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Saturday, August 21, 2010

बॉलीवुड पर भारी छालीवुड

छत्तीसगढ़ में छॉलीवुड छा गया है। राज्य की 54 में से 32-33 टॉकिजों में छत्तीसगढ़ी फिल्में धूम मचा रही हैं। हिंदी फिल्मों के मुकाबले आय के नए कीर्तिमान तो रचे ही जा रहे हैं, दम तोड़ते सिनेमा उद्योग को छत्तीसगढ़ी फिल्मों से नई संजीवनी मिल गई है।

राज्य में हर शुक्रवार को टॉकिजों में फिल्में बदलती हैं। कल 55 से 60 फीसदी टॉकिजों में छत्तीसगढ़ी फिल्में चल रही थीं। हिंदी फिल्मों के बड़े स्टारों को यहां थियेटर नहीं मिल रहे हैं। राजधानी रायपुर की चार में से दो, अंबिकापुर, भाटापारा, बालोद, पेंड्रारोड व पेंड्रा की सभी टॉकिजों, धमतरी, दुर्ग व राजनांदगांव जिलों में आधी टॉकिजों में छत्तीसगढ़ी फि ल्में चल रही हैं।

सुखद बात यह कि कस्बों से लेकर शहरों तक छत्तीसगढ़ी फिल्मों को देखने दर्शक टूट पड़े हैं। 13 अगस्त को रिकार्ड तीन फिल्मे एक साथ रीलीज हुईं और तीनों सुपर हिट साबित हो रही हैं। इनमें महूं दीवाना तहूं दिवानी, मया और टुरी नंबर वन शामिल हैं। अंबिकापुर जैसी छोटी जगह पर तीनों टाकिजों में शुक्रवार को मया दे दे मयारू, महूं दीवाना तहूं दिवानी और टुरी नंबर वन के सभी शो हाउसफुल रहे।

सिनेमाघरों के संचालकों ने बताया कि करीब सवा लाख रुपए का पहले दिन कारोबार हुआ। अन्य स्थानों पर हिंदी फिल्मों के मुकाबले ज्यादा बिजनेस दे रही हैं। कटघोरा में बंद पड़े सिनेमाघर मीरा में छत्तीसगढ़ी फिल्म देखने भीड़ जुट रही है। संचालक नरेश अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों के जरिए फिर से शुरू कर दिखाया है।

नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के वक्त करीब 100 सिनेमाघर थे। तब मोर छईंयां-भुईयां ने 40 फीसदी टॉकिजों में धूम मचाई थी। दिलचस्प यह कि इनमें से 29 टॉकिजों में चल रही फिल्में मया दे दे मयारू, टुरी नंबर वन और महूं दीवाना तहूं दिवानी के हीरो अनुज शर्मा हैं।

राज्य बनने के बाद से छॉलीवुड के हीरो नंबर वन बने हुए हैं। उनकी 12 में से 10 फिल्में हिट रही हैं। चार फिल्मों मोग छहियां भुईंया, मया, झन भुलाबों मां-बाप ला और मया दे दे मया ले ले ने सिल्वर जुबली मनाई। फिल्म रघुवीर तो कई टॉकिजों में 100 से अधिक दिन चली।

पुणे की सिम्बॉयसिस यूनिवर्सिटी ने उन्हें 2009 में यंग कम्युनिकेटर अवॉर्ड से नवाजा है। अन्य कलाकारों में प्रकाश अवस्थी, संजय बत्रा, सिल्की गुहा, रिजवाना, रेशम, सीमा सिंह, पुष्पेंद्र सिंह. मनमोहन ठाकुर, शशिमोहन सिंह भी पसंद किए जा रहे हैं।


कहते हैं छॉलीवुड वाले

फिल्मों आज दर्शक अपनापन ढूंढ रहे हैं और वह उन्हें छत्तीसगढ़ी फिल्मों में मिल रहा है। छत्तीसगढ़ सहित देश की 75 फीसदी आबादी कस्बों में रहती है। यही वजह है कि क्षेत्रीय फिल्में दर्शक पसंद कर रहे हैं। पहले निर्माताओं को अनुभव नहीं था कि कैसी फिल्में बनानी है। - अनुज शर्मा, सुपर स्टार छॉलीवुड

हमने तकनीक विकसित कर ली है। अनुभवी लोग फिल्म बना रहे सफल हो रहे हैं। हिंदी फिल्मों के दर्शक भी आएं। वे भी छत्तीसगढ़ी फिल्में देखें और स्वयं आंकलन करें। उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा। - मनोज वर्मा, फिल्म निर्माता

शहर की दोनों टॉकिजों में छत्तीसगढ़ी फिल्में चल रही हैं। हिंदी फिल्मों के 10-12 दिनों के मुकाबले वे माहभर या 50 से 100 दिन तक चल रही हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्मों में बंद होते सिनेमाघरों को जीवनदान दे दिया है। - पवन अग्रवाल, सिनेमाघर संचालक भाटापारा

खास बातें

- 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस बनी।- 1968 में दूसरी फिल्म घर - द्वार बनी।- 2001 में मोर छईहां-भुंईहां बनी।- 45 सालों में 70 फिल्में बनाई गईं।- करीब 20 फिल्में निर्माणाधीन हैं।- फिल्म मेकिंग के मामले में छॉलीवुड आत्मनिर्भर है।- केवल सेंसरशिप के लिए फिल्में मुंबई भेजी जाती हैं।- राज्य सरकार ने टैक्स फ्री कर रखी हैं छत्तीसगढ़ी फिल्में(जॉन राजेश पॉल,दैनिक भास्कर,रायपुर,21.8.2010)।

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