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Wednesday, April 7, 2010

मिलिए मनीषा कोईराला के होने वाले पति से


खबर है कि बॉलीवुड की सबसे खूबसूरत हीरोईनों में से एक मनीषा कोईराला नेपाल के नामी व्यावसायी सम्राट दहल से 19 जून को शादी करने जा रही हैं। सम्राट दहल अमरीका से ऑल्टरनेटिव एनर्जी में पढाई पूरी कर हाल ही में नेपाल लौटे हैं। वे पर्यटन के लिए प्रसिद्ध पोखरा में एक बायोगैस प्लांट लगाने जा रहे हैं। गौरतलब है कि इसी शहर में मनीषा ने नेपाली फिल्म धर्मा की शूटिंग की है(इससे पहले उन्होंने किसी नेपाली फिल्म की शूटिंग कोई 20 साल पहले की थी)। सम्राट के पिता सुरेन्द्र दहल नेपाल में,लेदर विंग्स नामक जूता ब्रांड के मालिक हैं। पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार,स्वयंवर का आयोजन दो दिन पूर्व,17 जून को होगा। मेहँदी की रस्म 18 जून को होगी।
हीरोईनों का देर से विवाह करना एक चलन सा है। करियर जब उफान पर हो,तो किसी हीरोईन से शादी की बात पूछ कर देखिए। कहेंगी,"अभी कम से कम पाँच वर्षों तक शादी करने का इरादा नहीं है।" या यह कि "मैंने तो करियर से ही शादी कर ली है।" नतीजा चालीस पार। जब करियर ढलान पर हो या खत्म हो गया हो,तब जाकर शादी। या फिर कुंवारापन ही सही। पाठकों को ध्यान होगा कि मनीषा का प्रेम प्रसंग नेपाल में आस्ट्रेलिया के राजदूत क्रिसपिन कॉनरॉय और अमरीकी लेखक क्रिस्टोफर डॉरिस के साथ भी चला था। सम्राट के सबसे बड़े भाई सूरज काठमांडू में इंटर छात्रों के लिए अकादमी चलाते हैं और सैनो-थिमी टेक्नीकल इँस्टीट्यूट से जुड़े हैं। बहन शुवाश्री अमरीका से पीएचडी कर रही हैं।
बॉलीवुड में सुभाष घई की सौदागर से धमाकेदार एंट्री करने वाली मनीषा इन दिनों किसी तमिल फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में केरल में बताई जाती हैं। पाठक जानते ही हैं कि मनीषा कोईराला के दादा बी पी कोईराला नेपाल के पहले प्रधानमंत्री थे। उनके सगे दादाजी के दो भाई भी प्रधानमंत्री रहे हैं जिनमें से एक-जी पी कोईराला का हाल ही में निधन हुआ है। उनके दो चाचा अभी भी सांसद हैं और चाची सुजाता नेपाल की उप-प्रधानमंत्री हैं।मनीषा ने स्वयं कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब तक नहीं दिखाई है। अलबत्ता,उन्होंने पिछले दिनों यह कहकर जरूर विवाद पैदा कर दिया था कि नेपाल में राजशाही ही ठीक थी। लीजिए,इस संबंध में हिंदुस्तान,पटना संस्करण में 29 मार्च को प्रकाशित वह खबर भी पढिए-



अच्छी भोजपुरी फिल्में करना चाहूंगा- संजय मिश्रा

धारावाहिक ऑफिस-ऑफिस के राम खेलावन यानी,संजय मिश्रा वैसे तो डॉन और आतंकवादी की भूमिका भी कर चुके हैं मगर उनकी छवि हास्य अभिनेता की ही है। ओह डार्लिंग ये है इंडिया से लेकर अतिथि तुम कब जाओगे तक में हम उन्हें देख चुके हैं। गोलमाल-3 और तारा-सितारा उनकी आने वाली फिल्में हैं। संजय मिश्रा जी दरभंगा के हैं। भोजपुरी फिल्मों के सुनहरे दौर के गीत गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ी-उड़ी जाए और हे गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो जैसे गीत उन्हें बेहद पसंद हैं। अच्छी भोजपुरी फिल्में मिलें,तो वे करने के इच्छुक हैं मगर बिहार में शूटिंग का माहौल न होने से निराश भी हैं। पढिए आज प्रकाशित उनका यह इंटरव्यू-



Tuesday, April 6, 2010

एयरटेल टॉकीज

अब दूरसंचार कंपनी एयरटेल के उपभोक्ता फिल्म रिलीज होने से पहले ही उसकी झलक पा सकेंगे। कंपनी ने इसके लिए कल "एयरटेल टॉकीज" लांच किया।

इस सेवा के तहत उपभोक्ताओं को फिल्म रिलीज होने से पहले मूल फिल्म की सामग्री, डायलॉग, कहानी और गानों की क्लिप जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। इसके लिए एयरटेल उपभोक्ता को 51010(टॉल फ्री) डायल करना होगा। एक महीने में चार फिल्मों की सामग्री लेने के लिए 30 रुपए देकर एयरटेल टॉकीज को सब्सक्राइब कर सकते है। इसकी वैधता 30 दिनों की रहेगी। एक माह में एक फिल्म की सुविधा महज 10 रूपए देकर ली जा सकती है।
एयरटेल टॉकीज आगामी फिल्मों और सदाबहार क्लासिक फिल्मों- दोनों की सामग्री उपलब्ध कराएगा। इस प्लान में लोगों को फिल्म की ऑरिजिनल साउंडबाइट सुनने को मिलेगी जिसके आधार पर दृश्य की कल्पना आपको स्वयं करनी होगी। इस प्लान का लुत्फ हर जगह उठाया जा सकेगा।

क्लैश ऑफ द टाइटन्स/महायुद्धः फ़िल्म-समीक्षा

इस हफ्ते रिलीज हुई एक प्रमुख अंग्रेजी फिल्म है क्लैश ऑफ द टाइटन्स जिसे हिंदी में महायुद्ध के रूप में डब किया गया है। फिल्म में मुख्य भूमिका सैम वर्दिंगटन,राल्फ फिनेस,गेमा एटर्टन और लिआम नीसन की है। एक घंटे 46 मिनट की इस एक्शन फिल्म का निर्देशन किया है लुइस लेटेरियर ने।
परसियस(सैम वर्दिंगटन) देवपुत्र है मगर इंसानों की तरह पाला गया है। अदम्य युद्ध साहस के कारण वह उन सब के लिए चुनौती बनना चाहता है जो दुनिया पर अपना साम्राज्य कायम करना चाहते हैं। दूसरी ओर है काली दुनिया का देवता हेडिस (रॉल्फ फिनेस) जिसके कहर से परसियस को अपना परिवार खोना पडा है। दुनिया को नर्क बनाने का ख्वाब देखने वाला एक तीसरा जियस(लिआम नीसन) भी है। आगे की कहानी परसियस के देवशक्ति हासिल करने के प्रयास की है ताकि वह दुनिया को बचा सके।
टाइम्स ऑफ इंडिया में निखत काजमी की टिप्पणी है कि कथा पौराणिक है और यह फिल्म नई नहीं लगती। एक तो इसलिए कि इसमें पुश-बटन फैंटेसी काफी ज्यादा है और दूसरी इसलिए कि पूरी फिल्म स्पेशल इफेक्ट पर आधारित है जिसके कारण दैत्य स्वाभाविक नहीं लगते। हिंदुस्तान टाइम्स में राशिद ईरानी ने माना है कि 1981 की यह रीमेक दर्शकों के धैर्य का इम्तिहान लेती है। उनके मुताबिक,फिल्म की कहानी का अंदाजा पहले से होने लगता है। दूसरी तरफ,हिंदुस्तान में विशाल ठाकुर को निर्देशन बहुत पसंद आया और उनके हिसाब से फिल्म में पर्याप्त रोमांच है।
निखत काजमी ने लिखा है कि इस फिल्म के लिए थ्री-डी का विचार शायद देर से लिया गया और यही कारण है कि यह अवतार जैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाती। उनके मुताबिक,दोनों फिल्मों की एकमात्र समानता है सैम वर्दिंगटन की मौजूदगी मगर यहां उनसे अवतार जैसे चमत्कार की उम्मीद न रखिए।
राशिद ईरानी को किसी भी कलाकार के अभिनय ने प्रभावित नहीं किया। उन्होंने कैमरा वर्क को भी घटिया करार दिया है और बैकग्राउंड म्यूजिक को किसी चलताउ फिल्म सा माना है। वे लिखते हैं कि इस तरह की फिल्म में आश्चर्य का जो फैक्टर अनिवार्य होता है,वह यहां से गायब है।
हिंदुस्तान टाइम्स ने इसे दो जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीन स्टार दिए हैं। हिंदुस्तान ने एक्शन और मनोरंजन के आधार इसे मस्त श्रेणी में रखा है जिसे साढे तीन स्टार के बराबर माना जा सकता है।

Monday, April 5, 2010

कल्पना को बचाएगी अमरीकी संस्था

कितनी ही फिल्में खराब रखरखाव के कारण हमेशा के लिए नष्ट हो गई हैं और कई नष्ट होने की कगार पर हैं। इसी ब्लॉग पर पाठकों को सूचित किया गया था कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता तपन सिन्हा की अंकुश समेत सात फिल्मों के प्रिेंट स्थायी रूप से नष्ट हो गए हैं और अब तलाश की जा रही है कि शायद किसी सिनेप्रेमी के पास उन फिल्मों की वीडियो सीडी बची हो। ऐसा ही एक और प्रकरण अपने ज़माने की बहुचर्चित फिल्म कल्पना के बारे में सामने आया है जिसकी अब एक ही कॉपी बची है और वह इतनी खस्ताहाल है कि उसका प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। इस बारे में कल के हिंदुस्तान टाइम्स में एक खबर छपी है।
अखबार लिखता है कि अमरीकी निर्देशक मार्टिन स्कोरसीज के वर्ल्ड सिनेमा फाउंडेशन ने इस फिल्म के प्रिंट को बचाने का जिम्मा उठाने का फैसला किया है। पाठकों को ध्यान दिला दें कि इस फाउंडेशन की स्थापना दुनिया भर की क्लासिक फिल्मों के संरक्षण के प्रयोजन से ही की गई है। दीपा मेहता इस फाउंडेशन की बोर्ड सदस्या हैं।
कल्पना नृत्य विषय पर बनी फिल्म थी जिसमें एक संघर्षरत लेखक फिल्मों में करियर बनाने की कोशिश करता है। यूरोप की आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों से प्रभावित इस कॉमेडी-ड्रामा का निर्देशन उदय शंकर ने किया था जिन्हें आधुनिक भारतीय नृत्य के आधार-स्तंभों में गिना जाता है। ठीक पहचाना,ये सितारवादक रविशंकर जी के बड़े भाई ही हैं जिनका 26 सितम्बर,977 को निधन हो गया था।
(चित्र विकीपीडिया से साभार)

"द फैब्रिक ऑफ फेथ" दुबई फिल्मोत्सव में

भारतीय फिल्मकार सोनिया कृपलानी की द फैब्रिक ऑफ फेथ दुबई में होने वाले तीसरे खाड़ी फिल्मोत्सव में प्रदर्शन के लिए चुनी गई है। यह समारोह 8 से 14 अप्रैल तक चलेगा। सुश्री कृपलानी संयुक्त अरब अमीरात में ही रहती हैं और उनकी यह डॉक्यूमेंट्री उन आठ वृत्तचित्रों में से है जिन्हें इस समारोह में प्रतिस्पर्धा श्रेणी में प्रदर्शन के लिए चुना गया है। यह फिल्म अमीरात की एक महिला के नेतृत्व में हुई खामोश क्रांति को दर्शाती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे संयुक्त अरब अमीरात में अंतर्राष्ट्रीय लक्जरी ब्रांड स्थानीय ब्रांड का सत्यानाश कर रहे हैं। फिल्म हिजाब(पर्दा) से जुड़ी सभी भ्रांतियों को दूर करती है। इस श्रेणी में यूएई के मुनीर इब्राहिम की "टू फ्लाई अ ड्रीम", इराक के हेडी महूद की "कॉलेप्स",ब्रिटेन में रह रहे इराकी निर्देशक फरोक दाउद की "कॉकाब मिन बेबेल",हमीद हद्दाद की "80-82",अब्बास मुतेर की "ड्रीम्स लुक लाइक विंग्स",खालिद अल्झराउ की "टुनाइट,नेक्सट वीक" तथा कुवैत के उदीयमान फिल्मकार तलाल अल मुहान्ना के "डांसिंग ऑन द एज" नामक वृत्तचित्र भी शामिल हैं । शीर्ष तीन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियों का चयन निर्णायक मंडल करेगा जिसमें फिल्मकार और सांस्कृतिक हस्तियां शामिल हैं। बता दें कि यह फिल्म केन्स फिल्म समारोह में भी दिखाए जाने के लिए चुनी गई है। पहले और दूसरे पुरस्कार विजेता को 13,614 डॉलर तथा 9,530 डॉलर मिलेंगे।

Saturday, April 3, 2010

जयाप्रदा

पिछले साल उत्तरप्रदेश में रामपुर के टांडा में एक चुनावी रैली में अमर सिंह ने कहा कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार जयाप्रदा ने आप लोगों के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। अगर आप लोगों ने जयाप्रदा को अपना प्यार नहीं दिया और जयाप्रदा की साइकिल दिल्ली तक नहीं पहुंची, तो वह खुदकुशी कर लेंगी।
अमर सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी नूरबानो की जयाप्रदा से तुलना करते हुए कहा कि वह नूरबानो हैं, और यह हूरबानो हैं। जयाप्रदा अक्ल, शक्ल और सीरत की हूरबानो हैं। वास्तव में,महान फिल्मकार सत्यजीत रे भी उन्हें रजतपट की सुंदरतम महिलाओं में से बताया था। रे जयाप्रदा के साथ काम करने के इच्छुक थे लेकिन उनकी अस्वस्थता और फिर निधन के कारण यह योजना मूर्त रूप नहीं ले पाई।
आज जयाप्रदा का जन्मदिन है। उनका मूलनाम ललिता रानी था। जन्म आंध्र प्रदेश में राजमंडी में हुआ था। पिता कृष्णा तेलुगू फ़िल्मों के फाइनेंसर थे। मां नीलवाणी ने उन्हें कम उम्र में ही नृत्य और संगीत की शिक्षा दिलानी शुरू कर दी थी। जयाप्रदा की कई फिल्मों में हम उनके नृत्य कौशल से परिचित हो चुके हैं।
जयाप्रदा को बॉलीवुड में लाने का श्रेय के. विश्वनाथ को जाता है जिन्होंने उनके साथ 1979 में सरगम बनाई। फ़िल्म ज़बरदस्त हिट रही और वे रातों रात स्टार बन गईं। लेकिन हिंदी न बोल सकने के कारण वे अपनी सफलता को भुना नहीं सकीं । उन्हें लेकर1 982 में कामचोर भी के. विश्वनाथ ने ही बनाई थी जिसमें दर्शकों ने पहली बार जयाप्रदा को धाराप्रवाह हिन्दी बोलते देखा।

परवीन बॉबी, जीनत अमान और राखी जैसी नायिकाओं का जादू ढल गया तो जयाप्रदा ने अमिताभ के साथ जोड़ी जमाई। जयाप्रदा शराबी, गंगा जमुना सरस्वती, आखिरी रास्ता, जादूगर, इंद्रजीत और आज का अर्जुन में अमिताभ के साथ थीं। इनमें से तीन फिल्में सुपरहिट थीं।
जयाप्रदा ने न केवल अमिताभ बच्चन और जीतेन्द्र के साथ सफल जोड़ी बनाई, बल्कि प्रतिद्वंद्वी श्रीदेवी के साथ भी उन्होंने लगभग एक दर्जन फ़िल्मों में अभिनय किया है। 'तोहफ़ा' (1984) ने उन्हें सिनेमाप्रेमियों का चहेता बना दिया और बाद में अपनी इस छवि का इस्तेमाल उन्होंने राजनीति में प्रवेश के लिए किया। वे 1994 में एन.टी.रामाराव की तेलुगूदेशम पार्टी में शामिल हुईं मगर बाद में चंद्रबाबू नायडू गुट में चली गईँ। 1996 में आंध्रप्रदेश के लिए राज्यसभा में मनोनीत की गईं। उनकी पहली बड़ी राजनीतिक कामयाबी वह थी जब उन्होंने 2004 के आम चुनावों के दौरान रामपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता।
1986 में, उन्होंने निर्माता श्रीकांत नाहटा से शादी की, जो पहले से ही चंद्रा के साथ विवाहित थे। उनका दाम्पत्य जीवन सामान्य नहीं रहा।
तीस साल के फिल्मी करियर में अब तक उन्होंने सात भाषाओं की 300 फिल्मों में काम किया है। वे चेन्नई में जयाप्रदा थियेटर की मालकिन भी हैं। उन्होंने हाल ही में बंगाली भाषा में ‘आखिरी संघर्ष’ नामक फिल्म बनाई है, जिसमें मुख्य किरदार उन्हीं का है। फिल्म की नायिका माओवादी है और अवाम के लिए संघर्ष करती है।
(तस्वीर जयाप्रदा डॉट नेट से साभार)

सदियां- फ़िल्म-समीक्षा

सदियां बिहारी बाबू के बेटे लव सिन्हा की और उनकी हीरोईन फेरेना वजीर की पहली फिल्म है। वैसे,इस फिल्म में ऋषि कपूर , हेमा मालिनी और रेखा भी हैं। निर्देशक हैं राज कंवर। गीत समीर का है और संगीत अदनान सामी का। लगभग पौने तीन घंटे की इस फिल्म को सेंसर ने यू / ए सर्टिफिकेट दिया है।
भारत-पाक बंटवारा हिंदी फिल्मकारों का लंबे अर्से से पसंदीदा और बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ विषय रहा है। मगर कहानी वही घिसी-पिटी कि जन्म किसी ने दिया और पाला किसी और ने। इस फिल्म में भी एक हिंदू परिवार विभाजन के बाद भारत आता है। अमृत (रेखा) विभाजन के बाद जिस घर में आती है वहां उसे एक बच्चा रोता हुआ मिलता है जो बेनजीर (हेमामालिनी) का पुत्र है। ईशान (लव सिन्हा) हिंदू परिवार में पालापोसा जाता है। वह अमृत को ही अपनी मां मानता है। ईशान को एक मुसलिम लड़की (फेरेना वजीर) से प्यार हो जाता है तब मजहब की दीवार दिलों के बीच आ जाती है जिसके बाद अमृत (रेखा) अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए सच्चाई बताती है और उसकी वास्तविक मां को खोज निकालती है।
फिल्म यह बताने के लिए बनाई गई है कि प्यार मजहब नहीं देखता और दिल के रिश्ते सरहद लांघ जाते हैं। मगर फिल्म न तो बंटवारे के दर्द को बयां कर पाती है और न ही अपनों से बिछुड़ने के दर्द को। दरअसल , सीधी सादी स्टोरी में डायरेक्टर ने टीनएजर्स को जोड़ने की चाह में लव सिन्हा और फरीना वजीर के रोमांस को कहानी का ऐसा उबाऊ हिस्सा बनाकर रख दिया , जिसे हॉल में बैठा दर्शक झेल नहीं पाता।
इंडियन एक्सप्रेस में सुभद्रा गुप्ता लिखती हैं कि लव सिन्हा और फेरेना वज़ीर हर वह कुछ करते हैं जो इस टाइप की फिल्म में हीरो-हीरोईन करते हैं-गाना,नाचना,रोमांस वगैरह-वगैरह। थोड़ा रोना-धोना भी। मगर रेखा और हेमा की मौजूदगी में वे कहीं गुम हो गए। नभाटा ने ध्यान दिलाया है कि रेखा और हेमा इससे पहले 2001 में रिलीज देव आनंद की फिल्म ' सेंसर ' में साथ काम किया था। रेखा कुछ दृश्यों में हेमा पर हावी रहीं , तो वहीं ऋषि कपूर कई फिल्मों में एक के बाद एक पंजाबी कैरेक्टर में ऐसे बंध गए हैं कि यहां अपनी अलग छाप नहीं छोड़ पाए। लव सिन्हा पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुए हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में मयंक शेखर ने लिखा है कि लव सिन्हा फिल्म में जबरदस्ती लाए गए लगते हैं। दैनिक भास्कर में राजेश यादव लिखते हैं कि मध्यांतर से पहले का भाग शुरुआती कुछ मिनटों को छोड़कर कमजोर सा है, लेकिन बाद की पटकथा में दम नजर आता है। रेखा और ऋषि कपूर ने अपने अभिनय से फिल्म के भावनात्मक पक्ष को बेहतर बनाया है।
राज कंवर अब भी 70-80 के दशक से बाहर नहीं निकल पाए हैं , तभी तो कई मंझे हुए स्टार्स होने के बावजूद उन्होंने पौने तीन घंटे का ऐसा नाटकीय ड्रामा दर्शकों के सामने परोसा , जिसे झेलना आसान नहीं।
राजेश यादव लिखते हैं कि फेरेना वजीर ठीक-ठाक नजर आई है मगर पूरी फिल्म में रेखा ने शानदार अभिनय किया है और उनके चेहरे पर जिस तरह के भावनात्मक आवेग आते हैं वह कमाल के है। टाइम्स ऑफ इंडिया की नज़र में,इस फिल्म में फिल्म रेखा,ऋषि और हेमा में से किसी की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं किया जा सका।
दैनिक भास्कर ने फिल्म के गीत -संगीत को कहानी के हिसाब से औसत बताया है। मगर नभाटा के मुताबिक,अदनान सामी का संगीत पंजाब की माटी और लोक संगीत को पेश करने से कोसों दूर है। सोना लगदा , माही सोना लगदा ... जरूर इसका अपवाद कहा जा सकता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में निखत काजमी की टिप्पणी है कि यह फिल्म इतिहास का हवाला तो देती है मगर इस प्रकार का सिनेमा स्वयं इतिहास बन चुका है। उनका सुझाव है कि कुछ निर्माताओं को फिल्म बनाने से पहले आजकल की फिल्मो पर नज़र डालनी चाहिए। राजेश यादव जी को लगता है कि अगर आप 80 के दशक की युवा प्रेम कहानी देखना चाहते हैं तो फिल्म देख सकते हैं। चन्द्रमोहन शर्मा जी का कहना है कि आप यह फिल्म तभी देखें जब करने को कुछ नहीं हो और तपती गर्मी में तीन घंटे एसी में रेस्ट करने का इरादा हो क्योंकि तीन घंटे गुजारना कम से कम टीनएजर्स दर्शकों के लिए प्रताड़ना से कम नहीं।
फिल्म को हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस ने एक-एक,टाइम्स ऑफ इंडिया ने डेढ़,नभाटा और दैनिक जागरण ने दो-दो और दैनिक भास्कर ने ढाई स्टार दिया है।
(ऊपर की तस्वीर इंडियन एक्सप्रेस से और नीचे की तस्वीर टाइम्स ऑफ इंडिया से साभार)

पंखःफ़िल्म-समीक्षा

सुदीप्तो चट्टोपाध्याय के निर्देशन में बनी पंख’ में बिपाशा बसु के अलावा मैराडोना रिबेलो, महेश मांजरेकर, लिलेट दूबे, रॉनित रॉय, संजीदा शेख और अमित पुरोहित भी हैं। अवधि है पौने दो घंटे।
"पंख" जेरी नामक एक ऐसे बाल कलाकार की कहानी है जो लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में वर्षों से लड़कियों के किरदार निभाता रहा है ।उसकी मां ने हमेशा उसे इसी तरह ड्रेस अप किया क्योंकि उसे लगता है कि इसी तरह जेरी स्टार बन सकता है। आगे चलकर जेरी सेक्सुअल आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार हो जाता है। किशोरावस्था में वह नशे की लत में पड़ जाता है। बड़ा होने पर जेरी अपनी मां के साथ, जय बनकर फिल्म स्टूडियो के चक्कर काटता है हीरो बनने के लिए मगर लोग उसे गुलाबी पाउडर और लिपिस्टिक से पुती कुसुम के रूप में जानते हैं जिसे अवार्ड मिल चुका है। ज़ाहिर है, उसके लिए चीजें वैसी नहीं रह जाती जैसी प्रतीत होती हैं। नतीज़ा-जेरी समझ नहीं पाता कि क्या वास्तविक है और क्या काल्पनिक। फिर, एक दिन अचानक उसे सपनों की रानी मिल जाती है और फिर शुरू होता है जेरी के भीतर के बदलाव की कहानी। वह सफल होता है या नहीं यही इस फिल्म की कहानी है।
मुख्य किरदार बिपाशा का है। अटकलें लगाई जा रही थीं कि पंख बिपाशा पर आधारित फिल्म है। बिपाशा इस फिल्म में नौ अलग रूपों में(नौ भूमिकाएं नहीं) हैं। उन्होंने एक ऐसा किरदार किया है जिसका वास्तव में अस्तित्व नहीं है। फिल्म में वे युवा हीरो मैराडोना रिबेलो की कल्पना से बना चरित्र हैं। उनका हर रूप हीरो की मन: स्थिति का प्रतिबिंब है। बिपाशा ने कहा है कि यह उनकी पहली कला फिल्म है जो फिल्मोद्योग की एक बेहद गंभीर समस्या को उठाती है। मगर प्रस्तुति संबंधी दोषों के कारण यह फिल्म प्रभावित नहीं कर पाती।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस फिल्म को बहुत अवास्तविक तथा उलझाव भरा बताया है जो चंद सीक्वेंस में ही प्रभावित करती है। इसलिए अख़बार ने इसे महज दो स्टार दिया है। इंडियन एक्सप्रेस में सुभद्रा गुप्ता लिखती हैं कि पंख में जबर्दस्त संभावना थी। हमारी फिल्में पहचान संकट और दमित सेक्सुएलिटी जैसे जटिल मुद्दे कम ही उठाती हैं। मगर तमाम तरह की पेचीदगियों की शिकार इस फिल्म को उन्होंने भी एक स्टार ही दिया है।

दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित समीक्षा पर भी एक नज़र डालिएः

तुम मिलो तो सहीःफ़िल्म-समीक्षा

कल नाना पाटेकर , डिंपल कपाडिया , सुनील शेट्टी , अंजना सुखानी , रेहान खान, विद्या मालवदे और मोहनीश बहल अभिनीत तुम मिलो तो सही रिलीज हुई है। निर्देशन है कबीर सदानंद का। गीत इरशाद कामिल का और संगीत है मन सात समंदर डोल गया वाले संदेश शॉडिल्य का। लगभग सवा दो घंटे की इस फिल्म को सेंसर ने "यू" प्रमाणपत्र दिया है।
‘तुम मिलो तो सही’ तीन जोड़ियों की कहानी है, जो उम्र के अलग-अलग मोड़ पर हैं और जिनके लिए प्यार के मायने अलग-अलग हैं। ये तीनों जिंदगी को अपने रास्ते और अपनी सोच के साथ जीना चाहते हैं। इस सभी की कहीं न कहीं कुछ मजबूरी भी है , लेकिन मुश्किलों से डरकर रास्ता बदलना इनकी फितरत में नहीं है। फिल्म में रेहान और अंजना सुखानी नई पीढी का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह भी दिखाया गया है कि युवा पीढ़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जा रही पैसों की बरसात में अपनी प्राचीन संस्कृति को खत्म करने पर किस कदर आमादा है ।
एक मल्टीनैशनल कॉफी कंपनी , मुंबई शहर की बेहतरीन लोकेशन पर कंपनी के आउटलेट खोलना चाहती है। एमडी चाहते हैं कि उनकी कंपनी का सीईओ अमित नागपाल (सुनील शेट्टी )लकी कैफे को खरीदने की डील फाइनल करे। अमित के लिए यह डील एक दांव जैसा है। फाइनल हुआ तो बहुत कुछ मिलेगा और न हुआ तो अपना सब कुछ खोना पड़ सकता है। वह आश्वस्त इसलिए है कि लकी कैफे की मालकिन दिलशान ईरानी (डिपंल कापडिया) उसकी पत्नी अनीता ( विधा मालवदे) की अच्छी दोस्त है। मगर इस कैफे को अपनी जिंदगी समझने वाली दिलशान इसे हर हाल में बनाए रखना चाहती है और अमित का ऑफर ठुकरा देती है। राजगोपाल सुब्रह्मण्यम (नाना पाटेकर) लकी कैफे को बचाने के लिए अदालत में दिलशान का केस लड़ता है। विक्रम जीत सिंह( रेहान खान) और शालिनी(अंजना सुखानी )इस कैफे को बचाने की मुहिम में युवा पीढ़ी का साथ लेते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में निखत काज़मी ने डिंपल और नाना के रोल के तारीफ के पुल बांधे हैं। नवभारत टाइम्स में चंद्रमोहन शर्मा ने इसे डिंपल बेहतरीन फिल्मों में माना है। वहीं नाना पाटेकर हमेशा की तरह इस बार भी चिड़चिडे और झगड़ालू राजगोपाल सुब्रह्मण्यम के अंदाज में नजर आए , जिन्हें लगता है कि सिर्फ वही सही हैं। अंजना सुखानी अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में कुछ अलग लुक में नजर आईं। उन्होंने सुनील शेट्टी की भी तारीफ़ की है मगर उनके हिसाब से विधा मालवदे ने ऐक्टिंग की बजाए चिल्लाने में ज्यादा जोर लगाया।

नभाटा ने फिल्म के सगीत को कहानी के अनुकूल माना है और राघव सच्चर के टाइटिल सॉन्ग तुम मिलो तो सही को पूरे अंक दिए हैं। कुणाल गांजावाला और सुनिधि चौहान की आवाज में आई एम बेड टीन एजर्स की पसंद को ध्यान में रखकर कहानी में जोड़ तो दिया गया , लेकिन गाना कहानी की गति को रोकता है। वेबदुनिया के अनुसार, टाइटल सांग को छोड़ अन्य गीत बेदम है और उन्हें फिल्म में ठूँसा गया है। मगर टाइम्स ऑफ इंडिया की टिप्पणी है कि साधारण संगीत के बावजूद इस फिल्म में बांधे रखने वाली कई चीजें हैं।
नभाटा लिखता है कि डायरेक्टर कबीर सदानंद कलाकारों से बेहतरीन परफॉर्मेंस लेने के साथ - साथ दर्शकों को कहानी के साथ बांधे रखने में कामयाब रहे हैं । नई दुनिया में मृत्यंजय प्रभाकर ने लिखा है कि फिल्म पर कबीर की पकड़ शुरू से अंत तक बनी रहती है। वेबदुनिया में संजय ताम्रकर जी ने भी माना है कि एक लेखक के बजाय डायरेक्टर के रूप में कबीर सदानंद ज्यादा प्रभावित करते हैं। उन्होंने एक्टर्स से अच्छा काम लिया है और कुछ शॉट्सा अच्छे फिल्माए हैं। नवभारत टाइम्स और वेबदुनिया दोनों ने माना है कि रेहान और अंजना के रोमांटिक पहलू को कहानी का हिस्सा बनाने की ज़रूरत नहीं थी और यह फिल्म का सबसे कमज़ोर पहलू है। मृत्युंजय प्रभाकर के हिसाब से फिल्म की पटकथा काफी रोचक है मगर टाइम्स ऑफ इंडिया और वेबदुनिया ने खासकर फिल्म के शुरुआती हिस्सों की एडिटिंग ठीक से नहीं किए जाने की ओर ध्यानाकर्षण किया है।
शर्मा जी लिखते हैं कि यह फिल्म उन्हीं के लिए है जो अच्छी और अलग सोच के साथ - साथ मैसेज देती फिल्मों के शौकीन हैं ।

वेबदुनिया ने एक्टिंग को छोड़ फिल्म के अन्य पहलू औसत दर्जे का होने के आधार पर इसे ढाई स्टार दिये हैं जबकि नभाटा ने यह मानते हुए कि इस फिल्म में ऐसी कई खूबियां हैं जो अच्छी और लीक से हटकर बनी फिल्मों को देखने वाले शौकीनों की कसौटी पर सौ फीसदी उतरने का दम रखती हैं, इसे तीन स्टार दिया है। टाइम्स ऑफ इँडिया ने फिल्म को मुंबई के जज्बात को ठीक से फिल्माने और कहानी को सही तरीक़े से बयां करने के आधार पर इसे तीन स्टार दिया है।

दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित समीक्षा पर एक नज़रः

Thursday, April 1, 2010

मीडिया पर फिल्म बनाना चाहते हैं आमिर






















(हिंदुस्तान,पटना,1.4.2010)

गठबंधन प्यार के

छोटू रंगीला अउर परिणीता अभिनीत गठबंधन प्यार के धूम मचा रहल बा। एह मे पवन सिंह अउर रिंकी घोष के काम के खूब बड़ाई कईल जाता। देखीं,एह के प्रोमोशन खातिर 29 मार्च के एलफिंस्टन,पटना मे आयोजित कार्यक्रम के रिपोर्ट हिंदुस्तान से-



भूपेन हज़ारिका को भारत-रत्न देने की मांग

असम सरकार ने जाने-माने संगीतकार और गायक भूपेन हजारिका को भारत रत्न देने की मांग की है। कल राज्य विधानसभा में इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया ।  असम गण परिषद् ने यह प्रस्ताव रखते हुए कहा कि डाक्टर हजारिका ने कला-संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया है। पाठकों को बताते चलें कि डाक्टर भूपेन हजारिका एक साथ पत्रकार,कवि,अभिनेता,फिल्म निर्माता-सब हैं। उनकी डाक्टरेट उपाधि कोई मानद तौर पर प्रदान की गई नहीं है,उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से जनसंचार में पीएचडी की हुई है। असमिया सिनेमा को विश्वमंच पर स्थापित करने का श्रेय उन्हीं को है। असमिया फिल्मों में पिछले 40 वर्षों में सबसे ज्यादा संगीत और गायन उन्हीं ने किया है। हिंदी फिल्मों के दर्शक भी एक पल,साज,दरमियां,गजगामिनी,दमन,क्यों और रुदाली में उनका संगीत भूले नहीं होंगे। वे देश के एकमात्र जीवित बैले गायक हैं। वे राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के निदेशक हैं। पूर्वी भारत के लोक संगीत को विश्वपटल पर स्थापित करने में उन्होंने जो योगदान दिया है,वह अतुलनीय है। उन्हें पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार पहले ही मिल चुके हैं। अब कुछ बचा है तो वह भारत रत्न ही है।
चलते-चलते आपको सुनाते हैं उनका गाया रुदाली का ये गीत 

"आइकन" अमिताभ की मुश्किलें- सुधीश पचौरी

अमिताभ गैर-फिल्मी कारणों से लाइमलाइट में हैं। उनके गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनने को लेकर विवाद थमा भी नहीं था कि मराठी साहित्य सम्मेलन में उनके काव्य-पाठ पर बवाल खड़ा कर दिया । आज नई दुनिया में,सुधीश पचौरी जी उन मुद्दों की पड़ताल कर रहे हैं जिन्होंने अमिताभ को आइकन बनाया और जो उनके आइकन बने रहने के लिए ज़रूरी हैं। लिखते हैं-
"अमिताभ चर्चा में हैं। पहले वे फिल्मों में "एंग्री यंगमैन" की जबर्दस्त भूमिकाओं के कारण उत्तर नेहरू युग की जनता के बीच लोकप्रिय बने थे। फिर वे "मित्रधर्म" निभाने के लिए राजनीति में प्रविष्ट हुए और एक "दर्द" लेकर बाहर हुए। उत्तर-राजीव दौर में "मित्रपरिवार" से दूर होते गए और लोहिया की गैर-कांग्रेसवादी राजनीति के उत्तर युगवाली समाजवादी पार्टी के नजदीक हो गए और अमर-मुलायम की "भैया-दद्दू" जोड़ी के एक महत्वपूर्ण हिस्से बन गए। उन्हें मुलायम-अमर का राजनीतिक कवच मिला। कांग्रेस की छिटपुट निशानेबाजी का मुकाबला करने वाले जवाबी निशानेबाज मिले। इस दौर में वे "बिग बी" बने। सदी के "महानायक" बने। "बने" का मतलब "बनाए गए"। "बनाए गए" का मतलब है कि कुछ वे अपनी प्रतिभा से बने और कुछ मनोरंजन उद्योग की पिछली सदी की सकल-पारिस्थितिकी से बने। इस सदी के पिछले दस साल में वे कई ब्रांडों के "दूत" बने। करोड़पति कार्यक्रम के अभूतपूर्व संयोजक बने। टीवी ने उन्हें सुपर हीरो से "आइकन" में बदल डाला।

ये दुष्ट-दिन हैं। "एंग्री यंगमैन" की जगह "देव डी", "ओए लकी ओए" और "कमीने" आ गए हैं। ऐसे बेमुरव्वत दिनों में अगर अमिताभ "एंग्री ओल्डमैन" बनते हैं तो उनके क्रोध से हास्य उत्पन्न होता है। कवि सम्मेलनों तक में अब हरिवंश राय बच्चन के पुराने क्षुब्ध स्वर हिट नहीं करते। हर "आइकन" देवमूर्ति होकर हमारे लिए आनंद-मंगल का चिह्न बनकर हमारी भाषा, अभिव्यक्ति में आ जाता है। उसके हिताहित हमारे हित से संबद्ध नजर आते हैं । उसकी हानि हम बर्दाश्त नहीं कर पाते। हम उसके विकट पक्षधर, "फैन", अकुंठ प्रशंसक बन उठते हैं । वह हमारे सुख का, भले वह क्षणिक तोष से ज्यादा कुछ न हो, साधन होता है । "आइकन" की समस्या यह होती है कि वह जिस वस्तु को पेश करता उससे अलग नहीं रह पाता। वह खुद वस्तु बन जाता है। जब "आइकन" अपने चोले को बदलता है तो वह तड़क जाता है।

इन दिनों इस "आइकन" और उसके भीतर बैठे व्यक्ति का अंतर्द्वंद्व अपने चरम पर है। "एक रूप"; आइकन को अलगाकर, "दूसरे रूप"; व्यक्ति को अलहदा भूमिका देने की हड़बड़ी अमिताभ में उसी तरह देखी जा सकती है कि जिस तरह इन दिनों पश्चिमी आइकन टाइगर वुड्स के प्रसंग में देखी जा रही है । टाइगर और अमिताभ की कहानी एक नहीं है लेकिन दोनों आइकनों की "सार्वजनिकता" और "निजता" के बीच बार-बार का बनता-बिगड़ता तनाव और उसका विलोपन लगभग एक जैसा अनुभव है, जिसे विखंडित किया जाना चाहिए।

पिछले दो-तीन बरसों में अमिताभ ने अपने "आइकन" की सीमाएं कई बार लांघी हैं। वे "आइकन" को पीछे कर अपने व्यक्तित्व में वापस होने की जद्दोजहद करते हुए दिखे हैं। पहली बार तब दिखे थे जब पुत्र अभिषेक की ऐश्वर्या के साथ शादी को निजी घटना की तरह बनाया। इसका चरमोत्कर्ष तब बना, जब वे तिरुपति मंदिर गए और उसकी फुटेज टीवी की खबरों में विवाद का विषय बनी। तब एक व्यापार वाणिज्य विशेषज्ञ ने टिप्पणी की थी कि अमिताभ को एक सुपर ब्रांड होने के नाते किसी मंदिर विशेष में कैमरे के साथ नहीं जाना चाहिए था । अमिताभ का अपनी "प्रतिमा" तत्व से बाहर आने की दूसरी बड़ी कोशिश उनका ब्लॉग बनाना रही। ब्लॉग लिख- लिख कर उन्होंने कई मसलों पर अपना पक्ष स्पष्ट करने की कोशिश की। ब्लॅाग उन्हें "अपना" स्पेस देता है। अपनी रक्षा की आजादी देता है लेकिन इस क्रम में वे ब्लॉगवादियों की "खुला खेल फर्रुखाबादी" बिरादरी की बराबरी में ही खड़े हो सकते थे । इस तरह उनका प्रतिमात्व या श्रद्धास्पदत्व कमतर होता था और एक ऐसी "फ्री फॉर ऑल" दुनिया से उनका सामना होता था जिसमें उनका प्रतिमात्व शीशे की किसी प्रतिमा की तरह "नाजुक" हो उठता था। वे मामूली आदमी के रूप में बाध्य होते थे। "आइकन" की अपनी निजता में लौटने का यही दंड हो सकता है। अपने "आइकन" की सीमा का तीसरा अतिक्रमण अमिताभ ने तब किया, जब वे "यूपी में है दम" वाले सपा सरकार के खराब से राजनीतिक विज्ञापन के विवादास्पद दूत बने । चौथा अतिक्रमण कमाल का "अबाउट टर्न" है। वे गुजरात के ब्रांड एंबेसडर बने हैं। यह शायद "आइकन" के रहे असर का जादू रहा कि जब अमिताभ ने मोदी के गुजरात के ब्रांड एंबेसडर बनने की स्वीकृति दी तो न तो सपा से कोई सेकूलर कराह उठी, न वाम सेकूलरों ने कोई आलोचना की। कांग्रेस भी तब चुप रही। इस शून्य में राज ठाकरे की मराठी मानुषवादी ने उनकी प्रतिमा को विवाद में इस तरह से घसीटा कि वह "आइकन" अरक्षित और अकेला हो उठा। गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनने के पीछे शायद यह अकेलापन रहा हो और वे अपने आखेटकों की शरण में महफूज महसूस करते हों। उन्हें लगा होगा कि निष्ठुर सत्तामूलक विमर्शों में अगर वे किसी एक विमर्श के संरक्षण में न होंगे तो उनके आइकनत्व की रक्षा जनता का उपभोक्तावादी प्यार नहीं कर सकता। अपनी जनता से उनके भरोसे का उठना अपने प्रति भरोसे का उठना लगता है।

इसके बाद घटनाक्रम ताबड़तोड़ है। सी-लिंक पुल उद्घाटन में अमिताभ का आना, कांग्रेस के मुख्यमंत्री का परेशान होना, फिर मराठी साहित्य सम्मेलन में अमिताभ का आना और मुख्यमंत्री का अमिताभ के साथ मंच पर बैठने से बचने के लिए एक दिन ही पहले आकर चले जाना और बाद में अमिताभ का उसी मंच से सत्ता पर कटाक्ष करने वाली कविताओं के पाठ को देख लगता है कि अब अमिताभ "दीवार" के उसी डायलॉग में लौट गए हैं जिसके एंग्री-यंग हीरो के रूप में वे कहते हैं कि "पीटर अब तेरी जेब से ही चाबी निकालकर ये दरवाजा खोलूंगा"।

अपने क्षोभ में यह आइकन नहीं समझ पा रहा कि "एंग्री यंगमैन" का युग बीत चुका है और कि "आइकन" अपने लिए क्षोभ नहीं किया करते क्योंकि वे दूसरों द्वारा "स्क्रिप्टेड" होते हैं। यह स्थिति दिलचस्प है। भाजपा के प्रवक्ता उन कविताओं के तुरंत राजनीतिक अर्थ निकालकर कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय हो रहे हैं। कांग्रेस ने आखिर में इस आइकन से पूछ ही लिया है कि वे गुजरात दंगों के बारे में अपना रुख़ साफ करें। यह सवाल "आइकन" को तड़काने के लिए काफी है। कोई पूछ सकता है कि अगर अमिताभ सिर्फ गुजरात पर्यटन के  एंबेसडर हैं तो क्या उनके अभियान के नक्शे में "गोधरा" और "नरोदा पटिया" के वह जले मकान हैं कि नहीं जिन्होंने गुजरात को एक "साम्प्रदायिक" राज्य की पहचान ती है!"