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Thursday, November 25, 2010

मुंबई में बनेगा भारतीय सिनेमा संग्रहालय

भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर वर्ष 2013 तक एक ऐसा संग्रहालय अस्तित्व में आ जाएगा, जिसमें सिनेमा से जुड़े सभी पहलुओं को दर्शाया जाएगा। एक अधिकारी ने बताया कि संग्रहालय में फिल्म अधिकारों से लेकर, स्क्रिप्ट,सेट डिजाइनिंग, मोनोग्राफ और यहां तक कि फिल्म पत्रिकाओं तक को स्थान दिया जाएगा।

फिल्म डिवीजन्स के निदेशक कुलदीप सिन्हा ने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के दौरान संवाददाताओं को बताया कि परियोजना की लागत करीब 110 करोड़ रुपए होगी। इसका उद्घाटन दादा साहब फाल्के की वर्ष 1913 में आई फिल्म राजा हरिश्चंद्र के 100 वर्ष पूरे होने पर होगा।

सिन्हा ने कहा कि पिछले 60 वर्षों के दौरान बनाई गई फिल्मों के वेब संस्करण शीघ्र ही तैयार कर लिए जाएंगे। करीब 5000 फिल्में ऑनलाइन खरीदने और डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध होंगी।

सिन्हा ने यह भी बताया कि डिवीजन ने नेशनल फिल्म डिवीजन कारपोरेशन (एनएफडीसी) के साथ वृत्तचित्रों की मार्केटिंग के लिए एक समझौता किया है(दैनिक भास्कर,मुंबई,24.11.2010)।

Monday, November 22, 2010

फिल्मों ने बना दिया हीरो : चेतन भगत

लेखक चेतन भगत कहते हैं कि उनकी किताबों पर बनी फिल्मों ने लोगों तक उनकी पहुंच बढ़ा दी है। उनकी दो किताबों पर फिल्में बन चुकी हैं, तीसरी किताब पर काम हो रहा है और अगले साल उनकी चौथी किताब पर फिल्म बनेगी।

सलमान खान अभिनीत 'हेलो' भगत की किताब 'वन नाइट एट द कॉल सेंटर' पर आधारित है। राजकुमार हीरानी के निर्देशन में बनी और आमिर खान, आर. माधवन, शरमन जोशी व करीना कपूर की मुख्य भूमिकाओं से सजी '3 इडियट्स' भगत की किताब 'फाइव प्वाइंट समवन' पर आधारित है।

भगत ने कहा, "मेरी कहानियां बेहद भारतीय, मध्यवर्गीय, मजेदार, साधारण है, शायद इसीलिए बॉलीवुड इन कहानियों को अपना रहा है। '3 इडियट्स' की सफलता ने बता दिया है कि इन कहानियों पर सफलतापूर्वक फिल्में बनाई जा सकती हैं। इसीलिए ऐसा हो रहा है और यह मेरे लिए अच्छा है क्योंकि मैं ज्यादा से ज्यादा भारतीयों तक पहुंचना चाहता हूं लेकिन मैं अंग्रेजी में लिखता हूं यदि मैं हिंदी में लिखूं तो मेरी पहुंच और भी बढ़ जाएगी।"

निर्माता साजिद नाडियावाला ने भगत की तीसरी किताब '2 स्टेट्स: द स्टोरी ऑफ माई मैरिज' पर फिल्म बनाने में रुचि दिखाई है। यह किताब तमिलनाडु की एक लड़की और एक पंजाबी लड़के के प्रेम की कहानी है। उनके माता-पिता इस रिश्ते को स्वीकार कर लें इसके लिए वे हर सम्भव प्रयास करते हैं।

भगत को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह 'टाइम' पत्रिका की इस साल की दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली हस्तियों की सूची में शामिल होंगे।

वह कहते हैं कि यह अद्भुत था क्योंकि उन्हें इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी।

भगत फिल्म के लिए पटकथा लिखने की सम्भावना से इंकार नहीं करते हैं। वह कहते हैं, "शायद मैं एक पटकथा लिखूं। यह इसके लिए प्रस्ताव आने पर निर्भर करता है। यदि ऐसा होता है तो मैं इस पर विचार कर सकता हूं लेकिन मैं इसके प्रति आश्वस्त नहीं हूं।"
(भास्करडॉटकॉम,22.11.2010)

Thursday, November 18, 2010

मुंबई में 4 दिसंबर से फ्रांसीसी फ़िल्मोत्सव

समकालीन फ्रांसीसी सिनेमा के विभिन्न पहलुओं से भारतीय दर्शकों एवं फिल्मकारों को अवगत कराने के उद्देश्य से फ्रांसीसी सिनेमा का महोत्सव 4 दिसंबर से मुंबई में आयोजित होने जा रहा है। चार दिनों तक चलने वाले इस तीसरे महोत्सव के दौरान मेट्रो बिग सिनेमा (धोबीतलाव) और फन सिनेमा (अंधेरी वेस्ट) में कुल सात फ्रांसीसी फिल्में दिखाई जाएंगी, जिनमें 'हार्टब्रेकर', 'ऑफ गॉड ऐंड मैन' और 'पोसिचे' प्रमुख हैं।

इस उत्सव का आयोजन भारत स्थित फ्रांसीसी दूतावास और यूनीफ्रांस ने मिलकर किया है ताकि भारत और फ्रांस कला, संस्कृति और सिनेमा के क्षेत्र में भी एक दूसरे के करीब आ सकें। फ्रांसीसी सरकार चाहती है कि फिल्म फ्रांसीसी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए भारत-फ्रांस सहयोग से निर्माण एवं वितरण का सशक्त मंच तैयार किया जाए। परस्पर सद्भाव को बढ़ावा देने और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अमिताभ बच्चन तथा शाहरुख खान सर्वोच्च फ्रांसीसी सम्मान से नवाजे जा चुके हैं।

गौरतलब है कि फ्रांस में भारतीय सिनेमा ने भी हाल के सालों में दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी है। कान फिल्म फेस्टिवल में संजय लीला भंसाली की 'देवदास' तथा देव आनंद की 'गाइड' को काफी सराहना मिली थी। पेरिस में 'ऐन इवनिंग इन पैरिस' सहित कई हिंदी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है और आइफल टॉवर से भारतीय दर्शक अब अच्छी तरह परिचित हैं। मकबूल फिदा हुसेन भी अपनी एक फिल्म की शूटिंग पैरिस में कर चुके हैं। बॉलिवुड के फिल्मकारों का मानना है कि मुंबई में फ्रांसीसी सिनेमा का महोत्सव दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग को और मजबूत करेगा(नवभारत टाइम्स,मुंबई,18.11.2010)।

Wednesday, November 17, 2010

मैथिली फिल्म सिनुरिया केर संगीत जारी भेल

मैथिली फ़िल्म सिनुरिया केर ऑ़डियो-वीडियो सीडी के काल्हि लोकार्पण भेल। एहि अवसर पर मधुबनी मे युवराज होटल में कार्यक्रम आयोजित कएल गेल छल। कार्यक्रम मे,मैथिली अकादमी केर पूर्व निदेशक देवकांत झा आ पूर्व न्यायाधीश सच्चिदानंद झा कहलन्हि जे एहि फिल्म केर निर्माण कए आयुष्मान फिल्म्स मीडिया आ प्रोडक्शन हाउस साहसिक काज कएलक अछि आ एहि पहल सं मैथिली भाषा मे फ़िल्म निर्माण के नव दिशा भेटतैक । कला केर उपयोगिता आ महत्ता को रेखांकित करैत देवकांत झा कहलनि जे फिल्म सिनुरिया केर नामकरणे बतबैत छैक जे ई सिनेमा एहि ठामक सभ्यता-संस्कृति सं जुड़ल छैक।

फिल्मक निर्माता मंजेश दुबे एहि अवसर पर लोक सभ सं अपील कएलनि जे अप्पन भाषाक एहि फ़िल्म कें सुपरहिट बनाऊ। फिल्म के सह-निर्माता बीएन चौधरी कहलनि जे छह गीत सं सुसज्जित एहि सीडी में सभ मूड के गाना छैक। आवश्यकता छैक तं इएह जे एकरा प्रोत्साहित कएल जाए। लोकार्पण समारोह मे संगीतकार ज्ञानेश्वर दुबे विद्यापति केर गीत गाबि श्रोतालोकनि कें मंत्रमुग्ध क देलनि। एहि अवसर पर ज्योति रमण झा बाबा, अभिराज झा, जटाधर झा आ फिल्म के वितरक अजय यश सेहो उपस्थित छलाह।

Tuesday, November 16, 2010

कॉमन मैन है क्यों बेचैन?

टिकट खिड़की पर न सही, लेकिन फिल्म समीक्षकों और अच्छी फिल्मों को पसंद करने वाले एक बड़े दर्शक वर्ग में पिछले दिनों एक फिल्म की खूब चर्चा हुई। एक शिक्षक की जिंदगी के हंसी-खुशी के पलों के बीच गुजरे जमाने की रोमांटिक जोड़ी ऋषि कपूर और नीतू सिंह की फिल्म ‘दो दूनी चार’ कई मायनों में सराही गयी।

इस फिल्म के पोस्टर में ऋषि कपूर अपनी पत्नी और दो बच्चों संग स्कूटर पर शान से बैठे दिखते हैं। जोड़-तोड़ कर घर चलाने वाली उनकी पत्नी नीतू सिंह के चेहरे पर भी संतोष झलकता है और बच्चे, दिख तो खुश ही रहे हैं, पर अंदर ही अंदर उन्हें अपने डैडीजी (बेशक बाद में अच्छे लगने लगते हैं) फूटी आंख नहीं सुहाते। ऐसे में डैडीजी अगर कम तन्ख्वाह में पूरे मुहल्ले के सामने एक नई कार लेने का ऐलान कर दें तो परिवार के बाकी लोगों पर क्या गुजरेगी। तंग जेब में जुगाड़बाजी शुरु हो जाएगी और इस जुगाड़बाजी से तमाम परेशानियां भी बिना बुलाए आएंगी ही। तंग जेब के बीच दैनंदिन मुसीबतों से जूझते एक कॉमन मैन के जीवन पर केन्द्रित इस फिल्म में बहुत कुछ कहा गया है।

मोटे तौर पर कहा जाए तो आम आदमी के जीवन और उससे जुड़े तमाम पहलुओं को भुनाने पर फिल्म इंडस्ट्री फिर से फोकस कर रही है। इस साल तमाम ऐसी छोटी-बड़ी फिल्में आईं, जिनके केन्द्र में आम आदमी था। साठ के दशक में हिन्दी फिल्मों का कथानक आम आदमी पर ही केन्द्रित हुआ करता था। हाल ही में अभी अक्षय कुमार 'खट्टा-मीठा' फिल्म में आम आदमी की भूमिका में थे। स्टार पावर युक्त अक्षय के बावजूद यह फिल्म नहीं चली। साधारण से चेहरे मोहरे और व्यक्तित्व वाले अमोल पालेकर ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए आम आदमी को खास लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुंचाया था।

उनकी फिल्में 'रजनीगंधा', 'चितचोर', 'घरौंदा', 'गोलमाल' आदि फिल्मों ने आम आदमी के इमोशंस को छुआ और जरूरतों का चित्रण किया। मिथुन चक्रवर्ती और गोविन्दा ने भी आम आदमी की इमेज को हिन्दी फिल्मों में अपनाया। गोविन्दा के साथ लंबे समय तक विरार का छोरा जोड़ा जाता रहा। ध्यान रहे की विरार आम लोगों के रहने वालों का इलाका है। मिथुन चक्रवर्ती के काले रंग और उनके फुटपाथ पर भूखे रह कर संघर्ष करने को खूब उछाला गया। इससे इन अभिनेताओं में आम आदमी ने खुद को देखा। इन दोनों अभिनेताओं के डांस स्टेप तक आम आदमी को रास आते थे। यह जब आम आदमी की बातें करते थे तो दर्शक तालियां बजाते थे।

कॉमन मैन के सहारे तमाम अभिनेता सुपर स्टार तक की कुर्सी पर भी पहुंचे। अमिताभ बच्चन ने कॉमन मैन को बखूबी जिया। शाहरुख खान ने अपने करियर की शुरुआत में 'राजू बन गया जैंटलमैन', 'कभी हां कभी ना', 'रामजाने' आदि फिल्मों में खुद की कॉमन मैन की इमेज बनाई। अनिल कपूर ने 'वो सात दिन' में आम आदमी बन कर सुपर हिट शुरुआत की थी। वह राज कपूर के बाद आम आदमी के पर्याय बन गए थे।

लेकिन हर अभिनेता को कॉमन मैन की इमेज रास नहीं आती। इसीलिए आम तौर पर ज्यादातर अभिनेता आम आदमी का जामा पहनने से कतराते रहे हैं। 2003 में सूरज बड़जात्या द्वारा बनाए गए चितचोर के रीमेक 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' में अभिनेता रितिक रौशन ने अमोल पालेकर का चोला पहनने की कोशिश की थी, लेकिन वह बुरी तरह से असफल रहे। ऐसा नहीं कि अब हिन्दी फिल्मों का नायक आम आदमी नहीं रह गया। कई हिन्दी फिल्में आम आदमी की बात करती हैं।

अलबत्ता, हिन्दुस्तान का आम आदमी रूपहले पर्दे पर दो हिस्सों में बंट गया लगता है। मसलन, एक तरफ वह आम आदमी बन कर सेल्युलाइड पर उभरता है तो दूसरी तरफ कॉमन मैन बन कर ग्लैमर पाता है। इस साल की एक अन्य हिट फिल्म एंधिरन उर्फ रोबोट इसी कॉमन मैन की बात करती दिखती है। निर्माता आमिर खान की अनुषा रिजवी निर्देशित फिल्म पीपली लाइव किसानों की समस्या को उभारने वाली फिल्म थी, मगर यह फिल्म रास्ता भटक कर मीडिया और नेताओं के विद्रूप को दर्शाने वाली कॉमन मैन की फिल्म बन गई। कुछ साल पहले दिबाकर बनर्जी ने खोसला का घोसला में आम आदमी की मकान की जरूरत का चित्रण किया था।

हालिया रिलीज फिल्म 'दस तोला' एक सुनार की जिंदगी की जद्दोजहद की कहानी बयां करती है। मनोज की ही एक अन्य फिल्म जुगाड़ में दिल्ली की सीलिंग की वजह से आम आदमी को हुई परेशानी का चित्रण था। वेल डन अब्बा में भी एक निम्न मध्यम वर्ग के व्यक्ति की अपनी बेटी की शादी की चिंता जुड़ी थी। मुम्बई मेरी जान, आमिर और ए वेनस्डे आम आदमी और आतंकवाद को जोड़ते हुए आम आदमी की चिंता का प्रदर्शन करती थीं। इन तीनों ही फिल्मों में कॉमन मैन अपील कूट-कूट कर भरी थी, लेकिन व्यावसायिक रूप से ये फिल्में खास कमाई न सकीं।

'दो दूनी चार' में ऋषि कपूर एक ऐसे परिवार के मुखिया थे, जिसके सदस्यों के बीच एक कार खरीदने के लिए बहस छिड़ी हुई है। बड़े बजट की कॉमन मैन वाली और कम बजट की आम आदमी की फिल्मों में कुछ चलीं, कुछ नहीं चलीं, मगर इन्हें चर्चा जरूरी मिली। आज के परिदृश्य में आम आदमी क्या सोचता है, इसका चित्रण करने वाली तमाम फिल्मों की समीक्षकों ने गम्भीरता से समीक्षा की। उन्हें सराहा और अच्छी रेटिंग दी। लेकिन आम आदमी का चित्रण करने वाली वही फिल्में बॉक्स आफिस पर चलीं, जिनसे बड़े सितारों का नाम जुड़ा।

बतौर अभिनेता अपनी पहली फिल्म 'राजधानी एक्सप्रेस' में टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस एक आम आदमी बने हैं। आने वाली फिल्म 'शाहरुख बोला खूबसूरत है तू' शाहरुख खान की फैन एक फूल बेचने वाली लड़की की कहानी है, जो यह सोचती है कि वह एक दिन शाहरुख खान की हीरोइन बनेगी। अभी तक मसाला फिल्मों में काम करते आए अभिनेता शरमन जोशी आने वाली फिल्म 'अल्लाह के बंदे' में माफिया से जुड़े आम आदमी का किरदार निभा रहे हैं। अनुष्का शर्मा की 'बैंड बाजा बारात' मध्यम वर्ग की लड़की की कहानी है, जो वैडिंग प्लानिंग कंपनी चलाती है। यानी बड़े सितारों वाली ग्लैमरस और भव्य फिल्में बनाने वाले यशराज बैनर का फोकस भी अब आम आदमी पर केन्द्रित होता दिख रहा है(राजेन्द्र काण्डपाल,हिंदुस्तान,दिल्ली,12.11.2010)।

हॉलीवुड-बॉलीवुड में हुआ ऐतिहासिक गठबंधन

भारतीय फिल्म उद्योग का बढ़ता बाजार और विदेशों में बढ़ता दबदबा देख कर हॉलीवुड ने बॉलीवुड की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है। शुक्रवार को कैलिफोर्निया में लॉस एंजिल्स और भारतीय फिल्म उद्योग के बीच घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। इस अनुबंध के तहत यह दोनों साथ मिल कर फिल्म निर्माण, वितरण, तकनीक, वाणिज्यिक सहकारिता विकसित करने और कॉपीराइट की सुरक्षा को लेकर काम करेंगे। इसके साथ ही लॉस एंजिल्स में भारतीय फिल्म निर्माण के विकास हेतु लॉस एंजिल्स-इंडिया फिल्म काउंसिल का गठन भी करेंगे।

इस मौके पर लॉस एंजिल्स के मेयर एंटोनियो विलाराइगोसा, कैलिफोर्निया फिल्म कमिशनर एमी लेमिश, पैरामाउंट पिक्चर्स के सीईओ ब्रैड ग्रे, मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन एशिया पैसिफिक के अध्यक्ष माइक एलिस, मोशन पिक्चर एसोसिएशन इंडिया के प्रबंध निदेशक राजीव दलाल, फिल्म निर्माता बॉबी बेदी, एल. सुरेश के साथ ही रिलायंस बिग एंटरटेनमेंट और यूटीवी मोशन पिक्चर्स के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इस मौके पर मेयर एंटोनियो ने कहा कि पिछले वर्ष "माई नेम इज खान" और "काइट्स" फिल्मों का निर्माण लॉस एंजिल्स में हुआ था और उम्मीद है कि इस अनुबंध के बाद और भी हिंदी फिल्मों का निर्माण लॉस एंजिल्स में होगा।

निर्माता बॉबी बेदी ने कहा कि बॉलीवुड और हॉलीवुड में हुए इस अनुबंध की वजह से हमें भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बनाने का मौका मिलेगा।

लॉस एंजिल्स शहर में अब ज्यादा से ज्यादा भारतीय फिल्मों का निर्माण हो पाएगा क्योंकि यहां की सरकार ने हमें सारी सुविधाएं देने का वादा किया है। इस अनुबंध से क्षेत्रीय फिल्म उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद निर्माता बॉबी बेदी, राजीव दयाल, लॉस एंजिल्स के मेयर एंटोनियो और दक्षिण भारतीय फिल्मों के निर्माता सुरेश लक्ष्मण(चंद्रकांत शिंदे,नई दुनिया,दिल्ली,16.11.2010)।

Monday, November 15, 2010

अधूरी तैयारियों के बीच जारी है कोलकाता फिल्मोत्सव

16 वें कोलकाता फिल्मोत्सव के तीन दिन बीत जाने केबावजूद कमियां जगह-जगह उजागर हो रही हैं। प्रबंधन कमियों की जानकारी के बाद भी अपने दायित्व से पल्ला झाड़ रहा है, वहीं मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य राजनीति में व्यस्त हैं। इससे दर्शकों में न सिर्फ नाराजगी है, बल्कि वे महोत्सव के चार दिन बाकी रहने के बावजूद अभी से उसे फ्लाप शो बता रहे हैं। राज्य सरकार घोषणा के बावजूद मशहूर फिल्मकार स्वर्गीय सत्यजीत राय के चर्चित वृत्तचित्र सिक्किम दिखाने में विफल रही। पहले तो नंदन के सीईओ नीलांजन चटर्जी ने कहा था कि सिक्किम वृत्तचित्र हर हाल में प्रदर्शित किया जायेगा लेकिन जब सिक्किम की अदालत ने रोक लगाने का निर्देश दिया तो वामो सरकार खामोश हो गयी। अब फिर से सिक्किम दिखाने के लिए सरकार ने पहल शुरू की है। संबंधित संस्था को प्रक्रिया के तहत चिट्ठी लिखी दी गयी है। मालूम हो कि महोत्सव के शुरू में सिक्किम की संस्था द आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारी उगेन चेपल ने कहा था कि उनके पास सिक्किम वृत्तचित्र का कापी राइट अधिकार सुरक्षित है, इसलिए उनकी अनुमति जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस बार सरकार का रवैया ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती महोत्सवों में सबकी राय सुनी जाती थी लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। उल्लेखनीय है कि पहले दिन सिक्किम का एक शो हुआ, जबकि महोत्सव में सात दिन दिखाने का निर्णय किया गया था। बांग्ला फिल्म के समीक्षक डा. संजय मुखर्जी ने तो सिक्किम की सीडी पर सवाल खड़ा किया और कहा कि उसके असली होने में भी संदेह है। गुरुवार को जापान के नामचीन निर्देशक कुरुसावा की वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म रैन रवींद्र सदन प्रेक्षागृह में दिखायी जा रही थी। कुछ देर बाद प्रोजेक्टर में गड़बड़ी आ गयी। काफी देर तक दर्शक इंतजार करते रहे बावजूद उसके प्रबंधन ने क्षमायाचना नहीं की। इस बीच दर्शकों का मन बहलाने के लिए हिन्दी व बांग्ला के गाने दिखाये गये, जिससे नाराज दर्शक हाल से बाहर निकल गये। शुक्रवार को वियतनामी फिल्म द लीजेंड इज एलाइव फिल्म दिखायी जा रही थी, तभी स्क्रीन पर गड़बड़ी देखी गयी। वियतनामी फिल्म के बदले भारतीय फिल्म लाइफ गोज आन दिखायी गयी। इससे नाराज दर्शक उत्तेजित हो गये और आयोजक को जमकर कोसा। इसी तरह की गड़बडि़यां अन्य प्रेक्षागृहों में भी देखी जा रही हैं। महोत्सव के पदाधिकारी नीलांजन चटर्जी अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहे हैं और सरकार भी चुप है(दैनिक जागरण,सिलीगुड़ी,15.11.2010)।

Sunday, November 14, 2010

शशि कपूर

बलबीर राज कपूर वर्ष 1938 में एक जाने-माने फिल्मी घराने कपूर खानदान में जन्मे थे। अपने पिता पृथ्वीराज कपूर और बड़े भाई राज कपूर व शम्मी कपूर के नक्शेकदम पर चलते हुए बलबीर ने भी फिल्मों में ही अपनी तकदीर आजमाई। अलबत्ता कई मायनों में उनका कॅरियर पिता और भाइयों से अलहदा था। दुनिया बलबीर को शशि कपूर के नाम से जानती है।

शशि कपूर ने 40 के दशक में ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने कई धार्मिक फिल्मों में बाल कलाकार की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने बंबई के माटुंगा स्थित डॉन बोस्को स्कूल में पढ़ाई की थी। पिता पृथ्वीराज कपूर उन्हें छुट्टियों के दौरान स्टेज पर अभिनय करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

इसी का नतीजा रहा कि शशि के बड़े भाई राज कपूर ने उन्हें आग (1948) और आवारा (1951) में भूमिकाएं दी। आवारा में उन्होंने राज कपूर के बचपन का रोल किया था। 50 के दशक के मध्य में पिता की सलाह पर वे गॉडफ्रे कैंडल के थिएटर ग्रुप ‘शेक्सपियराना’ में शामिल हो गए और उसके साथ दुनियाभर की यात्राएं कीं। इसी दौरान गॉडफ्रे की बेटी और ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से उन्हें प्रेम हुआ और 1958 में मात्र 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने उनसे विवाह कर लिया।

शशि कपूर ने गैरपरंपरागत किस्म की भूमिकाओं के साथ सिनेमा के पर्दे पर आगाज किया था। उन्होंने सांप्रदायिक दंगों पर आधारित फिल्म धर्मपुत्र (1961) में काम किया और उसके बाद चार दीवारी और प्रेम पात्र जैसी ऑफ बीट फिल्मों में नजर आए। वे हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने हाउसहोल्डर और शेक्सपियर वाला जैसी अंग्रेजी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं।

वर्ष 1965 शशि कपूर के लिए एक महत्वपूर्ण साल था। इसी साल उनकी पहली जुबली फिल्म जब जब फूल खिले रिलीज हुई और यश चोपड़ा ने उन्हें भारत की पहली मल्टी स्टारर ईस्टमैन कलर फिल्म वक्त के लिए कास्ट किया।

बॉक्स ऑफिस पर लगातार दो बड़ी हिट फिल्मों के बाद व्यावहारिकता का तकाजा यह था कि शशि कपूर परंपरागत भूमिकाएं करें, लेकिन उनके भीतर बैठा अभिनेता इसके लिए तैयार नहीं था। इसके बाद उन्होंने ए मैटर ऑव इनोसेंस और प्रिटी पॉली 67 जैसी फिल्में कीं, वहीं हसीना मान जाएगी, प्यार का मौसम ने एक चॉकलेटी हीरो के रूप में उन्हें स्थापित किया।

वर्ष 1972 की फिल्म सिद्धार्थ के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी मौजूदगी कायम रखी। ७क् के दशक में शशि कपूर सबसे व्यस्त अभिनेताओं में से थे और वे तीन-तीन शिफ्टों में काम करते थे। इसी दशक में उनकी चोर मचाए शोर, दीवार, कभी-कभी, दूसरा आदमी और सत्यम शिवम सुंदरम जैसी फिल्में रिलीज हुईं।

वर्ष 1971 में पृथ्वीराज कपूर की मृत्यु के बाद शशि कपूर ने जेनिफर के साथ मिलकर पिता के स्वप्न को जारी रखने के लिए मुंबई में पृथ्वी थिएटर का पुनरुत्थान किया। अमिताभ बच्चन के साथ आई उनकी फिल्मों दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, सिलसिला, नमक हलाल, दो और दो पांच, शान ने भी उन्हें बहुत लोकप्रियता दिलाई। लेकिन शशि कपूर ने सार्थक सिनेमा का दामन कभी नहीं छोड़ा। वर्ष 1977 में उनकी प्रोडक्शन कंपनी फिल्मवालाज ने पांच प्रोजेक्टों की घोषणा की।

इनमें श्याम बेनेगल की जुनून और कलयुग, गोविंद निहलानी की विजेता, गिरीश कर्नाड की उत्सव और अपर्णा सेन की ३६ चौरंगी लेन जैसी फिल्में शामिल थीं। उनके आलोचकों ने कहा कि वे पेशेवर रूप से आत्मघात कर रहे हैं, लेकिन शशि कपूर ने केवल यही कहा कि सिनेमा में भरोसा करते हैं, व्यावसायिक और कला फिल्मों के विभाजन में नहीं।

शशि कपूर ने मर्चेट आइवरी प्रोडक्शन की फिल्मों में बेहतरीन अदाकारी की है। इनमें हीट एंड डस्ट, सैमी एंड रोजी गेट लेड जैसी फिल्में शामिल हैं। जेनिफर की मृत्यु के बाद उन्हें अवसाद ने घेर लिया। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्होंने फिल्मों और थिएटर में दिलचस्पी लेना बंद कर दी।

लेकिन वर्ष 1986 में न्यू देहली टाइम्स के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर उन्होंने एक बार फिर खुद को साबित कर दिया। शशि कपूर अब सिनेमा से पूरी तरह रिटायर हो चुके हैं, लेकिन वे अब भी पृथ्वी थिएटर के प्रेरणास्रोत हैं। फिल्म दीवार में शशि कपूर का यह संवाद बहुत लोकप्रिय हुआ था : ‘मेरे पास मां है।’ इसी तर्ज पर हम भी गर्व से कह सकते हैं : ‘हमारे पास शशि कपूर हैं।’(भावना सोमाया,दैनिक भास्कर,14.11.2010)

Saturday, November 13, 2010

नाटक आधारित फिल्में और फिल्म पर नाटक

शोभना देसाई के गुजराती नाटक ‘अंधलो पातो’ पर आधारित फिल्म ‘आंखें’ विपुल शाह ने बनाई थी और अब अपने ही गुजराती नाटक पर उन्होंने ‘एक्शन रीप्ले’ नामक हादसा रचा है। इससे पूर्व पीटर शेफर के महान नाटक ‘अमेडियस’ पर आधारित उनकी ‘लंदन ड्रीम्स’ अनेक लोगों के लिए वित्तीय दु:स्वप्न बनी।

आश्चर्य की बात यह है कि उनका ही एक बयान है कि फिल्म उद्योग में सफलता का प्रतिशत पंद्रह नहीं पचास माना जाना चाहिए, क्योंकि अधिकांश फिल्में उद्योग से अपरिचित नौसिखियों द्वारा गढ़ी जाती हैं और उनको खारिज करने पर सफलता का प्रतिशत बढ़ता है। विपुल शाह उन लोगों को भूल गए जो नौसिखिया नहीं हैं, फिर भी अनपढ़ों की तरह फिल्में बनाते हैं और इस सूची में वे अब शिखर स्थान पर पहुंच गए हैं।


बहरहाल नाटकों का फिल्मों से नजदीकी रिश्ता रहा है। धुंडिराज गोविंद फाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ को ही पहली फिल्म माना जाता है, जबकि उसके प्रदर्शन के पूर्व इसी नाटक के एक प्रदर्शन को जस का तस शूट करके दिखाया गया था और उसे फिल्म्ड प्ले होने के नाते पहली कथा फिल्म नहीं माना गया। गोयाकि प्रारंभ में ही स्पष्ट हो गया कि नाटक से प्रेरणा लेकर फिल्म बनाई जा सकती है, परंतु वह फिल्म होनी चाहिए, फिल्म्ड प्ले नहीं।

नाटक में बोले गए शब्द का बहुत महत्व है, जबकि सिनेमा की भाषा में दृश्य का महत्व है। नाटक में अनेक पात्र मंच पर होते हैं परंतु दर्शक किसी एक को कुछ समय के लिए केंद्रीय माने, ऐसी बाध्यता नहीं है। दूसरी ओर सिनेमा में क्लोज अप द्वारा दर्शक का ध्यान एक पात्र पर केंद्रित किया जा सकता है।

नाटक में दर्शक और पात्र का सीधा संवाद स्थापित होता है जबकि फिल्म में निर्देशक की इच्छा के विपरीत कोई भाव संप्रेषित नहीं हो सकता। हर माध्यम की अपनी शक्ति और सीमाएं होती हैं और सृजनशील लोग अपने माध्यम की सीमाओं का विस्तार करते हैं। मसलन गिरीश कर्नाड ने ‘हयवदन’ में मंच पर मौजूद कठपुतलियों की बातचीत के माध्यम से पात्रों के स्वप्न को अभिव्यक्ति दी।

कठपुतलियों की भूमिकाएं दो बालिकाओं ने निभाई थीं। आजकल रंगमंच पर टेक्नोलॉजी की मदद से अनेक प्रयोग हो रहे हैं। सिनेमा की सीमाओं का भी विस्तार हो रहा है। दर्शक की कल्पनाशक्ति और रस ग्रहण करने का माद्दा भी माध्यमों का सीमा विस्तार करता है।

अंग्रेजी भाषा में बनी अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘द लास्ट लीयर’ में रंगमंच और सिनेमा के द्वंद्व को लेकर फिल्म रची गई थी। रंगमंच के नशे में चूर नायक सिनेमा को उससे छोटा समझता है और फिल्म का निर्देशक सिनेमा के नशे में गाफिल है। दरअसल यह द्वंद्व दोनों के नशों का है, माध्यमों का नहीं।

मराठी भाषा में नाटकों पर अनेक फिल्में बनी हैं। 1971 में विजय तेंदुलकर के नाटक पर ‘शांतता! कोर्ट चालू आहे’ बनी थी। गिरीश कर्नाड ने संस्कृत के ‘चारुदत्त’ और ‘मृच्छकटिकम’ को मिलाकर शशि कपूर के लिए ‘उत्सव’ नामक फिल्म बनाई थी, जिसमें लक्ष्मी-प्यारे ने अत्यंत मधुर संगीत दिया था। पश्चिम में ऑपेरा से प्रेरित ‘साउंड ऑफ म्यूजिक’ बनी थी, जिसे गुलजार ने हिंदी में ‘परिचय’ के नाम से बनाया था।

फिल्म ‘माय फेयर लेडी’ के आधार पर अमित खन्ना ने देवआनंद और टीना मुनीम को लेकर ‘मनपसंद’ बनाई थी, जिसमें राजेश रोशन ने अमित खन्ना के प्यारे गीतों की मधुर धुनें तैयारी की थीं। हरिकृष्ण प्रेमी के ‘रक्षा बंधन’ पर ‘चित्तौड़ विजय’ नामक फिल्म रची गई थी। शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित फिल्में सभी देशों में बार-बार बनाई गई हैं। यह सिलसिला हमेशा जारी रहेगा। हालांकि सफल फिल्मों के आधार पर नाटक नहीं रचे गए हैं, परंतु इस संभावना को निरस्त नहीं किया जा सकता(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,13.11.2010)।

Friday, November 12, 2010

कॉपीराइट उल्लंघन के खिलाफ अदालत जाएंगे अमिताभ

बॉलीवुड महानायक अमिताभ बच्चन लगातार हो रहे कॉपीराइट उल्लंघन और उत्पादों के प्रचार के लिए उनके नाम के अवैध इस्तेमाल के चलते गुस्से में हैं।

अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर लिखा है, "मैंने वकीलों से बात की है और हम अदालत जाएंगे। जब लोग ई-मेल के जरिए अपना व्यापार चलाते हैं तब वे ऐसा करते हैं। जब तक उन्हें इसका सबक नहीं सिखाया जाएगा तब तक वे सही रास्ते पर नहीं आएंगे।"

अमिताभ ने लिखा है, "सुबह से अब तक कॉपीराइट उल्लंघन के कई मामले आ चुके हैं।"

उन्होंने बताया है कि किस तरह एक कम्पनी 'लक्ष्मी फूड्स' विज्ञापन में उनके रिएलिटी शो 'कौन बनेगा करोड़पति' की नकल करते हुए बासमति चावल बेच रही है।

अमिताभ के मुताबिक इस विज्ञापन में केबीसी जैसा ही सेट तैयार किया गया है और उत्पाद बेचने के लिए उनकी आवाज की नकल की गई है जो कि अनैतिक और कानूनी तौर पर गलत है।

दूसरा कॉपीराइट उल्लंघन मोबाइल व टेलीफोन कम्पनी एयरटेल ने किया है। अमिताभ के मुताबिक एयरटेल के एक विज्ञापन में उनसे बात करने का अवसर दिए जाने की बात कही जा रही है जबकि उनका कम्पनी के साथ ऐसा कोई अनुबंध नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि कम्पनी ने इसे एक गलती बताया है लेकिन उसे इसके लिए माफ नहीं किया जा सकता(भास्कर डॉटकॉम,12.11.2010)।

चार साल में 136 अरब रुपए का हो जाएगा भारतीय फिल्मोद्योग

भारतीय फिल्मोद्योग वर्ष 2014 तक बढ़कर 136.7 अरब रुपए का हो जाएगा। इससे उत्साहित सूचना-प्रसारण मंत्रालय गोवा में होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में ‘फिल्म वित्त व्यवस्था’ पर विशेष सत्र आयोजित करने जा रहा है। इसमें देशी-विदेशी फिल्म फाइनेंसरों को भारतीय फिल्म उद्योग में पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही उन्हें भारत में विभिन्न जगहों पर शूटिंग के लिए आमंत्रित किया जाएगा।

यह फिल्म महोत्सव गोवा में 22 नवंबर से 2 दिसंबर के बीच आयोजित होने जा रहा है। मंत्रालय को अगले चार साल में घरेलू फिल्म उद्योग के 9 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। इसके मुताबिक, इसका आकार वर्ष 2009 के 104.4 अरब रुपए के मुकाबले 2014 में 136.7 अरब रुपए तक बढ़ने का अनुमान है।


क्या होगा फायदा :
मंत्रालय का मानना है कि इस पहल से न सिर्फ फिल्म उद्योग में अपराध जगत का पैसा लगने से रोक लगेगी, बल्कि देशभर में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का डिजिटलीकरण संभव होगा, जिससे पायरेसी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। एक अधिकारी के मुताबिक, ‘जब नजदीकी सिनेमा हॉल में डिजिटल फिल्म कम कीमत पर उपलब्ध होगी तो लोग नकली सीडी खरीदने नहीं जाएंगे।’
(संतोष ठाकुर,भास्कर डॉटकॉम,12.11.2010)

Thursday, November 11, 2010

कोई तो जाग रहा है !

पत्रकार और लेखिका मानिनी चटर्जी की किताब ‘डू एंड डाई- द चिटगांव अपराइजिंग 1930-34’ पर आधारित फिल्म ‘खेलें हम जी जान से’ आशुतोष गोवारीकर ने बनाई है। यह फिल्म आशुतोष की ‘लगान’, ‘स्वदेश’ और ‘जोधा अकबर’ की राष्ट्रप्रेम वाली धारा की अगली कड़ी है। क्या आज के बाजार युग में राष्ट्रप्रेम दकियानूसी मान लिया गया है? क्या सद्भाव जगाने वाली फिल्मों का जमाना लद गया है?

क्या भीतर से टूटने की प्रक्रिया में हम अपने इतिहास को भुला देना चाहते हैं? ये सारे सवाल मन में उस समय उठे जब आशुतोष गोवारीकर द्वारा अपनी फिल्म का संगीत जारी करने वाले गरिमामय समारोह में चटर्जी के भाषण पर कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार ऊब गए थे और अभद्र ढंग से तालियां बजा रहे थे। वे बता रही थीं कि किस तरह उन्होंने चिटगांव क्रांति पर शोध किया और उन्हें सबसे अधिक सामग्री अंग्रेजों की लिखी डायरियों से प्राप्त हुई।

उस दौर में चिटगांव में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों ने अपने ही विरुद्ध किए गए विद्रोह का सूक्ष्म ब्योरा लिखा था और वे दस्तावेज आज भी सलामत हैं। अंग्रेजों के पास अद्भुत इतिहास बोध रहा है। मुगलों ने भी अपने दरबार में घटनाओं को दर्ज करने के लिए वेतनभोगी इतिहासकार नियुक्त किए थे। राजाओं और बादशाहों के वेतनभोगी लोग तटस्थ कैसे हो सकते थे? अंग्रेजों ने स्वयं के खिलाफ गई बातों को भी दर्ज किया है। जबलपुर के राजेंद्र चंद्रकांत राय ने भी फिलिप मेडोस टेलर की किताब ‘कंफेशंस ऑफ ए ठग’ का अनुवाद हिंदी में किया है। उन्होंने अपनी किताब ‘फिरंगी ठग’ के लिए सामग्री विलियम स्लीमेन से प्राप्त की।

बहरहाल आशुतोष गोवारीकर की फिल्म का नाम ‘खेलें हम जी जान से’ शायद इसलिए रखा गया है कि चिटगांव क्रांति में 56 किशोरों ने अपने फुटबॉल के मैदान को बचाने के लिए जान की बाजी खेली और अंग्रेजी साम्राज्य को इस घटना ने जड़ से हिला दिया। फुटबॉल मैदान के अंग्रेजों द्वारा किए गए अवैध कब्जे से व्यथित इन किशोरों की शहादत देश के नाम ही मानी जाएगी।

आज प्राय: सुनते हैं कि धर्म के नाम पर आतंकवादी किशोरों के हाथों में हथियार दे रहे हैं और उनके दिलों में अंधी नफरत भर रहे हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि संगठित अपराध भी बच्चों और किशोरों को गुमराह कर रहा है। इसी विषय पर बनी है फिल्म ‘अल्लाह के बंदे’। तीसरी ओर हम देखते हैं कि किशोरों को वीडियो गेम्स का नशा परोसा जा रहा है।

इंटरनेट पर प्रवाहित गटर से भी अश्लीलता उन्हें उपलब्ध है। जब बच्चों और किशोरों के अवचेतन के साथ इतने भयंकर खेल खेले जा रहे हैं, तब एक साहसी फिल्मकार किशोरों द्वारा की गई क्रांति का विवरण प्रस्तुत कर रहा है। 18 अप्रैल 1930 को चिटगांव में घटित सत्यघटना पर आधारित यह फिल्म एक साहसी प्रयास है। आज परिवारों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि टेक्नोलॉजी के घटाटोप में बच्चों और किशोर वर्ग के लिए आदर्श कैसे तय करें।

आज मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है। सत्य को उबाऊ घोषित किया जा रहा है। सत्यमेव जयते संसद से लेकर तमाम छोटे-बड़े दफ्तरों की दीवारों पर जड़ा है और जीवन के रंगों तथा रोशनियों में आकंठ डूबे हुए लोग उसे दीवार के रंग का खलल और बेजान दाग-धब्बा मान रहे हैं। इस माहौल में एक फिल्मकार अब भी जाग रहा है और हम तमाशबीन हैं ठीक उस प्रहरी की तरह जो नींद में ‘जागते रहो’ कहकर सो जाता है(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,11.11.2010)।

Wednesday, November 10, 2010

16वें कोलकाता फिल्मोत्सव का शुभारंभ

प्रसिद्ध कैमरामैन रामानंद सेनगुप्ता ने आज नंदन प्रेक्षागृह में 16 वें कोलकाता फिल्मोत्सव (10 से 17 नवंबर) का दीप प्रज्जवलित कर शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि फिल्मोत्सव से नयी पीढ़ी के निर्देशकों का मनोबल बढ़ता है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह नये निर्देशकों द्वारा निर्मित फिल्मों को निगम के अधीन सिनेमाघरों में दिखाने की व्यवस्था करे। श्री सेनगुप्ता ने आज की बांग्ला फिल्मों पर चिंता जाहिर की, और कहा कि पहले हिन्दी व दक्षिण भारतीय फिल्में बांग्ला से प्रभावित होती थीं लेकिन आज बांग्ला फिल्में ही नकल की शिकार हो गयी हैं। जाने-माने फिल्मकार तरुण मजूमदार ने कहा कि आज दो बड़ी खुशी एक साथ मनाने का मौका है। पहला यह है कि नंदन के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं और दूसरा 16 वें फिल्मोत्सव का शुभारंभ हो रहा है। हमें नंदन को विकार से बचाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। मशहूर फिल्मकार मृणाल सेन ने कहा कि फिल्मोत्सव से हम कुछ ग्रहण करें, क्योंकि यह हमारे लिए उत्सव है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा कि नयी पीढ़ी के निर्देशकों को आगे आना चाहिए। देश-दुनिया की जितनी भी विचारधारा हैं, हमें सबका सम्मान करना चाहिए। हमारी कोशिश रहती है कि हम अधिक से अधिक फिल्म दिखायें लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। उन्होंने कहा कि इस बार जापानी फिल्मकार कुरुसोवा, कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की कृतियों पर आधारित फिल्म व सत्यजीत राय की डेक्यूमेंट्री सिक्किम आकर्षण के केन्द्र में है। स्वागत भाषण प्रसिद्ध अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने किया। समारोह में सूचना व संस्कृति राज्यमंत्री अंजन बेरा, मुख्य सचिव समर घोष व नंदन के वरिष्ठ पदाधिकारी नीलांजन चट्टोपाध्याय व अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे(दैनिक जागरण संवाददाता,कोलकाता,10.11.2010)।

Tuesday, November 9, 2010

खेलें हम जी-जान सेःगुमनाम लड़ाकों की जोशीली दास्तां

आशुतोष गोवारिकर को अपनी पहली फिल्म बनाने से लेकर पहली हिट फिल्म "लगान" तक के सफर में आठ साल लगे । लगता संघर्ष के इस दौर ने आशुतोष को सिनेमा में कहानी की अहमियत का पाठ कुछ ढंग से पढ़ा दिया है । यही वजह है कि अपनी नई फिल्म "खेलें हम जी जान से" के संगीत प्रर्दशन समारोह में फिल्म के लेखक को विशेष अहमियत देकर उन्होंने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट कर दी । चर्चित पत्रकार मानिनी चटर्जी को मंच पर खास अहमितय देकर आशुतोष ने यह अनोखा काम किया और हिंदी सिनेमा को यह संदेश दिया कि फिल्में वही चलेंगी जिनकी कहानी में दम होगा । सितारों के बूते तिजोरियां भरते रहे निर्माताओं के लिए यह एक ऐसे निर्देशक का संदेश है जिसकी फिल्में ऑस्कर की दहलीज तक पहुंचती रही हैं । कहा जा सकता है कि "लगान", "स्वदेस" और "जोधा अकबर" को जिस तरह पूरी दुनिया में हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने चाहा और सराहा उसी ने आशुतोष को भी यह हौसला जुटाने की हिम्मत दी ।

आशुतोष की तीन दिसंबर को रिलीज होने जा रही इस फिल्म से इतिहास के पन्नों को नए सिरे से खंगालने की उनकी कोशिशों की अगली कड़ी है । मानिनी चटर्जी के उपन्यास डू एंड डाइ - द चिटगॉङ्ग अपराइजिंग १९३० पर बनी इस फिल्म में चटगांव के एक अध्यापक के उस जीवट की कहानी है जिसने ब्रितानी सरकार को पूर्वी भारत में हिला कर रख दिया था । मानिनी कहती हैं, "हमने बचपन से लेकर अब तक ज्यादातर वही इतिहास पढ़ा है जिसे एक खास नजरिए से लिखा गया । हम गांधी और नेहरू के बारे में तो बहुत सारी बातें जानते हैं लेकिन उन लोगों के नाम तक नहीं जानते जिन्होंने बिना किसी परवाह के अपने-अपने इलाकों से अंग्रेजों के पैर उखाड़ दिए । चटगांव विद्रोह की कहानी भी इतिहास की सरकारी किताबों में बस एक या दो लाइनों में सिमट कर रह जाती है । यहां के सूर्य सेन नामक अध्यापक ने कुछ स्कूली बच्चों और कुछ युवाओं के साथ मिलकर १८ अप्रैल, १९३० की रात जो कुछ किया, उसे समझने के लिए इन किशोरों और युवाओं की मानसिक मजबूती और जज्बे को समझना होगा । पहली बार जब मैंने इन सबके बारे में विस्तार से जाना तो हतप्रभ रह गई । आशुतोष गोवारिकर भी इतिहास के इस अनकहे हिस्से के बारे में जानकर कई रातों तक सो नहीं पाए । आशुतोष बताते हैं, "मानिनी चटर्जी की किताब जब मैंने पहली बार पढ़ी तो मुझे लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इतने बड़े बलिदान का जिक्र इतिहास की मौजूदा किताबों में कहीं न हो ! किताब पढ़ने के बाद जब मैं मानिनी जी से मिला तब मुझे एक और आश्चर्यजनक हकीकत पता चली कि चटगांव बगावत की एक अहम किरदार कल्पना दत्त के परिवार से ही मानिनी खुद भी जुड़ी हैं और यह बात उन्हें इस विषय पर शोध के दौरान ही पता चली । "खेलें हम जी जान से" फिल्म आशुतोष के लिए कई मायनों में "लगान" और "जोधा अकबर" से भी ज्यादा कठिन रही । वह कहते हैं, "लगान तो खैर पूरी तरह काल्पनिक कथा थी और "जोधा अकबर" के बारे में भी लोग उतना ही जानते रहे हैं, जितना के आसिफ की फिल्म में बताया या दिखाया जा चुका है लेकिन, "खेलें हम जी जान से" एक ऐसी कहानी है जो वाकई घटी है लेकिन जिसके बारे में ज्यादा लोगों को पता नही है । फिल्म मानिनी के उपन्यास पर ही बनी है पर कहीं-कहीं हमने "सिनेमाई छूट" ली है ।" आशुतोष की इस सिनेमाई छूट की बात पर मानिनी मुस्कुरा भर देती हैं ।

मशहूर कथा-पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने एक बार फिर आशुतोष की फिल्म के लिए गीत लिखे हैं । आशुतोष बताते हैं, "जावेद जी ने इस फिल्म के लिए वंदे मारतम्‌ को फिर से लिखा है । मेरा मतलब उन्होंने इस राष्ट्रगीत के संस्कृत के शब्दों को हिंदी की सुरमाला में पिरोया है ।" खुद जावेद जी को अपने इस गीत पर नाज है, यह उनकी आंखों की चमक से साफ पता चलता है । अपने प्रगतिशील विचारों को लेकर प्रायः कट्टरपंथियों के निशाने पर रहने वाले जावेद हो सकता है वंदे मातरम्‌ के हिंदी संस्करण के लिए भी फतवों के फंदे में फंस जाएं लेकिन वह इससे बेपरवाह दिखते हैं । जावेद कहते हैं, "हिंदी सिनेमा के मौजूदा दौर में दो तरह के निर्देशक कम ही हैं । एक तो वह जिनमें कहानी कहने की संवेदनशीलता है और दूसरे वह जो स्वस्थ मनोरंजन वाली फिल्में बनाते हैं । आशुतोष में ये दोनों खूबियां मुझे नजर आती हैं । मेरा और आशुतोष का साथ बरसों पुराना है और मुझे खुशी है कि बतौर निर्देशक वह लगातार परिपक्व होते जा रहे हैं ।"

"खेलें हम जी जान से" का संगीत रग-रग में जोश भरता है । आशुतोष की ही फिल्म ह्वाट्स योर राशि से हिंदी सिनेमा में बतौर संगीतकार बोहनी करने वाले सोहैल सेन को आशुतोष ने इस फ़िल्म में बड़ा मौक़ा दिया है। सोहैल के मुताबिक,"आशुतोष जैसे निर्देशक की टीम में शामिल होने के बाद आपकी आधी परेशानी तो यूं ही ख़त्म हो जाती है। वह ऐसे कप्तान हैं जिसके नज़रिए को एक बार समझने के बाद,टीम का हर सदस्य पूरी बेफिक्री के साथ अपने काम को अंजाम दे सकता है।" फिल्म में सूर्य सेन का किरदार अभिषेक बच्चन कर रहे हैं और कल्पना दत्त बनी हैं दीपिका पादुकोण। दीपिका अपने आप को खुशकिस्मत मानती हैं कि उन्हें अपने करियर के शुरुआती दौर में ही इतना चुनौती भरा किरदार करने का मौका मिला। वे कहती हैं,"कल्पना हिंदुस्तानी औरत का वह रूप है जिसके बारे में इतिहास में भी चर्चा कम ही होती है। ऐसा नहीं कि आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की भागीदारी किसी तौर पर कम रही है लेकिन इतिहास लिखने वालों ने शायद इस ओर गौर करना मुनासिब ही नहीं समझा।"
बता दें कि अखंड भारत का हिस्सा रहे चटगांव में स्कूली अध्यापक सूर्य सेन के नेतृत्व में १९३० में हुई बगावत को सिनेमा के परदे पर उतारने की एक और कोशिश निर्देशक देवव्रत भी कर रहे हैं । इस फिल्म में सूर्य सेन का किरदार मनोज बाजपेयी ने निभाया है । अभिषेक जहां सूर्य सेन के किरदार का सबसे मुश्किल हिस्सा इस बारे में कहीं कोई संदर्भ न मिलने को मानते हैं, वहीं मनोज सूर्य सेन के किरदार से बेहद प्रभावित हैं । वैसे भी मनोज के गृह प्रदेश बिहार और बंगाल की दूरी ज्यादा नहीं है, लिहाजा सूर्य सेन का किरदार निभाते हुए मनोज ज्यादा सहज रहे(पंकज शुक्ल,संडे नई दुनिया,7-13 नवम्बर,2010) ।