्म को देखते वक्त आपको उसकी याद जरूर आएगी। दरअसल , इस फिल्म में भी डायरेक्टर ने स्लम की लाइफ को बिल्कुल अलग और नए लुक में दिखाया है। इस फिल्म की कहानी को प्रेजेंट करने का ट्रीटमेंट हॉलिवुड फिल्म से जरूर मिलता है।
कहानी : करीब 12 साल के मास्टर शम्स को एक लावारिस नवजात शिशु मिलता है। इस बच्चे के मिलने के बाद खुद स्लम में फटेहाल जिंदगी गुजार रहा शम्स अपने खास दोस्तों सोडा मास्टर ( मास्टर सलमान ) कटिंग ( मास्टर फैयाज ) डेढ़ शाणा ( मास्टर जफर ) और सुरसुरी ( बेबी अल्मास ) के साथ फैसला करता है कि वह इस मासूम बच्चे की जिंदगी अपनी तरह खराब नहीं होने देगा। वह ठान लेता है कि किसी भी तरह से इस नवजात शिशु को उसके माता - पिता से मिलवाएगा। इस खोज में शम्स और उसके दोस्तों को काफी मुश्किलों का सामना करता है। आखिर इन बच्चों की मेहनत रंग लाती है और वह बच्चे की मां को खोज लेते हैं , लेकिन मां अपने बच्चे को स्वीकार करने से मना कर देती है।
ऐक्टिंग : फिल्म में लीड रोल निभा रहे मास्टर शम्स पहले से इस फिल्म के लिए बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का अवॉर्ड ले चुके हैं। फिल्म में दूसरे बच्चों ने भी बेहतरीन काम किया है। रघुबीर यादव की ऐक्टिंग के बारे में कुछ कहना चांद को दीया दिखाने जैसा है। यादव जब भी स्क्रीन पर आए , अपनी अलग छाप छोड़ गए।
निर्देशन : अब तक आपने दर्जनों ऐसी फिल्में देखी होंगी , जिनमें किसी अस्पताल या धार्मिक स्थान के बाहर मिलने वाले लावारिस बच्चे की कहानी होती है। मसलन , 70-80 के दशक में अमिताभ बच्चन की लावारिस सहित कई फिल्में और महमूद की ' कुंआरा बाप ' कुछ ऐसी ही फिल्में हैं। यंग डायरेक्टर इरफान कमाल की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने बिना बॉलिवुड मसालों की चाशनी का सहारा लिए ऐसी बेहतरीन फिल्म बनाई। यह फिल्म देखकर आपको लगेगा कि इरफान ने फिल्म के हर दृश्य पर जमकर मेहनत की है। तेज रफ्तार से भागती शहरी जिंदगी से दूर तंग गलियों और स्लम में पलते बच्चों को उन्होंने जिस अंदाज में दिखाया है , उसे देखकर साफ लगता है कि हर पात्र पर उन्होंने काफी मेहनत की है। फिल्म शुरू होने पर आपको इस बात का आभास होगा कि आप ' स्लमडॉग मिनियनेयर ' देख रहे हैं। यही डायरेक्टर की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि सीमित साधनों और सीमित बजट में उन्होंने हॉल में बैठे दर्शकों को हॉलिवुड फिल्म की याद दिला दी। वहीं , फिल्म का क्लाइमैक्स आपकी आंखें नम करने का दम रखता है।
संगीत : सूफी संगीत का फिल्म में अच्छा तालमेल है। ऐसे में रंजीत बारोट का बेहतरीन बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के साथ पूरी तरह से मेल खाता है।
रोड,मूवीःफिल्म समीक्षा
कलाकार : अभय देओल, तनिष्ठा चटर्जी, सतीश कौशिक, यशपाल शर्मा, मोहम्मद फैजल, वीरेंद सक्सेनाडायरेक्टर : देव बेनेगल
निर्माता : स्टूडियो 18
म्यूजिक डायरेक्टर : माइकल ब्रूक
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए
अवधि : 97 मिनट।
हमारी रेटिंगः **1/2
देव बेनेगल की फिल्म रोड, मूवी एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म की तरह है, जिसे देश-विदेश के कई अवॉर्ड मिले हैं और इसे काफी सराहा भी गया है। जैसलमेर और बाड़मेर के बैकग्राउंड में बनी इस फिल्म की कहानी और ट्रीटमेंट दोनों एकदम हटकर हैं। डायरेक्टर देव बेनेगल ने एक बेहद पुराने ट्रक के साथ कुछ किरदारों की कहानी को बेहद अनूठे अंदाज में बयां किया है। साथ ही राजस्थान के बैकग्राउंड में पानी माफिया को भी दिखाया गया है, जिनके लिए पानी बहुत बड़ी संपत्ति है और इसके लिए कत्ल तक कर दिए जाते हैं। यशपाल शर्मा ने इस गैंग के मुखिया की भूमिका निभाई है।
फिल्म की कहानी शुरू होती है राजस्थान के एक गांव में विष्णु (अभय देओल) नाम के लड़के के साथ, जिसके पिता तेल बनाने का काम करते हैं और चाहते हैं कि बेटा भी इसी बिजनेस में आए। लेकिन विष्णु कुछ नया करना चाहता है। वह अपने दोस्त से सन 1942 का खटारा ट्रक लेता है, जिस पर प्रोजेक्टर लगे हैं, जो कभी टूरिंग टॉकीज यानी चलते-फिरते सिनेमा के तौर पर इस्तेमाल होता था। अपने साथ वह एक हेल्पर बच्चे (फैजल) को लेकर एक मेले की तरफ ट्रक लेकर चलता है, लेकिन सफर शुरू होने के 10 किलोमीटर बाद ही ट्रक खराब हो जाता है।
ट्रक को ठीक करने के लिए जो किरदार (सतीश कौशिक) आता है, उसका नाम ही मकैनिक है। वह ट्रक को ठीक तो कर देता है, पर इस शर्त के साथ कि मेले तक वह भी साथ जाएगा। जैसलमेर के रेगिस्तानों से होता हुआ यह ट्रक पुलिस इंस्पेक्टर (वीरेंद्र सक्सेना) के कब्जे में आ जाता है, जहां पूरे गांव को फिल्म दिखाने के बाद ट्रक पार्टी यहां से भाग निकलती है। रास्ते में उनकी मुलाकात बंजारन (तनिष्ठा चटर्जी) से होती है। प्यास से तड़प रहे इन लोगों को बंजारन थोड़ा पानी देती है, वह भी इस शर्त पर कि वे उसे भी मेले तक साथ ले चलेंगे। इसके बाद इन सभी का वास्ता पानी माफिया (यशपाल शर्मा) से पड़ता है। यहां पर बेहद रोचक तरीके से विष्णु और उसके साथी हालात का सामना करते हैं और उसके बाद कहानी अपने मुकाम तक अनूठे अंदाज में पहुंचती है।
निर्देशन व ऐक्टिंग: इस फिल्म को बनाने के लिए देव बेनेगल ने बेहद गहरी रिसर्च की और राजस्थान के इन इलाकों में जाकर टूरिंग टॉकीज के पूरे फंडे को बारीकी से समझा। यह बात फिल्म में भी झलकती है। इसके अलावा जिस तरह उन्होंने जैसलमेर के ग्रामीण परिवेश को इस्तेमाल किया है, वह भी गजब का है।
(चंद्रप्रकाश शर्मा,नभाटा,5.3.10)
दैनिक जागरण मे ढाई स्टार के साथ अजय ब्रह्मात्मज की प्रतिक्रियाः
हिंदी सिनेमा में विषय के स्तर पर आ रहे विस्तार को हम रोड,मूवी में देख सकते हैं। यह पारंपरिक हिंदी फिल्म नहीं है, जिसमें घिसे-पिटे किरदारों को लेकर कहानी बुनी जाती है। इस फिल्म के किरदार बेनाम हैं। उन्हें उनके नाम से हम नहीं जानते। संयोग से चार व्यक्ति एक सफर में साथ हो जाते हैं। वे मिल कर दुर्गम राहों से निकलते हैं। सफर के दौरान ही उनके रिश्ते बनते हैं, जो फिल्म खत्म होने के साथ अपनी राह ले लेते हैं।
फिल्म में कहानी की उम्मीद के साथ गए दर्शकों को निराशा हो सकती है। यह फिल्म दृश्यात्मक और प्रतीकात्मक है। आपसी रिश्तों में एक-दूसरे की जरूरत और मूल मानवीय भावनाओं का अच्छा तालमेल है। यह फिल्म अभय देओल और सतीश कौशिक के लिए देखी जा सकती है। तनिष्ठा चटर्जी सामान्य हैं। देव बेनेगल ने मुख्य पात्र की दोहरी यात्रा को अच्छी तरह से गुंथा और चित्रित किया है।
अतिथि तुम कब जाओगेःफिल्म-समीक्षा
कलाकार : अजय देवगन , कोंकणा सेन शर्मा , परेश रावल , संजय मिश्रास्टोरी राइटर और डायरेक्टर : अश्विनी धीर
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
सेंसर सर्टिफिकेट : यू
अवधि : 122 मिनट
हमारी रेटिंगः***1/2
फिल्म के डायरेक्टर अश्विनी धीर का नाम स्मॉल स्क्रीन पर उनके सुपर हिट कॉमिडी सीरियल ऑफिस - ऑफिस की वजह से जाना पहचाना है। वैसे , इससे पहले भी अश्विनी ने नामी स्टार्स के साथ एक लाइट कॉमिडी फिल्म बनाई थी , लेकिन वह फिल्म कब आई और कब गई , पता तक नहीं चला। अब उन्होंने एक बार फिर लंबे गेप के बाद बिग स्क्रीन पर वापसी की है। इस बार भी उन्होंने अपने पसंदीदा सब्जेक्ट कॉमिडी पर ही फोकस किया है। अश्विनी ने इस बार बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ स्टार कास्ट का सहारा लिया है। साथ ही लाइट कॉमिडी बेस्ड कहानी में कुछ नया परोसने की भी कोशिश की है। दरअसल , बॉलिवुड में कॉमिडी को बेस बनाकर कम अवधि की फीचर फिल्म बनाने का ट्रेंड अब पनपना शुरू हुआ है। हॉलिवुड में ऐसी फिल्मों का ट्रेंड बरसों से चल रहा है और काफी पसंद भी किया जाता है। इस फिल्म को देखने के बाद लगता है कि अश्विनी कहीं न कहीं बासु भट्टाचार्य और ऋषिकेश मुखर्जी से काफी हद तक प्रभावित हैं , तभी तो पूरी फिल्म एक फैमिली और सोसायटी में रहने वाले चंद पात्रों के इर्द - गिर्द टिकी है।
कहानी : फिल्म की कहानी वर्किंग कपल पुनीत ( अजय देवगन ) और मुनमुन ( कोंकणा सेन शर्मा ) और उनके सात साल के इकलौते बेटे पर टिकी है। फिल्म में दिखाया गया है कि आज महानगरों की तेज रफ्तार जिंदगी में पति - पत्नी अपनी फैमिली की जिम्मेदारी किस तरह उठा रहे हैं। पुनीत को अपने बेटे के कुछ सवालों का जवाब देना मुश्किल लगता है। उसी बेटे से जब टीचर पूछता है कि अतिथि का क्या मतलब होता है , तो वह नहीं बता पाता क्योंकि उसके घर तो कभी अतिथि आया ही नहीं। बेटा अब वही सवाल घर में आकर अपने डैड से पूछता है। इसी बीच इन सबकी खुशहाल जिंदगी में कभी न खत्म होने वाली मुश्किलों का दौर उस वक्त शुरू होता है , जब उनके घर एक रिश्ते में बहुत दूर से पुनीत के चाचा लंबोदर बाजपेयी ( परेश रावल ) आ धमकते हैं। पुनीत उन्हें नहीं जानता , लेकिन लंबोदर चाचा तो उससे मनवा ही लेते हैं कि वही उनका भतीजा पप्पू है। खैर , घर आए इस अनचाहे अतिथि को पुनीत और मुनमुन यह सोचकर रखते हैं कि चलो दो - चार दिन में तो हुजूर चले ही जाएंगे। लेकिन उन्हें क्या मालूम कि यह अनचाहा अतिथि लंबोदर बाजपेयी आया भी अपनी मर्जी से है और जाएगा भी अपनी मर्जी से। चाचा जी को इससे कुछ लेना देना नहीं कि उनकी वजह से पुनीत की फैमिली कभी न खत्म होने वाली मुश्किलों में घिर जाती है।
स्क्रिप्ट : फिल्म के डायलॉग असरदार , सटीक और मन को छूने वाले हैं। ऐसा ही एक डायलॉग कुछ इस तरह है , ' भगवान भी हमारे घर कभी गणेश जी के रूप में , तो कभी नवरात्र के रूप में आते हैं , लेकिन निश्चित अवधि के बाद घर से चले जाते हैं। ' फिल्म के क्लाइमैक्स में इस अनचाहे अतिथि के अचानक लापता होने पर पुनीत की फैमिली ही नहीं , बल्कि सोसायटी का हर वह शख्स परेशान है , जो इन्हीं चाचा जी के जाने की दुआएं मांगता था।
ऐक्टिंग : इस फिल्म में मुख्य रोल निभा रहे तीनों कलाकारों अजय , कोंकणा और परेश सभी ऐसे कलाकार हैं , जिन्हें देश - विदेश में कई अवॉर्ड मिल चुके हैं। पुनीत के रोल में अजय और अनचाहे मेहमान के आने से हर वक्त टेंशन में रहने वाली मुनमुन के रोल में कोंकणा का जवाब नहीं। लेकिन फिल्म की असली यूएसपी तो लंबोदर चाचा ( परेश रावल ) हैं। वह जब भी स्क्रीन पर आए , उनके सामने हर कोई बौना लगा। ऐसा नहीं कि डायरेक्टर ने दूसरे स्टार्स से बेहतर काम नहीं लिया। अखिलेंद्र मिश्रा और संजय मिश्रा का काम भी लाजवाब है।
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती के संगीत में इस बार पहले जैसी मेलॉडी तो नहीं दिखी। हां , अजय झींगरन की आवाज में गाया फिल्म का टाइटिल सॉन्ग पूरी फिल्म में जब भी सुनाई दिया , दर्शक झूम उठे।
डायरेक्शन : लंबे गेप के बाद अश्विनी ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। सिर्फ दो घंटे की एक ट्रैक पर बनी इस फिल्म में अश्विनी कहीं बॉक्स ऑफिस के मोह में इधर - उधर नहीं भटके। साथ ही उन्होंने फैमिली के साथ देखी जा सकने वाली साफ सुथरी अच्छी कॉमिडी फिल्म बनाकर इंडस्ट्री के ऐसे निर्देशकों की याद दिला दी , जो बिना डबल मीनिंग डायलॉग का सहारा या अश्लीलता के बिना ऐसी फिल्में बनाते थे , जो फैमिली क्लास ही नहीं , हर दर्शक वर्ग को पसंद आती। एक्शन सीन कहानी में फिट करने के चलते स्क्रिप्ट से थोड़ा जरूर भटके।
क्यों देखें : अगर टेंशन भगाना चाहते हैं , तो इस अतिथि से हॉल में जाकर मिल आइए। अगर आपका कभी किसी ऐसे अनचाहे मेहमान से वास्ता पड़ा है , जिसने आपकी लाइफ डिस्टर्ब कर दी हो , तो इस फिल्म को जरूर देखिए। परेश रावल का जीवंत अभिनय और फिल्म की कई परिस्थितियां आपको जरूर गुदगुदाएंगी।
(चंद्रप्रकाश शर्मा,नभाटा,दिल्ली)
--------------------------------------------------------------------------
दैनिक भास्कर मे राजेश यादव ने इस फिल्म को तीन स्टार देते हुए लिखा हैः
अश्विनी धीर के निर्देशन में बनीं फिल्म अतिथि तुम कब जाओगे? हॉस्य,मनोरंजन के साथ भावनात्मक संदेश देती है। फिल्म में छोटे- छोटे कथानक जुड़कर हॉस्य का ऐसा पिटारा बुनते है जो दर्शक को गुदगुदाता है। हॉस्य जो कुछ कह जाता है, बात जो दिल को छू जाती है, अतिथि और मेजबान के बीच संवाद करती यह फिल्म ऋषिकेष मुखर्जी की फिल्मों की याद दिलाती है। अश्विनी धीर ने फिल्म की पटकथा को शरद जोशी की लघुकथा तुम कब जाओगे अतिथि से रूपांतरित किया है और यह इस फिल्म की सबसे खास बात है। बात जो हंसाती है, बात जो दिल को छू जाती है और और अनकही बातों के अशाब्दिक संप्रेषण से जो मनोरंजन निकलता है वह दर्शक का मन मोह लेने वाला है, वहीं फिल्म में संवाद से हॉस्य का पिटारा गुदगुदाता है।
फिल्म मुंबई में रह रहे एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार से जुड़ी है, इस परिवार में पुनीत (अजय देवगन), और मुनमुन (कोंकणा सेन) की घरेलु जिंदगी में उस वक्त विचित्र स्थिति बन जाती है जब उनके यहां मेहमान के रूप में दूर के रिश्ते के चाचा (परेश रावल ) रहने के लिए आ जाते है। महानगरीय जिंदगी में चाचा जी अपनी बहुत सी बातों क साथ समझौता कर रहने लगते है, उधर पुनीत और मुनमुन अपने इस नए मेहमान के कारण परेशान रहने लगते है। वे अपने यहां आए इस बिन बुलाए मेहमान को विदा करने के लिए कई जतन करते है और इन सब बातों के बीच से निकलता है बेहतरीन हॉस्य और दिल को छू लेने वाली बात।
शहर बड़े हुए है, और परिवार छोटे और रिश्तों के ताने -बाने में भी एक बदलाव ,अतिथि को भगवान मानने वाले इस देश में अतिथि तुम कब जावोगे के संदेश के साथ बॉक्स ऑफिस पर आई इस फिल्म में अजय, कोंकणा और परेश की तिकड़ी ने बेहतरीन अभिनय किया है। परेश ने चाचा जी के रोल में कमाल का अभिनय किया है और कॉमेडी के जिस अंदाज को वह जीते है वह दर्शक को गुदगुदाता है। वहीं अजय देवगन और कोंकड़ा की टायमिंग और टयूनिंग रंग जमाने वाली है। कम बजट में स्वस्थ मनोरंजन की बात करती इस फिल्म में ऐसा बहुत कुछ है जो बॉलीवुड के लेखन और मनोरंजन की स्वस्थ परंपरा की तरफ हमारा ध्यान ले जाता है।
फिल्म में प्रीतम चक्रवर्ती का संगीत है और इरशाद कामिल के बोल फिल्म की थीम के अनुरूप है, पुराने गीत के तर्ज पर टाइटल सांग के बोल में एक खास तरह की मधुरता है। बॉलीवुड में ऐसी फिल्में बेहद सफल रहीं है जो किसी बेहतरीन किताब से रंपातरिंत कर फिल्मी पटकथा के रूप में आई है। फिल्म के निर्देशक अश्विनी धीर को इस बात के लिए साधुवाद दिया जा सकता है कि उन्होंने कम बजट में बेहतरीन हॉस्य रचने का प्रयास किया है।
----------------------------------------------------------------------------------------------------
राजस्थान पत्रिका मे रामकुमार सिंह जी की दृष्टि भी देखिएः
हमारे यहां अतिथि भगवान माना गया है लेकिन इस फिल्म का शीर्षक ही यह दुआ कर रहा है कि अतिथि घर छोडकर जाए। मुंबई में फिल्म राइटर पुनीत के घर उनके दूर के रिश्तेदार लंबोदर चाचा आए हैं। पुनीत और उसकी कामकाजी पत्नी मुनमुन ने शुरूआती दिनों में आदर भाव दिखाया लेकिन धीरे धीरे इस अतिथि की वजह से उनकी निजी जिंदगी में भूचाल आ गया। माता पिता के कामकाजी और शहरी जीवन शैली से अकेलेपन से जूझ रहा उनका छह साल का बच्चा लंबोदर चाचा से घुलमिल गया है। लंबोदर चाचा के पास मुंबई में आस पास के गांव के परिचित लोगों की सूची हैं जिन्हें उन्होंने याद किया है। कुल मिलाकर लंबोदर चाचा गांव के हैं और पुनीत और उसकी पत्नी पर शहरीकरण का पूरा रंग है। उन्हें अतिथि बोझ ही लगता है। सबके पास अपनी थोडी सी स्पेस है और दिल बुरी तरह संकरा। दोनों पति पत्नी हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि वे लंबोदर चाचा को वहां से निकालें लेकिन लंबोदर चाचा है कि धीरे धीरे मोहल्ले में लोगों और बच्चों के भी प्रिय बन गए हैं। वे जाने का नाम ही नहीं ले रहे। आखिरकार एक मामूली घटनाक्रम के बाद वे स्वयं ही उनका घर छोडकर जाने की बात करते हैं। फिल्म की पटकथा में लोकजीवन की छोटी छोटी कथाओं को पिरोया गया है। लंबोदर चाचा द्वारा बार बार गैस निकालने की ध्वनि एक स्तर पर आकर थोडी ऊब पैदा करती है लेकिन कुल मिलाकर फिल्म एक स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन करती है। खासकर महानगर में रहने वाले लोग लंबोदर चाचा जैसे अतिथि का कभी ना कभी सामना तो करते ही हैं। फिल्म बिना कुछ कहे गांव और शहर के लोगों की मन:स्थिति के बुनियादी फर्क को भी रेखांकित करती है कि घर बडे बनाकर और दौलत कमाने वाला मध्यवर्गीय आदमी में शहर में आकर कैैसे अपनी प्राथमिकताएं बदल देता है।फिल्म में लंबोदर चाचा बने परेश रावल अदभुत लगे हैं। अजय देवगन ओर कोंकणा ठीक हैं। चौकीदार बने संजय मिश्रा का काम भी काबिले तारीफ है। गीत इरशाद कामिल के हैं और बीडी जलाइले की धुन पर माता की आरती ठीक लगती है। संगीत प्रीतम और अमित मिश्रा का है। कबीर और रहीम के दोहों को अच्छे से इस्तेमाल किया गया है। निर्देशक अश्विनी धर ने एक मनोरंजक फिल्म रची है। फिल्म खत्म होते होते अतिथि देवो भव ही स्थापित होता है।
------------------------------------------------------------------------------------
दैनिक जागरण मे अजय ब्रह्मात्मज ने इस फिल्म को साढे तीन स्टार देते हुए लिखा हैः
पिछले कुछ सालों में लाउड कामेडी ने यह स्थापित किया है कि ऊंची आवाज मैं चिल्लाना, गिरना-पड़ना और बेतुकी हरकतें करना ही कामेडी है। प्रियदर्शन और डेविड धवन ऐसी कामेडी के उस्ताद माने जाते हैं। उनकी कामयाबी ने दूसरे निर्देशकों को गुमराह किया है। दर्शक भी भूल गए है कि कभी हृषीकेष मुखर्जी, गुलजार और बासु चटर्जी सरीखे निर्देशक सामान्य जीवन के हास्य को साधारण चरित्रों से पेश करते थे। अश्रि्वनी धीर की अतिथि तुम कब जाओगे? उसी श्रेणी की फिल्म है। यह परंपरा आगे बढ़नी चाहिए।
पुनीत फिल्मों का संघर्षशील लेखक है। वह कानपुर से मुंबई आया है। उसकी पत्नी मुनमुन बंगाल की है। दोनों का एक बेटा है। बेटा नहीं जानता कि अतिथि क्या होते हैं? एक दिन चाचाजी उनके घर पधारते हैं, जो खुद को पुनीत का दूर का रिश्तेदार बताते हैं। शुरू में उनकी ठीक आवभगत होती है, लेकिन छोटे से फ्लैट में उनकी मौजूदगी और गंवई आदतों से पुनीत और मुनमुन की जिंदगी में खलल पड़ने लगती है। चाचाजी को घर से भगाने की युक्तियों में बार-बार विफल होने के क्रम में ही पुनीत और मुनमुन को एहसास होता है कि कैसे चाचाजी उनकी रोजमर्रा जिंदगी के हिस्सा हो गए हैं। अश्रि्वनी धीर ने अतिथि के इस प्रसंग को रोचक तरीके से फिल्म में उतारा है। उन्होंने फिल्म को बढ़ाने के लिए कुछ दृश्य और प्रसंग जोड़े हैं, जिनसे मूल कहानी थोड़ी ढीली होती है। फिर भी अजय देवगन, परेश रावल, कोंकणा सेन शर्मा और सहयोगी कलाकारों ने फिल्म को बांधे रखा है। परेश रावल की अभिनय क्षमता का अश्रि्वनी धीर ने सार्थक उपयोग किया है। अजय देवगन बहुमुखी अभिनेता के तौर पर निखर रहे हैं। वे लाउड कामेडी के साथ ऐसी हल्की-फुल्की कामेडी भी कर सकते हैं। कोंकणा सेन शर्मा तो हैं ही सहज अभिनेत्री। मुकेश तिवारी, संजय मिश्र, अखिलेन्द्र मिश्र और सतीश कौशिक का अभिनय और योगदान उल्लेखनीय है।कोंकणा के संवादों में स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गलतियां उनके चरित्र को बारीकी से स्थापित करती है। इस फिल्म का कितने आदमी थे प्रसंग रोचक है। परेश रावल ने उस प्रसंग को अपने अंदाज से मजेदार बना दिया है। उन्हें वीजू खोटे का बराबर सहयोग मिला है। बस, एक ही शिकायत की जा सकती है कि परेश रावल को इतना ज्यादा वायु प्रवाह करते नहीं दिखाना चाहिए था। पर आजकल हिंदी फिल्मों का यह आम दृश्य हो गया है।
हर्ट लॉकर की कहानी नकल करने का आरोप
अमेरिकी सेना के एक सार्जेंट ने ऑस्कर के लिए नामित मशहूर फिल्म "द हर्ट लाकर" के निर्माताओं पर अपनी कहानी चुराने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया है। मास्टर सार्जेंट जेफरी एस सार्वर (३८) ने फिल्म निर्माताओं पर आरोप लगाया है कि उन्होनें इराक में बम निष्क्रिय करने के उनके अनुभव को अपनी फिल्म का आधार बनाया और इसके लिए उनसे इजाजत नहीं ली। इस संबंध में सार्जेंट ने मंगलवार को मुकदमा दायर किया। सार्जेंट सार्वर कहा फिल्म निर्माताओं के रवैए से दुख हुआ। प्रीति,पैसा और पुलिस
पैसों की भूख जाती नहीं है। इस मोर्चे पर आम आदमी और फिल्मी सितारे एक ही मंच पर खड़े दिखते हैं। पिछले दो दिनों से लगातार खबर छपर रही है कि प्रीति जिंटा कमाल अमरोही की संपत्ति कब्जाने के चक्कर मे हैं। आज नई दुनिया के दिल्ली संस्करण मे चंद्रकांत शिंदे जी की खबर छपी है जिसमे कहा गया है कि इस संपत्ति विवाद मे प्रीति को कल पुलिस थाने मे घंटो इंतजार करना पड़ा-अंधेरी स्थित कमाल अमरोही स्टुडियो में निवेश कर प्रीति जिंटा पूरी तरह फंस गई है। वह स्टुडियो पर कब्जा करना चाहती हैं लेकिन अमरोही परिवार के आपसी झग़ड़े की वजह से प्रीति को मालिकाना हक मिलने में दिक्कत हो रही है। इसी सिलसिले में पुलिस में शिकायत करने पहुंचीं प्रीति को घंटों इंतजार करना प़ड़ा। हालांकि खार पुलिस स्टेशन का कहना है कि दीवानी मामला होने की वजह से हम प्रीति की शिकायत दर्ज नहीं कर पाए। फौजदारी मामला होता तो हम उसे तुरंत ही दर्ज करते। प्रीति को हमने यह बात समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मान रही थी।
प्रीति जिंटा ने कमाल अमरोही स्टुडियो के एक वारिस शानदार अमरोही की मदद से स्टुडियो में निवेश किया है। कमाल अमरोही के बेटों में अदालती कार्रवाई चल रही है। प्रीति शानदार अमरोही का समर्थन कर रही है। प्रीति का कहना है कि शानदार को दूसरे पक्ष की ओर से धमकियां मिल रही हैं। ट्विटर पर प्रीति ने मुंबई पुलिस के प्रति नाराजगी जताते हुए लिखा कि पुलिस को उनकी शिकायत दर्ज कर लेनी चाहिए थी। एक आम नागरिक की तरह वह शिकायत दर्ज करने गई थी। पुलिस ने मुझे पांच घंटे तक बिठाए रखा। मुझसे अच्छी बातचीत की, चाय पिलाई, लेकिन मेरी एफआईआर दर्ज नहीं कराई। प्रीति ने आगे लिखा है कि मुंबई पुलिस पर उन्हें पूरा भरोसा है, लेकिन उनका रवैया ठीक नहीं था।
दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि जो मामला उनके हाथ में नहीं उसकी शिकायत वह कैसे दर्ज कर सकते है? प्रीति का मामला दीवानी होने की वजह से उसे फौजदारी रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता। अगर शानदार अमरोही धमकी की शिकायत करने आते तो हम मामला दर्ज कर लेते। प्रीति को तो किसी ने धमकी नहीं दी है इसलिए हमने मामला दर्ज नहीं किया।
दिल्ली मे गुलजार
दिल्ली विश्वविद्यालय का साउथ कैंपस 4 मार्च को दिनभर गुलजार रहा। मौका था लोकप्रिय गीतकार गुलजार के संग छात्रों व शिक्षकों का एक दिन बिताने का। कभी कविता तो कभी सवाल जवाब और चाय व गप्पशप के बहाने दिनभर उनकी महफिल जमी।
जवाब के सत्र के बाद गुलजार ने करीब डे़ढ़ घंटे तक अपनी अलग अलग रंगों में रंगी नज्में सुनाईं। डिप्टी डीन दिनेश वार्ष्णेय ने बताया कि इनमें जीवन के हर पहलू को छुआ। चाहे वह प्यार हो या गरीबी, मेहनतकश महिलाएं हो या राजनीति। सितारों से लेकर स़ड़क पर रहने वाले आम मजदूर तक की बातें उन्होंने अपने नज्म के माध्यम से खूबसूरती से कही। उनके इस नज्म को सुनने के लिए साउथ कैंपस और आसपास के कॉलेजों के छात्र ब़ड़ी तादाद में पहुंचे। आलम यह कि एसपी जैन सभागार में ख़ड़े होने तक की जगह नहीं रही। नज्म सुनाने के बाद गुलजार करीब घंटे भर तक छात्रों के साथ बांस की बनी अनूठी कैंटीन में भी वक्त गुजारा।Thursday, March 4, 2010
भाषावाद से खफ़ा हैं नाना पाटेकर
Wednesday, March 3, 2010
Tuesday, March 2, 2010
संजीव कुमार
रंगमंच से अपने करियर की शुरुआत करने वाले एक गुजराती परिवार के इस युवक की दिली इच्छा तो आखिरकार फिल्मों में आने की ही थी और ऐसा ही हुआ भी। वे खुद कहा करते थे कि - रंगमंच को तो मैंने इसलिए अपनाया था कि अपनी अभिनय क्षमता की थाह पा सकूं। वैसे मेरा अंतिम लक्ष्य तो फिल्में ही थीं।" हालांकि शुरुआत में उन्हें बी ग्रेड स्टंट फिल्में मिली या फिर छोटी भूमिकाएं। एक बार तो वे ऑडिशन में रिजेक्ट भी कर दिए गए लेकिन अभिनय के इस हीरे की परख आखिरकार हुई और थोड़ी देर से ही सही साठ के दशक में निशान, आशीर्वाद, गौरी, स्मगलर आदि जैसी कई फिल्में करने के बाद सन् १९७० में आई "खिलौना" ने उन्हें ख्यातनाम बना दिया। एक मानसिक संतुलन खो बैठे प्रेमी का यह रोल उन्हें ऊंचाई पर ले गया। फिर तो सीता और गीता, कोशिश, नया दिन नई रात, आंधी, मौसम, शतरंज के खिलाड़ी, अर्जुन पंडित और ब्लॉकबस्टर शोले जैसी कई सफलताएं उनके खाते में जुड़ती ही चली गईं। अपनी भूमिकाओं के प्रति संजीव का समर्पण इस दीवानगी की हद तक था कि वे हर रोल को एक नई चुनौती की तरह लेकर उस पर सौ प्रतिशत खरे उतरते थे।अर्जुन की तरह उनका भी पूरा ध्यान सिर्फ चिड़िया की आंख पर केंद्रित होता था और सितारा हैसियत, नंबरों का तमगा या पुरस्कार जैसी बात को उन्होंने कभी अपने दिमाग पर चढ़ने नहीं दिया। जिंदगी भर उन्होंने एक कलाकार की तरह ही काम किया। उनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने में गुलजार सबसे आगे रहे। एक समय था जब गुलजार और संजीव एक-दूसरे के पर्याय बन चुके थे और उनकी "ट्यूनिंग" इतनी अच्छी थी कि वे एक-दूसरे का मन पढ़ पाते थे।
सबसे खास बात जिसने संजीव को उनके समकक्षों और हर अभिनेता से अलग बनाया वह ये थी कि उन्होंने कम उम्र में भी प्रौढ़ भूमिकाएं करने से गुरेज नहीं किया। बल्कि कई बार तो वे अपनी नायिकाओं के पिता के रोल भी उसी दक्षता से निभा गए जिनके साथ उन्होंने रूमानी भूमिकाएं की थीं। जया भादुड़ी और शर्मिला टैगोर इसका उदाहरण हैं। तब भी और आज भी, अधेड़ होते नायक तक इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए। शोले के ठाकुर और कोशिश के मूकबधिर युवा से लेकर नया दिन नई रात के नौ अलग रूपों वाले व्यक्ति तक संजीव ने कम समय में कई कीर्तिमान रच डाले। उन्हें दो राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा कई अन्य सम्मान भी प्राप्त हुए।
यह विडंबना ही है कि खुशमिजाज और प्रतिभाशाली इस अभिनेता को सब कुछ मिलते हुए भी मोहब्बत के नाम पर बेरुखी ही हाथ आई और हेमामालिनी के लिए दिल में सच्चा प्यार लिए वे बिना और किसी से शादी किए ही दुनिया से चले गए।
यह भी उतना ही दर्दनाक था कि अंतिम समय तक उनके साथ रहीं और उन्हें सच्चे दिल से चाहने वाली सुलक्षणा पंडित भी उनके मन के उस कोने से हेमा की तस्वीर नहीं मिटा सकीं। बकौल सुलक्षणा -" मैंने संजीव कुमार से बहुत प्यार किया था और उनकी बायपास सर्जरी के बाद जब एक दिन हनुमान मंदिर में मैंने उनसे अपनी मांग में सिंदूर भरने को कहा तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वे कभी भी अपने पहले प्यार हेमा मालिनी को नहीं भूल सकते।"
हरिहर जरीवाला... एक नाम जो फिल्म जगत में कई-कई मील के पत्थर कायम कर गया। ऐसे फिल्म जगत में जहां लोग अपनी सफलताओं का ढिंढोरा ज्यादा पीटते हैं और हर पल नंबरों के खेल में बने रहते हैं। हरिभाई ने नंबर का यह गणित जाना ही नहीं। जाना होता तो शायद अपनी जिंदगी में कुछ नंबर और जोड़ लेते। पर उन्होंने तो हमेशा केवल हर रोल की चुनौती को स्वीकार कर उसमें डूब जाना ही सीखा था... जो बहुत कम कलाकार कर पाते हैं। इसलिए फिल्म जगत के आकाश में सितारों के ढेर हो सकते हैं, लेकिन संजीव जैसे अपने प्रकाश से चमकते कलाकार कम ही होते हैं और इनके आगे हर सितारा फीका पड़ जाता है।
(मालविका कौशल,नई दुनिया,दिल्ली,27.2.10)




