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Tuesday, June 15, 2010

जफर: सिनेमा प्रेम का पथरीला सफर

ईरान में सिनेमा बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद नए विषय वस्तु और शिल्प को लेकर ईरान का सिनेमा दुनिया में चर्चित है। ऎसे ही फिल्मकार जफर पनाही पिछले कई महीनों जेल में रहे। दबावों के चलते सरकार को उन्हें रिहा करना पडा।

दुनियाभर में अपने नई शैली और विषयों के लिए विख्यात ईरानी सिनेमा के बारे में तो लोग जानने लगे हैं लेकिन वहां के फिल्मकारों के संघर्ष के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। इस साल कान फिल्म फेस्टिवल में ईरान के मशहूर फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी ने जब ईरानी फिल्मकार जफर पनाही की जेल से रिहाई की मांग की तो दुनिया के मंच पर एक बार फिर ईरानी फिल्मकारों पर सरकारी सेंसरशिप को दुनिया ने देखा। हालांकि पिछले दिनों ही जफर पनाही को सरकार ने जेल जमानत पर रिहा कर दिया है। जफर मार्च से ही जेल में थे। वे विपक्षी नेता मीर हुसैन मौसवी के समर्थक माने जाते हैं। उन पर आरोप था कि वे पिछले साल ईरान में विवादित राष्ट्रपति चुनावों पर फिल्म बनाना चाहते थे।

कान समारोह में जफर की वकालत करते हुए किरोस्तामी ने कहा था कि एक फिल्मकार को इस तरह जेल में बंद करना अभिव्यक्ति पर हमला है। किरोस्तामी के मुताबिक एक फिल्म बनाना अपराध कैसे हो सकता है 'खासकर ऎसी फिल्म के लिए किसी को जेल में बंद करना कैसे जायज हो सकता है, जो अभी बनी ही नहीं।' उन्होंने पिछले दिनों जेल में अपने साथ दुर्व्यवहार को लेकर लेकर भूख हडताल कर दी थी। बाद में प्रशासन ने उनके परिवार को गिरफ्तार करने की धमकियां दी। लेकिन जफर नहीं डिगे। जफर ने कहा कि उन्हें एक फिल्मकार होने पर गर्व है और उसी सिनेमा की कसम खाकर कहते हैं कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जाएंगी वे भूख हडताल खत्म नहीं करेंगे। वे अपने परिवार और वकील से मिलना चाहते थे और जमानत पर रिहा होने की मांग कर रहे थे। दुनिया के मानवाघिकार संगठनों, बुद्धिजीवियों ने ईरान सरकार आलोचना भी की। फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग, फ्रांसिस फोर्ड कोपोला और मार्टिन स्कॉरसेस ने इरान सरकार से निजी तौर पर आग्रह किया कि जफर को रिहा किया जाए।

49 वर्षीय पनाही दुनिया के जाने माने फिल्मकार हैं और दुनिया के कई देशों में हुए फिल्म फेस्टिवल्स में उन्होंने अवार्ड जीते हैं। वे ईरानी समाज पर सरकारी अंकुश और वहां के जनविरोधी हालातों पर काम करते रहे हैं। ईरान सरकार उन्हें पसंद नहीं करती। अघिकारी उनकी फिल्मों की आलोचना करते रहे हैं कि वे ईरान की नकारात्मक छवि अपने सिनेमा में दिखाते हैं। उनकी कई फिल्मों को सरकार ने ईरान में प्रदर्शित नहीं होने दिया। उनकी फिल्म 'क्रिमसन गोल्ड' ईरान में प्रतिबंघित कर दी गई। इसमें एक पिज्जा डिलीवर करने वाले आदमी के जरिए ईरान में उच्च वर्ग के विशेषाघिकारों को दिखाया गया। इस फिल्म ने 2003 में कान फिल्म समारोह में अन सर्टेन रिगार्ड श्रेणी में नामांकित किया गया।
नई धारा के ईरानी सिनेमा की खूबी यही है कि वह बच्चों और बडों के जीवन से जुडी आम कहानियों में भी एक राजनीतिक यथार्थ की कहानी रूपकीय अंदाज से कहते हैं, चाहें वो माजिद मजीदी हों, किरोस्तामी हों या मखमलबाफ। ईरानी फिल्मकार अपनी इसी राजनैतिक चेतना के चलते ही अकसर वहां सरकार और प्रशासन के निशाने पर रहते हैं। इस लिहाज से जफर वहां के अग्रणी फिल्मकार हैं। वे तो राजनीतिक रूप से सक्रिय भी है।

उनकी फिल्म 'द सर्किल' भी ईरान में रिलीज नहीं होने दी गई। इसमें उन्होंने एक इस्लामी देश में औरतों के खराब हालात को दिखाया। फिल्म ने सन 2000 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन गलोब जीता था। 2006 के बर्लिन फिल्म समारोह में पनाही की फिल्म 'ऑफसाइड' ने दूसरा सबसे बडा अवार्ड हासिल किया। इसमें कॉमेडी के जरिए सॉकर देखने पर माहिलाओं की पाबंदी पर तंज किया गया है। सरकार ने एक आंदोलन में शामिल होने के लिए पहले भी पनाही को गिरफ्तार किया था। पनाही ने हार नहीं मानी लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं है। पुलिस जांच के दौरान उनसे पूछा गया कि, तुम ईरान में क्यों रहते हो तुम बाहर जाकर फिल्में क्यों नहीं बनाते(रामकुमार सिंह,Rajasthan Patrika,6 june,2010)

3 comments:

  1. ज़फ़र पनाही के बारे में जानकर दुख: हुआ,पर खुशी इस बात की है कि वीपरीत परिस्थितियों में में भी जैसी फ़िल्मों को इन लोगों ने बनाया है सभी मील का पत्थर साबित हुई हैं ,मै उन खुशनसीब लोगों में हूँ जो मैने इनकी फ़िल्में देखीं हैं......ज़फ़र पनाही, माजिद मजीदी,किरोस्तामी मखमलबाफ, इल्माज़ गुने इन सभी को हमारा सलाम।

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  2. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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