
पुस्तक मेंअरुणा वासुदेव ने अपने संस्मरण में "सिनेमाया" के जन्म की दिलचस्प कहानी बताई है। एक समय में अरुणा वासुदेव और वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और फिल्मकार चिदानंद दासगुप्त ने एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी सिनेमा पर फोकस के इरादे से एक ऐसी महत्वाकांक्षी पत्रिका की योजना बनाई थी जो अंग्रेजी फ्रांसीसी और स्पानी भाषा में एक साथ सामने आए। खुद अरुणा वासुदेव ने स्वीकार किया है कि यह एक "वाइल्ड आइडिया" था। पर अचानक १९८८ में अरुणा ने अपनी एक छोटी पर मेहनती टीम बनाई और "सिनेमाया" का पहला अंक सामने आ गया। जापान के चर्चित और विवादास्पद फिल्मकार नागिसा ओशिमा से कहा गया कि आप हमारे लिए एक फिल्म निर्देशक का कॉलम लिखें। ओशिमा ने पहले अंक के लिए तोक्यो से एक पत्र भेजा जो पुस्तक में संकलित हैं। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम भी पहले अंक को आर्थिक सहयोग देने के लिए तैयार हो गया। १३ अक्टूबर, १९८८ को सिनेमाया का जन्म हुआ। अरुणा वासुदेव की टीम ने २००४ तक पत्रिका के ६१ अंक निकाले। इस बीच सिनेफैन फिल्मोत्सव ने २००४ में "सिनेमाया" और "सिनेफैन" दोनों को अपना हिस्सा बना लिया। ओशियान ने "सिनेमाया" के छह अंक निकालने के बाद उसे बंद कर दिया गया। "सिनेफैन" को शुरू में काफी ग्लैमरस बना दिया गया। ओशियान कला की कमाई से "सिनेफैन" को चला रहा था। २००८ से कला बाजार लड़खड़ाने लगा। "सिनेफैन" पर भी इसका निषेधी असर पड़ा। इस साल यह हो पाएगा या नहीं यह स्पष्ट नहीं है लेकिन "नेटपैक" के माध्यम से वासुदेव ने अपने पुराने सपने को एक नया अवतार दे दिया है। फ्रांसीसी सांस्कृतिक केंद्र, स्पानी सांस्कृति केंद्र , इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, द एशियन हेरिटेज फांउडेशन, एनएफडीसी आदि की मदद से वासुदेव ने एक बार फिर से विनम्र शुरुआत कर दी है। आज भले ही एशियाई सिनेमा पर फोकस की कोई खास समस्या नहीं रह गई है पर जब "सिनेमाया" शुरू हुई थी तो एशियाई सिनेमा को ऐसे फोरम की सख्त जरूरत थी। सिनेमाया का इतिहास एशियाई सिनेमा पर सार्थक फोकस की कहानी है(नई दुनिया,दिल्ली,29.8.2010)।
No comments:
Post a Comment
न मॉडरेशन की आशंका, न ब्लॉग स्वामी की स्वीकृति का इंतज़ार। लिखिए और तुरंत छपा देखिएः