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Tuesday, December 21, 2010

पश्चिम के आसमान में बॉलीवुड सितारे

अमेरिका और पश्चिमी देशों में सिने दर्शकों की जो मुख्यधारा है, उसमें मुंबइया फिल्मों या बॉलीवुड के सितारों की कोई खास पहचान नहीं है। यह स्थिति लंबे समय से है, लेकिन नए हालात में जल्दी ही बदल सकती है। अमेरिका में दूसरे देशों से आकर बसे आप्रवासी लोगों के जो समुदाय हैं, उनमें दक्षिण एशियाई लोगों के समुदाय का आकार तेजी से बढ़ रहा है।

इन्हीं आप्रवासियों को ध्यान में रखकर बनाई गई बॉलीवुड फिल्में बड़े पैमाने पर अमेरिकी सिनेमागृहों में दिखाई जाने लगी हैं। अमेरिकी परदे पर ऐसी फिल्मों का एक विस्फोट-सा देखा जा सकता है। यही कारण है कि अब भारतीय फिल्मी सितारे दुनिया के इस हिस्से में अपनी अजनबीयत से उबर रहे हैं और जल्दी ही यहां गुमनाम या अनजाने नहीं रहेंगे।

मेरी बहन एक किस्सा सुनाती हैं। वह चैनल 9 के साथ एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थीं। इसमें फिल्म अभिनेत्री प्रीति जिंटा पर भी फोकस था। जब प्रीति से हॉलीवुड और बॉलीवुड की तुलना करने को कहा गया तब उन्होंने यह घटना टेलीविजन टीम को बताई। प्रीति उस विमान में लंदन से न्यूयॉर्क जा रही थीं। उन्होंने देखा कि फस्र्ट क्लास कैबिन में सुंदर और उभरे हुए होंठों वाली एक अमेरिकी महिला मुड़ी-तुड़ी जींस पहने और गहरा काला चश्मा लगाए बैठी हैं। तभी ऑटोग्राफ लेने वाले यात्रियों की एक भीड़ विमान की इकॉनोमी क्लास से फर्स्ट क्लास की ओर दौड़ी।

यह देखकर अमेरिकी महिला के होठों से निकला, ‘ओह, गॉड!’ लेकिन तभी उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उस भीड़ ने उनकी बगल से गुजरकर आगे बैठी प्रीति को घेर लिया। भारतीय अभिनेत्री क्षमा मांगने की मुद्रा में उनकी तरफ देखकर मुस्कराईं और अपने दक्षिण एशियाई प्रशंसकों की ऑटोग्राफ बुक पर दस्तखत करने में व्यस्त हो गईं। उभरे हुए होंठों वाली वह खूबसूरत अमेरिकी महिला कोई और नहीं हॉलीवुड की जानी-मानी अभिनेत्री एंजेलिना जोली थीं। हॉलीवुड पर हुकूमत करने वाली उस साम्राज्ञी ने मन ही मन जरूर पूछा होगा कि ‘यह हिंदुस्तानी महारानी आखिर है कौन?’ जाहिर है, पश्चिम में भी बॉलीवुड के सितारों का सूर्योदय हो रहा है।

लेकिन मुंबई की फिल्मी दुनिया में ऐसे सितारे भी हैं जिन्हें अपनी प्रसिद्धि और अपने यश की सीमाओं को लेकर कोई गलतफहमी नहीं है। न ही उन्हें इस बारे में कोई अफसोस है। इनमें संभवत: अमिताभ बच्चन सबसे आगे हैं। न्यूयॉर्क के लिंकन सेंटर में उनकी फिल्मों का एक रेट्रोस्पेक्टिव आयोजित किया गया था, जिसमें भाग लेने वह आए थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या वह हॉलीवुड की फिल्में करना पसंद करेंगे? सवाल सुनकर पहले तो वह हंसे, फिर बोले कि हॉलीवुड ने दरअसल उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया। ‘हर अभिनेता सबसे पहले अपने घर या अपने स्वदेश के बारे में सोचता है। मैं जहां हूं वहीं बहुत खुश हूं।’ अमिताभ बच्चन वह शख्स हैं जिन्होंने अपने को ‘दुनिया का सबसे महान फिल्म सितारा’ मानने से इनकार कर दिया था। यह तमगा उन्हें 1999 में बीबीसी के ऑनलाइन सर्वे में दिया गया था, जब उन्हें लॉरेंस ओलिवर जैसे महान अभिनेताओं को पीछे छोड़ते हुए स्टार ऑफ द मिलेनियम चुना गया था। बच्चन यह सुनकर नाराज हो जाते हैं कि भारतीय सिनेमा को पश्चिमी दर्शकों की रुचियों के हिसाब से अपने को बदल लेना चाहिए। ‘अगर हमारी फिल्में किसी न किसी रूप में कम भारतीय होती हैं, तो यह बहुत दुखद होगा।’

लेकिन बदलाव तो आ रहे हैं, चाहे वे कितने ही बेतरतीब हों या कितने ही जबरदस्ती किए जा रहे हों। अगर आपको यह देखना हो कि ग्लोबलाइजेशन या भूमंडलीकरण किस तरह बॉलीवुड की फिल्मों को बदल रहा है, तो आपको ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं, हाल ही में बनी फिल्म काइट्स को देखिए। ऋतिक रोशन अभिनीत इस फिल्म का वितरण रिलायंस बिग पिक्चर्स ने किया था। इसके दो संस्करण बनाए गए थे। 130 मिनट लंबा एक हिंदी संस्करण था जिसमें तमाम नाच और गाने थे। इसका एक छोटा और कसा हुआ अंग्रेजी संस्करण भी था, जो सिर्फ 90 मिनट लंबा था। इसका नाम था काइट्स : द रीमिक्स और इसका संपादन किया था हॉलीवुड डायरेक्टर ब्रेट रैटनर ने। रैटनर ने पश्चिमी दर्शकों की रुचियों और संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इसका संपादन किया था। इस छोटे अंग्रेजी संस्करण में उन्होंने मूल फिल्म के सारे नाच-गाने, उपकथाओं और बेकार के दृश्यों को निकाल दिया था।

काइट्स : द रीमिक्स परीक्षा में पास हुई। मई में इसे अमेरिकी सिनेमागृहों में प्रदर्शित किया गया और उस सप्ताह यह सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाली टॉप टेन फिल्मों में शुमार हुई। ऐसा करने वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी। प्रमुख अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स फिल्म की इस कामयाबी से चकरा गया। उसने फिल्म के कसीदे काढ़ते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो आम तौर पर वह नहीं करता है। मिसाल के लिए, उसने लिखा कि ऋतिक रोशन ‘स्मोकिंग बॉडी’ के स्वामी हैं। स्मोकिंग बॉडी का फिर चाहे जो अर्थ रहा हो(उत्तरा चौधरी,दैनिक भास्कर,19.12.2010)।

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