स्वागत

Tuesday, September 14, 2010

यूपी में टॉकीजों के वजूद पर खतरा

मल्टीप्लेक्स के दौर में सूबे के साढ़े चार सौ से ज्यादा सिनेमाहालों में ताले लग चुके हैं। जो चल रहे हैं उनमें से भी ज्यादातर में कभी भी ताले लग सकते हैं। इन हालात के बावजूद सरकार सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों का वजूद बचाने के प्रति गंभीर नहीं दिखती। मल्टीप्लेक्स को बढ़ावा देने के लिए पूर्व में लागू की गई प्रोत्साहन योजना से सूबे में वे तो धड़ाधड़ खुलते जा रहे हैं लेकिन उनकी चकाचौंध के आगे सिनेमाहाल का वजूद खतरे में पड़ता जा रहा है। दर्शक घटते जा रहे हैं जबकि खर्चो के बढ़ते रहने से सिनेमाहाल चलाना घाटे का सौदा साबित होता जा रहा है। यही कारण है कि सूबे 1018 सिनेमाहालों में से अब तक 460 में ताले लग चुके हैं। चूंकि सिनेमाहाल तोड़कर उस भूमि का व्यावसायिक उपयोग प्रतिबंधित है इसलिए बंद सिनेमाहाल खंडहर में ही तब्दील हो रहे हैं। इससे सिनेमा मालिक तो वित्तीय संकट झेल ही रहे हैं, सरकार को भी राजस्व नहीं मिल रहा है। सन 2004-05 में सिंगल स्क्रीन सिनेमाहालों को प्रोत्साहित करने को नई नीति लागू की गई थी लेकिन उसमें सिनेमाहाल को पूरा तोड़ने व 300 सीटों का बनाने पर ही व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति देने जैसी शर्ते थी जिससे सिनेमा मालिक उसके प्रति आकर्षित ही नहीं हुए। ऐसे में जब मौजूदा सरकार में सिनेमा मालिकों ने दौड़-भाग की तो कहा गया कि उन्हें सिनेमाहाल पूरा तोड़ने व न्यूनतम 300 सीटों के बनाने की शर्त से राहत मिलेगी। सिनेमा मालिकों को ऐसी छूट दी जाएगी कि वे सिनेमाहाल को जरुरत के हिसाब से परिवर्तित कर सकें बशर्ते उसमें न्यूनतम 125 सीटों का सिनेमाहाल रहे। ऐसे में वे शेष भवन काव्यावसायिक इस्तेमाल भी कर सकेंगे। पिछले वर्ष से अब तक उक्त प्रस्ताव शासन में विचाराधीन ही है। प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी न मिलने सेस्थिति जस की तस है। उत्तर प्रदेश सिनेमा एग्जीबिटर्स फेडरेशन के महामंत्री आशीष अग्रवाल का कहना है कि सरकार द्वारा इस ओर ध्यान न देने से सिनेमा उद्योग पूरी तरह चौपट होता जा रहा है। पायरेसी पर अंकुश न लगने व ज्यादा टैक्स दर से सिनेमाहालों की औसतन 85 फीसदी सीटें खाली ही रहती हैं। उन्होंने कहा कि यहां सर्वाधिक 40 फीसदी टैक्स होने के साथ ही अनुरक्षण शुल्क और कूलिंग की अलग से व्यवस्था नहीं है। बिजली की समस्या भी रहने से सिनेमा हाल चलाना जबरदस्त घाटे का सौदा होता जा रहा है। हाल ही में मनोरंजन कर आयुक्त की कुर्सी संभालने वाले एसके द्विवेदी का कहना है प्रदेश में मनोरंजन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बंद सिनेमाहालों के ताले खुलवाने को लेकर सरकार पूरी तरह से गंभीर हैं(अजय जायसवाल,दैनिक जागरण,लखनऊ,14.9.2010)।

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....

    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

    ReplyDelete
  2. aaj kal t.v.ke age me cinema hall me kaun jaye.yeh bhi ek durbhagya hai .electronic media jyada hawi hai.prastuti is nice.

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छा लिखा है...मैं खुद साहिर साहब की प्रशंसक हूं...उन्होनें न जाने कितने लोगों के मन की बातें कह दीं...

    ReplyDelete

न मॉडरेशन की आशंका, न ब्लॉग स्वामी की स्वीकृति का इंतज़ार। लिखिए और तुरंत छपा देखिएः