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Saturday, November 6, 2010

अपनी आवाज पर कॉपीराइट चाहते हैं बिग बी

बॉलिवुड के महानायक अमिताभ बच्चन अपनी आवाज को कॉपीराइट कानून के अतंर्गत सुरक्षित करवाना चाहते हैं ताकि लोग मनमाने ढंग से उसकी नकल न कर सकें। उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा है कि इस बारे में वह काफी पहले से सोच रहे थे और अब इसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।

बिग बी ने लिखा है कि पिछले दिनों यह जानकर वह हैरत में पड़ गए कि किसी गुटका कंपनी ने अपने विज्ञापन में उनकी आवाज की नकल का इस्तेमाल किया है। उन्होंने बताया कि उनके ब्लॉग पर ही किसी पाठक ने उन्हें यह जानकारी दी थी। बिग बी ने लिखा है, ' यह अनैतिक और गलत है। इससे मेरी छवि भी खराब होती है। '

गौरतलब है कि अमिताभ बच्चन तंबाकू उत्पादों का विज्ञापन नहीं करते। उन्होंने लिखा है, ' सिगरेट और तंबाकू से दूर रहनेवाले और इनके उत्पादों को प्रचारित न करने वाले व्यक्ति के लिए यह बात सचमुच घिनौनी है कि कोई देश के कानून और नैतिकता के नियमों की इस तरह धज्जियां उड़ा रहा है। '(नवभारत टाइम्स,मुंबई,6.11.2010)

Thursday, November 4, 2010

सिनेमा का जादू और 'गुज़ारिश'

संजय लीला भंसाली की ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत ‘गुजारिश’ फिल्म में मोनिकांगना दत्ता नामक असमिया मूल की मॉडल कन्या की छोटी, परंतु महत्वपूर्ण भूमिका है। खबर है कि कथा में थोड़ा-बहुत रस क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘द प्रेस्टीज’ से भी लिया गया है। फिल्म का कथानक दो जादूगरों की मित्रता और दुश्मनी पर है।

जादू की दुनिया में हर करतब के तीन हिस्से होते हैं। पहला दर्शक को वस्तु या परिंदा दिखाना, दूसरा उसे गायब करना और तीसरा उसे पुन: प्रकट करना। इस तीसरे हिस्से को जादूगर की प्रेस्टीज अर्थात सम्मान कहा जाता है। फिल्म में शागिर्द जादूगर की चूक से पानी में हथकड़ी नहीं खुल पाने के कारण उस्ताद जादूगर की पत्नी की मृत्यु हो जाती है। इसका बदला उस्ताद कुछ इस तरह लेता है कि अपने हमशक्ल भाई की हत्या का आरोप शागिर्द पर लगाकर उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा देता है।

यह अनुमान लगा सकते हैं कि ऋतिक की प्रेयसी की भूमिका मोनिकांगना कर रही हैं। ऋतिक के अपाहिज होने के बाद ऐश्वर्या उनकी नर्स बनती हैं और उनसे प्रेम करने लगती हैं। हालांकि इस पात्र को भंसाली ने विवाहित दिखाकर प्रेम त्रिकोण की शक्ल दी है और क्लाइमैक्स अपाहिज की मृत्यु कामना की कोर्ट सुनवाई के साथ है। भारत में असहनीय दर्द से छुटकारे के लिए मृत्यु को चुनने का अधिकार नहीं है। यह मर्सी किलिंग या यूथेनेशिया कुछ देशों में कानूनी तौर पर जायज है। भंसाली महोदय ने इस अजब कथा को पुर्तगाल शासित गोवा की पृष्ठभूमि पर रचा है। बहरहाल उन्होंने इस बार कालखंड और स्थान निश्चित कर दिया है, वरना उनकी विगत फिल्म ‘सावरिया’ में सबकुछ अनकहा और अपरिभाषित था।

अपनी फिल्मों को ऑपेरा नुमा शैली में रचने वाले भंसाली की ‘देवदास’ फिल्म में गीत-नृत्य की प्रस्तुति से प्रभावित पेरिस की एक कंपनी ने उनसे फ्रेंच भाषा में एक ऑपेरा का निर्देशन करवाया था। शायद अपने फ्रांस में बिताए दिनों की जुगाली की खातिर ही उन्होंने ‘गुजारिश’ में भी ऐश्वर्या को कुछ संवाद फ्रेंच भाषा में दिए हैं। इस बार उन्होंने अपना संगीत भी खुद ही रचा है।

संजय लीला भंसाली की सृजन प्रक्रिया में संभवत: यह पहलू नगण्य है कि दर्शक की प्रतिक्रिया क्या होगी। अधिकांश फिल्मकार सारे समय दर्शक की पसंद का अनुमान लगाते रहते हैं और दर्शक की पाचन क्रिया की सीमाओं के आधार पर फिल्म गढ़ते हैं। इस विचार शैली की सफलता का प्रतिशत भी उतना ही कम है, जितना उन फिल्मकारों का जो सृजन के समय दर्शक के बारे में नहीं सोचते। दर्शक और मतदाता का अवचेतन पढ़ना असंभव है।

क्या गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ बनाते समय दर्शक की पसंद का ख्याल रखा होगा? फिल्म का सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर है कि क्या दर्शक पात्रों से भावनात्मक लय स्थापित करता है। इस संबंध तथा संवाद का कोई फॉमरूला नहीं है। अत: भंसाली का तरीका गलत नहीं है। जादूगर के जीवन पर फिल्म रोचक विचार है क्योंकि यह माध्यम खुद ही जादू है।

यह जानना रोचक रहेगा कि भारत में कथा फिल्म के जनक धुंडिराज गोविंद फाल्के भी जादू का तमाशा करना जानते थे। उन्होंने कई ट्रिक्स सीखी थीं। इसी के प्रभाव से सिनेमा में ‘ट्रिक फोटोग्राफी’ करने का चलन फैला। बहरहाल ‘गुजारिश’ पर जनता की प्रतिक्रिया 19 नवंबर को ज्ञात होगी(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,3.11.2010)।

बदनाम मुन्नी ने दोगुनी कर दी झंडु बाम की बिक्री

झंडु बाम को ऐसा पीड़ाहारी बाम बताया जाता है, जिसमें जांची-परखी जड़ी-बूटियां होती हैं। हालांकि, हाल के महीनों में जोरदार ढंग से बढ़ी इसकी बिक्री के पीछे ऐसी किसी जड़ी-बूटी का नहीं, बल्कि किसी और चीज का हाथ दिख रहा है। झंडु बाम बनाने वाली कोलकाता की कंपनी इमामी लिमिटेड ने सितंबर की शुरुआत में फिल्म दबंग के प्रोड्यूसर अरबाज खान पर मुकदमा कर दिया। इसकी वजह थी, फिल्म के एक हिट गाने में झंडु बाम शब्द का इस्तेमाल। विवाद रंग लाया।

सलमान खान की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म से जुड़े विवाद के बीच इमामी जुलाई-सितंबर तिमाही में झंडु बाम की दोगुनी बिक्री की गवाह बनी। इस दौरान बाम की बिक्री करीब 35 फीसदी बढ़ी। इमामी के लिए झंडु अब सबसे अधिक बिकने वाला ब्रांड बन गया है। कंपनी की आमदनी में उसकी हिस्सेदारी अब करीब 23 फीसदी है, जबकि पहले यह आंकड़ा 17-18 फीसदी हुआ करता था। झंडु बाम ने नवरत्न तेल ब्रांड को पीछे छोड़ दिया है, जो आमतौर पर करीब 20 फीसदी की हिस्सेदारी देता है। इसी उत्साह का फायदा उठाने के लिए इमामी ने झंडु बाम के दाम तक नहीं बढ़ाए, जबकि इसमें इस्तेमाल होने वाले अहम कच्चा माल मेंथॉल की कीमतें बीते साल भर में बढ़कर दोगुनी हो गई हैं।

इमामी ने सोमवार को दूसरी तिमाही में अब तक के सबसे बढि़या आंकड़े पेश किए, जिससे कंपनी का पहली छमाही का प्रदर्शन सुधर गया और अब उसे लगता है कि आगे इसे जारी रखना आसान नहीं होगा। इमामी लिमिटेड के निदेशक मोहन गोयनका ने ईटी से कहा, 'दूसरी तिमाही के प्रदर्शन का मुख्य आधार झंडु बाम रहा है, जिसने इमामी को पहली छमाही में अब तक के सबसे बढि़या आंकडे़ दर्ज करने में मदद दी।'

झंडु बाम-दबंग विवाद सितंबर की शुरुआत में सामने आया। हालांकि, यह विवाद बाद में अदालत के बाहर निपटा और सितंबर के अंत में नया विज्ञापन प्रसारित होना शुरू हुआ। नए कमर्शियल में दबंग के गाने की क्लिपिंग थी। इमामी के निदेशक आदित्य अग्रवाल ने कहा, 'हम अब भी वही कमर्शियल प्रसारित कर रहे हैं, जो काफी लोकप्रिय हो गया है।' अग्रवाल ने बताया कि दबंग में मुन्नी का किरदार अदा करने वाली मलाइका अरोड़ा खान को झंडु बाम का ब्रांड एम्बेसेडर बनाने की बात हो रही है।

उन्होंने कहा, 'यह सच है कि विवाद से झंडु बाम की बिक्री को काफी मदद मिली, क्योंकि इसने ब्रांड को याद रखने में अहम किरदार अदा किया। इस महीने भी झंडु बाम की बिक्री मजबूत रही है और देश के सभी हिस्सों से आने वाले आंकडे़ यही कह रहे हैं। लेकिन, दूसरी तिमाही में ब्रांड के साथ हमने इससे अलग भी काफी कुछ किया, जिसने अपनी भूमिका निभाई है। इसकी नई पैकेजिंग इसमें शामिल है।'

ब्रांड कंसल्टेंट हरीश बिजूर को लगता है कि इमामी के लिए इस गाने ने काफी बड़ा किरदार अदा किया। बिजूर ने कहा, 'काफी हद तक यह दबंग का असर है। खास तौर से ग्रामीण इलाकों के बाजारों में इससे काफी मदद मिली है। यह गाना कई तरह से इमामी के लिए जिंगल बन गया है। इससे कंपनी को काफी फायदा हुआ है।' झंडु की भारतीय बाम बाजार में 43 फीसदी हिस्सेदारी है(ऋतंकर मुखर्जी,इकनॉमिक टाइम्स,कोलकाता,2.11.2010)।

Tuesday, November 2, 2010

बीबीसी और रिलायंस बिग के बीच फिल्म निर्माण समझौता

बीबीसी अर्थ और अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के रिलायंस बिग एंटरटेनमेंट ने आज अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के लिए तीन फिल्में बनाने के लिए एक समझौते की घोषणा की।
दोनों कंपनियों की ओर से जारी किए गए एक वक्तव्य में कहा गया है कि तीनों फिल्मों 'वाकिंग विद डायनासोर्स 3डी', 'अफ्रीका 3डी' और 'लाइफ' का वितरण रिलायंस एंटरटेनमेंट की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहायक कंपनी आईएम ग्लोबल करेगी। बीबीसी व‌र्ल्डवाइड के प्रबंध निदेशक मार्कस आर्थर का कहना है कि रिलायंस बिग एंटरटेनमेंट के साथ समझौता करने के बाद बीबीसी अर्थ की 3डी फीचर फिल्में बनाने की महत्वाकांक्षा पूरी हो सकेगी।
'वाकिंग विद डायनासोर्स 3डी' का निर्माण 6.5 करोड़ डॉलर की लागत से होगा। लास एंजेलिस के पीयर डी लेस्पिनोइस इसका निर्देशन करेगे। 'अफ्रीका 3डी' का निर्माण 2.5 करोड़ डॉलर की लागत से होगा(दैनिक जागरण)।

Sunday, October 31, 2010

आमिर, शाहरुख और यशराज

यशराज फिल्म्स ने शाहरुख खान के साथ अनेक फिल्में करते हुए भी अपनी तटस्थता बनाए रखी है। इस बैनर ने ऋतिक रोशन, आमिर खान तथा सैफ अली खान के साथ भी फिल्में बनाई हैं। उन्होंने सलमान खान को लेने के प्रयास भी किए हैं। फिल्म ‘चक दे इंडिया’ पहले सलमान को ही दी गई थी। ऐसा उद्योग में पहली बार हो रहा है कि पिता यश चोपड़ा और पुत्र आदित्य चोपड़ा निरंतर फिल्में बना रहे हैं। राज कपूर और रणधीर कपूर ने भी ‘मेरा नाम जोकर’, ‘कल आज और कल’, ‘बॉबी’ और ‘धरम करम’ एक ही दशक में बनाई थीं। हालांकि रणधीर कपूर ने अपने पिता की मृत्यु के बाद केवल ‘हिना’ बनाई।

खबर है कि यश चोपड़ा और आदित्य आमिर खान और शाहरुख खान के साथ दो अलग-अलग फिल्में अगले वर्ष शुरू करने जा रहे हैं। इसके लिए आमिर खान ने अपनी स्वीकृति दे दी है। इस कंपनी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि आदित्य बहुत अच्छे लेखक हैं। उनकी लिखी हुई ‘वीर जारा’ अच्छी फिल्म थी।

इसकी अंतिम रील में शाहरुख द्वारा अदालत में बोला गया लंबा संवाद तो कमाल का लिखा था। इसी कंपनी से फूटी एक शाखा करण जौहर हैं, परंतु उन्होंने तटस्थता कायम नहीं रखी। करण ने शाहरुख खान को अपने ईश्वर की तरह ही बार-बार पूजा है। करण को खूब बतियाने का शौक है, जबकि आदित्य चोपड़ा कभी कुछ बोलते ही नहीं और उनकी यह खामोशी अत्यंत गरिमापूर्ण है। करण जौहर निरंतर उजागर होते रहते हैं और कुछ बयां भी नहीं होता।

आमिर खान ने अपना फैसला पूरी तरह इस बात पर किया है कि उन्हें पटकथा पसंद है। वह फरहान अख्तर जैसे नए फिल्मकार के साथ ‘दिल चाहता है’ केवल पटकथा के आधार पर कर चुके हैं। उन्हें पटकथा पसंद आने का यह अर्थ भी है कि अब उसमें अपना योगदान दिया जा सकता है। इस मामले में वह दिलीप कुमार का अनुकरण करते हैं। विगत साठ वर्षो में संजीव कुमार को छोड़कर सारे अभिनेता दिलीप कुमार से प्रभावित रहे हैं।

यश चोपड़ा एकमात्र फिल्मकार हैं जो उम्रदराज होने के बावजूद सक्रिय हैं और युवा पीढ़ी को समझते हैं। प्राय: बुढ़ाते हुए फिल्मकार युवा पीढ़ी को अनदेखा करते हैं। सिनेमा का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग हमेशा युवा लोगों का ही रहा है। आदित्य चोपड़ा ने अनेक युवा निर्देशकों को अवसर दिए हैं, परंतु उनकी अपेक्षाओं पर कोई खरा नहीं उतरा। यशराज फिल्म्स संगीत व्यापार और विदेश वितरण क्षेत्र में सफलता अर्जित नहीं कर पाया और टेलीविजन के क्षेत्र में भी वे विफल रहे हैं। यह आशा की जा सकती है कि टेलीविजन क्षेत्र में अपनी असफलता से सबक लेकर वे दूसरी पारी अवश्य खेलेंगे।

इस कंपनी ने कभी नए सितारे गढ़ने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि उन्हें सारे स्थापित सितारे आसानी से उपलब्ध हैं। उदय चोपड़ा को प्रस्तुत करना पारिवारिक काम था, परंतु उद्योग के लिए नए सितारे गढ़ना अलग किस्म का काम है। यशराज कंपनी की निगाह हमेशा बॉक्स ऑफिस पर रहती है जो व्यावहारिक है, परंतु सिनेमा उसके परे भी है और उसकी कोशिश कभी-कभी तो की जानी चाहिए(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,30.10.2010)।

Friday, October 29, 2010

प्रचार के लिए ...........

विगत कुछ समय से बॉलीवुड सितारे अपनी फिल्मों के प्रदर्शन पूर्व प्रचार के लिए टीवी कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। अगर फिल्म के प्रचार का मामला नहीं हो तो इस तरह के कार्यक्रम में जाने के लिए यही सितारे मोटी रकम मांगते हैं। कई बार प्रचार के लिए किए गए कार्यक्रम का प्रसारण फिल्म के असफल होने के बाद होता है। इससे बेहद हास्यास्पद स्थिति बनती है।

इस तरह के प्रकरणों में फिल्म उद्योग के लोगों के व्यक्तिगत झगड़े और पूर्वाग्रह भी बाधा खड़ी करते हैं। खबर है कि ऐश्वर्या राय बच्चन अपनी अभिनीत फिल्म ‘एक्शन रीप्ले’ के प्रचार के सिलसिले में ‘केबीसी 4’ में शामिल नहीं हुईं। कारण बताया जा रहा है कि इसमें जीती हुई राशि सलमान खान की ‘बीइंग ह्यूमन’ फॉउंडेशन को दिए जाने का फैसला अक्षय कुमार और निर्माता विपुल शाह पहले ही कर चुके थे।

गौरतलब है कि शो के संचालक अमिताभ बच्चन ने इस पर कोई एतराज नहीं जताकर अपनी गरिमा बनाए रखी। यह भी संभव है कि बहू होने के नाते ऐश्वर्या नियमानुसार कार्यक्रम में नहीं आ सकती हों। यह भी खबर है कि कभी अमिताभ बच्चन के अति प्रचारित ‘छोटे भैया’ अमर सिंह सलमान खान संचालित ‘बिग बॉस 4’ में आना चाहते हैं।

इसी तरह संजय लीला भंसाली को उनकी पहली दो फिल्मों में सहायता करने वाले सलमान खान को ‘बिग बॉस’ में अपनी फिल्म ‘गुजारिश’ का प्रचार करने में नायिका ऐश्वर्या राय के होने से संकोच होगा। गुजरा हुआ वक्त गुजरकर भी नहीं गुजरता। संबंध टूटने के बाद भी सामाजिक-सार्वजनिक मुलाकातें की जा सकती हैं। मौजूदा संबंध मजबूत हों तो विगत के गलियारों की ध्वनियां कुछ नहीं कर सकतीं। शायद मीडिया के अनगिनत दोहराव और मनमानी व्याख्या के खौफ से लोग मिलने से कतराते हैं।

बाजार और विज्ञापन के इस युग में किताबों के विमोचन में भी फिल्म कलाकारों या सुप्रसिद्ध लोगों को बुलाया जाता है। दुकानों के उद्घाटन के लिए भी कोई न कोई तमाशा रचना पड़ता है, क्योंकि इस युग में प्रचार का मुर्गा बांग नहीं दे तो सूरज भी शायद नहीं निकले। कुछ ऐसे प्रबल भ्रम रचे जा चुके हैं। पहले सारे उद्घाटन नेताओं से कराए जाते थे, परंतु अब आम जनता में उनकी साख इतनी गिर गई है कि फिल्म वालों को ही बुलाया जाता है।

इतना ही नहीं चुनाव प्रचार में भी भीड़ जुटाने के लिए अभिनेताओं को बुलाया जाता है। धनाढ्य परिवार अपने घर की शादियों और बच्चों के मुंडन समारोह में भी धन देकर सितारों को बुलाते हैं। ये सारे संकेत केवल सांस्कृतिक शून्य को ही रेखांकित कर रहे हैं।

आज के सफल कलाकारों के लिए आय के नए स्रोत खुलते जा रहे हैं और जिस व्यक्ति को जो काम आता है, उससे बिल्कुल अलग काम के लिए उसे ज्यादा धन मिल रहा है। योग्यता और पारिश्रमिक के समीकरण बदल गए हैं। आज महज काम में प्रवीणता या मेहनत से बात नहीं बनती, कुछ तमाशा भी करना पड़ता है और अब अवाम भी अनुभवी तमाशबीन हो चुका है(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,29.10.2010)।

Thursday, October 28, 2010

क्यों लोकप्रिय है वैम्पायर सिनेमा?

हॉलीवुड के प्रारंभिक दौर में ही भूत-प्रेत की हॉरर फिल्में बनने लगी थीं। ‘द कैबिनेट ऑफ डॉ. कैलिगेरी’ हॉलीवुड के पहले दशक में बनी थी। आजकल एडवर्ड कलन की ‘ट्विलाइट’ श्रंखला पर वैम्पायर फिल्में बन रही हैं, जो ड्रैकुला फिल्मों से इस मायने में अलग हैं कि अब उनकी लोकेशन कब्रिस्तान और सुनसान हवेली नहीं होकर महानगर हैं। नायक खौफनाक नहीं वरन युवा, सुंदर, रहस्यमय और कवियों की तरह व्यवहार करने वाला है। कुछ फिल्में तो ऐसी भी रची गई हैं कि कमसिन नायिका को ज्ञात है कि उसका प्रेमी आम व्यक्ति नहीं वरन एक प्यासी आत्मा है।

वह यह भी जानती है कि उसका पहला सहवास उसकी मृत्यु का कारण भी बन जाएगा, परंतु वह पीछे नहीं हटती। कहा जाता है कि बिच्छू भी सहवास के पहले नृत्य करते हैं और सहवास के बाद एक की मृत्यु हो जाती है। रामगोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म ‘रंगीला’ में जैकी श्रॉफ और उर्मिला मातोंडकर पर बिच्छू शैली का नृत्य प्रस्तुत किया था। सहवास के क्षणों और मृत्यु में शायद यह समानता है कि समय और स्थान के बंधन से मुक्ति का भाव दोनों में होता है- एक में क्षणिक और दूसरे में चिरंतन।

बहरहाल, विचारणीय यह है कि इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में वैम्पायर फिल्में इतनी लोकप्रिय क्यों हैं? भारत की भूत-प्रेत कहानियों में इस तरह के चरित्र नहीं हैं। ये सारी कल्पनाएं पूर्वी यूरोप के देशों की हैं, परंतु अधिकांश फिल्में अमेरिका में बनती हैं जहां पूर्वी यूरोप से आए लोगों को बसे हुए एक सदी से ऊपर का वक्त हो गया है। उनकी मौजूदा पीढ़ी को अपने पूर्वजों के मूल देश की भी कोई यादें नहीं हैं। दरअसल भूत-प्रेत कहानियों का लेखन अमेरिका में लंबे समय से चला आ रहा है और इन किताबों को पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है।

इंदौर के प्रसिद्ध वैद्य श्री रामनारायण शास्त्री के सुपुत्र महेश शास्त्री के पास इस तरह की किताबों का विरल खजाना है और उनसे लेकर कुछ किताबें मैंने भी पढ़ी हैं।
इस विधा के शौकीन विभिन्न क्षेत्रों में रहे हैं, मसलन महान पाश्र्वगायक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी किशोर कुमार के पास हॉरर फिल्मों का खजाना था। अजीब सा लगता है कि दुनिया भर को हंसाने वाले व्यक्ति को हॉरर फिल्में देखना पसंद था। भारत में इस विधा की फिल्में एनए अंसारी अपनी कंपनी ‘बुंदेलखंड फिल्म्स’ के तहत बनाते थे और बाद में रामसे बंधुओं ने इसमें महारत हासिल की। ज्ञातव्य है कि केशु रामसे की मृत्यु विगत दिनों ही हुई है।

बहरहाल, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में ब्लड सीरीज और वैम्पायर श्रंखला अत्यंत लोकप्रिय हैं और इसके कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। दुनिया के तमाम देशों में धरती पर जीवन, ऊपर स्वर्ग और नर्क की कल्पना के साथ दोनों के बीच भटकती हुई अतृप्त आत्माओं का काल्पनिक विवरण चटखारे लेकर सुना और सुनाया जाता रहा है, गोयाकि मरकर भी कुछ लोग इस तरह जीवित रखे जाते हैं। क्या अतृप्त आत्मा की अवधारणा का संबंध इस बात से भी है कि जीवन में कब किसको संतोष और तृप्ति मिलती है? नीरद चौधरी ने अपनी किताब ‘हिंदुइज्म’ में इस आशय की बात की है कि भारत में पुनर्जन्म की अवधारणा के पीछे यह तथ्य छुपा है कि भारतीय लोगों को खाने-पीने और भोग-विलास का इतना मोह है कि वे बार-बार धरती पर लौटना चाहते हैं। यह मसला भी तृप्ति से जुड़ा है।

आज की युवा पीढ़ी सदियों बाद अपनी सैक्सुएलिटी के प्रति बहुत सजग है। यौन विषयों को कालीन के नीचे या लौह कपाटों के भीतर रखने का दौर लगभग खत्म हो चुका है। वैम्पायर कथाओं का संबंध इससे है। दरअसल यौन इच्छाओं की कल्पनाएं उसके यथार्थ से बहुत अधिक विराट हैं और पोर्नोग्राफी (अश्लील कथाएं) का अरबों का व्यवसाय इसी विशाल अंतर पर टिका है।

दूसरा तथ्य यह है कि पूंजीवादी बाजार मनुष्य की इच्छाओं के असीमित विस्तार पर बहुत निर्भर करता है। असीमित इच्छाओं के घोड़े पर सवार मनुष्य वहां पहुंचना चाहता है, जहां से उसको अपनी खबर भी नहीं मिले। वैम्पायर सिनेमा बाजार की ही एक भुजा है और कमसिन उम्र बाजार की बांहों में आलिंगनबद्ध है(जयप्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,27.10.2010)।

रिश्तों का रसायन और प्रयोगशाला

करण जौहर की घोर असफल फिल्म ‘वी आर फैमिली’ में करीना कपूर अपने पति की पहली पत्नी से उत्पन्न संतानों से दोस्ताना विकसित करती हैं। यथार्थ जीवन में भी वह सैफ-अमृता के बच्चों से दोस्ताना निभाती हैं। आजकल फिल्म उद्योग में इस तरह के बहुत से रिश्ते हैं। शबाना आजमी जावेद-हनी के बच्चों फरहान और जोया से बहुत प्यार करती हैं। अरसा पहले क्या जावेद अख्तर ने भी अपने पिता की दूसरी पत्नी से उत्पन्न संतानों से दोस्ताना निभाया था या आज उनके संबंध कैसे हैं, यह कोई नहीं जानता।

किरण राव भी आमिर-रीना के बच्चों से स्नेह का व्यवहार रखती हैं। श्रीदेवी बोनी कपूर-मोना के पुत्र अजरुन से अच्छा व्यवहार रखती हैं, परंतु अजरुन की बहन शायद उनसे दूरी बनाए हुए हैं। हेमा मालिनी के संबंध सनी और बॉबी देओल से सामान्य हैं, परंतु सनी-बॉबी हेमा की पुत्रियों के साथ कभी नहीं देखे गए। हालांकि इसका अर्थ खराब संबंध नहीं हो सकता। नादिरा बब्बर भी राज-स्मिता पाटिल के पुत्र प्रतीक को प्यार करती हैं और उनके बच्चों के आपसी रिश्ते भी मधुर हैं। अनुपम खेर अपनी पत्नी किरण के पुत्र सिकंदर को बहुत ज्यादा स्नेह करते हैं।

अनेक विशेषज्ञों की राय है कि आधुनिक काल में सौतेले रिश्ते कटु नहीं रहे, क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता को उनकी कमजोरियों के साथ स्वीकार करते हैं। जहां रिश्तों में इतनी मिठास है, वहां यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ये सारे प्रकरण अमीर लोगों से जुड़े हैं। क्या किरण राव आमिर-रीना के बच्चों के साथ संबंध बिगाड़कर एक दिन भी आमिर के साथ रह सकती हैं? क्या करीना सैफ-अमृता के बच्चों से बुरे संबंध रखकर भी सैफ के साथ बनी रह सकती हैं? इन सारे प्रकरणों में कोई एक बहुत अधिक धनवान और सफल है, जिसके कारण सौतेलों में सगा सा प्यार नजर आ रहा है। विराट धन और अकल्पनीय सफलता रिश्तों में सीमेंट का काम भी करती है।

मुफलिसी के दौर में सौतेलों और विमाता के संबंध मधुर नहीं रह पाते। इस कालखंड में धन और सफलता रिश्तों के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तन कर रहे हैं। जिस उच्च भावना से युधिष्ठिर ने अपनी विमाता माद्री के बच्चों की रक्षा की, वह आज कहीं नजर नहीं आती। सफलता, प्रसिद्धि और असीमित धन रिश्तों के लिए भी सुविधाजनक प्रयोगशाला बनाते हैं, जिसमें सारे धागे धन से उत्पन्न प्रेम के दूध में नहाए नजर आते हैं। यह स्वाभाविक है कि प्राय: टूटे हुए विवाह के बच्चे अपनी विमाता से मन ही मन नफरत करते हैं और अपने पिता के दोष से उत्पन्न सारी घृणा बेचारी माता पर उतारते हैं।

यह भी अजीब बात है कि जिन बच्चों ने अपने पिता को दूसरा रिश्ता बनाते देखा और विरोध किया है, जवान होकर अपने पिता वाली गलती उन्होंने स्वयं भी की है। तब क्या हम यह मानें कि इस समय का सारा क्रोध सुविधा के छिन जाने के कारण था और युवा होने पर उन्हीं सुविधाओं और धन की शक्ति प्राप्त होते ही उन्होंने भी दूसरी स्त्री पर अधिकार जताया? रिश्तों का रसायन विचित्र है, परंतु रिश्तों की प्रयोगशाला धन का बायप्रोडक्ट है(जय प्रकाश चौकसे,दैनिक भास्कर,28.10.2010)।

होना है औरों से अलग: प्रमोद कुमार

तमाम भोजपुरी एलबम में अपने चुटीले गीतों की वजह से सुर्खियों में आए गीतकार डॉ. प्रमोद कुमार पेशे से प्राध्यापक हैं। गीतकार के रूप में सफलता अर्जित करने के बाद अब वे हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखक भी बन गए हैं। अभी वे हिंदी फिल्म देवी मेरा नाम की पटकथा लिखने में व्यस्त हैं। पिछले दिनों प्रमोद कुमार से बातचीत हुई। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश..
प्राध्यापक, गीतकार और अब पटकथा लेखन। कैसा लगता है?
हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। कॉलेज में शिक्षक हूं और कॉलेज के बाहर गीतकार और कहानीकार। कम लोग जानते होंगे कि मैं गीतकार के साथ-साथ कहानीकार भी हूं। लघुकथाओं का एक संग्रह बात आधी सी प्रकाशित हो चुका है। मैं अपने हर काम से खुश हूं और आशा है कि खुशियां मेरा साथ हमेशा देंगी।

फूहड़पन और अश्लीलता फिल्मों में खूब है?
आज बाजारवाद देश और दुनिया पर हावी है। आज हर चीज का बिकना ही एक मात्र मूल्य है। अब यदि अश्लीलता और फूहड़पन बिक रहा है, तो इसे रोकना मुश्किल है। समाज की रुचि जब बदलेगी, तभी यह रुकेगा, वर्ना नहीं।

देवी मेरा नाम को लेकर आपकी चर्चा है?
मैं इसकी पटकथा और संवाद लिख रहा हूं। यह एक अलग तरह की हिंदी फिल्म साबित होगी। आज हर भाषा में अच्छी और बुरी तमाम फिल्में बन रही हैं। जब हमने फिल्मों में प्रवेश किया है, तो हमारी एक अलग पहचान तो होनी ही चाहिए यहां। आज की फिल्मों से मैं संतुष्ट नहीं हूं। देवी मेरा नाम की जो स्क्रिप्ट है, उस पर मैं मन से काम कर रहा हूं। मुझे उम्मीद है कि यह अलग फिल्म साबित होगी।

स्क्रिप्ट फिट है, तो फिल्म के हिट होने की उम्मीद की जाए?
स्क्रिप्ट के साथ-साथ यदि अभिनेता और निर्देशक भी कमाल के हों, तो फिर सोने पर सुहागा वाली बात चरितार्थ हो सकती है।

फिल्मों का दौर, यानी तब और अब के बारे में कुछ कहेंगे?
पहले राजकपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद, राजकुमार, गुरुदत्त, बी आर चोपड़ा, मनोज कुमार, कमाल अमरोही, मीना कुमारी जैसे दिग्गजों की फिल्म जगत में तूती बोलती थी। एक से बढ़कर एक संगीतकार-गीतकार और गायक अपनी कला से लोगों को मुग्ध करते थे। वैसा युग तो अब शायद ही आए। कला की बारीकियां उनकी आत्मा में बसती थीं। आज की विडंबना यह है कि साधारण प्रतिभा के लोग ही ऊपर आ गए हैं। यही वजह है कि आज हिट
फिल्मों की लाइफ चंद दिनों की हो गई है।

कोई ख्वाब है?
खुद को औरों से अलग साबित करना चाहता हूं। यही मेरा ख्वाब है(दैनिक जागरण)।

Wednesday, October 27, 2010

झज्जर में खुलेगा फिल्म इंस्टीट्यूट

व्हिस्लिंग वुड्स इंटरनेशनल, इंस्टीटच्यूट फार फिल्म टेलीविजन एनीमेशन एंड मीडिया आर्ट्स,मुंबई हरियाणा के झज्जर में अपना एक और इंस्टीच्यूट खोलेगा। यह जानकारी फिल्म निदेशक एवं व्हिस्लिंग वुड्स इंटरनेशनल के चेयरमैन सुभाष घई ने मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को व्हिस्लिंग वुड्स इंटरनेशनल मुंबई में बातचीत करते हुए दी है।

हुड्डा इस संस्थान की फिल्म निर्माण तकनीक, पाठ्यक्रम संरचना एवं सुविधाओं से भी प्रभावित हुए। इससे पूर्व घई ने इंस्टीच्यूट पहुंचने पर मुख्यमंत्री हुड्डा का अभिनंदन किया। इस अवसर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव छतर सिंह एवं मीडिया सलाहकार शिव भाटिया भी उपस्थित थे।

हुड्डा ने व्हिस्लिंग वुड्स इंटरनेशनल को एक बेहतरीन संस्थान बताया। उन्होंने कहा कि घई समय से आगे चल रहे है और उनके संस्थान से न केवल हरियाणा अपितु आसपास के राज्यों को भी लाभ पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि आज असली दौड़ शिक्षा के क्षेत्र में है और आने वाले समय में वहीं क्षेत्र एवं समाज आगे बढ़ेगा, जो गुणवत्तापरक शिक्षा में आगे होगा। घई ने हुड्डा की उनकी शिक्षा के क्षेत्र एवं अन्य क्षेत्रों में दूरदर्शी सोच के लिए सराहना की।

उन्होंने मुख्यमंत्री को विश्वास दिलाया कि झज्जर के 20 एकड़ भूमि पर स्थापित होने वाले इस संस्थान का विशाल परिसर फिल्म तकनीक एवं मीडिया के क्षेत्र में गुणवत्तापरक शिक्षा उपलब्ध कराएगा। घई ने कहा कि यह संस्थान हरियाणा के साथ लगते राज्यों की आवश्यकताओं को भी पूरा करेगा।

उन्होंने कहा कि यह संस्थान दो वर्ष के अंदर-अंदर स्थापित कर लिया जायेगा और इसमें 100 करोड़ रुपये का निवेश किया जायेगा। इस संस्थान में फिल्म, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट, व्यवसाय प्रबंधन, फैशन तथा मनोरंजन व्यवसायों से संबद्ध अन्य सभी पाठ्यक्रम उपलब्ध होंगे।

व्हिस्लिंग वुड्स इंटरनेशनल को फिल्म, टेलीविजन, एनीमेशन तथा मीडिया आर्ट्स के क्षेत्र में एशिया का सबसे बड़ा संस्थान माना गया है, जो फिल्म एवं टेलीविजन के सभी तकनीकी एवं सृजनात्मक पहलुओं पर विश्व स्तरीय शिक्षा उपलब्ध करवा रहा है। इस संस्थान में इस क्षेत्र में 10 से 30 महीनों की अवधि के विभिन्न पाठ्यक्रम चलाये जा रहे है। यह संस्थान सुभाष घई, मुक्ता आर्ट्स लिमिटेड एवं फिल्म सिटी, मुंबई द्वारा संचालित किया जा रहा है।

इस संस्थान में राकेश मेहरा, विशाल भारद्वाज, आशुतोष गावरेकर, फरहान अख्तर, अशोक अमृतराज, श्याम बेनेगल, फराह खान, नसीरूद्दीन शाह, पंकज कपूर, रतना पाठक साहा, डेनी बोएले, राज कुमार हिरानी, नागेश कुकुनूर के अतिरिक्त कई अन्य जाने माने कलाकार इसमें नियमित अतिथि प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं देंगे। इस संस्थान से उत्तीर्ण होने वाले वर्तमान में बालाजी टेलीफिल्म्स, चैनल-31 आस्ट्रेलिया, धर्म प्रोडक्शन, एक्सल एंटरटेनमेंट, 20वीं सेंचुरी फॉक्स इंडिया, मुक्ता आर्ट्स लिमिटेड, पापरी खास स्टूडियो, प्रणा स्टूडियो, रेड चिली एंटरटेनमेंट, स्पाइस एंटरटेनमेंट, वॉकवाटर फिल्म्स एवं कई अन्य मनोरंजन संस्थानों ने कार्य कर रहे है(दैनिक भास्कर,चंडीगढ़,27.10.2010)।

Tuesday, October 26, 2010

क्यों न आ जाए सुकून की नींद

जिंदगी की खोई हुई चीजें अक्सर अचक-अचानक ही मिल जाती हैं। मेरे साथ भी आज ऐसा ही हुआ। सुबह, हस्बे मामूल, एक कैसेट लगाया। पहले दो गीत कानों को अच्छे लगे, मगर तीसरे गीत की पहली लाइन ने ही सीधे दिल पर दस्तक दे डाली। सब कुछ छोड़, उसी में खो गया। दिल बल्लियों उछलने लगा। वाह! क्या लोरी है। एक बार, दो बार, तीन बार, और फिर न जाने कितनी बार इसी लोरी को सुनता रहा। अचानक अपनी ही कुछ पुरानी पंक्तियां याद आ गईं- ‘इस उम्र में/हर रात/लोरी की कितनी जरूरत महसूस होती है/और ठीक इसी उम्र में/मां मेरे पास नहीं होती।’

इस समय इस लोरी में इस कदर डूबा हुआ हूं कि आप मान सकते हैं कि मैं नींद में हूं और बड़बड़ा रहा हूं। यह लोरी है महबूब खान की 1956 की फिल्म ‘आवाज’ की, जिसके निर्देशक थे जिया सरहदी। बोल हैं: ‘झुन झुनझुना, झुन झुनझुना, नाचे गगन, नाचे पवन, अ.अ.आ.आ.आ.आ।’ गीतकार विश्वामित्र आदिल के बोलों को जादू भरी धुन दी है सलिल चौधरी ने। अब जरा कल्पना कीजिए कि इन लफ्जों की अदायगी एकदम कोमल, मद्धम और चाशनी में डूबी लता मंगेशकर की आवाज में है। मगर नहीं, शायद सिर्फ कल्पना से काम नहीं चलेगा। मैं उसकी खूबियों को बताऊंगा तो भी काम नहीं चलेगा। अगर मेरे मामूली से बयान से लता मंगेशकर की गायकी बयान हो पाती है, तो फिर मैं ‘कि खुशी से मर न जाते..’ वाली हालत में न पहुंच जाता। बहरहाल इतना तो कह ही सकता हूं कि इसे सुनकर ऐसा जरूर लगता है, कम-से-कम मुझे तो लगता है कि ऐ काश! फिर से बच्चा बन जाता। यह लोरी सुनता और कहता-‘अ.अ.आ.आ.आ.आ।’

यकीन जानिए, बचपन में मां की लोरियां बहुत सुनी हैं। जिद करके सुनी हैं। कभी खाली बोरे से बने झूले में लेटकर, कभी मां की गोद में। मां की आवाज तो लता मंगेशकर जैसी बिल्कुल नहीं थी, मगर आज लता जी की आवाज न जाने क्यों मां जैसी ही लग रही है। इस आवाज में इतनी ममता है कि सुनकर झूले में पड़े-पड़े मचलने और सुनते-सुनते सो जाने का मन हो जाता है। सलाम! लता मंगेशकर सलाम!

ल..ल..ल..लोरी

कभी-कभी बहुत ताज्जुब होता है। दुनिया बदली- सो बदली, मां और बच्चों के रिश्ते में भी बदलाव आ गया? हिंदुस्तान ही नहीं, तमाम दुनिया में न जाने कब से मां और बच्चे के रिश्ते में पालने और लोरी का एक अटूट संबंध रहा है। मगर आजकल लोरी गाने का चलन बहुत कम हो गया है, खासकर शहरों में। हमारे सिनेमा से तो यह लगभग पूरी तरह गायब ही हो गया है।
लोरी की दुनिया दरअसल सपनों की दुनिया है। मां की लोरी में ऐसे हमीन और सुहाने वादे होते हैं कि मां के चेहरे पर आते भावों से रीझकर दुनिया के हर बच्चे के चेहरे पर पहले मुस्कान और फिर आंखों में नींद आ जाती है। और नींद में सपने होते हैं। तब शायद सपनों में भी मां होती है और उसके साथ उसके वादों की दुनिया भी।

हिंदी सिनेमा में इसके शुरुआती दौर से ही हर दूसरी फिल्म में लोरी जरूर होती थी। इनमें से कुछ लोरियां तो वाकई बहुत खूबसूरत हैं। के.एल. सहगल की आवाज में फिल्म ‘जिंदगी’ की लोरी ‘सो जा राजकुमारी सो जा’ या फिर फिल्म ‘अलबेला’ की ‘धीरे से आ जा तू अंखियन में, निंदिया आ जा तू आ जा।’ बांबे टॉकीज की ‘किस्मत’ की ‘धीरे-धीरे आ रे, बादल धीरे-धीरे आ’। फिल्म ‘सीमा’ की ‘सुनो छोटी-सी गुड़िया की लम्बी कहानी।’ वी. शांताराम की ‘दो आंखें बारह हाथ’ की ‘मैं जागूं रे तू सो जा।’ फिल्म ‘अंगुलिमाल’ में ‘धीरे-धीरे ढल रे चंदा, धीरे-धीरे ढल।’ फिल्म ‘ब्रह्मचारी’ में ‘मैं गाऊं तुम सो जाओ।’ यूं यह लिस्ट तो बहुत लंबी है, पर जो याद आया सो गिना दिया, बाकी तो आपको भी बहुत सारी याद ही होंगी।

हां, एक बात जरूर कहूंगा। कुछ फिल्मी लोरियों में बाद के दौर में इतना ऊंचा स्वर और संगीत का शोर आ गया कि सोता बच्चा जाग जाए। अब मिसाल के तौर पर फिल्म ‘सांझ और सवेरा’ में सुमन कल्याणपुर की आवाज में एक लोरी है ‘चांद कंवल, मेरे चांद कंवल, चुपचाप सो जा यूं न मचल।’ एक तो मुझे इसमें बच्चे के लिए वात्सल्य भाव से भी ज्यादा डांट नजर आती है और जब बात अंतरे तक जा पहुंचती है, तो आवाज इतनी ऊंची पिच पर जा पहुंचती है कि माधुर्य ही खत्म हो जाता है। शंकर-जयकिशन की ही एक और लोरी फिल्म ‘बेटी-बेटे’ की है- ‘आज कल में ढल गया, दिन हुए तमाम, तू भी सो जा सो गई रंग भरी शाम..’ इसमें भी साजों का बहुत शोर है।

अब दो और कमाल की लोरियां याद आ गईं। पहली है फिल्म ‘संत ज्ञानेश्वर’ की ‘मेरे लाडलों तुम फूलो-फलो।’ इसमें भरत व्यास के शब्द, लता मंगेशकर की भावपूर्ण गायकी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत का अद्भुत संगम है। ‘अपनी मां की किस्मत पर मेरे बेटे तू मत रो, मैं तो कांटों पर जी लूंगी, जा फूलों पर सो।’ मगर इतना सब कह चुकने के बाद भी मैं फिर अपनी पहली वाली बात पर ही आऊंगा- ‘झुन झुनझुना, झुन झुनझुना’ का जवाब नहीं। कानों में ऐसी मिठास भर गया है कि कुछ और सूझता ही नहीं।

(वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘बॉम्बे टॉकी’ से)
(राजकुमार केसवानी,हिंदुस्तान,दिल्ली,23.10.2010)

फिल्मी सितारों की करवाचौथ

आज की महिलाएं करवाचौथ का व्रत उतने ही जोश के साथ मनाती हैं, जैसे कि पहले की महिलाएं मनाया करती थीं। हमारी बॉलीवुड की शादीशुदा हीरोइनें भी अपनी व्यस्त जिंदगी में भूखे-प्यासे रह कर पति की सलामती के लिये करवाचौथ का व्रत रखती हैं। वे करवाचौथ कैसे मनाती हैं, आइये जानते हैं उन्हीं की जुबानी

ऐश्वर्या राय बच्चन

ऑफकोर्स मैं करवाचौथ का व्रत अपने पतिदेव के लिए करती हूं, चाहे मैं कितनी ही व्यस्त क्यों न हो जाऊं। यह व्रत मेरे लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। पिछले साल तो अभि ने भी मेरे साथ भूखे-प्यासे रह कर यह व्रत किया था। उनका कहना है कि जब मैं उनके लिए भूखी-प्यासी रह कर व्रत रख सकती हूं तो वह मेरे लिये यह व्रत क्यों नहीं रख सकते। जब मैं कुंवारी थी, तभी से मेरी दिली इच्छा थी कि जब मेरी शादी हो जाएगी तो मैं भी शादीशुदा लड़कियों की तरह यह करवाचौथ का व्रत अपने पति के लिये रखा करूंगी। आज भगवान ने मेरी सुन ली है। उन्होंने अभिषेक के रूप में बहुत प्यार करने वाला हसबैंड दिया है और इतनी अच्छी ससुराल भी मुझे मिली है कि मैं हर जन्म में अभि को ही पति के रूप में चाहूंगी। करवाचौथ के व्रत में यही मेरी भगवान से कामना होती है।

करिश्मा कपूर

मैं करवाचौथ का व्रत पूरे रीति-रिवाज के साथ ही मनाती हूं और पूरा दिन निर्जल रह कर करवाचौथ का व्रत रखती हूं। इस दिन मैं अपनी ससुराल की सभी औरतों के साथ मिल कर करवाचौथ की पूजा करती हूं। रात में चांद की पूजा करने के बाद अपने पति परमेश्वर की भी पूजा करती हूं और फिर उन्हीं के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत छोड़ती हूं। मेरे लिए तो यह व्रत बहुत ही मायने रखता है, क्योंकि एक सुहागन के लिए इस व्रत की बहुत अहमियत होती है। यह बात मैंने शादी के बाद ही महसूस की है।

रवीना टंडन

जब से मेरी शादी अनिल से हुई है, तब से तो मेरी पूरी जिंदगी ही बदल गयी है। उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया है कि मैं अपनी जिंदगी के सारे दुख और टेंशन हमेशा के लिए भूल गयी हूं। अनिल से शादी के बाद ही मैंने यह जाना कि पति की अहमियत एक औरत की जिंदगी में क्या होती है। मेरे पति मुझसे इतना प्यार करते हैं कि दुनिया की सारी खुशियां वो मुझे देने को तैयार रहते हैं। मैं मोटी रहूं या पतली, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, तो ऐसे में भला इतने प्यारे पति के लिये कौन करवाचौथ का व्रत नहीं रखना चाहेगा। मैं अपने पति के लिए पूरे रीति-रिवाज के साथ करवाचौथ का व्रत रखती हूं। और मजे की बात यह कि व्रत मैं रखती हूं और परेशान वह रहते हैं। मेरे पूरा दिन भूखे-प्यासे रहने पर उन्हें बहुत तकलीफ होती है, इसलिए करवाचौथ पर खास तौर पर वह मेरा ध्यान रखते हैं। मुझे एक अच्छा सा मेरी पसंद का गिफ्ट भी लाकर देते हैं। करवाचौथ पर जब मैं अपने पति की पूजा करती हूं तो उनका चेहरा देखने वाला होता है। उनके चेहरे पर उस वक्त जो खुशी होती है, वो देखने लायक होती है। अनिल का अपने प्रति इतना प्यार देखने के बाद करवाचौथ के व्रत पर पूजा करते समय मैं भगवान से यही प्रार्थना करती हूं कि हर जन्म में मुझे पति के रूप में यही मिलें।

सोनाली बेंद्रे बहल

गोल्डी से शादी के बाद मैं करवाचौथ का व्रत हर साल करती आई हूं। इस व्रत में मैं भगवान से अपने पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हूं। हमारे मराठी में पति की सलामती के लिये वट सावित्री का व्रत रखा जाता है, लेकिन मेरी शादी पंजाबी परिवार में हुई है, इसलिए मैं ससुराल वालों के मुताबिक करवाचौथ का व्रत रखती हूं। इस दिन मैं बिल्कुल वैसा ही महसूस करती हूं, जैसे कि मैंने अपनी शादी के दिन महसूस किया था(आरती सक्सेना,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.10.2010)।

तेलुगुदेशम को डीएमके का जवाब है रक्तचरित्र

केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए राजा को हटाए जाने और स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराए जाने की तेलुगूदेशम पार्टी की मांग और इस शुक्रवार को रिलीज हुई रामगोपाल वर्मा की फिल्म रक्त चरित्र-१ में क्या संबंध हो सकता है? न सिर्फ ये सवाल चौंकाने वाला है बल्कि इसका जवाब इससे भी ज्यादा हैरान करने वाला है।

भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक डीएमके कोटे के मंत्री पर कीच़ड़ उछालने वाली तेलुगूदेशम पार्टी के संस्थापक एन टी रामाराव के सियासी कारनामों को उजागर करने के लिए ही रक्तचरित्र का निर्माण किया गया है और इसके पीछे जिस शख्स के दिमाग और पैसे ने काम किया, वह और कोई नहीं बल्कि डीएमके अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के पोते दयानिधि अझागिरी हैं। दक्षिण की राजनीति में आने से पहले अपने फिल्मी किरदारों के चलते पूरे आंध्र प्रदेश में पूजे जाने वाले दिवंगत एन टी रामाराव ने ही तेलुगूदेशम पार्टी की स्थापना की और लंबे वक्त तक दक्षिण की राजनीति के जरिए केंद्र की सियासत को प्रभावित किया। नेशनल फ्रंट के गठन के समय से ही केंद्र की सत्ता में एक पाले में रही तेलुगूदेशम और डीएमके रिश्तों में खटास एनडीए के पहली बार गठन के वक्त आई थी। बाद में तमिलनाडु और आंध्र-प्रदेश दोनों ही राज्यों में सत्ता संतुलन बदलने से ये सियासी रिश्ते भी बनते बिग़ड़ते रहे लेकिन, तेलुगू देशम ने डीएमके पर सीधा निशान इस साल मई के पहले हफ्ते में साधा। इसके पोलित ब्यूरो सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री के येरन्नाायडू ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर न सिर्फ स्पेक्ट्रम घोटाले की चपेट में आए दूरसंचार मंत्री ए राजा को मंत्रिमंडल के बर्खास्त करने की मांग की बल्कि पूरे मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग की। निर्देशक रामगोपाल वर्मा के करीबी सूत्रों की मानें तो तेलुगूदेशम पार्टी की छवि पर हमला करने की योजना इसके बाद ही बनी।

इस फिल्म में प्रजा देशम पार्टी के बहाने और शत्रुघ्न सिन्हा को एन टी रामाराव के चोले में पेशकर ये बताने की कोशिश की गई है कि कैसे तेलुगूदेशम पार्टी ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए अपराधी तत्वों का सहारा लिया। फिल्म के कथानक को लेकर आंध्र-प्रदेश में बवाल मचा हुआ है। तेलुगूदेशम के नेता इस फिल्म को रामाराव की छवि को ध्वस्त करने की साजिश बता रहे हैं।

फिल्म की शुरुआत में इसके निर्माता के रूप में दयानिधि अझागिरी की कंपनी क्लाउड ९ का नाम देखकर एक नया हंगामा शुरू हो गया है। दयानिधि के पिता एम के अझागिरी केंद्र में रसायन और उर्वरक मंत्री है और उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं अक्सर अपने भाई स्टालिन की सियासत में रुकावटें डालती रही हैं। आंध्र प्रदेश में रक्तचरित्र के तेलुगू संस्करण को देखने वालों का कहना है कि ये फिल्म एन टी रामाराव की वहां अब तक बनी रही छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर रही है और पार्टी के कुछ नेता इसके खिलाफ अदालत की शरण लेने का भी मन बना रहे हैं। इस बारे में फिल्म के निर्देशक राम गोपाल वर्मा कुछ नहीं कहना चाहते(पंकज शुक्ल,नई दुनिया,दिल्ली,26.10.2010)।

पग-पग हॉलीवुड....

अमेरिका के किसी शहर को क़दमों से नापना ही अटपटा लगता है, लेकिन हॉलीवुड उन कुछ गिने-चुने जगहों में से है, जो अपने स्टीरियोटाइप्स को अभी भी जी रहे हैं। बस थोड़ी-सी कोशिश, और यह ढेर सारे यादगार अनुभव देता है। पैदल चलने वालों के लिहाज से शानदार यह डिस्ट्रिक्ट लॉस एंजिल्स के अतीत और भविष्य, दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।

अतीत में हैं कैपिटल रिकॉर्डस बिल्डिंग सरीखे आइकॉन और शहर का भविष्य है- बहुजातीय, ऊपर उठती इमारतें और घनी आबादी। पुनर्जागरण के हालिया दौर के चलते अब यहां हैं मिलियन-डॉलर कोंडोस, ट्रेंडी रेस्टरांज, वर्ल्ड क्लास मूवी थिएटर और सेलिब्रिटीज के नजारे।

लेकिन साथ ही यहां टैटू पार्लर्स, सेक्स शॉप्स और बेघर लोग भी क़ायम हैं। और ये सारी चीजें मिलती हैं हॉलीवुड वाक ऑफ फ़ेम में, जहां यह मुश्किल ही है कि किसी क्षण में आपको गुदगुदी न हो या आप भ्रमित न हों। आख़िर, यह ऐसी जगह है, जो लॉस एंजिल्स में ही हो सकती है।

शुरू करें सुबह-सुबह : लॉस एंजिल्स सुबह का शहर है। सो, स्क्वैयर वन डायनिंग पर ब्रेकफास्ट से शुरुआत कीजिए, जो किसानों के उत्पाद पर फोकस करने वाला जिंदादिल लोकल स्पॉट है। बनाना स्रिटस कारमेल के साथ कुछ फ्रेंच टोस्ट ऑर्डर कीजिए या फिर टमाटर और एरुगुला के साथ प्रेस्ड एग सैंडविच।

फिर सड़क के पार स्थित साइंटोलॉजी हेडक्वार्टर्स को निहारें। यह हॉलीवुड की छवि बनाने वाले सर्वाधिक उपयुक्त भवनों में से एक है। और यह भी देखने की कोशिश करें कि इसके पार्किग एरिया में कौन-सा स्टार जा रहा है या बाहर आ रहा है।

सेलिब्रिटी डॉग वाकर्स : हॉलीवुड बूलवार्ड (मुख्य सड़क) से दो ब्लॉक उत्तर की ओर अमेरिका के सबसे अनोखे अर्बन पार्को में से एक, रनयॉन केनयॉन है। 130 एकड़ में फैले इस पार्क में सीधी ढालें और कई पैदल मार्ग हैं, जहां से सैन फर्नाडो घाटी, प्रशांत महासागर और साफ़ दिनों में कैटलिना आइलैंड का नजारा होता है। यहां ग्रिफ़िथ ऑब्Êारवेटरी भी है, जहां अंतरिक्ष और विज्ञान से जुड़ी रोचक प्रदर्शनियां हैं। यह क्षेत्र डॉग ओनर्स के बीच लोकप्रिय है, जिनमें सेलिब्रिटीÊा भी शामिल हैं। यहां कुत्तों को पट्टा लगा या चेन से बांधकर रखने की बंदिश नहीं है।

देखें ‘हॉलीवुड’: लॉस एंजिल्स के बहुत सारे मूल निवासी भी ब्रेंसडाल आर्ट पार्क के बारे में नहीं जानते। यह पब्लिक स्पेस है, जिसे 1927 में एलिन ब्रेंसडाल ने दान किया था। यहां से हॉलीवुड साइन (पहाड़ी पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा ‘हॉलीवुड’) का मनमोहक नजारा होता है और यह लॉस एंजिल्स की इक्का-दुक्का जगहों में है, जहां आप हरी घास पर बैठ सकते हैं। यहां लॉस एंजिल्स म्युनिसिपल आर्ट गैलरी, एक थिएटर और हॉलीवुड हाउस है।


थोड़ी पेट पूजा : आपने कभी सोचा था कि हॉलीवुड जाकर आप रॉ फूड खाएंगे? यह वेस्ट हॉलीवुड है जनाब। इस एरिया में लंबा घूमना है, सो पहले नॉर्थ ग्रावर स्ट्रीट पर रोसकोÊा हाउस ऑफ चिकन एंड वेफ़ल्स में थोड़ी पेटपूजा कर ली जाए। बेहद पसंद की जाने वाली यह फूड चेन ग्रेवी में डूबे हाफ़ चिकन के लिए जानी जाती है, जिसे दो वेफल्स के साथ सर्व किया जाता है। अगर हल्का खाना चाहिए, तो कॉर्न ब्रेड के साथ रेड बींस व राइस ऑर्डर कीजिए।

खोजें सीडीज : रोसकोज से अमीबा रिकॉर्डस की ओर फास्ट वाक होती है। यह अमेरिका के सबसे बड़े इंडिपेंडेंट रिकॉर्ड स्टोर्स में है, जहां नई और इस्तेमाल की हुई सीडीज व डीवीडीज मीलभर तक फैले क्षेत्र में खोजी जा सकती हंै। यहां पर लाइव परफॉर्मेस भी चलता रहता है, जिसमें शहर के संभावनाशील कलाकारों को मौक़ा मिलता है।

हाईटेक मूवी : चलते रहें। अब आप आर्कलाइट सिनेमा की ओर बढ़ रहे हैं, जहां अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ साउंड व प्रोजेक्शन सिस्टम में से एक लगा है। साथ ही यहां शानदार, आरामदायक कुर्सियां भी हैं।
टेस्ट ऑफ़ पेरू : नॉर्थ वाइन के कॉर्नर पर मुड़ें और आप एक छोटी-सी जगह पर पहुंचेंगे, जहां पूरी सजावट लीमा के प्रसिद्ध बाल्कोंस या बाल्कोनीज की छोटी प्रतिकृतियों से की गई है। यह लॉस बाल्कोंस डेल पेरू है, जहां परिवार, कपल्स और गायज नजर आते हैं।

आप चिचा मोराडा से शुरुआत कीजिए, जो कॉर्न वाटर के साथ बनी एक फ्रूट ड्रिंक है। फिर लोमो साल्टेडो चखें या प्याज के साथ सॉटीड या टाकु टाकु कॉन मॉरिस्कोस, जो पेरू की बींस और श्रिंप के साथ रिफ्राइड की जाती है।

फिर से सड़क पर : बेशक, यहां से टूरिस्ट गुज़रते ही हैं, पर आप हॉलीवुड बूलवार्ड से एक बार और गुजारिए और सैकड़ों स्टार्स को देखते हुए ख़ुद से पूछिए कि आप कितनों को पहचान पाए। ऐसा करते हुए ‘लकी डेविल्स’ पर जरूर रुकें और टोस्टेड पिकान माल्ट चखें। यह मीठा मिश्रण टूरिस्ट को बहुत पसंद आता है और जाहिर है, हॉलीवुड के अनुभवों के साथ इसका स्वाद भी हमेशा याद रहता है(दैनिक भास्कर,24.10.2010)।